भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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सांख्यादिस्मृतिविरोधनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५३५

प्रज्ञानाम् । परतन्त्रप्रज्ञास्तु प्रायेण जनाः स्वातन्त्र्येण श्रुत्यर्थमवधारयितुमशक्नुवन्तः प्रख्यातप्रणेतृकासु स्मृतिष्ववलम्बेरन् । तद्बलेन च श्रुत्यर्थं प्रतिपित्सेरन् । अस्मत्कृते च व्याख्याने न विश्वस्युर्वहुमानात्स्मृतीनां प्रणेतृषु । कपिलप्रभृतीनां चार्षं ज्ञानमप्रतिहतं स्मर्यते । श्रुतिश्च भवति—'ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत्' ( श्वे० ५।२ ) इति । तस्मान्नैषां मतमयथार्थं शक्यं संभावयितुम् । तर्कावष्टम्भेन चैतेऽर्थं प्रतिष्ठापयन्ति । तस्मादपि स्मृतिबलेन वेदान्ता व्याख्येया इति पुनराक्षेपः ।

तस्य समाधिः— नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गादिति । यदि स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गेनेश्वरकारणवाद आक्षिप्येत एवमप्यन्या ईश्वरकारणवादिन्यः स्मृतयोऽनवकाशाः

भामती

प्रति पुनः प्रसाध्यत इत्यर्थः । आपाततः समाधानमुक्त्वा परमसमाधानमाह पूर्वपक्षी ॐ कपिलप्रभृतीनां चायम् इति ॐ । अयमस्याभिसन्धिः — ब्रह्म हि शास्त्रस्य कारणमुक्तं 'शास्त्रयोनित्वाद्' इति, तेनैष वेदराशिरंब्रह्मप्रभवः सन्नाजानसिद्धानावरणभूतार्थमात्रगोचरतद्बुद्धिपूर्वको यथा तथा कपिलादीनामपि श्रुतिस्मृतिप्रथिताजानसिद्धभावानां स्मृतयोऽनावरणसर्वविषयतद्बुद्धिप्रभवा इति न श्रुतिभ्योऽनूषाणमस्ति कश्चिद्विशेषः । न चैताः स्फुटतरं प्रधानादिप्रतिपादनपराः शक्यन्तेऽन्यथयितुम् । तस्मात् तदनुरोधेन कथञ्चिच्छ्रुतय एव नेतव्याः । अपि च तर्कोऽपि कपिलादिस्मृतीरनुमन्यते, तस्मादप्येतदेव ग्राह्यम् ।

एवं प्राप्त आह ॐ तस्य समाधिः इति ॐ । यथा हि श्रुतीनामविगानं ब्रह्मणि गतिसामान्यात् , नैवं स्मृतीनामविगानमस्ति प्रधाने, तासां भूयसीनां ब्रह्मोपादानत्वप्रतिपादनपराणां तत्र तत्र दर्शनात् ।

भामती-व्याख्या

इस आक्षेप का समाधान करते हुए महापूर्वपक्षी कह रहा है—“भवेदयमनाक्षेपः”। अर्थात् जो लोग श्रुतियों का स्वतन्त्र प्रामाण्य स्वीकार करते हैं, उनकी ओर से उक्त पूर्व पक्ष नहीं किया जा रहा है, अपि तु जिन लोगों की ऐसी धारणा है कि श्रुतियों का स्वतन्त्र अर्थ नहीं किया जा सकता, अपि तु किसी-न-किसी स्मृति के परिप्रेक्ष्य एवं स्मृतिकार के निर्देशन में ही श्रुतियों का सटीक अर्थ किया जा सकता है। महर्षि कपिलादि का ज्ञान अप्रतिहत था—ऐसा स्मृतियों और श्रुतियों ने मुक्त कण्ठ से कहा है—“ऋषिं प्रसूतं कपिलं यः तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत्” ( श्वेता ५।२) सारांश यह है कि ब्रह्म ही सभी वेदों का कारण बताया गया है—“शास्त्रयोनित्वात्” ( ब्र. सू. १।१।४)। कर्ता की बुद्धि ही उसके शास्त्र की प्रतिपाद्य वस्तु को जन्म दिया करती है, जैसे ब्रह्म या ईश्वर की बुद्धि स्वभावतः निरावृत सत्य वस्तु को विषय करती है, अतः वेद भी वैसी ही सत्य वस्तु के बोधक माने जाते हैं। वैसे ही कपिलादि महर्षियों का ज्ञान भी श्रुति-स्मृति-द्वारा आजानसिद्ध यथाभूतवस्तुविषयक ही कहा गया है। फलतः कपिलादि-प्रणीत स्मृतियों का वेदों से कोई अन्तर नहीं रह जाता। ये स्मृतियाँ स्फुट रूप से प्रधानादि का अभिधान करती हैं, इनका अन्यथाकरण कभी नहीं हो सकता, अतः इसके अनुरोध पर श्रुतियों का ही अन्यथानयन करना चाहिए। तर्क भी कपिलादि-प्रणीत स्मृतियों का समर्थक है—“कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम्” ( सां. का. १४)।

सिद्धान्त—उक्त पूर्व पक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“तस्य समाधिः”। ब्रह्म में समन्वित होने के लिए श्रुतियों में जैसा अविगान (अविरोध) है, वैसा स्मृतियों में प्रधान (प्रकृति) के साथ समन्वित होने के लिए अविगान नहीं, अपितु विरोध है, क्योंकि अधिकतर श्रुति-सन्दर्भों में ब्रह्मगत जगत् की उपादानता साक्षात् प्रतिपादित है,