भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३
तिदिशति। तत्रापि श्रुतिविरोधेन प्रधानं स्वतन्त्रमेव कारणं, महदादीनि च कार्याण्य- लोकवेदप्रसिद्धानि कल्प्यन्ते। नन्वेवं सति समानन्यायत्वात्पूर्वेणैव तद्गतम्, किमर्थं पुनरतिदिश्यते ? अस्ति ह्यत्राभ्यधिकाशङ्का—सम्यग्दर्शनाभ्युपायो हि योगो वेदे विदितः ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ ( बृ० २।४।५ ) इति। ‘त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्’ ( श्वे० २।८ ) इत्यादिना चासनादिकल्पनापुरःसरं बहुप्रपञ्चं योगविधानं श्वेताश्वतरोपनिषदि दृश्यते। लिङ्गानि च वैदिकानि योगविषयाणि सहस्रश उपलभ्य- न्ते—‘तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्’ ( का० २।६।११ ) इति, ‘विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्’ ( का० २।६।१८ ) इति चैवमादीनि। योगशास्त्रेऽपि अथ तत्त्व- दर्शनोपायो योगः’ इति सम्यग्दर्शनाभ्युपायतयैव योगोऽङ्गीक्रियते। अतः संप्रति-
भामती
इति ॐ। अधिकरणान्तरारम्भमाक्षिपति ॐनन्वेवं सति समानन्यायत्वाद् इति ॐ। समाधत्ते ॐ अस्त्य- त्राभ्यधिकाशङ्का ॐ। मा नाम सांख्यशास्त्रात् प्रधानसत्ता विज्ञायि। योगशास्त्रात्तु प्रधानादिसत्ता विज्ञा- पयिष्यते। बहुलं हि योगशास्त्राणां वेदेन सह संवादो दृश्यते। उपनिषदुपायस्य च तत्त्वज्ञानस्य योगा- पेक्षास्ति। न तु जातु योगशास्त्रविहितं यमनियमादिबहिरङ्गमपायमपहायान्तरङ्गरू धारणादिकमन्तरेणौ- पनिषदात्मतत्त्वसाक्षात्कार उदेतुमर्हति। तस्मादौपनिषदेन तत्त्वज्ञानेनापेक्षणात् संवादाद्बहुश्याञ्च वेदेनाष्ट- कादिस्मृतिवद्योगस्मृतिः प्रमाणम् । ततश्च प्रमाणात् प्रधानादिप्रतीतेर्नाशब्दत्वम् । न च तवप्रमाणं
भामती-व्याख्या
में गुणादि की चर्चा कर दी गई है, उनकी वास्तविकता में तात्पर्य नहीं, क्योंकि उन्हें माया के समान अतात्त्विक ही माना है। यद्यपि लोक-वेद में अत्यन्त अप्रसिद्ध प्रधानादि का अनुवाद भी सम्भव नहीं, तथापि अनादि काल से चले आए पूर्वपक्ष और न्यायाभास के आधार पर वादिगणों के द्वारा उत्प्रेक्षित और बहुचर्चित प्रधानादि का अनुवाद करके उन का निराकरण सम्भव हो जाता है। इस आशय को मन में रखकर सूत्रकार ने कहा है "एतेन योगः प्रत्युक्तः" अर्थात् सांख्य-स्मृति के प्रत्याख्यान से ही प्रधानादिविषयकत्वेन योग-स्मृति का भी प्रत्याख्यान हो जाता है।
यदि सांख्य के निराकरण से ही योग का निराकरण हो जाता है, तब योग-निराकर- णार्थ अधिकरणान्तर की रचना क्यों ? ऐसी शङ्का की जा रही है—"नन्वेवं सति समान- न्यायत्वात् पूर्वेणैव तद्गतम्"। उक्त शङ्का का समाधान किया जाता है—"अस्ति ह्यत्राभ्य- धिकाशङ्का"। अर्थात् सांख्य-शास्त्र के अनुरोध पर प्रधानादि की सत्ता यदि नहीं मानी जा सकती तो न सही, योग-शास्त्र के आग्रह पर प्रधानादि का अस्तित्व मान लेना चाहिए, क्योंकि सांख्यीय पदार्थ वेदों में उपलब्ध नहीं होते, किन्तु योग-शास्त्र का प्रायः बहुत-सा भाग वेद से संवादित ( समर्थित ) है। उपनिषत् में प्रतिपादित तत्त्व-ज्ञान को योग की पूर्णतया अपेक्षा है, क्योंकि योग-शास्त्र में विहित यम-नियमादि बहिरङ्ग और धारणादि अन्तरङ्ग साधनों के बिना औपनिषद आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कभी हो ही नहीं सकता। इस प्रकार औपनिषद आत्म-तत्त्व के साक्षात्कार में अपेक्षित होने और वेद से संवादित होने के कारण योग-स्मृति वैसे ही प्रमाणभूत है, जैसे अष्टकादि स्मृति [ अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन की कृष्णपक्षीय चार अष्टमी तिथियों में अनुष्ठेय श्राद्ध को अष्टका श्राद्ध कहते हैं, आश्वलायन गृह्य सूत्र (२।४।१) में इसका विधान किया गया है, वेद में विहित न होने से यह स्मार्त कर्म कहलाता है, अष्टका-विधायक आश्वलायनादि स्मृति-वचनों को प्रमाण इसी लिए माना जाता है कि वह वेद-विरुद्ध नहीं। वैसे ही वेदविरुद्ध योग-शास्त्र को प्रमाण