भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५७

आत्मशरीरादीनां रथिरथादिरूपकक्लृप्तिं दर्शयति—'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥' (का० १।३।३,४) इति।

भामती तदुपायत्वात्। यथाहुः—"य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्त एव चैषामर्थाः" इतिः न तु परीक्ष- काणां पारिभाषिकी, पौरुषेयी हि सा न वेदार्थनिर्णयनिबन्धनसिद्धौ निमित्तम् औषधादिप्रसिद्धिवत्। तस्मात् रूढितस्तावन्न प्रधानं प्रतीयते। योगरूढस्त्वन्यत्रापि तुल्यः। तदेवमव्यक्तश्रुतावन्यथासिद्धायां प्रकरणपरिशेषाभ्यां शरीरगोचरोऽयमव्यक्तशब्दः। यथा अस्य तद्गोचरत्वमुपपद्यते, तथाऽग्रे दर्शयिष्यति। तेषु शरीरादिषु मध्ये विषयांस्तद्गोचरान् विद्धि। यथाऽश्वोऽध्वानमालम्ब्य चलति, एवमिन्द्रियहयाः स्वगोचरमालम्ब्येति। आत्मा भोक्तेत्याहुर्मनीषिण। कथम्? इन्द्रियमनोयुक्तम् योगो यथा भवति।

भामती-व्याख्या ऐसी परिभाषा है, जिसे सर्वलोक-प्रसिद्धि नहीं कहा जा सकता, ऐसे ही प्रधान के अर्थ में 'अव्यक्त' शब्द का प्रयोग सांख्याचार्यों को एक अपनी परिभाषा है, उसके आधार पर वैदिक 'अव्यक्त' शब्द की 'प्रधान' अर्थ में रूढ़ि नहीं मानी जा सकती। 'न व्यक्तमव्यक्तम्'—इस प्रकार का योगार्थ तो अन्यत्र ( शरीरादि अर्थों में) भी घटाया जा सकता है। इस प्रकार अव्यक्त शब्दरूप श्रुति अन्यथा-सिद्ध हो जाने के कारण निर्णायिका नहीं हो सकती, अतः प्रकरण और परिशेष के द्वारा शरीर को बोधकता 'अव्यक्त' शब्द में निर्णीत होती है—ऐसा भाष्यकार आगे चल कर दिखायेंगे।

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥ (कठो. १।३।४)

इस श्रुति में 'तेषु' का अर्थ है—शरीरादिषु मध्ये। रूपादि को चक्षुरादि इन्द्रियों का विषय इस लिए कहा जाता है कि जैसे अश्व किसी मार्ग का अवलम्बन कर चलता है, वैसे ही इन्द्रियगण रूपादि विषयों का अवलम्बन किया करते हैं, जैसा कि भाष्यकार ने भी कहा है—"गोचरान् मार्गान् रूपादीन् विषयान् विद्धि" (कठो. पृ. ६२)। 'आत्मा विषयों का भोक्ता है'—ऐसा मनीषिगण कहा करते हैं। निष्क्रिय आत्मा में भोग क्रिया का सम्पादन करने के लिए 'इन्द्रियमनोयुक्तं यथा स्यात्तथा'—ऐसा कहा गया है अर्थात् इन्द्रिय और मन के सम्बन्ध से आत्मा गन्धादि का भोक्ता होता है, [जैसा कि भाष्यकार ने भी प्रकारान्तर से उक्त श्रुति-वाक्य की व्याख्या करते हुए कहा है—"शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं संयुक्त- मात्मानं भोक्तेति संसारीत्याहुर्मनीषिणः। न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति, बुद्ध्याद्युपाधि- कृतमेव तस्य भोक्तृत्वम्" (कठो. पृ. ६२)]।

भाष्यकार ने जो कहा है—"शरीरं ह्यत्र परिगृह्यते, कुतः? प्रकरणात् परिशेषाच्च"। वहाँ प्रकरण का स्वरूप है—"प्रधानस्याकाङ्क्षावतं वचनं प्रकरणम्"। [आकांक्षावान् व्यक्ति की आकांक्षा प्रश्न के रूप में परिणत होती है, अतः श्री शबरस्वामी ने जैमिनि-सूत्रों के अपने भाष्य (पृ० ८१७) में प्रकरण का लक्षण बताया है—"प्रश्नोपक्रमं प्रकरणम्]। प्रकृत में विष्णु का परम पद अधिगन्तव्य (प्राप्तव्य) प्रधान प्रतिपाद्य वस्तु है—

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुषात् न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः॥ (कठो. १।३।११)

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