भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 466
४५८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ४१

शमिति विचारे भूतपरिग्रहो युक्तः, आकाशशब्दस्य तस्मिन्रूढत्वात्, नामरूपनिर्वह- णस्य चावकाशदानद्वारेण तस्मिन्योजयितुं शक्यत्वात्, स्रष्टृत्वादेश्च स्पष्टस्य ब्रह्म- लिङ्गस्याश्रवणादिति । एवं प्राप्त इदमुच्यते—परमेव ब्रह्मेहाकाशशब्दं भवितुमर्हति । कस्मात् ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । ‘ते यदन्तरा तद् ब्रह्म’ इति हि नामरूपाभ्याम- र्थान्तरभूतमाकाशं व्यपदिशति । न च ब्रह्मणोऽन्यन्नामरूपाभ्यामर्थान्तरं संभवति, सर्वस्य विकारजातस्य नामरूपाभ्यामेव व्याकृतत्वात् । नामरूपयोरपि निर्वहणं निरङ्कुशं न ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति, ‘अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर-

भामती

यद्यप्याकाशस्तल्लिङ्गादित्यत्र ब्रह्मलिङ्गदर्शनादाकाशः परमात्मेति व्युत्पादितं, तथापि तद्वदत्र परमात्मलिङ्गदर्शनाभावान्नामरूपनिर्वहणस्य भूताकाशेऽप्यवकाशदानेनोपपत्तेरकस्माच्च रूढिपरित्यागस्या- योगात् । नामरूपे अन्तरा ब्रह्मेति च नाकाशस्य नामरूपयोर्निर्वहितुरन्तरालत्वमाहापि तु ब्रह्मणस्तेन भूताकाशो नामरूपयोर्निर्वहिता । ब्रह्म चैतयोरन्तरालं मध्यं सारमिति यावत् । न तु निर्वोढैव ब्रह्म अन्त- रालं वा निर्वोढृ । तस्मात्प्रसिद्धेर्भूताकाशमेवाकाशो न तु ब्रह्मेति प्राप्तम् । एवं प्राप्त उच्यते—परमेवा- काशं ब्रह्म कस्मात् ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । नामरूपमात्रनिर्वाहकमिहाकाशमुच्यते । भूता- काशञ्च विकारत्वेन नामरूपान्तःपाति सत् कथमात्मानमुद्वहेत् । न हि सुशिक्षितोऽपि विज्ञानी स्वेन स्कन्धेनात्मानं वोढुमुत्सहते । न च नामरूपश्रुतिरविशेषतः प्रवृत्ता भूताकाशवर्जं नामरूपान्तरे सङ्कोचयितुं सति सम्भवे युज्यते, न च निर्वाहकत्वं निरङ्कुशमवगतं ब्रह्म लिङ्गं कथम्चित् क्लेशेन परतन्त्रे नेतुमु-

भामती-व्याख्या

संशय—उक्त श्रुति में पठित 'आकाश' शब्द भूताकाश का बोधक है ? अथवा ब्रह्म का ?

पूर्वपक्ष—यद्यपि "आकाशस्तल्लिङ्गात्" (ब्र. सू. १।१।२२) इस सूत्र में यह निर्णय दे दिया गया है कि उक्त श्रुति में ब्रह्म के संकीर्तित लिङ्गों (धर्मों) के आधार पर 'आकाश' शब्द परमात्मा का बोधक है । तथापि यहाँ वैसा ब्रह्म-लिङ्ग-दर्शन न होने के कारण 'आकाश' शब्द ब्रह्म का गमक नहीं हो सकता । नाम और रूपात्मक प्रपञ्च का निर्वहण भूताकाश में भी सम्भव है, क्योंकि वह समस्त प्रपञ्च को रहने के लिए अवकाश प्रदान करता है । 'आकाश' पद भूताकाश में रूढ़ है, रूढि अर्थ का अकस्मात् (बिना किसी कारण के) परित्याग उचित नहीं । 'नामरूप अन्तरा ब्रह्म'—इन शब्दों के द्वारा नाम-रूप के निर्वाहक आकाश की अन्तरालता विवक्षित नहीं, अपितु ब्रह्म की, अर्थात् नाम-रूप का निर्वाहिता तो आकाश ही है, ब्रह्म नाम और रूप के अन्तराल (मध्य) में अवस्थित सारभूत वस्तु है । आकाशरूप निर्वोढा निर्वाहिता ब्रह्म नहीं और अन्तरालभूत जो ब्रह्म है, वह नाम-रूप का निर्वाहिता नहीं । अतः लोक-प्रसिद्धि और रूढि अर्थ के अनुसार 'आकाश' शब्द भूताकाश का ही बोधक है, ब्रह्म का नहीं ।

सिद्धान्त—'आकाश' शब्द से यहाँ ब्रह्म ही विवक्षित है, क्योंकि "अर्थान्तरत्वादि- व्यपदेशात्" अर्थात् नामरूपात्मक समग्र प्रपञ्च की निर्वाहक वस्तु को 'आकाश' शब्द कहता है । भूताकाश तो स्वयं विकाररूप होने के कारण नाम-रूप का अन्तः पाती है, अतः वह अपना निर्वाहक क्योंकर होगा ? कितना भी कुशल नट हो वह कभी अपने कन्धे पर अपने- आप को बिठा नहीं सकता । 'नामरूप' शब्द सामान्यतः समस्त 'प्रपंच का बोधक है, आकाशेतर प्रपञ्च में संकुचित नहीं किया जा सकता । जगत्-निर्वाहकत्व एक ऐसा धर्म है, जो ब्रह्म का ही लिङ्ग (धर्म) है, उसे खींच-खाँच कर भी पराश्रित आकाश में घटाना सम्भव नहीं ।