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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

५४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३

तिदिशति। तत्रापि श्रुतिविरोधेन प्रधानं स्वतन्त्रमेव कारणं, महदादीनि च कार्याण्य- लोकवेदप्रसिद्धानि कल्प्यन्ते। नन्वेवं सति समानन्यायत्वात्पूर्वेणैव तद्गतम्, किमर्थं पुनरतिदिश्यते ? अस्ति ह्यत्राभ्यधिकाशङ्का—सम्यग्दर्शनाभ्युपायो हि योगो वेदे विदितः ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ ( बृ० २।४।५ ) इति। ‘त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्’ ( श्वे० २।८ ) इत्यादिना चासनादिकल्पनापुरःसरं बहुप्रपञ्चं योगविधानं श्वेताश्वतरोपनिषदि दृश्यते। लिङ्गानि च वैदिकानि योगविषयाणि सहस्रश उपलभ्य- न्ते—‘तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्’ ( का० २।६।११ ) इति, ‘विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्’ ( का० २।६।१८ ) इति चैवमादीनि। योगशास्त्रेऽपि अथ तत्त्व- दर्शनोपायो योगः’ इति सम्यग्दर्शनाभ्युपायतयैव योगोऽङ्गीक्रियते। अतः संप्रति-

भामती

इति ॐ। अधिकरणान्तरारम्भमाक्षिपति ॐनन्वेवं सति समानन्यायत्वाद् इति ॐ। समाधत्ते ॐ अस्त्य- त्राभ्यधिकाशङ्का ॐ। मा नाम सांख्यशास्त्रात् प्रधानसत्ता विज्ञायि। योगशास्त्रात्तु प्रधानादिसत्ता विज्ञा- पयिष्यते। बहुलं हि योगशास्त्राणां वेदेन सह संवादो दृश्यते। उपनिषदुपायस्य च तत्त्वज्ञानस्य योगा- पेक्षास्ति। न तु जातु योगशास्त्रविहितं यमनियमादिबहिरङ्गमपायमपहायान्तरङ्गरू धारणादिकमन्तरेणौ- पनिषदात्मतत्त्वसाक्षात्कार उदेतुमर्हति। तस्मादौपनिषदेन तत्त्वज्ञानेनापेक्षणात् संवादाद्बहुश्याञ्च वेदेनाष्ट- कादिस्मृतिवद्योगस्मृतिः प्रमाणम् । ततश्च प्रमाणात् प्रधानादिप्रतीतेर्नाशब्दत्वम् । न च तवप्रमाणं

भामती-व्याख्या

में गुणादि की चर्चा कर दी गई है, उनकी वास्तविकता में तात्पर्य नहीं, क्योंकि उन्हें माया के समान अतात्त्विक ही माना है। यद्यपि लोक-वेद में अत्यन्त अप्रसिद्ध प्रधानादि का अनुवाद भी सम्भव नहीं, तथापि अनादि काल से चले आए पूर्वपक्ष और न्यायाभास के आधार पर वादिगणों के द्वारा उत्प्रेक्षित और बहुचर्चित प्रधानादि का अनुवाद करके उन का निराकरण सम्भव हो जाता है। इस आशय को मन में रखकर सूत्रकार ने कहा है "एतेन योगः प्रत्युक्तः" अर्थात् सांख्य-स्मृति के प्रत्याख्यान से ही प्रधानादिविषयकत्वेन योग-स्मृति का भी प्रत्याख्यान हो जाता है।

यदि सांख्य के निराकरण से ही योग का निराकरण हो जाता है, तब योग-निराकर- णार्थ अधिकरणान्तर की रचना क्यों ? ऐसी शङ्का की जा रही है—"नन्वेवं सति समान- न्यायत्वात् पूर्वेणैव तद्गतम्"। उक्त शङ्का का समाधान किया जाता है—"अस्ति ह्यत्राभ्य- धिकाशङ्का"। अर्थात् सांख्य-शास्त्र के अनुरोध पर प्रधानादि की सत्ता यदि नहीं मानी जा सकती तो न सही, योग-शास्त्र के आग्रह पर प्रधानादि का अस्तित्व मान लेना चाहिए, क्योंकि सांख्यीय पदार्थ वेदों में उपलब्ध नहीं होते, किन्तु योग-शास्त्र का प्रायः बहुत-सा भाग वेद से संवादित ( समर्थित ) है। उपनिषत् में प्रतिपादित तत्त्व-ज्ञान को योग की पूर्णतया अपेक्षा है, क्योंकि योग-शास्त्र में विहित यम-नियमादि बहिरङ्ग और धारणादि अन्तरङ्ग साधनों के बिना औपनिषद आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कभी हो ही नहीं सकता। इस प्रकार औपनिषद आत्म-तत्त्व के साक्षात्कार में अपेक्षित होने और वेद से संवादित होने के कारण योग-स्मृति वैसे ही प्रमाणभूत है, जैसे अष्टकादि स्मृति [ अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन की कृष्णपक्षीय चार अष्टमी तिथियों में अनुष्ठेय श्राद्ध को अष्टका श्राद्ध कहते हैं, आश्वलायन गृह्य सूत्र (२।४।१) में इसका विधान किया गया है, वेद में विहित न होने से यह स्मार्त कर्म कहलाता है, अष्टका-विधायक आश्वलायनादि स्मृति-वचनों को प्रमाण इसी लिए माना जाता है कि वह वेद-विरुद्ध नहीं। वैसे ही वेदविरुद्ध योग-शास्त्र को प्रमाण

योगस्मृतेर्नादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४३

पन्नायैकदेशत्वादष्टकादिस्मृतिवद्योगस्मृतिरप्यनववदनीया भविष्यतीति-इयमभ्यधिकाशङ्काऽतिदेशेन निवर्त्यते, अर्थैकदेशसंप्रतिपत्तावप्यर्थैकदेशविप्रतिपत्तेः पूर्वोक्ताया

भामती

प्रधानादौ प्रमाणञ्च यमादाविति युक्तम् । तत्राप्रामाण्येऽन्यत्राप्यनाश्वासात् । यथाहुः —

“प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः ।
नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे ॥” इति ।

