भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ४० |
|---|
रीरादुत्क्रमत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते' (छा० ८।६।५) इति मुमुक्षोरादित्यप्राप्ति- रभिहिता । तस्मात्प्रसिद्धमेव तेजो ज्योतिःशब्दमिति ।
एवं प्राप्ते ब्रूमः—परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दम् । कस्मात् ? दर्शनात् । तस्य हीह प्रकरणे वक्तव्यत्वेनानुवृत्तिर्दृश्यते, 'य आत्माऽपहतपाप्मा' (छा० ८।७।१) इत्यपहत- पाप्मत्वादिगुणकस्यात्मनः प्रकरणादावन्वेष्टव्यत्वेन विजिज्ञासितव्यत्वेन च प्रतिज्ञा- नात् । 'एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि' (छा० ८।९।३) चानुसंधानात् । 'अशरीरं
भामती
तेजःपक्षेऽर्चिरादिमार्गेणोपपद्यते । आदित्यश्चाचिराद्यपेक्षया परं ज्योतिर्भवतीति । तदुपसम्पद्य तस्य समीपे भूत्वा स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते, कार्यब्रह्मलोकप्राप्तौ क्रमेण मुच्यते । ब्रह्मज्योतिःपक्षे तु ब्रह्म भूत्वा का परा स्वरूपनिष्पत्तिः ? न च देहादिविविक्तब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारो वृत्तिरूपोऽभिनिष्पत्तिः । सा हि ब्रह्मभूयात् प्राचीना न तु पराचीना । सेयमुपसम्पद्येति क्त्वाश्रुतेः पीडा । तस्मात्तिसृभिः श्रुतिभिः प्रकरणबाधनात्तेज एवात्र ज्योतिरिति प्राप्तम् । एवं प्राप्तेऽभिधीयते – ॐ परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दम् । कस्मात् ? दर्शनात् । तस्य हीह प्रकरणे अनुवृत्तिर्दृश्यते ॐ । यत् खलु प्रतिज्ञायते यच्च मध्ये परामृश्यते यच्चोपसंह्रियते स एवं प्रधानं प्रकरणार्थः । तदन्तःपातिनस्तु सर्वे तदनुगुणतया नेतव्याः । न तु श्रुत्यनुरोधमात्रेण प्रकरणादपक्रष्टव्य इति हि लोकस्थितिः । अन्यथोपशुयाजवाक्ये जामितादोषोपक्रमे तत्प्रतिसमाधानोप- संहारे च तदन्तःपातिनो विष्णुरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो विधिश्रुत्यनुरोधेन पृथग् विधायः प्रसज्येरन् ।
भामती-व्याख्या
दूसरी बात यह भी है कि उक्त श्रुति में जो समुत्थान कहा गया है कि 'अस्मात् शरीरात् समुत्थाय', वह समुत्थान 'ज्योति' पद के द्वारा तेज का ग्रहण करने पर ही उपपन्न हो सकता है, क्योंकि वहाँ समुत्थान का अर्थ उद्गमन ही है, विवेक-विज्ञान नहीं । अर्चिरादि की अपेक्षा आदित्य को परं ज्योति कहा जाता है, अतः जीव का सूक्ष्म शरीर इस स्थूल शरीर का त्याग कर आदित्य की उपसम्पत्ति प्राप्त करता है, उसके पश्चात् स्वरूपाभिनिष्पत्ति (ब्रह्मरूपतापत्ति) होती है । किन्तु 'ज्योति' शब्द से ब्रह्म का ग्रहण करने पर तत्त्वज्ञानी का शरीर से समुत्थान न हो सकेगा, जैसा कि श्रुति कहती है—"न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति" (बृह. उ. ४।४।६) । इसी प्रकार "परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वरूपेणाभिनिष्पद्यते"—यह ज्योति, रुपसम्पत्ति और स्वरूपाभिनिष्पत्ति का पौर्वापर्यभाव भी संगत नहीं रह जाता, क्योंकि ब्रह्मरूप ज्योति की उपसम्पत्ति भी स्वरूपाभिनिष्पत्ति ही है, अतः 'स्वरूपमभिनिष्पद्य स्वरूपमभिनिष्पद्यते'—ऐसा व्यवहार संगत क्योंकर होगा ? देहादि से विविक्त ब्रह्मस्वरूप के वृत्त्यात्मक साक्षात्कार को अभिनिष्पत्ति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह ब्रह्मरूपतापत्तिरूप मुक्ति के पूर्व क्षण में होती है, पश्चात् नहीं । फलतः (१) ज्योतिः शब्द, (२) क्त्वा प्रत्यय और (३) समुत्थान शब्द—इन तीन श्रुति प्रमाणों (रूढ शब्दों) के द्वारा प्रकरण प्रमाण का बाध करके भौतिक तेज ही ज्योति पद का अर्थ सिद्ध होता है ।
सिद्धान्त—"परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दम्" अर्थात् परम ब्रह्म ही ज्योतिः शब्द के द्वारा विवक्षित है, क्योंकि इस प्रकरण में उसी की अनुवृत्ति का दर्शन होता है । जो प्रतिज्ञा या प्रकरण के उपक्रम में चर्चित, मध्य में परामृष्ट और उपसंहार में वर्णित होता है, वही प्रकरण का मुख्यार्थ माना जाता है और प्रकरण-पाती अन्य सभी पदार्थ उसी प्रधान के अनुसारी या अङ्ग माने जाते हैं, केवल श्रुति के अनुरोध पर प्रकरण से पृथक् नहीं किए जाते—ऐसी लोकमर्यादा है । अन्यथा उपांशुयाज के प्रकरण में पठित "विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय"—इन तीन वाक्यों