भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ४०
भामती
शक्नोति विधातुम्। नाप्यतोऽपकृष्टः सन्नहर्गणस्य विधत्ते परप्रकरणेऽप्यधर्मविधेरन्याय्यत्वात् । असम्बद्ध- पदव्यवायविच्छिन्नस्य प्रकरणस्य पुनरनुसन्धानक्लेशात् । तेनानपकृष्टेनैव द्वादशाहीनस्येति वाक्येन साह्नस्य तिस्र उपसदः कार्या इति विधिं स्तोतुं द्वादशाहविहिता द्वादशोपसत्ता तत्प्रकृतित्वेन च सर्वाहीनेषु प्राप्ता निवीतादिवदनूद्यते । तस्मादहीनश्रुत्या प्रकरणबाधेऽपि न द्वादशाहीनस्येति वाक्यस्य प्रकरणाद- पकर्षो ज्योतिष्टोमप्रकरणानात्तस्य । पूषानुमन्त्रणमन्त्रस्य यल्लिङ्गबलात् प्रकणबाधेनावकर्षस्तद्गत्या, पौष्णादौ च कर्मणि तस्यार्थवत्त्वादिह त्वप्रकृष्टस्याचिरादिमार्गोपदेशे फलस्योपायमार्गप्रतिपादकेऽतिविशदे एष सम्प्रसाद इति वाक्यस्याविशदेकदेशमात्रप्रतिपादकस्य निष्प्रयोजनत्वात् । न च द्वादशाहीनस्येतिवद्य- थोक्तमध्यानासाधनानुष्ठानं स्तोतुमेष सम्प्रसाद इति वचनमचिरादिमार्गमनुवदतीति युक्तम्, स्तुति- लक्षणायां स्वाभिधेयसंसर्गतात्पर्यपरित्यागप्रसङ्गात् । द्वादशाहीनस्येति तु वाक्ये स्वार्थसंसर्गतात्पर्ये प्रकरणविच्छेदस्य प्राप्तानुवादमात्रस्य चाप्रयोजनत्वमिति स्तुत्यर्थो लक्ष्यते । न चैतद्द्दोषभयात्समुदायप्रसिद्धि- मूलरूढ्यावयवप्रसिद्धिमपाश्रित्य साह्नस्यैव द्वादशोपसत्तां विधातुमर्हति, त्रित्वद्वादशत्वयोर्विकल्पप्रस- ङ्गात् । न च सत्यां गतौ विकल्पो न्याय्यः । साह्नाहीनपदयोश्च प्रकृतज्यो [तिष्टोमाभिधायिनोरानर्थक्यप्रस- ङ्गात् । प्रकरणाञ्च तदवगतेः । इह तु स्वार्थसंसर्गतात्पर्ये नोक्तदोषप्रसङ्ग इति पौर्वापर्यपर्यालोचनया
भामती-व्याख्या
पर्यवसित होता है। द्वादशाहरूप अहीन कर्म में द्वादश उपसत् का विधान किया गया है, सभी अहीन कर्मों की द्वादशाह कर्म प्रकृति है, अतः उसके विकृतिभूत सभी अहीन कर्मों में द्वादश उपसत् 'प्रकृतिवद् विकृतिः कार्या'—इस अतिदेश वाक्य से ही प्राप्त हो जाते हैं, इस लिए भी ज्योतिष्टोम-प्रकरण-पठित वाक्य के द्वारा द्वादश उपसदों का विधान वहाँ अपेक्षित ही नहीं, अतः इसका प्रकरण से अपकर्ष (विच्छेद) भी अनावश्यक है। ज्योतिष्टोम के प्रकरण में पठित पूषानुमन्त्रण मन्त्रों का उत्कर्ष जो लिङ्ग प्रमाण से प्रकरण का बाध करके किया जाता है, वह अगति-गति है। पूषदेवताक कर्मों में उसकी आवश्यकता और सार्थकता भी है। "एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय"—इस वाक्य का यहाँ से विच्छेद करके अर्चिरादि मार्ग-प्रतिपादक प्रकरण में उन्नयन सम्भव नहीं, क्योंकि अर्चिरादि का "तेऽर्चिषमेवाभि- सम्भवन्ति"—इत्यादि उपदेश जैसा विशद (स्पष्ट) है, वैसा "एष सम्प्रसादः"—यह नहीं, क्योंकि यहाँ तो उस मार्ग के तेजोरूप एकदेश का ही ग्रहण किया गया है, जिसका कोई विशेष प्रयोजन नहीं।
जैसे "द्वादशाहीनस्य"—यह वाक्य तीन उपसदों के विधान की स्तुति है, वैसे ही उक्त मध्यान-भावना की स्तुति करने के लिए "एष सम्प्रसादः" इसका उपयोग भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वैसा करने पर इस वाक्य को अपने स्वार्थ का सर्वथा त्याग करना पड़ेगा। "द्वादशाहीनस्य"—इस वाक्य का अन्यत्र उन्नयन करने पर द्वादशाह-पठित वाक्य के द्वारा विहित द्वादशोपसत्ता का अनुवादमात्र करना होगा, जो कि निष्प्रयोजन और निरर्थक मात्र है, अतः उसमें स्तुतिपरता अगत्या मानी जाती है। ज्योतिष्टोमगत उपसद् होमों में ही त्रित्व और द्वादशत्व—दोनों का विधान करने पर विकल्प प्राप्त होता है, जो कि मार्गान्तर के सम्भव होने पर उचित नहीं माना जाता । फिर भी त्रित्व और द्वादशत्व—दोनों का विधान करने पर ज्योतिष्टोम के वाचक 'साह्न' और 'अहीन'—दोनों पद निरर्थक हो जाते हैं, क्योंकि केवल प्रकरण के बल पर भी दोनों धर्म प्राप्त हो जाते हैं किन्तु प्रकृत में 'ज्योतिः' पद का ब्रह्मज्योति में तात्पर्य मान लेने पर आनर्थक्य प्रसक्त नहीं होता, पौर्वापर्य की विचारणा से सहकृत प्रकरण प्रमाण के द्वारा पूर्वकालता रूप अर्थ में रूढ 'क्त्वा' प्रत्यय का परित्याग करके ब्रह्मज्योति ही ज्योतिपदास्पद निर्णीत होती है।