सेयं लब्धप्रसरा प्रधानादौ योगप्रामाणता पिशाची सर्वत्रैव दुर्वारा भवेदित्यस्याः प्रसरं निषेधता प्रधानाद्यभ्युपेयमिति नाशब्दं प्रधानमिति शङ्कार्थः । सा ॐ इयमभ्यधिकाशङ्काऽतिदेशेन निवर्त्यते ॐ । निवृत्तिहेतुमाह ॐ अर्थैकदेशसम्प्रतिपत्तावपि इति ॐ । यदि हि प्रधानादिसत्तापरं योगशास्त्रं भवेत् भवेत् प्रत्यक्षवेदान्तश्रुतिविरोधेनाप्रमाणम् । तथा च तद्विहितेषु यमादिष्वप्यनाश्वासः स्यात् । तस्मान्न प्रधानदिपरं तत् किन्तु तन्निमित्तीकृत्य योगव्युत्पादनपरमित्युक्तम् । न चाविषयेऽप्रामाण्यं विषयेऽपि प्रामाण्यमुपहन्ति । नहि चक्षूरसादावप्रमाणं रूपेऽप्यप्रमाणं भवितुमर्हति । तस्माद्वेदान्तश्रुतिविरोधात् प्रधानादिरस्याविषयो न त्वप्रामाण्यमिति परमार्थः । स्यादेतत् — अध्यात्मविषयाः सन्ति सहस्रं स्मृतयो बौद्धाऽर्हत-


भामती-व्याख्या

मानना चाहिए ] । फलतः योग-शास्त्ररूप प्रमाण के द्वारा प्रमाणित प्रधानादि पदार्थों को अशब्द ( अप्रमाण ) कहना उचित नहीं । 'योग-शास्त्र प्रधानादि अंश में अप्रमाण और यम-नियमादि अंश में प्रमाण है'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि योग-शास्त्र को यदि किसी भी अंश में अप्रमाण माना जाता है, तब पूरे योग-शास्त्र पर से ही विश्वास उठ जायगा, जैसे कि श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—

प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः ।
नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचराः ॥
क्वचिद् दत्तेऽवकाशे हि स्वोत्प्रेक्षालब्धधामभिः ।
जीवितुं लभते कस्तेस्तन्मार्गपतितः स्वयम् ॥” (तं. वा. पृ. १७१)

[ मर्कट ( वानर ) और भूत ( प्रेत ) को जब तक कहीं घुसने का अवसर नहीं मिलता, तभी तक उनके उपद्रव शान्त रहते हैं । जब उनको कहीं पैर रखने का अवसर मिल जाता है, तब पूरा क्षेत्र उनके उपद्रवों से ऐसा आक्रान्त हो जाता है कि उनके मार्ग में आकर कोई व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता । उसी प्रकार ] यदि अप्रमाणता को किसी अंश ( प्रधानादि ) में मान लिया जाता है, तब समग्र अंशी ( योग-शास्त्र ) अप्रमाण हो जाता है, अतः योग-शास्त्र के प्रधानादि अंश में भी अप्रमाणता की गति रोक कर प्रधानादि की वास्तविक सत्ता मान लेनी चाहिए । ऐसा मान लेने पर प्रधानादि में अशाब्दता का आरोप निराधार हो जाता है ।

सिद्धान्त — उक्त अत्यधिक आशङ्का अतिदेश के द्वारा दूर की जाती है, क्योंकि “अर्थैकदेशसंप्रतिपत्तावप्यर्थैकदेशविप्रतिपत्तेः” । यदि योग-शास्त्र का मुख्य तात्पर्य प्रधानादि की सत्ता में होता, तब प्रत्यक्ष वेदान्त श्रुति से बाधित होकर योग-शास्त्र अप्रमाण हो जाता । इतना ही नहीं, उसके द्वारा विहित यम-नियमादि पर भी अविश्वास हो जाता । फलतः योग-शास्त्र को प्रधानादि-परक न मानकर प्रधानादि के निमित्त से यम-नियमादि का प्रतिपादक मानना ही उचित है । योग-शास्त्र प्रधानादि अंश में अप्रमाण होकर यम-नियमादि अंश में भी वैसे ही अप्रमाण नहीं होता, जैसे चक्षु अपने अविषयीभूत रसादि अंश में अप्रमाण होकर रूप में भी अप्रमाण नहीं होता ।

५५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३

दर्शनात् । सतीष्वप्यध्यात्मविषयासु बह्वीषु स्मृतिषु सांख्ययोगस्मृत्योरेव निराकरणे यत्नः कृतः । सांख्ययोगौ हि परमपुरुषार्थसाधनत्वेन लोके प्रख्यातौ, शिष्टैश्च परिगृहीतौ, लिङ्गेन च श्रौतेनोपबृंहितौ । 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः' (श्वे० ६।१३) इति । निराकरणं तु-न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःश्रेयसमधिगम्यत इति । श्रुतिर्हि वैदिकादात्मैकत्वविज्ञानादन्यन्निःश्रेयससाधनं वारयति - 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' (श्वे० ३।८) इति । द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च नात्मैकत्वदर्शिनः । यत्तु दर्शनमुक्तं 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम्' इति, वैदिकमेव तत्र ज्ञानं ध्यानं च सांख्ययोगशब्दाभ्यामभिलप्यते प्रत्यासत्तेरित्यवगन्तव्यम् । येन त्वंशेन न विरुध्येते तेनेष्टमेव सांख्ययोगस्मृत्योः सावकाशत्वम् । तद्यथा - 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' (बृ. ४।३।१६) इत्येवमादिश्रुतिप्रसिद्धमेव पुरुषस्य विशुद्धत्वं निर्गुणपुरुषनिरूपणेन सांख्यैरभ्युपगम्यते । तथा च योगैरपि 'अथ परिव्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः' (जावा० ५)


भामती

कापालिकादीनां, ता अपि कस्मान्न निराक्रियन्त इत्यत आह ॐ सतीष्वपि इति ॐ । तासु खलु बहुलं वेदार्थविसंवादिनीषु शिष्टानादृतासु कैश्चिदेव तु पुरुषापसदैः पशुप्राथैर्म्लेच्छादिभिः परिगृहीतासु वेदमूलत्वाशङ्कव नास्तीति न निराकृताः, तद्विपरीतास्तु सांख्ययोगस्मृतय इति ताः प्रधानादिपरतया व्युदस्यन्त इत्यर्थः । ॐ न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण इति ॐ । प्रधानादिविषयेणेत्यर्थः । ॐ द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च ॐ ये प्रधानादिपरतया तच्छास्त्रं व्याचक्षत इत्यर्थः । संख्या सम्यग्बुद्धिर्वैदिकी तया वर्तन्त इति सांख्याः । एवं योगो ध्यानम् , उपायोपेययोरभेदविवक्षया, चित्तवृत्तिनिरोधो हि योगः, तस्योपायो


