भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३८२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २५

प्राप्ते ब्रूमः—परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमितः पुरुषो भवितुमर्हति। कस्मात्? शब्दात्, ‘ईशानो भूतभव्यस्य’ इति। नह्यन्यः परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुशमीशिता। ‘एतद्वै तत्’ इति च प्रकृतं पृष्टमिहानुसंदधाति। एतद्वै तद्यत्पृष्टं ब्रह्मेत्यर्थः। पृष्टं चेह ब्रह्म ‘अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद’ (का० १।२।१४) इति। शब्दादेवेति, अभिधानश्रुतेरेवेशान इति परमेश्वरोऽयं गम्यत इत्यर्थः ॥ २४ ॥

कथं पुनः सर्वगतस्य परमात्मनः परिमाणोपदेश इत्यत्र ब्रूमः—

हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ २५ ॥

सर्वगतस्यापि परमात्मनो हृदयेऽवस्थानमपेक्ष्याङ्गुष्ठमात्रत्वमिदमुच्यते।


भामती

प्रश्नोत्तरत्वादीशानश्रवणस्याविशेषतः।
जीवस्य ब्रह्मरूपत्वप्रत्यायनपरं वचः ॥

इह हि भूतभव्यमात्रं प्रति निरङ्कुशमीशानत्वं प्रतीयते। प्राक् पृष्टं चात्र ब्रह्म, अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादित्यादिना। तदनन्तरस्य सन्दर्भस्य तत्प्रतिवचनतोचितेति एतद्वै तदिति ब्रह्माभिधानं युक्तम्। तथा चाङ्गुष्ठमात्रतया यद्यपि जीवोऽवगम्यते, तथापि न तत्परमेतद्वाक्यं, किन्त्वङ्गुष्ठमात्रस्य जीवस्य ब्रह्मरूपताप्रतिपादनपरम्। एवं निरङ्कुशमीशानत्वं न सङ्कोचयितव्यम्। न च ब्रह्मप्रश्नोत्तरता हातव्या, तेन यथा तत्त्वमसीति विज्ञानात्मनस्त्वम्पदार्थस्य तदिति परमात्मनैकत्वं प्रतिपाद्यते, तथेहाप्यङ्गुष्ठपरिमितस्य विज्ञानात्मन ईशानश्रुत्या ब्रह्मभावः प्रतिपाद्यत इति युक्तम् ॥ २४ ॥

सर्वगतस्यापि परब्रह्मणो हृदयेऽवस्थानमपेक्ष्य इति ❖। जीवाभिप्रायम्। न चान्यः परमात्मन


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त—'अंगुष्ठमात्र' शब्द के द्वारा ब्रह्म का ही निर्देश मानना चाहिए, क्योंकि—

प्रश्नोत्तरत्वाद् ईशानश्रवणस्याविशेषतः।
जीवस्य ब्रह्मरूपत्वप्रत्यायनपरं वचः॥

“अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृताद्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद” (कठो० १।२।१४) इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया है—“अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत्॥” (कठो० २।४।१३)। अर्थात् जिस अतीतानादि समस्त प्रपञ्च के नियन्ता परमेश्वर के विषय में प्रश्न किया गया है, वह निर्धूम ज्योति के समान देदीप्यमान अंगुष्ठमात्र हृदय में उपलब्ध होनेवाला यह पर ब्रह्म ही है—इस प्रकार प्रश्नोत्तररूप में प्रतिपादित ब्रह्म ही अंगुष्ठमात्र पुरुष है, क्योंकि उसमें ही निखिल प्रपञ्च का निरंकुश शासकत्व है और ब्रह्मविषयक प्रश्न के उत्तर वाक्य के द्वारा प्रतिपादित है। ब्रह्मविषयक प्रश्न के उत्तर में ब्रह्म का ही प्रतिपादन उचिततर है। यद्यपि 'अंगुष्ठमात्र' शब्द के द्वारा सहजत: जीव प्रतीत होता है, तथापि यहाँ 'अंगुष्ठमात्र' शब्द जीवपरक नहीं, किन्तु अंगुष्ठमात्रक जीव की ब्रह्मरूपता के प्रतिपादन में उसका तात्पर्य निश्चित होता है। इस प्रकार न तो निरंकुश ईशानता का संकोच करने की आवश्यकता रह जाती है और न प्रश्न और उत्तर वाक्यों की ब्रह्मपरता का परित्याग करना पड़ता है। अतः जैसे 'तत्त्वमसि'—इस वाक्य के द्वारा त्वं पदार्थभूत जीव और तत्पदार्थरूप ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन किया जाता है, वैसे ही यहाँ भी अंगुष्ठ परिमाण के जीव की ब्रह्मरूपता का प्रतिपादन “ईशानो भूतभव्यस्य”—इस वाक्य के द्वारा किया जाना युक्ति-युक्त है॥ २४॥

“सर्वगतस्यापि परब्रह्मणो हृदयेऽवस्थानमपेक्ष्य”—इस भाष्य में सर्वगत ब्रह्म का