भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४५६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १] |
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नैतदेवम्; न ह्येतत्काठकं वाक्यं स्मृतिप्रसिद्धयोर्महदव्यक्तयोरस्तित्वपरम्। न ह्यत्र यादृशं स्मृतिप्रसिद्धं स्वतन्त्रं कारणं त्रिगुणं प्रधानं तादृशं प्रत्यभिज्ञायते। शब्दमात्रं ह्यत्राव्यक्तमिति प्रत्यभिज्ञायते। स च शब्दो न व्यक्तमव्यक्तमिति यौगिकत्वादम्यस्मिन्नपि सूक्ष्मे सुदुर्लक्ष्ये च प्रयुज्यते। न चायं कस्मिंश्चिद्रूढः। या तु प्रधानवादिनां रूढिः सा तेषामेव पारिभाषिकी सती न वेदार्थनिरूपणे कारणभावं प्रतिपद्यते। न च क्रममात्रसामान्यात्समानार्थप्रतिपत्तिर्भवत्यसति तद्रूपप्रत्यभिज्ञाने। न ह्यश्वस्थाने गां पश्यन्नश्वोऽयमित्यमूढोऽध्यवस्यति। प्रकरणनिरूपणायां चात्र न परपरिकल्पितं प्रधानं प्रतीयते; शरीरं ह्यत्र रथरूपकविन्यस्तमव्यक्तशब्देन परिगृह्यते। कुतः? प्रकरणात्परिशेषाच्च। तथा ह्यनन्तरातीतो ग्रन्थ
भामती
'भेदानां परिमाणात्समन्वयाच्छक्तितः प्रवृत्तेश्च ।
कारणकार्यविभागादविभागाद्वैश्वरूप्यस्य ॥
कारणमस्त्यव्यक्तम्' इति।
न च महतः परमव्यक्तमिति प्रकरणपरिशेषाभ्यामव्यक्तपदं शरीरगोचरम्, शरीरस्य शान्तघोरमूढरूपशब्दाद्यात्मकत्वेनाव्यक्तत्वानुपपत्तेः। तस्मात्प्रधानमेवाव्यक्तमुच्यत इति प्राप्ते, उच्यते—
ॐ नेतदेवं नह्येतत्काठकं वाक्यम् इति ॐ। लौकिकी हि प्रसिद्धी रूढिर्वेदार्थनिर्णये निमित्तं,
भामती-व्याख्या
भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तितः प्रवृत्तेश्च ।
कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥ (सां० का० १५)
[ 'महदादिविशेषा अव्यक्तकारणाः, परिमाणात्' इस प्रकार अव्यक्त तत्त्व में जगत् की कारणता सिद्ध की गई है। परिमाणात् का अर्थ परिमितत्वात् या नियतत्वात् है। जैसे घट मृत्तिका से नियत होने के कारण मृत्कारणक होता है, वैसे ही महदादि कार्य अव्यक्त से नियत होने के कारण अव्यक्तकारणक है। इसी प्रकार अव्यक्त का कार्य में अन्वय यह सिद्ध करता है कि समस्त कार्य अव्यक्तकारणक है। मृत्तिका की शक्ति से जनित घटादि कार्य जैसे मृत्कारणक है, वैसे ही अव्यक्त की शक्ति से प्रकट हुआ महदादि कार्य अव्यक्तकारणक है। यह विश्व (महदादि स्थूल जगत्) सृष्टि के समय जिस तत्त्व से विभक्त (आविर्भूत) और प्रलय के समय जिसमें अविभक्त (तिरोहित) हो जाता है, वह अव्यक्त तत्त्व ही है]। "महतः परमव्यक्तम्"—यह वाक्य अपने प्रकरण और वाक्यशेष के आधार पर शरीर का प्रतिपादक है'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि शरीर भी उस व्यक्तरूप स्थूल कार्य के अन्तर्गत है, जिसे अपने से भिन्न किसी अव्यक्त की अपेक्षा है, अतः शरीर को अव्यक्त नहीं कहा जा सकता।
सिद्धान्त—भाष्यकार ने सूत्रस्थ सिद्धान्त का विशदीकरण किया है—"नैतदेवम्"। न ह्येतत्काठकं वाक्यं स्मृतिप्रसिद्धयोर्महदव्यक्तयोरस्तित्वपरम्"। इस भाष्य का अभिप्राय यह है कि वेदार्थ-निर्णय में अवश्य ही लोक-प्रसिद्धि का यथेष्ट समादर किया गया है, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं—"य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकाः, ते एव चैषामर्थाः" (शाबर. पृ. २९१) किन्तु अव्यक्तादि शब्दों की प्रधानादि अर्थों में लौकिकी प्रसिद्धि नहीं, यह तो एक दर्शन के पक्षपाती आचार्यों की अपनी ऊहा है, वह अनादि प्रसिद्धि नहीं, पौरुषेयी कल्पनामात्र है। उसे वेदार्थ निर्णय में वैसे ही निमित्त नहीं माना जाता, जैसे वैद्यों-द्वारा कल्पित औषध-विशेष के बोधक 'चन्द्रप्रभा' आदि शब्द, क्योंकि वह तो एक