भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 408
३९०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २८

ब्राह्मणो युगपन्नमस्क्रियते। तद्द्विहोद्देशपरित्यागात्मकत्वाद्यागस्य विग्रहवतीमप्येकां देवतामुद्दिश्य बहवः स्वं स्वं द्रव्यं युगपत्परित्यक्ष्यन्तीति विग्रहवत्त्वेऽपि देवतानां न किञ्चित्कर्मणि विरुध्यते ॥ २७ ॥

शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ २८ ॥

मा नाम विग्रहवत्त्वे देवादीनामभ्युपगम्यमाने कर्मणि कश्चिद्विरोधः प्रसञ्जि। शब्दे तु विरोधः प्रसज्येत। कथम् ? औत्पत्तिकं हि शब्दस्यार्थेन संबन्धमाश्रित्य 'अनपेक्षत्वात्' इति वेदस्य प्रामाण्यं स्थापितम्। इदानीं तु विग्रहवती देवताऽभ्युपगम्यमाना यद्यप्यैश्वर्ययोगाद्युगपदनेकर्मसंबन्धीनि हवींषि भुञ्जीत, तथापि विग्रहयोगादस्मदादिवज्जननमरणवती सेति नित्यस्य शब्दस्य नित्येनार्थेन नित्ये संबन्धे प्रतीय-

भामती

युगपदङ्गभावमाह ॐ क्वचिच्चैक इति ॐ । यथैकं ब्राह्मणमुद्दिश्य युगपन्नमस्कारः क्रियते बहुभिस्तथा स्वस्थानस्थितामेकां देवतामुद्दिश्य बहुभिर्यजमानैर्नानादेशावस्थितैर्युगपद्धविस्त्यज्यते, तस्याश्च तत्रासन्निहिताया अप्यङ्गभावो भवति। अस्ति हि तस्या युगपद्विप्रकृष्टानेकार्थोपलम्भसामर्थ्यमित्युपपादितम् ॥२७॥

गोत्वादिष्वत्पूर्वविमर्शाभावादुपाधेरप्येकस्याप्रतीतेः पाचकादिवद् आकाशादिशब्दवद् व्यक्तिवचना एव वस्वाविशब्दाः तस्याश्च नित्यत्वात्तया सह सम्बन्धो नित्यो भवेत्। विग्रहादियोगे तु सावयवत्वेन वस्वादीनाम नित्यत्वात्तः पूर्वं वस्वाविशब्दो न स्वार्थेन सम्बद्ध आसीत् स्वार्थस्यैवाभावात्। ततश्चोत्पन्ने वस्वादौ वस्वाविशब्दसम्बन्धः प्रादुर्भवन् देवदत्ताविशब्दसम्बन्धवत्पुरुषबुद्धिप्रभव इति तत्पूर्वको वाक्यार्थप्रत्ययोऽपि पुरुषबुद्ध्याधीनः स्यात्। पुरुषबुद्धिश्च मानान्तराधीनजन्मेति मानान्तरापेक्षया प्रामाण्यं

भामती-व्याख्या

ब्राह्मण अनेक देश-काल में किए जानेवाले कर्मों का अङ्ग बन जाता है, जैसे विभिन्न देशों में एक ही समय किये जानेवाले नमस्कार कर्मों का एक ही ब्राह्मण अङ्ग ( उद्देश्य ) बन जाता है। ठीक उसी प्रकार अपने नियत स्थान में अवस्थित एक ही देवता के उद्देश्य से विभिन्न यजमानों के द्वारा विविध देशों में अनेक यागों का अनुष्ठान किया जा सकता है, क्योंकि देवता के उद्देश्य से द्रव्य ( हवि ) का त्याग ही याग कहलाता है, उसके लिए देवता का यजमान के सन्निहित होना आवश्यक नहीं, “असन्निहित देवता भी उस त्यागात्मक याग का अङ्ग ( उद्देश्य या सम्प्रदान कारक ) बन जाता है। देवता में यह सामर्थ्य स्वतः सिद्ध है कि वह अपने एक ही स्थान में अवस्थित होकर भी अनेक विप्रकृष्ट ( दूर-दूर ) देशों में किए जानेवाले यागों का साक्षात्कार कर त्यज्यमान हवि को स्वीकार कर ले—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है ॥ २७ ॥

इस सूत्र में शङ्कावादी का आशय यह है कि इन्द्रादि देवगण एक-एक व्यक्तात्मक होने के कारण उनमें 'अयं गौः-अयं गौः'—इस प्रकार गोत्व जाति के समान न कोई इन्द्रत्वादि जाति का परामर्श होता है और न आकाशत्वादि के समान किसी अखण्ड उपाधि का भान होता है कि 'आकृत्यधिकरण (जै. सू. १।३।३३) के अनुसार इन्द्रत्वादिजातिरूप नित्य अर्थ के साथ इन्द्रादि शब्दों का नित्य सम्बन्ध उपपन्न होकर अनपेक्षत्वहेतुक प्रामाण्य व्यवस्थित हो जाता, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने कहा है—“औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः, तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् (जै. सू. १।१।५)। अर्थात् शब्द का अपने वाच्यार्थ के साथ औत्पत्तिक ( नित्य ) सम्बन्ध होता है, इसीलिए उपदेशात्मक वेद धर्म का ज्ञापक है, क्योंकि वैदिक वाक्यों को धर्म का बोध कराने में अन्य किसी भी प्रमाण की अपेक्षा नहीं होती, किन्तु यदि मनुष्य के समान