भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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विज्ञानमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४४१

सर्वमिदं जगत्पञ्चवृत्तौ वायौ प्राणशब्दिते प्रतिष्ठायैजति । वायुनिमित्तमेव च महद्भयानकं वज्रमुद्यम्यते, वायौ हि पर्जन्यभावेन विवर्तमाने विद्युत्स्तनयित्नुवृष्ट्यशनयो विवर्तन्त इत्याचक्षते । वायुविज्ञानादेव चेदममृतत्वम् । तथा हि श्रुत्यन्तरम् - वायुरेव व्यष्टि- र्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद' इति । तस्माद्वायुरयमिह प्रतिप- त्तव्य इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - ब्रह्मैवेदमिति प्रतिपत्तव्यम् । कुतः ? पूर्वोत्तरालोचनात् ।

भामती

तथाहि—प्राणशब्दो मुख्यो वायावाध्यात्मिके, वज्रशब्दश्चाशनौ । अशनिश्च वायुपरिणामः । वायुरेव हि बाह्यो धूमज्योतिःसलिलसंवलितः पर्जन्यभावेन परिणतो विद्युत् स्तनयित्नुवृष्ट्यशनिभावेन विवर्तन्ते । यद्यपि च सर्वं जगदिति सवायुकं प्रतीयते, तथापि सर्वशब्द आपेक्षिकोऽपि न स्वाभिधेयं जहाति किन्तु सङ्कु- चितवृत्तिमवति । प्राणवज्रशब्दौ तु ब्रह्मविषयत्वे स्वार्थमेव त्यजतः । तस्मात् स्वार्थत्यागाद्वरं वृत्तिसङ्कोचः, स्वार्थलेशावस्थानात् । अमृतशब्दोऽपि मरणाभाववचनो न सार्वकालिकं तदभावं ब्रूते, ज्योक्जीवित्वापि तदुपपत्तेः । यथा अमृता देवा इति । तस्मात् प्राणवज्रश्रुत्यनुरोधाद्वायुरेवात्र विवक्षितो न ब्रह्मेति प्राप्तम् । एवं प्राप्ते उच्यते— ॐ कम्पनात् ॐ सवायुकस्य जगतः कम्पनात्, परमात्मैव शब्दात् प्रमित इति मण्डूकप्लुत्यानुषज्यते । ब्रह्मणो हि बिभ्यदेतज्जगत् कृत्स्नं स्वव्यापारे नियमेन प्रवर्त्तते न तु मर्यादामति- वर्त्तते । एतदुक्तं भवति— न श्रुतिसङ्कोचमात्रं श्रुत्यर्थपरित्यागे हेतुरपि तु पूर्वापरदाढ्येनेकवाक्यताप्रकर-

भामती-व्याख्या

श्रुति प्रमाण सबसे प्रबल माना जाता है, अतः 'प्राण' और 'वज्र'—ये दोनों शब्द श्रुति प्रमाण होने के कारण वाक्य और प्रकरण के बाधक हैं । फलतः यहाँ 'कम्पन' शब्द के द्वारा पञ्चवृत्त्यात्मक प्राण अथवा बाह्य वायु का अभिधान करना उचित है, क्योंकि 'प्राण' शब्द आध्यात्मिक ( शरीरान्तर्वर्ती ) वायु को मुख्यरूप से कहता है । 'वज्र' शब्द भी अशनि का वाचक है और अशनि वायु का परिणाम है, क्योंकि बाह्य वायु ही धूम, ज्योति और जल से संवलित होकर वर्षा के रूप में परिणत होकर विद्युत्, मेघ, वृष्टि और अशनि के रूप में विवर्तित हो जाती है । यद्यपि 'सर्वं जगत्' शब्द के द्वारा वायु-सहित संसार प्रतीत होता है, तथापि 'सर्व' शब्द अपने अभिधेयार्थ का सर्वथा त्याग न करके संकुचित अर्थ का बोधक हो जाता है । 'प्राण' और 'वज्र' शब्द यदि ब्रह्मपरक माने जाते हैं, तब स्वार्थ का सर्वथा त्याग कर डालते हैं । सर्वथा स्वार्थ-त्याग से तो संकुचित अर्थ का बोधन ही अच्छा है, क्योंकि संकुचित अर्थ में स्वार्थ का कुछ भाग अवस्थित ही रहता है । 'अमृत' शब्द भी मरणाभाव का वाचक है किन्तु मरण के सार्वकालिक अभाव को नहीं कहता, कादाचित्क जीवन में भी उसकी उपपत्ति हो जाती है, जैसे कि देवगणों को अमर कहा जाता है, वे सदा अमर नहीं, केवल चिरजीवी होने के कारण ही अमर कह दिए जाते हैं । इस प्रकार 'प्राण' और 'वज्र' इन शब्दों के अनुरोध पर वायु ही उक्त श्रुति में विवक्षित है, ब्रह्म नहीं । सिद्धान्त—'कम्पनात्' सूत्र के द्वारा वायु-सहित समस्त जगत् का कम्पन विवक्षित है । समस्त जगत् को कँपानेवाला तो परमात्मा ही है । 'कम्पनात्'—यह हेतुवाक्य है, इसका अन्वय इसी पाद के "शब्दादेव प्रमितः"—इस चौबीसवें सूत्र के साथ वैसे ही होता है, जैसे कि एक मेंढक लम्बी छलांग भर कर अपने दूर बैठे साथी से जा मिलता है । [ “इको गुणवृद्धी” ( पा. सू. १।१।३ ) इस सूत्र के भाष्य में भाष्यकार ने कहा है—"यथा मण्डूका उत्प्लुत्योत्प्लुत्य गच्छन्ति, तद्वदधिकारः” । शब्द जड़ होने पर भी आकांक्षा के आधार पर व्यवहितान्वयी हो जाता है, जैसा कि प्रदीपकार ने कहा है—"बुद्धिशब्दस्येहाकांक्षावशादुप- ५६