भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अङ्गुष्ठमात्रपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३८३

आकाशस्येव 'वंशपर्वापेक्षमरत्निमात्रत्वम्। नह्यञ्जसाऽतिमात्रस्य परमात्मनोऽङ्गुष्ठ- मात्रत्वमुपपद्यते। न चान्यः परमात्मन इह ग्रहणमर्हतीशानशब्दादिभ्य इत्युक्तम्। ननु प्रतिप्राणिभेदं हृदयानामनवस्थितत्वात्तदपेक्षमप्यङ्गुष्ठमात्रत्वं नोपपद्यत इत्यत उत्तर- मुच्यते—मनुष्याधिकारत्वादिति। शास्त्रं ह्यविशेषप्रवृत्तमपि मनुष्यानेवाधिकरोति, शक्तत्वादर्थित्वादपर्युदस्तत्वादुपनयनादिशास्त्राच्चेति वर्णितमेतदधिकारलक्षणे (जै० ६।१)। मनुष्याणां च नियतपरिमाणः कायः। औचित्येन नियतपरिमाणमेव चैषा- मङ्गुष्ठमात्रं हृदयम्। अतो मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य मनुष्यहृदयावस्थानापेक्षमङ्गुष्ठ- मात्रत्वमुपपन्नं परमात्मनः। यदप्युक्तं—परिमाणोपदेशात्स्मृतेश्च संसार्येवायमङ्गुष्ठमात्रः प्रत्येतव्य इति, तत्प्रत्युच्यते—'स आत्मा तत्त्वमसि' इत्यादिवत्संसारिण एव सतोऽ-


भामती

इह ग्रहणमर्हतीति न जीवपरमेतद्वाक्यमित्यर्थः। ॐ मनुष्यानेव इति ॐ त्रैवर्णिकानेवेति। ॐ अर्थित्वाद् इति ॐ अन्तःसंज्ञानां मोक्षमाणानां च काम्येषु कर्मस्वधिकारं निषेधति। ॐ शक्तत्वाद् इति ॐ तिर्यग्देवर्षीणामशक्तानामधिकारं निवर्त्तयति ॐ उपनयनादिशास्त्राच्च इति ॐ शूद्राणामनधिकारितां दर्शयति ॐ यदप्युक्तं परिमाणोपदेशात् स्मृतेश्च इति ॐ । यद्येतत्परमात्मपरं किमिति तर्हि जीव इहोच्यते। ननु परमात्मैवोच्यताम् , उच्यते च जीवः, तस्माज्जीवपरमेवेति भावः। परिहरति ॐ तत्प्रत्युच्यते


भामती-व्याख्या

जो हृदय में अवस्थान कहा है, वह जीवभावापन्न ब्रह्म के अभिप्राय से कहा है, अन्यथा 'सर्वगतस्य हृदयेऽवस्थानम्'—ऐसा कहना परस्पर विरुद्ध पड़ जाता है, अतः यहाँ 'सर्वगतं यद् ब्रह्म जीवभावापन्नस्य तस्य हृदयेऽवस्थानम्'—ऐसी योजना विवक्षित है। “न चान्यः परमात्मन इह ग्रहणमर्हति”—इस भाष्य का अर्थ है—“अंगुष्ठमात्रः पुरुषः' एतद्वाक्यं जीवपरं न भवति", अर्थात् उक्त वाक्य के घटकीभूत 'अंगुष्ठमात्र' पद के द्वारा जीव का निर्देश होने पर भी पूरा वाक्य जीवपरक नहीं हो सकता, क्योंकि 'सर्वेशानत्व का जीव में सामञ्जस्य नहीं होता। “शास्त्रं मनुष्यानेवाधिकरोति”—इस भाष्य में 'मनुष्य' पद केवल त्रैवर्णिकपरक है, क्योंकि अपशूद्राधिकरण (जै. सू. ६।१।२५) में निश्चय किया गया है कि “स्वाध्यायोऽ- ध्येतव्यः”—इत्यादि विधि वाक्यों का ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य'—इन तीन वर्णों को ही अधिकारी माना गया है। श्रौत कर्म के अधिकारी व्यक्ति के (१) अर्थित्व (कामनारूप) (२) शक्तत्व, (३) अनिषिद्धत्व, (४) उपनयनादि संस्कार-युक्तत्व—ये चार विशेषण माने गए हैं। उनमें अर्थित्व विशेषण के द्वारा अन्तःसंज्ञक (स्थावरादि एवं निष्काम मुमुक्षु पुरुषों का काम्य कर्मों में अधिकार निवृत्त (निषिद्ध) किया गया है, शक्तत्व विशेषण के द्वारा तिर्यक् (पशु-पक्ष्यादि), देवगण एवं ऋषिगणों का कर्म में अधिकार वर्जित किया गया है, क्योंकि जैसे मनुष्य इन्द्रादि देवों के उद्देश्य से हविरादिगत स्वत्व का त्याग (याग) कर सकते हैं, वैसे इन्द्रादि देवगण अपने उद्देश्य से स्वत्व का त्याग और परस्वत्वा-पादन नहीं कर सकते। वसिष्ठादि ऋषिगण भी आर्षेयवरण के अवसर पर अपने से भिन्न वसिष्ठादि का वरण नहीं कर सकते। उपनयनादि संस्कारों द्वारा शूद्रादि असंस्कृत मनुष्यों का कर्म में अधिकार समाप्त किया गया है। जैमिनि-सूत्रों के छठे अध्याय में अधिकार की विस्तृत चर्चा की गई है।

“यदप्युक्तं परिमाणोपदेशात्”—इस भाष्य के द्वारा जो इस शङ्का का अनुवाद किया गया है कि 'यदि उक्त वाक्य ब्रह्मपरक है, तब उसमें जीव का निर्देश क्यों किया गया? ब्रह्म का ही निर्देश करना चाहिए था, किन्तु जीव का निर्देश अंगुष्ठमात्र' शब्द के द्वारा किया