भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

योगस्मृतेर्नादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४१

भामती

नानेन योगशास्त्रस्य हैरण्यगर्भगवाताह्लादेः सर्वथा प्रामाण्यं निराक्रियते, किन्तु जगदुपादान-स्वतन्त्रप्रधानतद्विकारमहदहङ्कारपञ्चतन्मात्रगोचरं प्रामाण्यं नास्तीत्युच्यते । न चैतावतेषामप्रामाण्यं भवितुमर्हति । यत्पराणि हि तानि तत्राप्रामाण्येऽप्रामाण्यमश्नुवीरन् । न चैतानि प्रधानादिसद्भावपराणि । किन्तु योगस्वरूपतत्साधनतदवान्तरफलविभूतितत्परमफलकैवल्यव्युत्पादनपराणि । तच्च किञ्चिन्निमित्ती-कृत्य व्युत्पाद्यमिति प्रधानं सविकारं निमित्तीकृतं पुराणेष्विव सर्गप्रतिसर्गवंशमन्वन्तरवंशानुचरितं तत्प्रतिपादनपरेषु, न तु तद्विवक्षितम् । अन्यपरादपि चान्यनिमित्तं तत्प्रतीयमानमभ्युपेयेत, यदि न मानान्तरेण विरुध्येत । अस्ति तु वेदान्तश्रुतिभिरस्य विरोध इत्युक्तम् । तस्मात् प्रमाणभूतादपि योग-शास्त्रान्न प्रधानादिसिद्धिः । अत एव योगशास्त्रं व्युत्पादयित्वाऽऽह स्म भगवान् वार्षगण्यः—

'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।
यत् तु दृष्टिपथप्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम्' ॥ इति ॥

योगं व्युत्पिपादयिषता निमित्तमात्रेणेह गुणा उक्ताः, न तु भावतः, तेषामतात्त्विकत्वादित्यर्थः । अलोकसिद्धानामपि प्रधानादीनामनादिपूर्वपक्षन्यायाभासोत्प्रेक्षितानामनुवादत्वमुपपन्नम् । तदनेनाभिस-न्धिनाह ॐ एतेन सांख्यस्मृतिप्रत्याख्यानेन योगस्मृतिरपि ॐ प्रधानादिविषयतया । ॐ प्रत्याख्याता द्रष्टव्या

भामती-व्याख्या

सन्देह—योग-शास्त्र के अनुरोध पर सृष्टि-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय सङ्कुचित किया जाय ? अथवा नहीं ?

पूर्वपक्ष—सांख्य-स्मृति के प्रतिपाद्य पदार्थों का बहुत-सा भाग वेद में उपलब्ध नहीं, किन्तु योग-दर्शनद्वारा अभिहित यमादि पदार्थ वेद में उपलब्ध होते हैं, अतः योग-स्मृति के अनुसार प्रधान तत्त्व को ही जगत् का उपादान कारण माना जाय, ब्रह्म को नहीं ।

सिद्धान्त—सांख्य-दर्शन के समान ही योग-दर्शन भी अप्रमाण ही है। यद्यपि इस अधिकरण के द्वारा इस योग-शास्त्र के प्रामाण्य का सर्वथा निराकरण नहीं किया जाता, क्योंकि स्मृतिकारों ने हिरण्यगर्भ से इस शास्त्र का प्रादुर्भाव माना है—"हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः" (म. भार. शान्ति ३४९।६५) और महर्षि पतञ्जलि ने इसे सूत्र-बद्ध किया है। मुख्यरूप से इसमें मोक्ष-साधनीभूत विवेक-ज्ञान का विधान उपलब्ध होता है, अतः "यत्परः शब्दः, स शब्दार्थः"—इस न्याय के आधार पर उसी अर्थ में इस शास्त्र का तात्पर्य पर्यवसित होता है। इसके चार पादों में क्रमशः (१) योग का स्वरूप, उसके साधनीभूत यम-नियमादि (२) क्रिया योग, (३) विभूति और (४) सिद्धि एवं कैवल्यादि पदार्थ वर्णित हैं। वर्णनीय विषय वस्तु के लिए कुछ निमित्त चाहिए था, अतः प्रधान और उसके विकारभूत महदादि पदार्थों को वैसे ही निमित्तमात्र बनाया गया है, जैसे कि पुराणों का मुख्य उद्देश्य वैदिक तत्त्व का उपबृंहण है, किन्तु प्रसङ्गतः (१) सर्ग (सृष्टि), (२) प्रतिसर्ग (प्रलय), (३) वंश, (४) मन्वन्तर और (५) वंशानुचरित भी वर्णित हैं। प्रसङ्गतः प्रतिपादित पदार्थों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं माना जाता, क्योंकि अन्यार्थपरक वाक्यों से प्रसङ्गतः अन्य पदार्थ भी स्फोरित हो जाते हैं। उन्हें भी तब स्वीकृत कर लिया जाता है, जब कि प्रमाणान्तर से वे विरुद्ध न होते हों, प्रधानादिगत जगत् की उपादानता का वेदान्त श्रुतियों से विरोध स्पष्ट है—यह कहा जा चुका है। अतः अपने मुख्य विषय में प्रमाणभूत योग-शास्त्र से प्रधानादि तत्त्वों की सिद्धि न होने के कारण भगवान् वार्षगण्य ने प्रधानादि को तात्त्विक नहीं माना है—

गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।
यत्त दृष्टिपथप्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम् ॥

अर्थात् वार्षगण्य का मुख्य उद्देश्य योग का व्युत्पादन ही था, केवल निमित्त या प्रासङ्गिकरूप

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