भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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सांख्यस्मृतेर्नादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५३७

लक्षणः। ततश्च पूर्वसिद्धायाश्चोदनाया अर्थो न पश्चिमसिद्धपुरुषवचनवशेनार्थतिशङ्कितुं शक्यते। सिद्धव्यपाश्रयकल्पनायामपि बहुत्वत् सिद्धानां प्रदर्शितेन प्रकारेण स्मृतिविप्रतिपत्तौ सत्यां न श्रुतिव्यपाश्रयादन्यन्निर्णयकारणमस्ति। परतन्त्रप्रज्ञस्यापि नाकस्मात्स्मृतिविशेषविषयः पक्षपातो युक्तः, कस्यचित्क्वचित्पक्षपाते सति पुरुषम तिवश्वरूप्येण तत्त्वाव्यवस्थानप्रसङ्गात्। तस्मात्तस्यापि स्मृतिविप्रतिपत्त्युपन्यासेन श्रुत्यनुसाराननुसारविषयविवेचनेन च सन्मार्गे प्रज्ञा संग्रहरणीया। या तु श्रुतिः कपिलस्य ज्ञानातिशयं प्रदर्शयन्ती प्रदर्शिता, न तया श्रुतिविरुद्धमपि कापिलं मतं श्रद्धांतुं शक्यम्। कपिलमिति श्रुतिसामान्यमात्रत्वात् अन्यस्य च कपिलस्य सगरपुत्राणां प्रतप्तुर्वासुदेवनाम्नः स्मरणात्। अन्यार्थदर्शनस्य च प्राप्तिरहितस्यासाधकत्वात्।

भामती सिद्धवचनमप्रमाणमुक्त्वा सिद्धानामपि परस्परविरोधे तद्वचनादनाश्वास इति पूर्वोक्तं स्मारयति ॐ सिद्धव्यपाश्रयकल्पनायामपि इति ॐ। श्रद्धाजडान् बोधयति। ॐ परतन्त्रप्रज्ञस्यापि इति ॐ। ननु श्रुतिश्चेत्कपिलादीनामनावरणभूतार्थगोचरज्ञानातिशयं बोधयति, कथं तेषां वचनमप्रमाणं ? तदप्रामाण्ये श्रुतेरप्यप्रामाण्यप्रसङ्गादित्यत आह ॐ या तु श्रुतिः इति ॐ। न साध्यसिद्धानां परस्परविरूद्धानि वचांसि प्रमाणं भवितुमर्हन्ति। न च विकल्पो वस्तुनि, सिद्धे तदनुपपत्तेः। अनुष्ठानमनागतोत्पाद्यं विकल्प्यते, न सिद्धम्। तस्य व्यवस्थानात्। तस्मात् श्रुतिसामान्यमात्रेण भ्रमः सांख्यप्रणेता कपिलः श्रौत इति। स्यादेतत् -

भामती-व्याख्या मान लेते हैं कि कपिल सिद्ध योगी थे तो क्या उनके श्रुति से विरुद्ध अर्थ के अभिधायक शास्त्रों को भी प्रमाण मान लिया जाय ? कभी नहीं। ऐसे शास्त्रों का अप्रामाण्य निश्चित है, वैसे अप्रमाणभूत शास्त्रों से वेदार्थ का बाध कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वेदों का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है।

वेद-विरुद्ध सिद्ध-वचनों की अप्रमाणता दिखा कर सिद्ध-वचनों का परस्पर-विरोध देख कर भी उनके वचनों पर अविश्वास हो जाता है-ऐसे पूर्व-कथन का स्मरण दिलाया जाता है-"सिद्धव्यपाश्रयकल्पनायामपि बहुत्वत् सिद्धानाम्"। स्मृति और स्मृतिकारों के जड़ (अन्ध) भक्तों को भी पक्षपात-रहित होकर विचार करना चाहिए-"परतन्त्रप्रज्ञस्यापि नाकस्मात् स्मृतिविशेषविषयः पक्षपातो युक्तः"। श्रुत्यर्थ-निर्णय में यदि स्मृति का माध्यम आवश्यक है, तब केवल कापिल स्मृति का ही अनुसरण क्यों ? मन्वादि स्मृतियों का अनुगमन क्यों नहीं किया जाता ? "ऋषिं प्रसूतं कपिलम्"- यह श्रुति जब कि कपिल का ज्ञान अनावृतसत्यार्थविषयक बता रही है तब कापिल वचन को अप्रमाण क्योंकर कहा जा सकता है ? कपिल-स्मृति की अप्रमाणता से उक्त श्रुति में ही अप्रामाण्य प्रसक्त क्यों न होगा ? इस शङ्का का समाधान है-"या तु श्रुतिः कपिलस्य ज्ञानातिशयं प्रदर्शयन्ती दर्शिता"। अर्थात् वह श्रुति केवल यह कह रही है कि कपिल सिद्ध थे, किन्तु यह नहीं कहती कि कपिल का श्रुति-विरुद्ध वचन भी प्रमाण माना जाय। बहुत-से सिद्धों के परस्पर विरुद्ध वचन भी प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उन सबको प्रमाण मानने के लिए षोडशि के ग्रहणाग्रहण के समान स्मृति-गम्य विरुद्ध अर्थों को मानना आवश्यक है, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि ग्रहणाग्रहणादि अनुष्ठानों में इस प्रकार का विकल्प माना जा सकता है, सिद्ध अर्थ में नहीं- यह कई बार कहा जा चुका है। दूसरी बात यह भी है कि कथित श्वेताश्वतर-श्रुति ने जो 'कपिल' शब्द का प्रयोग किया है, वह महर्षि कपिल का ही वाचक है-ऐसी बात नहीं, अपितु श्रुतिसामान्य है अर्थात् सामान्य शब्द है, इसका अन्य भी अर्थ हो सकता है, जैसे

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