भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५५

तद्यावत्तेषां शब्दानामन्यपरत्वं न प्रतिपाद्यते तावत्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणमिति प्रतिपादितमप्याकुलीभवेत् । अतस्तेषामन्यपरत्वं दर्शयितुं परः संदर्भः प्रवर्तते । आनुमानिकमप्यनुमाननिरूपितमपि प्रधानमेकेषां शाखिनां शब्दवदुपलभ्यते । काठके हि पठ्यते—'महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः' ( १।३।११ ) इति । तत्र य एव यन्नामानो यत्क्रमाश्च महदव्यक्तपुरुषाः स्मृतिप्रसिद्धास्त एवेह प्रत्यभिज्ञायन्ते । तत्राव्यक्तमिति स्मृतिप्रसिद्धेः, शब्दादिहीनत्वाच्च न व्यक्त.मव्यमिति व्युत्पत्तिसंभवात् , स्मृतिप्रसिद्धं प्रधानमभिधीयते । तस्य शब्दवत्त्वादशब्दत्वमनुपपन्नम् । तदेव च जगतः कारणं श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धिभ्य इति चेत् ।

भामती

अजामेकामित्यादीनां तु कारणत्वाभिधानमतिस्फुटम् । एवञ्च लक्षणव्यभिचारापत्तावऽव्यभिचाराय युक्त उत्तरसूत्रसन्दर्भारम्भ इति ।

पूर्वपक्षयति ॐ तत्र य एव इति ॐ । सांख्यप्रवादरूढिमाह ॐ तत्राव्यक्तम्' इति ॐ । सांख्य-स्मृतिप्रसिद्धेन केवलं रूढिरवयवप्रसिद्ध्याप्ययमेवार्थोऽवगम्यत इत्याह “न व्यक्त इति । शान्तघोरमूढ-शब्दाविहीनत्वाच्चेति । श्रुतिरुक्ता स्मृतिश्च साख्याया । न्यायश्च—

भामती-व्याख्या

शब्द अव्यवहितपूर्वकालत्व का बोधक है, अव्यवहितपूर्वकालत्व ही कारणत्वपदार्थ है । "अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः" ( श्वेता. ४५ ) इत्यादि वाक्यों में तो जगत्कारणत्व-प्रतिपादन अत्यन्त स्फुट है । इस प्रकार उक्त ब्रह्म के जगत्कारणत्वरूप लक्षण की अतिव्याप्ति प्रधानादि में अवश्य प्रसक्त है, उसकी निवृत्ति के लिए उत्तरभावी सूत्र-सन्दर्भ नितान्त आवश्यक और सार्थक है ।

संशय—“महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः" ( कठो. १।३।११ ) इस वाक्य में 'महत्' शब्द प्रधान का वाचक है ? अथवा अस्फुटित शरीरादि कार्य का ?

पूर्वपक्ष—“तत्र य एव यन्नामानो यत्क्रमाश्च महदव्यक्तपुरुषाः स्मृतिप्रसिद्धाः, ते एवेह प्रत्यभिज्ञायन्ते"—इस भाष्य के द्वारा भाष्यकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सांख्यदर्शनकारों ने जिस नाम और जिस क्रम से अपने मौलिक पदार्थों का प्रतिपादन किया है, वे पदार्थ उसी नाम और क्रम से प्रक्रान्त वेदान्त-वाक्यों में प्रत्यभिज्ञात हो रहे हैं। वे पदार्थ हैं—'महद्', 'अव्यक्त' और 'पुरुष' । 'तत्राव्यक्तमिति स्मृतिप्रसिद्धेः' इस भाष्य के द्वारा 'अव्यक्त' शब्द पर प्रकाश डालते हुए यह कहा गया कि सांख्यमतानुसार 'अव्यक्त' शब्द जिस शब्दादि के मूलकारणीभूत प्रकृतिरूप अर्थ में रूढ़ माना जाता है, वह केवल रूढ़ नहीं यौगिक भी है, क्योंकि 'न व्यक्तम्, अव्यक्तम्' इस प्रकार का अवयवार्थ भी वहाँ घट जाता है, शान्त, घोर और मूढ ( स्थूल ) शब्दादि रूप प्रपञ्च को व्यक्त ( प्रकट ) कहते हैं, उसका कारण तत्त्व सूक्ष्म होने से अव्यक्त कहा जाता है । अव्यक्तादि के साधक प्रमाण जो बताए हैं—"श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धिभ्यः" । उन में ( श्रुति के रूप में “महतः परमव्यक्त" ( कठो. १।३।११) इस वाक्य को ही यहाँ भाष्यकार ने इङ्गित किया है, क्योंकि वहाँ 'अव्यक्तम्' पद की विशद व्याख्या, प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि सत्त्व, रज और तम'—इन तीन गुणों की साम्यावस्था को अव्यक्त इसीलिए कहा जाता है कि उसमें शब्दादि प्रपञ्च व्यक्त ( स्थूल ) रूप में न होकर अव्यक्त ( सूक्ष्म ) ही रहता है। (२) स्मृति प्रमाण के रूप में "कारणमस्त्यव्यक्तम्" ( सां० का० १६ ) इत्यादि सांख्यशास्त्र का उल्लेख किया गया है और (३) न्याय ( युक्ति ) के रूप में उद्धृत किया गया है—