भामती-व्याख्या

अध्यात्मविषयक हजारों अन्य दर्शन हैं, जैसे-बौद्ध, आर्हत (जैन) और कापालिकादि। उनका भी यहाँ निराकरण क्यों नहीं किया जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सतीष्वपि अध्यात्मविषयासु बह्वीषु स्मृतिषु" । अर्थात् बौद्धादि दर्शन वेदार्थ के विसंवादी (विपरीत) होने के कारण शिष्ट पुरुषों के द्वारा ही अनादृत एवं समाज के गिरे हुए म्लेच्छप्राय पशु-स्तर के असभ्य पुरुषों के ही श्रद्धा-भाजन हैं। उनमें वेदमूलकत्व की आशङ्का ही नहीं हो सकती, अतः उनके निराकरण की कोई आवश्यकता ही नहीं किन्तु सांख्य-योग ठीक उनके विपरीत वेदमूलक और शिष्ट-समाज में समादृत और प्रचलित हैं, अतः प्रधानादि-प्रतिपादन अंश में उनका निरास किया जाता है। "न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःश्रेयसमधिगम्यते"—इस भाष्य का आशय यह है कि सांख्य-योग का निराकरण इसी लिए किया जाता है कि उनका जो कहना है कि 'वेद-निरपेक्ष केवल प्रधानादिविषयक सांख्य-ज्ञान अथवा योग-मार्ग से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है' उनका वह कहना अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि श्रुति ने यह नियम घोषित कर रखा है कि केवल वैदिक आत्मैकत्व-ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है किन्तु 'द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च'। सांख्य-दर्शन और योग-दर्शन का सिद्धान्त आत्मैकत्ववाद का विरोधी द्वैतवाद एवं प्रधानादिपरक है। श्रुतियों में जो "सांख्ययोगाभिपन्नम्" (श्वेता. ६।१३) इस प्रकार 'सांख्य' और 'योग' शब्द आए हैं, वहाँ 'सांख्य' शब्द वैदिक सम्यक् आत्मैकत्वज्ञान और 'योग' शब्द ध्यान को कहता है। 'योग' शब्द से जो "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (यो. सू. १।२) इस प्रकार चित्त-वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है, वह प्रत्ययैकतानतारूप ध्यान का उपाय है, उपाय और उपेय की अभेद-विवक्षा में वैसा कह दिया गया है। केवल चित्त-वृत्ति-निरोध ही ध्यान

सांख्यतर्कविरोधः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४५

इत्येवमादि श्रुतिप्रसिद्धमेव निवृत्तिनिष्ठत्वं प्रव्रज्याद्युपदेशेनानुगम्यते। एतेन सर्वाणि तर्कस्मरणानि प्रतिवक्तव्यानि। तान्यपि तर्कोपपत्तिभ्यां तत्त्वज्ञानायोपकुर्वन्तीति चेदुपकुर्वन्तु नाम। तत्त्वज्ञानं तु वेदान्तवाक्येभ्य एव भवति—'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्' (तै० ब्रा० ३।१२।९।७) 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृ० ३।९।२६) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः ॥ ३ ॥


( ३ विलक्षणत्वाधिकरणम् । सू० ४—१२ )

न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ ४ ॥

ब्रह्मस्य जगतो निमित्तकारणं प्रकृतिश्चेत्यस्य पक्षस्याक्षेपः स्मृतिनिमित्तः परिहृतः, तर्कनिमित्त इदानीमाक्षेपः परिह्रियते। कुतः पुनरस्मिन्नवधारित आगमार्थे तर्कनिमित्तस्याक्षेपस्यावकाशः ? ननु धर्म इव ब्रह्मण्यप्यनपेक्ष आगमो भवितुमर्हति। भवेदयमवष्टम्भो यदि प्रमाणान्तरानवगाह्य आगममात्रप्रमेयोऽयमर्थः स्यादनुष्ठेयरूप इव धर्मः, परिनिष्पन्नरूपं तु ब्रह्मावगम्यते। परिनिष्पन्ने च वस्तुनि प्रमाणान्तराणाम-

भामती

ध्यानं प्रत्ययैकतानता। एतच्चोपलक्षणम्। अन्येऽपि यमनियमादयो बाह्या आन्तराश्च धारणादयो योगोपाया द्रष्टव्याः। एतेनाभ्युपगतवेदप्रामाण्यानां कणभक्षाक्षचरणादीनां सर्वाणि तर्कस्मरणानीति योजना। सुगममन्यत् ॥ ३ ॥


अवान्तरसङ्गतिमाह ꣼ ब्रह्मस्य जगतो निमित्तकारणं प्रकृतिश्चेत्यस्य पक्षस्य इति ꣼। चोदयति ꣼ कुतः पुनरिति। समानविषयत्वे हि विरोधो भवेत्। न चेहास्ति समानविषयता, धर्मवद् ब्रह्मणोऽपि मानान्तरविषयतयाऽतर्क्यत्वेनानपेक्षाग्नायैकगोचरत्वादित्यर्थः। समाधत्ते ꣼ भवेदयम् इति ꣼।

मानान्तरस्याविषयः सिद्धवस्तुवगाहिनः।
धर्मोऽस्तु कार्य्यरूपत्वाद् ब्रह्म सिद्धं तु गोचरः ॥

भामती-व्याख्या

का उपाय नहीं, अपितु यम-नियमादि बाह्य और धारणादि आन्तरिक उपाय भी योग (ध्यान) के साधन हैं। भाष्यकार ने जो कहा है—"एतेन सर्वाणि तर्कस्मरणानि प्रतिवक्तव्यानि"। वहाँ 'एतेनाभ्युपगतवेदप्रामाण्यानां कणभक्षाक्षचरणादीनां सर्वाणि तर्कस्मरणानि प्रतिवक्तव्यानि'—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए। अर्थात् ऐसे सभी दर्शन तत्त्व-ज्ञान के विविध उपाय यदि प्रस्तुत करते हैं, तब कोई क्षति नहीं, मोक्ष-प्रद तत्त्व-ज्ञान केवल वेद-वेदान्त से ही होता है, अन्य शास्त्र से नहीं—"नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्" (तै. ब्रा. ३।१२।९।७) ॥३॥

सङ्गति—"ब्रह्मस्य जगतो निमित्तकारणं प्रकृतिश्चेत्यस्य पक्षस्य"। अर्थात् ब्रह्मगत अभिन्ननिमित्तोपादानता पर जो विभिन्न स्मृतियों (दर्शनों) के द्वारा आक्षेप किए जाते थे, उनका परिहार किया गया। अब तर्कनिमित्तक उसी आक्षेप का निराकरण किया जाता है।

शङ्का—ब्रह्म में जगत् की उभय-विध कारणता जब आगम प्रमाण से निर्णीत हो चुकी है, तब अप्रमाणभूत तर्क के द्वारा उस पर आक्षेप क्योंकर सम्भव होगा ?

