भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. ३ |
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कुतश्च स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोषः ?—
इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ ॥
प्रधानादितराणि यानि प्रधानपरिणामत्वेन स्मृतौ कल्पितानि महदादीनि न तानि वेदे लोके वोपलभ्यन्ते । भूतेन्द्रियाणि तावल्लोकवेदप्रसिद्धत्वाच्छक्यन्ते स्मर्तुम् । अलोकवेदप्रसिद्धत्वात्तु महदादीनां षष्ठस्येवेन्द्रियार्थस्य न स्मृतिरव कल्पते । यदपि क्वचित्परमिव श्रवणमवभासते, तदप्यतत्परं व्याख्यातम् 'आनुमानिकमप्येकेषाम्' ( ब्र० सू० १।४।१ ) इत्यत्र । कार्यस्मृतेरप्रामाण्यात्कारणस्मृतेरप्यप्रामाण्यं युक्तमित्यभिप्रायः । तस्मादपि न स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो दोषः । तर्कावष्टम्भं तु 'न विलक्षणत्वात्' ( ब्र० सू० २।१।४ ) इत्यारभ्योन्मथिष्यति ॥ २ ॥
( २ योगप्रत्युक्त्यधिकरणम् । सू० ३ )
एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ ३ ॥
एतेन सांख्यस्मृतिप्रत्याख्यानेन, योगस्मृतिरपि प्रत्याख्याता द्रष्टव्येत्य-
भामती
प्रधानस्य तावत् क्वचिद्वेदप्रदेशे वाक्याभासानि दृश्यन्ते, तद्विकाराणां तु महदादीनां तान्यपि न सन्ति । न च भूतेन्द्रियादिवन्महदादयो लोकसिद्धाः । तस्मादात्यन्तिकात् प्रमाणान्तरासंवादात् प्रमाणमूलत्वाच्च स्मृतेर्मूलाभावादभावो वन्ध्याया इव दौहित्र्यस्मृतेः । न चार्षं ज्ञानमत्र मूलमुपपद्यत इति युक्तम् । तस्मान्न कपिलस्मृतेः प्रधानोपादानत्वं जगत इति सिद्धम् ॥ २ ॥
भामती-व्याख्या
प्रकार सांख्यादि शास्त्रों की प्रमाणता के लिए अपेक्षित प्रतिपाद्यार्थविषयक स्मरण और अनुभव की कल्पना जब तक की जायगी, तब तक स्वतःप्रमाणभूत और निरपेक्ष वेद अपने अबाधित एवं असन्दिग्ध अर्थ का बोध शीघ्र ही करा देता है, जिसके द्वारा सांख्यादि स्मृतियाँ बाधितार्थक हो जाती हैं, वार्तिककार कहते हैं—
न च शीघ्रप्रवृत्तेऽर्थेऽस्ति चिरादागच्छतो गतिः ।
अश्वैरपहृतं को हि गर्दभैः प्राप्तुमर्हति ॥ (तं. वा. पृ. १७७) ॥१॥
सांख्याभिमत पदार्थों में से प्रधान ( प्रकृति ) के प्रतिपादक कुछ वाक्याभास वेदों में मिल भी जाते हैं, किन्तु प्रधान तत्त्व के विकारभूत महदादि के बोधक वाक्याभास भी नहीं मिलते, महाभूत और इन्द्रियादि के समान लोक में भी महदादि प्रसिद्ध नहीं। स्मृति वही प्रमाणभूत मानी जाती है, जिसका आप्त प्रमाण से संवाद ( समर्थन ) हो और जो स्वयं प्रमाणमूलक हो, किन्तु सांख्य स्मृति का न तो कोई ठोस मूल उपलब्ध होता है और न प्रमाणान्तर का संवाद, तब वह क्योंकर प्रमाण होगी ? जैसे कोई वन्ध्या स्त्री कहे कि यह स्मृति हमारे दौहित्र की बनाई हुई है, तो उसका यह कहना नितान्त अप्रमाण और असङ्गत है, क्योंकि उसकी मूलभूत उसकी दुहिता है ही नहीं ; वैसे ही सांख्य-परम्परा का यह कहना अत्यन्त निर्मूल है कि हमारे कपिलादि आचार्यों ने स्वयं प्रधानादि का अनुभव करके सांख्य-स्मृति का प्रणयन किया, क्योंकि उनके अनुभवादि का कोई मूल उपलब्ध नहीं होता। आर्ष ज्ञान को भी मूल मानना युक्ति युक्त नहीं, क्योंकि आद्य श्रुति-संवादित आर्ष ज्ञान से विरुद्ध है, फलतः कपिल-स्मृति के आधार पर प्रधानादि में जगदुपादानत्व नहीं माना जा सकता ॥ २ ॥