भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३८९
वैकस्य प्राणस्य युगपदनेकरूपतां दर्शयति । तथा स्मृतिरपि—'आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ ।। योगी कुर्याद्बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ।। प्राप्नुयाद्विषयान् कैश्चित्कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ।। संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ।।' इत्येवंजा- तीयका प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनामपि युगपदनेकशरीरयोगं दर्शयति, किमु वक्तव्यमाजानसिद्धानां देवानाम् ? अनेकरूपप्रतिपत्तिसंभवाच्चैकैका देवता बहुभी रूपैरात्मानं प्रविभज्य बहुषु यागेषु युगपदङ्गभावं गच्छतीति । परैश्च न दृश्यतेऽ- न्तर्धानादिक्रियायोगादित्युपपद्यते । अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनादित्यस्यापरा व्याख्या— विग्रहवतामपि कर्माङ्गभावचोदनास्वनेका प्रतिपत्तिर्दृश्यते । क्वचिदेकोऽपि विग्रहवान- नेकत्र युगपदङ्गभावं न गच्छति, यथा बहुभिर्भोजयद्भिर्नैको ब्राह्मणो युगपद् भोज्यते । क्वचिच्चैकोऽपि विग्रहवाननेकत्र युगपदङ्गभावं गच्छति, यथा बहुभिर्नमस्कुर्वाणैरेको
भामती
एताध्यर्द्धः, यदस्मिन् सति सर्वमिदमध्यर्द्धाद्वृद्धिं प्राप्नोतीति । तेनाध्यर्द्धं इति । कतम एक इति, स एवाध्यर्द्धः प्राण एको ब्रह्म । सर्वदेवात्मत्वेन बृहत्त्वाद्ब्रह्म तदेव त्यदित्याचक्षते परोक्षाभिधायकेन शब्देन, तस्मादेकस्यैव देवस्य महिमावशाद्युगपदनेकदेवरूपतामाह श्रुतिः । स्मृतिश्च निगदव्याख्याता । अपि च पृथग्जनानामप्युपायानुष्ठानवशात्प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां युगपन्नानाकायनिर्माणं श्रूयते, तत्र केव कथा देवानां स्वभावसिद्धानामित्याह ॐ प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्याणां योगिनाम् इति ॐ । अणिमा लघिमा महिमा प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं यत्रकामावसायितेत्यैश्वर्याणि । ॐ अपरा व्याख्या इति ॐ । अनेकत्र कर्मणि युगपदङ्गभावप्रतिपत्तिरङ्गभावगमनं, तस्य दर्शनात् । तदेव परिस्र्फुटं दर्शयितुं व्यतिरेकं तावदाह ॐ क्वचिदेकः इति ॐ । न खलु बहुषु श्राद्धेष्वेको ब्राह्मणो युगपदङ्गभावं गन्तुमर्हति । एकस्यानेकत्र
भामती-व्याख्या
अन्तर्भुक्त हो जाने पर दो देवता और उन दोनों का एकीकरण करने पर एक ही प्राणरूप देवता रहता है, जिसे अध्यर्ध (वृद्धिगत, बृहत् अथवा बृहंयिता) हो जाने के कारण ब्रह्म है एवं परोक्षार्थक 'त्यत्' पद के द्वारा अभिहित होता है। इस प्रकार श्रुति एक देवता की अनेकरूपता का प्रतिपादन करती है। स्मृतिकारों ने तो अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहा है कि योगिगण अपने योग बल के द्वारा अपने अनेक शरीर धारण कर सम्पूर्ण पृथिवी पर विचरने लगते हैं। कतिपय शरीरों के माध्यम से विषयोपभोग और कतिपय शरीरों से उग्र तपश्चरण करते हैं। अन्त में योगी अपने उन सभी शरीरों का वैसे ही उपसंहार कर लेता है, जैसे सायं काल में सूर्य अपनी समस्त रश्मियों को समेट लेता है।
(१) अणिमा (अपने शरीर को अत्यन्त सूक्ष्म कर लेना), (२) महिमा (शरीर को विशाल बना लेना), (३) लघिमा (शरीर को रुई से भी हल्का बना लेना), (४) प्राप्ति (पृथिवी पर बैठे-बैठे हाथ को इतना लम्बा कर देना कि चन्द्रादि को भी छू ले), (५) ईशिता (सृष्टि और प्रलय की शक्ति का लाभ), (६) वशिता (समस्त जगत् के नियमन का सामर्थ्य), (७) प्राकाम्य (इच्छा का अनभिघात) और (८) यत्र कामावसायिता (संकल्पित वस्तु का तुरन्त लाभ) इत्यादि सिद्धियाँ जब कि एक साधारण मनुष्य को भी योगबल से मिल जाती हैं, तब आजान-सिद्ध देवताओं के लिए कहना ही क्या ?
"अनेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्"—इस सूत्रांश की अन्य व्याख्या प्रस्तुत की जाती है— "अपरा व्याख्या"। शरीरधारी प्राणियों में भी विविधता पाई जाती है कि कोई व्यक्ति एक ही समय अनेक कर्मों का अङ्ग नहीं बनता, जैसे विभिन्न स्थानों में अनेक यजमानों के द्वारा दिए जानेवाले ब्रह्म-भोजों में एक ब्राह्मण सर्वत्र भाग नहीं ले सकता और कहीं एक ही