समाधान—धर्म और ब्रह्म में यह महान् अन्तर है कि धर्म केवल आगम प्रमाण का विषय है, प्रमाणान्तर का नहीं, अतः वहाँ तर्क की गति नहीं किन्तु ब्रह्म साध्यात्मक धर्म

६९

५४६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[अ. २ पा. १ सू. ४

स्त्यवकाशो यथा पृथिव्यादिषु । यथा च श्रुतीनां परस्परविरोधे सत्येकवशेनेतरा नीयन्ते एवं प्रमाणान्तरविरोधेऽपि तद्वशेनैव श्रुतिर्नीयेत । दृष्टसाम्येन चादृष्टमर्थं समर्थयन्ती युक्तिरनुभवस्य संनिकृष्यते । विप्रकृष्यते तु श्रुतिरेतिह्यमात्रेण स्वार्थाभिधानात् । अनुभवावसानं च ब्रह्मविज्ञानमविद्याया निवर्तकं मोक्षसाधनं च दृष्टफलतयेष्यते । श्रुतिरपि—'श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति श्रवणव्यतिरेकेण मननं विदधती तर्क्रमप्याद्रतव्यं दर्शयति, अतस्तर्कनिमित्तः पुनराक्षेपः क्रियते 'न विलक्षणत्वादस्य' इति ॥

भामती

तस्मात्समानविषयत्वादस्त्यत्र तर्कस्यावकाशः । नन्वस्तु विरोधः, तथापि तर्कादरे को हेतुरित्यत आह ॐ यथा च श्रुतीनाम् इति ॐ । सावकाशा बह्व्योऽपि श्रुतयोऽनवकाशैकश्रुतिविरोधे तदनुगुणतया यथा नीयन्ते एवमनवकाशैकतर्कविरोधे तदनुगुणतया बह्व्योपि श्रुतयो गुणकल्पनादिभिर्व्याख्यानमर्हन्तीत्यर्थः । अपि च ब्रह्मसाक्षात्कारो विरोपितयाऽनादिमविद्यां निवर्त्तयन् दृष्टेनैव रूपेण मोक्षसाधनमिष्यते, न ब्रह्मसाक्षात्कारस्य मोक्षसाधनतया प्रधानस्यानुमानं दृष्टसाधर्म्येणादृष्टविषयं विषयतोऽन्तरङ्गं, बहिरङ्गं त्वत्यन्तपरोक्षगोचरं शाब्दं ज्ञानं तेन प्रधानप्रत्यासत्त्याप्यनुमानमेव बलीय इत्याह ॐ दृष्टसाधर्म्येण च इति ॐ । अपि च श्रुत्यापि ब्रह्मणि तर्क आदृत इत्याह ॐ श्रुतिरपि इति ॐ । सोऽयं ब्रह्मणो जगदुपादानत्वाक्षेपः पुनस्तर्केण प्रस्तूयते ।

प्रकृत्या सह सारूप्यं विकाराणामवस्थितम् ।
जगद् ब्रह्मस्वरूपन्न नेति नो तस्य विक्रिया ॥

भामती-व्याख्या

से विपरीत सिद्धार्थक है। वेदान्त और तर्क—दोनों समानविषयक (सिद्धार्थविषयक) हैं, अतः वेदान्त के क्षेत्र में तर्क को भी उतरने का अवकाश है। वेदान्त के साथ तर्क का विरोध होने पर भी तर्क को इतना प्रश्रय क्यों दिया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर है—"यथा च श्रुतीनां परस्परविरोधे सत्येकवशेनेतरा नीयन्ते"। जैसे अनेक सावकाश श्रुतियाँ अनवकाशभूत एक श्रुति से विरुद्ध होने पर उसके अनुसार ही व्याख्यात और संघटित की जाती हैं, वैसे ही अनवकाशभूत एक तर्क का विरोध होने पर वेदान्त-श्रुतियाँ उस (तर्क) के अनुरूप ही गौणी वृत्ति आदि का सहारा लेकर प्रवृत्त की जा सकती हैं।

दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान अनादि अविद्या को निवृत्त करता हुआ शुक्ति-साक्षात्कार के समान दृष्ट-मार्ग से ही मोक्ष का साधन माना जाता है। अनुमानरूप तर्क भी दृष्ट के अनुसार अदृष्ट की कल्पना है। इस प्रकार प्रधान (प्रकृति) का अनुमान विषयतः प्रत्यक्ष का अन्तरङ्ग (निकट-वर्ती) है किन्तु आगम-जन्य शाब्द ज्ञान अत्यन्तपरोक्षार्थावगाही होने के कारण बहिरङ्ग (दूरवर्ती) है। प्रत्यक्ष प्रधान है, तर्क और श्रुति—दोनों उसके अङ्ग हैं। तर्क के साथ प्रधान की प्रत्यासत्ति (समीपता) तर्क को श्रुति से प्रबल बनाती है, भाष्यकार यही कह रहे हैं—"दृष्टसाधर्म्येण चादृष्टमर्थं समर्थयन्ती युक्तिरनुभवस्य संनिकृष्यते"। इतना ही नहीं, श्रुति ने स्वयं तर्क को आदर दिया है—"श्रुतिरपि—श्रोतव्यो मन्तव्यः" इति श्रवणव्यतिरेकेण मननं विदधती तर्क्रमप्याद्रतव्यं दर्शयति"। मनन एक तर्क-प्रकार ही है।

पूर्वपक्ष—ब्रह्मगत जगदुपादानत्व पर तर्क के द्वारा इस प्रकार आक्षेप किया जाता है—

प्रकृत्या सह सारूप्यं विकाराणामवस्थितम् ।
जगद् ब्रह्मस्वरूपं च नेति नो तस्य विक्रिया ॥

