भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| सांख्यस्मृतेर्नादरः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५३९ |
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विरुद्धं च, न केवलं स्वतन्त्रप्रकृतिकल्पनयैवेति । वेदस्य हि निरपेक्षं स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिव रूपविषये । पुरुषवचसां तु मूलान्तरापेक्षं वक्तृस्मृतिव्यवहितं चेति विप्रकर्षः । तस्माद्वेदविरुद्धे विषये स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोषः ॥ १ ॥
भामती
वेदविरोधि कापिंलं वचो नादरणीयमित्यत आह ॐ वेदस्य हि निरपेक्षम् इति ॐ । अयमभिसन्धिः—सत्यं शास्त्रयोनिरीश्वरस्तथाप्यस्य न शास्त्रक्रियायामस्ति स्वातन्त्र्यं कपिलादीनामिव, स हि भगवान् यादृशं पूर्वस्मिन् सर्गे चकार शास्त्रं तदनुसारेणास्मिन्नपि सर्गे प्रणीतवान् । एवं पूर्वतरानुसारेण पूर्वस्मिन् , पूर्वतमानुसारण च पूर्वतर इत्यनादिरयं शास्त्रेश्वरयोः कार्यकारणभावः । तत्रेश्वरस्य न शास्त्रार्थज्ञानपूर्वा शास्त्रक्रिया येनास्य कपिलादिवत् स्वातन्त्र्यं भवेत् । शास्त्रार्थज्ञानं चास्य स्वयमाविर्भवदपि न शास्त्रकारणतामुपैति, द्वयोरव्यपर्यायेणाविर्भावात् । शास्त्रं च स्वतःबोधकतया पुरुषस्वातन्त्र्याभावेन निरस्तसमस्तदोषाशङ्कं सवनपेक्षं साक्षादेव स्वार्थे प्रमाणम् । कपिलादिवचांसि तु स्वतन्त्रकपिलादिप्रणेतृकाणि तदर्थस्मृतिपूर्वकाणि, तदर्थस्मृतयश्च तदर्थानुभवपूर्वाः । तस्मात्तासामप्रप्रत्ययाङ्गप्रामाण्यविनिश्चयाय यावत् स्मृत्यनुभवौ कल्प्येते तावत् स्वतःसिद्धप्रमाणभावयाऽनपेक्षयैव श्रुत्या स्वार्थो विनिश्चायित इति शीघ्रतरप्रवृत्तया श्रुत्या स्मृत्यर्थो बाध्यत इति युक्तम् ॥ १ ॥
भामती-व्याख्या
अनादरणीय क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर है—"वेदस्य हि निरपेक्षं स्वार्थे प्रामाण्यम्" । भाव यह है कि वेदों का कारण ईश्वर है, इस प्रकार वेद सांख्य-शास्त्र के समान पौरुषेय ही है । तथापि ईश्वर वेद-प्रणयन में कपिलादि के समान स्वतन्त्र नहीं। ईश्वर तो इतना ही करता है कि पूर्व कल्प में जैसा वेद प्रचलित था, उसका स्मरण करके वैसा ही इस कल्प में भी उपदेश कर देता है । इसी प्रकार पूर्व-पूर्व कल्प के अनुसार ही उत्तरोत्तर कल्प में ईश्वर वेद की परम्परा अक्षुण्ण रखता है । वेद और ईश्वर दोनों ही अनादि हैं, उनका कार्यकारणभाव भी अनादि ही है । वेदों की रचना इतर दर्शनों के समान शास्त्रार्थज्ञानपूर्वक नहीं होती, अतः सांख्य में कपिलादि के समान ईश्वर का वेद में स्वातन्त्र्य नहीं माना जाता । यद्यपि ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है, उसको वेदार्थ का ज्ञान भी स्वयं ही होता है, तथापि वेद-प्रणयन-क्रिया में कारण नहीं माना जाता, क्योंकि ईश्वर के द्वारा वेद-प्रणयन श्वास-प्रश्वास के समान बिना प्रयत्न के वैसे ही किया जाता है, जैसे उसका ज्ञान अयत्न-साध्य स्वतः आविर्भूत होता है । न तो उसका ज्ञान वेदाध्ययनपूर्वक होता है और न वेद-प्रणयन वेदार्थज्ञानपूर्वक । अपर्यायतः ( युगपत् ) आविर्भूत होनेवाले पदार्थों में परस्पर कार्यकारणभाव नहीं होता । [ महर्षि जैमिनि ने कहा है—'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत् प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' ( जै. सू. १।१।५ ) अर्थात् शास्त्रों में अप्रामाण्य तीन प्रकार का माना जाता है—(१) अबोधकत्व, (२) विपरीत या बाधितार्थ-बाधकत्व और (३) सन्दिग्धार्थ-बोधकत्व ] । इनमें अबोधकत्वात्मक अप्रामाण्य वेद में इसलिए नहीं कि वह निसर्गतः बोधक है, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं—"विप्रतिषिद्धमिदमुच्यते ब्रवीति वितथं चेति" ( शाबर पृ. १४) । विपरीत और सन्दिग्ध अर्थ का ज्ञान उस वचन से होता है, जो भ्रम, प्रमादादि दोषों से युक्त हो—"दुष्टेषु हि ज्ञानं मिथ्या भवति" ( शाबर. पृ. २५) । वेद में किसी प्रकार का दोष नहीं, वह स्वतः निर्दुष्ट और अपने अर्थावबोधन में किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा वैसे ही नहीं करता, जैसे प्रत्यक्ष प्रमाण, किन्तु कपिलादि के द्वारा प्रणीत शास्त्र तो स्वतन्त्रबुद्धिपूर्वक हैं, उनकी विषयवस्तु का पहले उन्होंने स्मरण किया, स्मरण तभी होगा, जब कि उसका अनुभव हो । इस