भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १ |
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प्रसङ्गात् । स्मृतिश्च तन्त्राख्या परमर्षिप्रणीता शिष्टपरिगृहीता, अन्याश्च तदनुसारिण्यः स्मृतयः, ता एवं सत्यनवकाशाः प्रसज्येरन् । तासु ह्यचेतनं प्रधानं स्वतन्त्रं जगतः कारणमुपनिबध्यते । मन्वादिस्मृतयस्तावच्चोदनालक्षणेनाग्निहोत्रादिना धर्मजातेना- पेक्षितमर्थं समर्पयन्त्यः सावकाशा भवन्ति । अस्य वर्णस्यास्मिन्कालेऽनेन विधाने- नोपनयनं, ईदृशश्चाचारः, इत्थं वेदाध्ययनं, इत्थं समावर्तनं, इत्थं सहधर्मचारिणीसंयोग इति । तथा पुरुषार्थाश्च वर्णाश्रमधर्माज्ञानाविधाग्विद्धति । नैवं कपिलादिस्मृतीना- मनुष्ठेये विषयेऽवकाशोऽस्ति । मोक्षसाधनमेव हि सम्यग्दर्शनमधिकृत्य ताः प्रणीताः । यदि तत्राप्यनवकाशाः स्युरानर्थक्यमेवासां प्रसज्येत । तस्मात्तद्विरोधेन वेदान्ता व्याख्यातव्याः । कथं पुनरीक्षत्यादिभ्यो हेतुभ्यो ब्रह्मैव सर्वज्ञं जगतः कारणमित्यव- धारितः श्रुत्यर्थः स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गेन पुनराक्षिप्यते ? भवेदद्यमनाक्षेपः स्वतन्त्र-
भामती
स्मृतिस्तन्त्राख्या परमर्षिणा कपिलेनादिविदुषा प्रणीता। अन्याश्चासुरिपञ्चशिखादिप्रणीताः स्मृतयस्तदनु- सारिण्यः । न खलु अमूषां स्मृतीनां मन्वादिस्मृतिवदभ्योऽवकाशः शक्यो भवितुमृते मोक्षसाधनप्रकाशनात् । तदपि चेन्नाभिश्रद्दध्युरनवकाशाः सत्योऽप्रमाणं प्रसज्येरन् । तस्मात् तदविरोघेन कथञ्चिद्वेदान्ता व्याख्या- तव्याः । पूर्वपक्षमाक्षिपति ॐ कथं पुनरीक्षत्यादिभ्यः इति ॐ । प्रसाधितं खलु धर्ममीमांसायां 'विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' इत्यत्र, यथा श्रुतिविरुद्धानां स्मृतीनां दुर्बलतयाऽनपेक्षणीयत्वं तस्मान्न दुर्बलानुरोधेन बलीयसीनां श्रुतीनां युक्तमुपवर्णनम्, अपि तु स्वतःसिद्धप्रमाणभावाः श्रुतयो दुर्बलाः स्मृतीर्बाधन्त एवेति युक्तम् । पूर्वपक्षी समाधत्ते । ॐ भवेदयम् इति ॐ । प्रसाधितोऽप्यर्थः श्रद्धाजडान्
भामती-व्याख्या
और निष्प्रमाण हो जाती है किन्तु उसकी प्रामाणिकता सिद्ध है, क्योंकि “स्मृतिश्च तन्त्राख्या परमर्षिप्रणीता”। ‘तन्त्र्यते व्युत्पाद्यते मोक्षसाधनमनेन'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर 'तन्त्र' शब्द का अर्थ दर्शन या शास्त्र है। आदिविद्वान् महर्षि कपिल ने 'तन्त्र' नाम से अपने स्वतन्त्र दर्शन का प्रणयन किया। उसके आधार पर उनकी शिष्य-परम्परा में आसुरि, वार्षगण्य और पञ्चशिखादि आचार्यों ने अनेक शास्त्रों की रचना की [ सम्भवतः 'षष्टि तन्त्र' नाम के ग्रन्थ को ध्यान में रखकर 'तन्त्र' शब्द को सांख्य-दर्शन की आख्या (संज्ञा) माना गया है ] । वे सभी शास्त्र मोक्ष के साधनीभूत प्रधानादि तत्त्वों के प्रतिपादक हैं। यदि उनके प्रतिपादन में भी उनको कोई अवसर नहीं दिया जाता, उनका प्रामाण स्वीकार नहीं किया जाता, तब वे अत्यन्त निरवकाश निरर्थक और अप्रमाण हो जाते हैं। मन्वादि स्मृतियों का कर्म लेकर ब्रह्म तक का विषय विशाल है, अतः उनको यदि एक स्थान पर अवसर नहीं दिया जाता, तब अन्यत्र उनको अवसर मिल जाता है, किन्तु सांख्य-स्मृति का विषय सीमित है।
इस अधिकरण का जो पूर्व पक्ष है कि 'सांख्य स्मृति के अनुरोध पर वेदान्त-समन्वय का संकोच करके प्रधान (प्रकृति) तत्त्व को जगत् का कारण माना जाय।' उस पर कोई आक्षेप करता है—“कथं पुनरीक्षत्यादिभ्यो हेतुभ्यो ब्रह्मैव सर्वज्ञं जगतः कारणम्”। आशय यह है कि पूर्व मीमांसा में यह सिद्ध कर दिया गया है कि श्रुति-विरुद्ध स्मृति को प्रमाण नहीं माना जाता, चाहे वह निरवकाश हो या सावकाश। विरुद्ध श्रुति के न होने पर ही स्मृति- वाक्य को श्रुतिमूलकत्वानुमानपूर्वक प्रमाण माना जाता है—“विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्” (जै० सू० १।३।३ ) । सांख्यादि स्मृतियाँ दुर्बल हैं, उनकी अपेक्षा वेदान्त-वाक्य स्वतःसिद्धप्रामाण्यक होने से प्रबल हैं, अतः श्रुति-विरुद्ध स्मृति के आधार पर समन्वय- संकोच का आक्षेप क्योंकर हो सकता है ?