सांख्यतर्कविरोधः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४७

यदुक्तं चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिरिति तन्नोपपद्यते, कस्मात् ? विलक्षणत्वादस्य विकारस्य प्रकृत्याः । इदं हि ब्रह्मकार्यत्वेनाभिप्रेयमाणं जगद् ब्रह्मविलक्षणमचेतन-मशुद्धं च दृश्यते, ब्रह्म च जगद्विलक्षणं चेतनं शुद्धं च श्रूयते । न च विलक्षणत्वे प्रकृति-विकारभावो दृष्टः । न हि रुचकादयो विकारा मृत्प्रकृतिका भवन्ति, शरावादयो वा सुवर्णप्रकृतिकाः । मृदैव तु मृदन्विता विकाराः क्रियन्ते, सुवर्णेन च सुवर्णान्विताः । तथेदमपि जगदचेतनं सुखदुःखमोहान्वितं सदचेतनस्यैव सुखदुःखमोहात्मकस्य कारणस्य कार्यं भवितुमर्हतीति, न विलक्षणस्य ब्रह्मणः । ब्रह्मविलक्षणत्वं चास्य जगतोऽशुद्ध्यचेतनत्वदर्शनादवगन्तव्यम् । अशुद्धं हि जगत् सुखदुःखमोहात्मकतया प्रीतिपरितापविषादादिहेतुत्वात्स्वर्गनारकाद्युच्चावचप्रपञ्चत्वाच्च । अचेतनं चेदं जगत् चेतनं प्रति कार्यकारणभावेनोपकरणभावोपगमात् । नहि साम्ये सत्युपकार्योपकारकभावो भवति, नहि प्रदीपौ परस्परस्योपकुरुतः । ननु चेतनमपि कार्यकारणं स्वामिभृत्यन्यायेन भोक्तुरुपकरिष्यति । न, स्वामिभृत्ययोरप्यचेतनांशस्यैव चेतनं


भामती

विशुद्धं चेतनं ब्रह्म जगज्जडमशुद्धिभाक् ।
तेन प्रधानसारूप्यात् प्रधानस्यैव विक्रिया ॥

तथाहि—एक एव स्त्रीकायः सुखदुःखमोहात्मकतया पत्युश्च सपत्नीनाञ्च चैत्रस्य च स्त्रैणस्य तामविन्दतोऽप्यर्थाय सुखदुःखविषादानाधत्ते । स्त्रिया च सर्वे भावा व्याख्याताः । तस्मात् सुखदुःखमोहात्मकतया च स्वर्गनरकोच्चावचप्रपञ्चतया च जगदशुद्धमचेतनञ्च, ब्रह्म तु चेतनं विशुद्धं च, निरतिशयत्वात् । तस्मात् प्रधानस्याशुद्धस्यांशस्य विकारी जगन्न तु ब्रह्मण इति युक्तम् । ये तु चेतनब्रह्मविकारतया जगच्चैतन्यमाहुस्तान् प्रत्याह ॐ अचेतनं चेदं जगद् इति ॐ । व्यभिचारं चोदयति ॐ ननु चेतनमपि इति ॐ । परिहरति ॐ न स्वामिभृत्ययोरपि इति ॐ । ननु मा नाम साक्षाच्चेतन-


भामती-व्याख्या

विशुद्धं चेतनं ब्रह्म जगज्जडमशुद्धिभाक् ।
तेन प्रधानसारूप्यात् प्रधानस्यैव विक्रिया ॥

[ प्रकृति (उपादान कारण) के साथ विकारों (उपादेयभूत कार्यों) का नियमतः सारूप्य (साजात्य) होता है, किन्तु आकाशादि प्रपञ्च ब्रह्म के सरूप न होकर विरूप है, क्योंकि ब्रह्म विशुद्ध (निरतिशय, चेतन्यात्मक और जगत् जड़, अविशुद्ध और स्वर्ग-नरकादिरूप में उच्चावच (सातिशय) है, अतः यह ब्रह्म का विकार नहीं हो सकता। हाँ, सांख्याभिमत प्रधान (प्रकृति) का सरूप होने के कारण प्रधान का विकार (उपादेय) हो सकता है, क्योंकि] यह कहा जा चुका है कि जैसे एक ही स्त्री अपने पति के लिए सुखरूप, अपनी सपत्नियों के लिए दुःखरूप और पति से भिन्न चैत्रादि कामुक पुरुषों को सुलभ न होने के कारण उनके लिए मोहरूप होती है। वैसे ही समस्त प्रपञ्च सुख-दुःख-मोहात्मक है और प्रकृति भी वैसी ही है, अतः प्रकृति और प्रपञ्च का सारूप्य एवं उपादानोपादेयभाव निश्चित है।

जो लोग चेतन ब्रह्म का विकार होने के कारण जगत् को चेतन कहते हैं, उनका निराकरण करने के लिए कहा जाता है—"अचेतनं चेदं जगत्"। अर्थात् जगत् को अचेतन मानने पर ही चेतन पुरुष के साथ उसका उपकार्य-उपकारकभाव बन सकता है, दोनों को समान (एक जातीय) मानने पर उपकार्योपकारकभाव नहीं बन पाता। इस नियम के व्यभिचार की शङ्का की जाती है—"ननु चेतनमपि"। राजा और उसके भृत्य सब चेतन हैं,

५४८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ४

प्रत्युपकारकत्वात् । यो ह्येकस्य चेतनस्य परिग्रहो बुद्ध्यादिरचेतनभागः, स एवान्यस्य चेतनस्योपकरोति, नतु स्वयमेव चेतनश्चेतनान्तरस्योपकरोत्यपकरोति वा । निरतिशया ह्यकर्तारश्चेतना इति सांख्या मन्यन्ते । तस्मादचेतनं कार्यकारणम् । न च काष्ठलोष्ठा- दीनां चेतनत्वे किंचित्प्रमाणमस्ति । प्रसिद्धश्चायं चेतनाचेतनप्रविभागो लोके । तस्माद् ब्रह्मविलक्षणत्वान्नेदं जगत्तत्प्रकृतिकम् । योऽपि कश्चिदाचक्षीत-श्रुत्वा जगतश्चेतनप्रकृतिकतां, तद्वलेनैव समस्तं जगच्चेतन- मवगमयिष्यामि, प्रकृतिरूपस्य विकारेऽन्वयदर्शनात् । अविभावनं तु चैतन्यस्य परिणामविशेषाद्भविष्यति । यथा स्पष्टचैतन्यानामात्मनां स्वापमूर्च्छाद्यवस्थासु चैतन्यं न विभाव्यते, एवं काष्ठलोष्ठादीनामपि चैतन्यं न विभावयिष्यते । एतस्मादेव च विभावित्वाविभावितत्वकृताद्विशेषाद्रूपादिभावाभावाभ्यां च कार्यकारणानामा- त्मनां च चेतनत्वाविशेषेऽपि गुणप्रधानभावो न विरोत्स्यते । यथा च पार्थिवत्वा- विशेषेऽपि मांससूपौदनादीनां प्रत्यात्मवर्तिनो विशेषात्परोपकारित्वं भवत्येवमि- हापि भविष्यति । प्रविभागप्रसिद्धिश्चेप्यत एव न विरोत्स्यत इति । तेनापि कथंचि- च्चेतनाचेतनत्वलक्षणं विलक्षणत्वं परिह्रियेत, शुद्धयशुद्धित्वलक्षणं तु विलक्षणत्वं नैव परिह्रियते । न चेतरदपि विलक्षणत्वं परिहर्तुं शक्यत इत्याह--तथात्वं च शब्दादिति । अनवगम्यमानमेव हीदं लोके समस्तस्य वस्तुनश्चेतनत्वं चेतनप्रकृति-


