भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

ज्योतिःशब्दं ब्रह्म ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४४५

वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः' ( छा० ८।१२।१) इति चाशरीरतायै ज्योतिःसम्पत्ते- रस्याभिधानात्, ब्रह्मभावाच्चान्यत्राशरीरतानुपपत्तेः, 'परं ज्योतिः', 'स उत्तमः

भामती

तत् किमिदानीं तिस्रः साह्नस्योपसदः कार्या द्वादशाहीनस्येति प्रकरणानुरोधात् समुदायप्रसिद्धिबललब्ध- महर्गणाभिधानं परित्यज्याहीनशब्दः कथमप्यवयवव्युत्पत्त्या साह्नं ज्योतिष्टोममभिधाय तत्रैव द्वादशोपसत्तां विदधताम् ? स हि कृत्स्नविधानान्न कुतश्चिदपि हीयते क्रतोरित्यहीनः शक्यो वक्तुम् । मैवम्, अवयव- प्रसिद्धेः समुदायप्रसिद्धिर्बलीयसीति श्रुत्या प्रकरणबाधनान्न द्वादशोपसत्तामहीनगुणयुक्ते ज्योतिष्टोमे

भामती-व्याख्या

के द्वारा प्रतिपादित तीनों कर्म उपांशुयाज से भिन्न मानने पड़ेंगे । [ जैमिनि-दर्शनस्थ द्वितीय अध्याय के द्वितीय पाद का चौथा अधिकरण है—उपांशुयाजाधिकरण । शबरस्वामी ने विषय- वाक्य की आनुपूर्वी दिखाई है—"जामि वा एतद्यज्ञस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशावुपांशुयाज- मन्तरा यजति । विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषो- मावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय"। तैत्तिरीयसंहिता में यजति तक वाक्य मिलता है, विष्णुरुपांशु यष्टव्यः' इत्यादि इस समय उपलब्ध नहीं । तथापि अजामित्वाय-पर्यन्त एकवाक्यता मान कर प्रायः सभी आचार्यों ने यही विचार प्रस्तुत किया है कि उपक्रम और उपसंहारादि में समनुगत पदार्थ को यदि मुख्यार्थ मान कर प्रकरणस्थ अन्यान्य पदार्थों को उसका अङ्ग नहीं माना जाता, तब उपांशुयाज-प्रकरण के उपक्रम ( आरम्भ ) में जो जामिता ( आलस्य या उबा देना ) दोष उठा कर उपसंहार में अजामित्वाय कह कर उसकी निवृत्ति बताई गई । उससे ऐसी एकवाक्यता पर्यवसित हो जाती है कि मध्यपाती उक्त तीनों वाक्य स्वतन्त्र कर्म के विधायक न होकर उपांशुयाज के अन्तरा-विधान की प्रशंसामात्र करते माने गए हैं ] ।

शङ्का—यदि एकवाक्यतापन्न प्रकरण का भङ्ग या बाध किसी प्रकार भी नहीं किया जा सकता, तब ज्योतिष्टोमनामक एकाह कर्म के प्रकरण में जो कहा गया है कि "तिस्र एव साह्नस्योपसदो द्वादशाहीनस्य" ( तै. सं. ६।२।५।१) । उपसत् होमविशेष की संज्ञा है । 'ज्योतिष्टोमादि एकाह कर्म में तीन ही उपसत् किए जाएँ और अहीन कर्म में 'द्वादश' [ जिस सोमयाग में एक ही दिन सोम का अभिषव किया जाता है, उसे एकाह या साह्न कहते हैं और जिसमें कई दिन सोमरस का अभिषव होता है, वह अहीन या अहर्गण कहलाता है । एकाह और अहीन शब्द अपने अपने उक्त अर्थों में रूढ़ माने जाते हैं ]। यह प्रकरण ज्योति- ष्टोमरूप एकाह क्रतु का है, अतः इसके प्रकरण में पठित द्वादश उपसत् भी इसी कर्म में करने पड़ेंगे और 'अहीन' शब्द की अवयवार्थ को लेकर ज्योतिष्टोम-वाचकता भी मानी जा सकती है, जैसा कि शबरस्वामी ने कहा है—"अहीनशब्देन ज्योतिष्टोमं वक्ष्यामः, कुतः ? न हीयते इत्यहीनः । दक्षिणया क्रतुकरणैर्वा फलेन वा न हीयते, तेन ज्योतिष्टोमोऽहीनः" ( शाबर. पृ. ८६३ ) ।

समाधान—अवयवार्थ की अपेक्षा रूढार्थ प्रबल माना जाता है। यद्यपि प्रकरण प्रमाण से द्वादश उपसत् ज्योतिष्टोम में प्राप्त हैं, तथापि 'अहीन' शब्दरूप श्रुति प्रमाण के द्वारा प्रकरण का बाध हो जाता है. अतः उक्त वाक्य ज्योतिष्टोम में द्वादश उपसत् का विधान नहीं कर सकता । इस प्रकरण से विच्छिन्न कर देने पर भी उक्त वाक्य अहीन या अहर्गण कर्मों में भी द्वादश उपसत् का विधान नहीं कर सकता, क्योंकि अन्य प्रकरण में पठित वाक्य के द्वारा अन्य कर्म में अङ्गों का विधान न्यायोचित नहीं माना जाता । परिशेषतः 'तिस्रः उपसदः कार्याः'—इस विधि की स्तुति में ही "द्वादशाहीनस्य"—इस वाक्य का तात्पर्य