भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. २७ |
|---|
विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ २७ ॥
स्यादेतत्, यदि विग्रहवत्त्वाद्यभ्युपगमेन देवादीनां विद्यास्वधिकारो वर्ण्येत । विग्रहवत्त्वादित्त्वागादिवदिन्द्रादीनामपि स्वरूपसंनिधानेन कर्माङ्गभावोऽभ्युपगम्येत । तदा च विरोधः कर्मणि स्यात् । नहीन्द्रादीनां स्वरूपसंनिधानेन यागेऽङ्गभावो दृश्यते । नच संभवति; बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य स्वरूपसंनिधानानुपपत्तेरिति चेत्, नायमस्ति विरोधः, कस्मात् ? अनेकप्रतिपत्तेः । एकस्यापि देवतात्मनो युगपदनेक-
भामती
मन्त्रादिपदसमन्वयात्प्रतीयमानोऽर्थः प्रमाणान्तराविरोधे सत्युपेयः, न तु विरोधे। प्रमाणान्तर- विरुद्धं चेदं विग्रहवत्त्वादिकंदेवतायाः, तस्माद्यजमानः प्रस्तर इत्यादिवदुपचरितार्थो मन्त्रादिर्व्याख्येयः । तथा च विग्रहाद्यभावाच्छब्दोपहितार्थोऽर्थोपहितो वा शब्दो देवतेत्यचेतनत्वान्नैतस्याः क्वचिदप्यधिकार इति शङ्कार्थः ।
निराकरोति ❖न, कस्माद् ? अनेकरूपप्रतिपत्तेः । सैव कुत इत्यत आह ❖दर्शनात् । श्रुतिषु स्मृतिषु च । तथा ह्येकस्यानेककायनिर्माणमदर्शनाद्वा न युज्यते, बाधदर्शनाद्वा ? तत्रादर्शनमसिद्धं, श्रुति- स्मृतिभ्यां दर्शनात् । न हि लौकिकेन प्रमाणेनादृष्टत्वादागमेन दृष्टमदृष्टं भवति । मा भूद्यागादीनामपि स्व- र्गादिसाधनत्वमदृष्टमिति । मनुष्यशरीरस्य मातापितृसंयोगजत्वनियमात् असति पित्रोः संयोगे कुतः संभवः ?
भामती-व्याख्या
शङ्का—मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास और पुराणादि के घटकीभूत पदों के द्वारा प्रतीयमान वस्तु-तत्त्व को तभी स्वीकृत किया जा सकता है, जब कि किसी अन्य प्रमाण का विरोध न होता हो, किन्तु देवताओं के शरीरादि का प्रतिपादन प्रमाणान्तर से विरुद्ध है, अतः देव-विग्रहादि के प्रतिपादक वाक्यों को वैसे ही अर्थवादमात्र मानना होगा, जैसे—"यजमानः प्रस्तरः" (तै. सं. २।६।५।३) यह वाक्य । [ भाष्यकार ने स्पष्ट कहा है—"यच्चोक्तं स्मृत्युपचाराभ्यामर्थदर्शनैर्विग्रहवती भुङ्क्ते चेति । तन्न, स्मृतेर्मन्त्रार्थवादमूलत्वात्" (शाबरभाष्य पृ. १६५३ ) ] शरीरादि से रहित देवता का स्वरूप केवल इन्द्रादि शब्द अथवा उसका यौगिक अर्थ ही माना जा सकता है, जो कि चेतन नहीं, जड़मात्र है, अतः कर्म या ज्ञान में कहीं भी उसको अधिकार नहीं।
समाधान—उक्त शङ्का निराकरण करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"नायमस्ति विरोधः, कस्मात् ? अनेकप्रतिपत्तेः"। एक देवता का समानकालिक अनेक कर्मों में उपस्थित हो जाना प्रमाण-विरुद्ध नहीं, क्योंकि एक देवता अनेक रूप धारण कर सकता है, वैसा ही श्रुतियों और स्मृतियों में देखा जाता है। आशय यह है कि एक देवता की अनेकरूपापत्ति क्या योगिजनों के अनेक काय-निर्माण का अदर्शन होने के कारण नहीं मानी जा सकती ? अथवा अनेकरूपापत्ति में कोई प्रबल बाधक उपलब्ध होता है ? प्रथम हेतु योगियों के अनेक-शरीर-निर्माण का अदर्शन असिद्ध है, क्योंकि श्रुतियों से लेकर स्मृतियों तक योगियों के अनेक शरीर-निर्माण की गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। जो पदार्थ आगम प्रमाण से सिद्ध है, वह केवल लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनुमोदित न होने के कारण असिद्ध नहीं हो जाता, जैसे कि आगमप्रमाण से प्रमाणित यागादिगत स्वर्ग-साधनता प्रत्यक्षतः अदृष्ट होनेमात्र से निवृत्त नहीं होती।
शङ्का—एक देवता की अनेकरूपापत्ति में बाधक उपलब्ध होने के कारण वह सम्भव नहीं। अनेकरूपापत्ति की बाधक युक्ति यह है कि जो शरीर माता-पिता के संयोग से उत्पन्न होता है, वह शरीर माता-पिता के संयोग के बिना कैसे बन जायगा ? यदि वह अपनी