भामती

श्चेतनान्तरस्योप कार्षीत्, तत्कार्यकरणबुद्ध्यादिनियोगद्वारेण तूपकरिष्यतीत्यत आह ॐ निरतिशया ह्यकर्त्तारश्चेतनाः इति ॐ । उपजनापायवर्द्धर्मयोगोऽतिशयः, तदभावो निरतिशयत्वम्, अत एव निष्क्रियार- स्वभावकर्त्तारस्तस्मात्तेषां बुद्ध्यादिप्रयोक्तृत्वमपि नास्तोत्यर्थः । चोदकोऽनुशयबीजमुद्घाटयति ॐ योऽपि इति ॐ । अभ्युपेत्यापाततः समाधानमाह ॐ तेनापि कथञ्चिद् इति ॐ । परमसमाधानं तु सूत्रावयवेन वक्तुं तमेवावतारयति ॐ न चैतदपि विलक्षणत्वम् इति ॐ । सूत्रावयवाभिसन्धिमाह ॐ अनवगम्यमान-


भामती-व्याख्या

फिर भी उनमें उपकार्योपकारकभाव होता है। उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है— "न, स्वामिभृत्ययोरपि"। भृत्य का जड़ शरीर ही चेतनरूप स्वामी का उपकारक होता है। यद्यपि एक चेतन दूसरे चेतन का साक्षात् उपकार नही कर सकता, तथापि शरीर, इन्द्रिय और बुद्ध्यादि का प्रेरक होकर उपकारक क्यों न होगा ? इस शङ्का का समाधान है— "निरतिशया ह्याकर्तारश्चेतना"। 'अतिशय' पद से आगमायायी धर्मवान् व्यापार (क्रिया) आदि विवक्षित हैं, सांख्य-मत के अनुसार चेतन में किसी प्रकार का पेरणादि व्यापार नहीं माना जाता, अतः वह शरीरादि का भी प्रेरक नहीं हो सकता। शङ्कावादी अपना अभिप्राय प्रकट करता है—"योऽपि कश्चिदाचक्षीत"। अर्थात् जो शङ्कावादी कहता है कि श्रुतियाँ जगत् को चेतनप्रकृतिक कहती है, इतने से ही यह सिद्ध हो जाता है कि समस्त जगत् चेतन है, क्योंकि प्रकृति के स्वभाव का अन्वय विकार में नियमतः देखा जाता है। उस शङ्कावादी के उक्त कथन को आपाततः मान करके समाधान किया जाता है— तेनापि कथंचित् चेतनाचेतनत्वलक्षणं विलक्षणत्वं परिह्रियेत"। अर्थात् ऐसे शङ्कावादी के द्वारा वेदान्ति-सूचित बहुत-से वैलक्षण्यों में से केवल चेतनत्व-अचेतनत्वरूप वैलक्षण्य का ही कथंचित् परिहार हो सकेगा, शुद्धित्व-अशुद्धित्वादि का नहीं। वस्तुतः इतर (चेतनत्व- अचेतनत्वरूप) वैलक्षण्य का परिहार भी नहीं किया जा सकता, ऐसा सूत्रकार कहते हैं—

सांख्यतर्कस्यानादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४९

कत्वश्रवणाच्छब्दशरणतया केवलयोत्प्रेक्षेत, तच्च शब्देनैव विरुध्यते। यतः शब्दादपि तथात्वमवगम्यते। तथात्वमिति प्रकृतिविलक्षणत्वं कथयति। शब्द एव 'विज्ञानं च' ( तै० २।६ ) इति कस्यचिद्विभागस्याचेतनतां श्रावयन्नचेतनाद् ब्रह्मणो विलक्षणमचेतनं जगच्छ्रावयति ॥ ४ ॥

ननु चेतनत्वमपि कचिदचेतनत्वाभिमतानां भूतेन्द्रियाणां श्रूयते—यथा 'मृदब्रवीत्', 'आपोऽब्रुवन्' ( श० प० ब्रा० ६।१।३।२।४ ) इति, 'तत्तेज ऐक्षत' 'ता आप ऐक्षन्त' ( छा० ६।२।३।४ ) इति चैवमाद्या भूतविषया चेतनत्वश्रुतिः। इन्द्रियविषयाणि 'ते हेमे प्राणा अहंश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुः' ( बृ० ६।१।७ ) इति, 'ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति ( बृ० १।३।२ ) इत्येवमाद्येन्द्रियविषयेति। अत उत्तरं पठति —

अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ ५ ॥

तुशब्द आशङ्कामपनुदति । न खलु 'मृदब्रवीद्' इत्येवंजातीयकया श्रुत्या भूतेन्द्रियाणां चेतनत्वमाशङ्कनीयम्, यतोऽभिमानिव्यपदेश एषः । मृदाद्यभिमानिन्यो


भामती

मेव हीदम् इति। शब्दार्थात् खलु चेतनप्रकृतिकत्वाच्चैतन्यं पृथिव्यादीनामवगम्यमानमुपोद्वलितं मानान्तरेण साक्षाच्छ्रूयमाणमप्यचैतन्यमप्यथयेत् । मानान्तराभावे स्वार्थोऽर्थः श्रुत्यर्थेनापबाध्यः, न तु तद्बलेन श्रुत्यर्थोऽन्यथयितव्य इत्यर्थः ॥ ४ ॥

सू०न्तरमवतारयितुं चोदयति ॐ ननु चेतनत्वमपि क्वचिद् इति ॐ । न पृथिव्यादीनां चैतन्यमार्थमेव, किन्तु भूयसीनां श्रुतीनां साक्षादेवार्थ इत्यर्थः । सूत्रमवतारयति ॐ अत उत्तरं पठति ॐ अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥

