भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३८७
स्वरूपप्रतिपत्तिः संभवति । कथमेतदवगम्यते ? दर्शनात् । तथा हि—‘कति देवाः’ इत्युपक्रम्य 'त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्रा' इति निरुच्य 'कतमे ते' इत्यस्यां
भामती
सम्भवे वाऽनग्नितोऽपि धूमः स्यादिति बाधदर्शनमिति चेत् , हन्त किं शरीरत्वेन हेतुना देवाविशरीरमपि मातापितृसंयोगजं सिषाधयिषसि । तथा चानेकान्तो हेत्वाभासः। स्वेदजोद्भिज्जानां शरीराणामतद्धेतु- त्वात् । इच्छामात्रनिर्माणत्वं देहादीनामदृष्टचरमिति चेत् , न, भूतोपादानत्वेनेच्छामात्रनिर्माणत्वासिद्धेः । भूतवशिनां हि देवादीनां नानाकायचिकीर्षावशाद्भूतक्रियोत्पत्तौ भूतानां परस्परसंयोगेन नाना- कायसमुत्पादात् । दृष्टा च वशिनं इच्छावशाददृश्ये क्रिया, यथा विषविद्याविद इच्छामात्रेण विषशकल- प्रेरणम् । न च विषविद्याविदो दर्शनेनाधिष्ठानदर्शनान्नदृष्टव्यवहितविप्रकृष्टभूतादर्शनाद्देवादीनां कथमधिष्ठान- मिति वाच्यम् । काचाभ्रपटलपिहितस्य विप्रकृष्टस्य च भौमशनैश्चरादेर्दर्शनेन व्यभिचारात् । असक्ताश्च दृष्टयो देवादीनां काचाभ्रपटलादिभिर्महीमहीधरादिभिर्न व्यवधीयन्ते। न चास्मदादिवत्तेषां शरीरत्वेन व्यवहितविप्रकृष्टार्थादर्शनासम्भवोऽनुमीयत इति वाच्यम् । आगमविरोघिनोऽनुमानस्योत्पादाद्योगात् । अन्त- र्धानं चाञ्जनादिना मनुजादीनामिव तेषां प्रभवतामुपपद्यते, तेन सन्निहितानामपि न क्रतुदेशे दर्शनं भविष्यति । तस्मात् सूक्तमनेकप्रतिपत्तेरिति । ॐ तथा हि कति देवा इत्युपक्रम्य इति ॐ । वैश्वदेवशस्त्रस्य
भामती-व्याख्या
कारण-सम्पत्ति के बिना ही बन सकता है, तब बिना अग्नि के धूम और शब्दादि के बिना ही शाब्दबोधादि कार्य होना चाहिए, किन्तु नहीं होता । इसी प्रकार अपनी सामग्री के बिना अनेक शरीरों की रचना नहीं हो सकती ।
समाधान—देवता के शरीर में यदि शरीरत्वरूप हेतु के द्वारा माता-पितृसंयोग- जन्यत्व सिद्ध किया जाता है, तो वैसा सम्भव नहीं, क्योंकि "यत्र यत्र शरीरत्वम्, तत्र तत्र मातापितृजन्यत्वम्"—यह नियम व्यभिचरित है, जैसे कि जुआँ आदि स्वेदज और वृक्षादि उद्भिज्ज शरीरों में शरीरत्व रहने पर भी मातापितृसंयोगजन्यत्व नहीं होता । फिर भी उपादानकारणीभूत पृथिव्यादि भूतों के विना इच्छामात्र के द्वारा भौतिक शरीर का निर्माण क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि योगिजनों की इच्छा 'भूतजातमन्तरा शरीरं जायताम्'—ऐसी नहीं होती अपितु भूतवर्ग उनके वश में होते हैं, अतः उनका भूतों को सीधा आदेश होता है कि 'भूतानि शरीरमारभन्ताम्', फलतः परस्पर संयुक्त पाँच भूतों के द्वारा अभीष्ट शरीरों की रचना वैसे ही हो जाती है, जैसे सर्पादि के विष को उतारनेवाले मान्त्रिक की इच्छा से विष के परमाणु सक्रिय होकर नीचे उतरने लग जाते हैं । मान्त्रिक को जैसे रोगी के शरीर में विष की तरङ्ग दिखाई देती है, अतः वह उसका अधिष्ठाता ( सञ्चालक ) हो जाता है, वैसे ही योगियों और देवताओं के द्वारा सभी भूत सञ्चालित हो जाते हैं । जैसे शीशा, अभ्रक और मेघादि पारदर्शक-पदार्थों को मानवीय दृष्टि पार कर जाती है, वैसे ही योगियों और देवताओं की दृष्टि पर्वतादि को भी पार कर दूर-दूर तक फैल जाती है। उनकी दृष्टि किसी भी पदार्थ से अवरुद्ध नहीं होती । जब कि साधारण दृष्टि मंगल, बुध और शनैश्चरादि ग्रहों तक पहुँच जाती है, तब योगिजनों की दृष्टि व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थों को क्यों न ग्रहण कर लेगी ? 'देवादीनां शरीरं न व्यवहितं गृह्णाति, शरीरत्वाद्, अस्मदादिशरीरवत्'—यह अनुमान देवशरीर-प्रतिपादक आगम प्रमाण से बाधित है, अतः इसके द्वारा व्यवहितादि पदार्थों के अदर्शन का अनुमान नहीं किया जा सकता । यागादि-स्थल पर देवता दिखाई इस लिए नहीं देते कि उनमें अन्तर्धान हो जाने की शक्ति वैसे ही होती है, जैसे नेत्र में अभिमन्त्रित अञ्जनादि के प्रयोग से मनुष्यों में अन्तर्धान की शक्ति आ जाती है ।