विभजते ॐ तुशब्द इति ॐ । नैताः श्रुतयः साक्षान्मृदादीनां वागादीनाञ्च चैतन्यमाहुः, अपि तु तदधिष्ठात्रीणां देवतानां चिदात्मनां, तेनैतच्छ्रुतिबलेन न मृदादीनां वागादीनाञ्च चैतन्यमाशङ्कनीयमिति ।


भामती-व्याख्या

"अस्य तथात्वं च, शब्दात्"। इस सूत्र-खण्ड का आशय प्रकट किया गया है—"अनवगम्यमानमेव हीदं लोके समस्तस्य वस्तुततश्चेतनत्वम्"। अर्थात् पृथिव्यादि जगत् में श्रुतियों के द्वारा चेतनोपादानकत्व प्रतिपादित है, उसी के बल पर अर्थात् जगत् में जो चेतनत्व अधिगत होता है, वह यदि लौकिक अनुभव के द्वारा संवादित या अवगम्यमान होता, तब वह चेतनत्व अवश्य ही प्रपञ्चगत साक्षात् श्रुति-बोधित अचेतनत्व का अन्यथाकरण ( बाध ) कर देता, किन्तु अनुभवरूप प्रमाणान्तर की सहायता के बिना केवल श्रुतार्थापत्ति से गम्यमान जगद्गत चेतनत्व श्रुति-प्रतिपादित अचेतनत्व से बाधित होता है, अर्थात् अवगत चेतनत्व के द्वारा श्रुत्यर्थ रूप अचेतनत्व का बाध कभी नहीं हो सकता ॥ ४ ॥

पञ्चम सूत्र के अवतारणार्थ शङ्का की जाती है—"ननु चेतनत्वमपि क्वचित्"। शङ्कावादी का कहना यह है कि पृथिव्यादि में चेतनत्व केवल अर्थापत्ति-गम्य नहीं, अपितु बहुत-सी श्रुतियों के द्वारा साक्षात् प्रतिपादित है—"मृदब्रवीत्, आपोऽब्रुवन्" ( शत. ब्रा. ६।१।३।२।४)। "तत्तेज ऐक्षत" (छां. ६।२।३, ४) इत्यादि। उक्त शङ्का का अपनোদন-सूत्र है—"अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्"। इस सूत्र की व्याख्या की जाती है—"तुशब्द आशङ्कामपनुदति"। आशय यह है कि कथित श्रुतियाँ मृदादि और वागादि इन्द्रियों में साक्षात् चेतनत्व का अभिधान नहीं करतीं, अपि तु उनके अधिष्ठाता देवगणों में चैतन्य ध्वनित करती हैं, जो कि चेतन ही हैं, अतः इन श्रुतियों के बल पर मृदादि और वागादि इन्द्रियों में

५५० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ५

वागाद्यभिमानिन्यश्च चेतना देवता वदनसंवदनादिषु चेतनोचितेषु व्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते, न भूतेन्द्रियमात्रम् । कस्मात् ? विशेषानुगतिभ्याम् । विशेषो हि भोक्तॄणां भूतेन्द्रियाणां च चेतनाचेतनप्रविभागलक्षणः प्रागभिहितः । सर्वचेतनतायां चासौ नोपपद्येत । अपि च कौषीतकिनः प्राणसंवादे करणमा- त्राशङ्काविनिवृत्तयेऽधिष्ठातृचेतनपरिग्रहाय देवताशब्देन विशिषन्ति - 'एता ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमानाः' इति 'ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणे निःश्रेयसं विदित्वा' (कौषी० उ० २।१४) इति च । अनुगताश्च सर्वत्राभिमानिन्यश्चेतना देवता मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणादिभ्योऽवगम्यन्ते । 'अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत्' (ऐ० आ० २।४।२।४) इत्येवमादिका च श्रुतिः करणेष्वनुग्राहिकां देवतामनुगतां दर्शयति । प्राणसंवादवाक्यशेषे च 'ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुः' (छा० ५।१।७)

भामती

कस्मात् पुनरेतदेवमित्यत आह ॐ विशेषानुगतिभ्याम् ॐ । तत्र विशेषं व्याचष्टे ॐ विशेषो हि इति ॐ । भोक्तृणामुपकार्यत्वाद् भूतेन्द्रियाणां चोपकारकत्वात् साम्ये च तदनुपपत्तेः सर्वजनप्रसिद्धेश्च "विज्ञानं चाभवत्" इति श्रुतेश्च विशेषश्चेतनाचेतनलक्षणः प्रागुक्तः स नोपपद्यते । देवताशब्दकृतो वात्र विशेषो विशेषशब्देनोच्यत इत्याह ॐ अपि च कौषीतकिनः प्राणसंवाद इति ॐ । अनुगतिं व्याचष्टे ॐ अनुगताश्च इतिॐ । सर्वत्र भूतेन्द्रियादिष्वनुगता देवता अभिमानिनीरुपदिशन्ति मन्त्रादयः । अपि च 'भूयस्यः श्रुतयोऽ- ग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणोभूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत्' इत्यादय इन्द्रियविशेषगता देवता दर्शयन्ति । देवताश्च क्षेत्रज्ञभेदाश्चेतनाः । तस्मान्नेन्द्रियादीनां चैतन्यं रूपत इति । अपि च प्राणसंवादवाक्यशेषे प्राणानामसमन्वाविशच्छरीराणामिव क्षेत्रज्ञाधिष्ठितानां व्यवहारं दर्शयन् प्राणानां

भामती-व्याख्या

चेतनत्व की शङ्का नहीं करनी चाहिए। क्यों नहीं करनी चाहिए ? इस प्रश्न का उत्तर है— "विशेषानुगतिभ्याम्" । इन हेतुओं में 'विशेष' की व्याख्या की जाती है— "विशेषो हि भोक्तॄणाम्" । भोक्ता पुरुष उपकार्य और पृथिव्यादि उपकारक हैं—इस प्रकार की विशेषता की उपपत्ति के लिए "विज्ञानं चाविज्ञानं च" (तै० उ० २।६) इस प्रकार जो चेतनाचेतनरूप विशेषभाव प्रतिपादित है, वह दोनों (पुरुष और पृथिव्यादि) के समानरूप से चेतन होने पर उपपन्न नहीं हो सकता । अथवा श्रुति में प्रयुक्त 'देवता' शब्द के द्वारा ध्वनित विशेषता विशेष शब्द का अर्थ है— "अपि च कौषीतकिनः प्राणसंवादे कारणमात्राशङ्का विनिवृत्तयेऽधिष्ठातृ- चेतनपरिग्रहाय देवताशब्देन विशिषन्ति—'एता वै देवता' (कौ० ब्रा० २।१४) ।" अर्थात् कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत् में प्राण के साथ इन्द्रिय-संवाद के अवसर पर केवल इन्द्रियों की आशङ्का निवृत्त करने और उनके अधिष्ठातृदेवताओं का ग्रहण करने के लिए 'देवता' शब्द का प्रयोग किया गया कि "एता वै देवता"—इन देवताओं ने विवाद किया, केवल जड़ इन्द्रियों ने नहीं।

'अनुगति' शब्द की व्याख्या है— "अनुगताश्च सर्वत्राभिमानिन्यश्चेतना देवता" । मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास और पुराणादि शास्त्र पृथिव्यादि में अनुगत अभिमानी चेतन देवताओं का प्रतिपादन करते हैं, जिसकी चर्चा विगत देवताधिकरण में आ चुकी है। "अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशद्, वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशद्, आदित्यः चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत्" (ऐत. आ. २।४।२।४) इत्यादि बहुत-सी श्रुतियाँ तत्तदिन्द्रिय में अनुगत देवताओं का प्रदर्शन करती हैं। फलतः ईन्द्रियों में स्वरूपतः चैतन्य नहीं, अपि तु इन्द्रियानुगत देवताओं में चैतन्य विवक्षित है। दूसरी बात यह भी है कि प्राण-संवाद के वाक्य-शेष में प्राणों को वैसे ही जीव

सांख्यतर्कनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५१

इति श्रेष्ठत्वनिर्धारणाय प्रजापतिगमनं, तद्वचनाच्चैकैकक्रमणेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां प्राणश्रेष्ठत्वप्रतिपत्तिः । 'तस्मै बलिहरणम्' (बृ० ६।१।१३) इति चैवंजातीयकोऽस्मदादिष्विव व्यवहारोऽनुगम्यमानोऽभिमानिव्यपदेशं द्रढयति । 'तत्तेज ऐक्षत' इत्यपि परस्या एव देवताया अधिष्ठात्र्याः स्वविकारेष्वनुगताया इयमीक्षा व्यपदिश्यत इति द्रष्टव्यम् । तस्माद्विलक्षणमेवेदं ब्रह्मणो जगत् ॥ ५ ॥

विलक्षणत्वाच्च न ब्रह्मप्रकृतिकमित्याक्षिप्ते प्रतिविद्धत्ते—

दृश्यते तु ॥ ६ ॥

तुशब्दः पक्षं व्यावर्तयति । यदुक्तं विलक्षणत्वान्नेदं जगद् ब्रह्मप्रकृतिकमिति । नायमेकान्तः । दृश्यते हि लोके चेतनत्वेन प्रसिद्धेभ्यः पुरुषादिभ्यो विलक्षणानां केशनखादीनामुत्पत्तिः, अचेतनत्वेन च प्रसिद्धेभ्यो गोमयादिभ्यो वृश्चिकादीनाम् । नन्वचेतनान्येव पुरुषादिशरीराण्येचेतनानां केशनखादीनां कारणानि अचेतनान्येव च वृश्चिकादिशरीराण्येचेतनानां गोमयादीनां कार्याणीति, उच्यते, —एवमपि किंचिदचेतनं चेतनस्यायतनभावमुपगच्छति, किंचिन्नेत्यस्त्येव वैलक्षण्यम् । महांश्चायं पारिणामिकः स्वभावविप्रकर्षः, पुरुषादीनां केशनखानां च स्वरूपादिभेदात् । यथा गोमयादीना वृश्चिकादीनां च अत्यन्तसारूप्ये च प्रकृतिविकारभाव एव प्रलीयेत । अथोच्येत—अस्ति कश्चित्पार्थिवत्वादित्वस्वभावः पुरुषादीनां केशनखादिष्वनुवर्तमानो गोमयादीनां वृश्चिकादिष्विति । ब्रह्मणोऽपि तर्हि सत्तालक्षणः स्वभाव आकाशादिष्वनुवर्तमानो दृश्यते । विलक्षणत्वेन च कारणेन ब्रह्मप्रकृतिकत्वं जगतो दूषयता किमशेषस्य


भामती

क्षेत्रज्ञाधिष्ठानेन चैतन्यं द्रढयतीत्याह ॐ प्राणसंवादवाक्यशेषे च इति ॐ । ॐ तत्तेज ऐक्षतेत्यपि इति ॐ । यद्यपि प्रथमेऽध्याये भाक्तत्वेन वर्णितं तथापि मुख्यतयापि कथञ्चिन्नेतुं शक्यमिति द्रष्टव्यम् । पूर्वपक्षमुपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ ॥ ५ ॥
सिद्धान्तसूत्रम् — दृश्यते तु ॥
प्रकृतिविकारभावे हेतुं सारूप्यं विकल्प्य दूषयति ॐ अत्यन्तसारूप्ये च इति ॐ । प्रकृतिविकारभावाभावहेतुं वैलक्षण्यं विकल्प्य दूषयति ॐ विलक्षणत्वेन कारणेन इति ॐ । सर्वस्वभावाननुवर्तनं


भामती-व्याख्या

से अधिष्ठित बताया है, जैसे हम लोगों के शरीर क्षेत्रज्ञाधिष्ठित हैं—'प्राणसंवादवाक्यशेषे च'। "तत् तेज ऐक्षत" इत्यपि परस्या एव देवताया अधिष्ठात्र्याः" । यद्यपि प्रथमाध्यायगत ईक्षत्यधिकरण में तेज आदि के ईक्षण को गौण ईक्षण ही कहा है, तथापि मुख्य ईक्षण का भी समन्वय किया जा सकता है। पूर्व पक्ष का उपसंहार किया जाता है—"तस्माद् विलक्षणमेवेदं ब्रह्मणो जगत्" । 'विलक्षणत्व' हेतु सिद्ध होकर अपने साध्य-साधन में सक्षम है—जगत् न ब्रह्मप्रकृतिकम्, ब्रह्मविलक्षणत्वात् ॥ ५ ॥
सिद्धान्त—"दृश्यते तु"। पूर्वपक्षी ने कहा था कि ब्रह्म और जगत् का प्रकृति-विकारभाव तभी हो सकता है, जब कि दोनों में सारूप्य (सादृश्य) हो । प्रकृति-विकारभाव के लिए सारूप्य अपेक्षित नहीं—यह दिखाने के लिए सारूप्य का विकल्पपूर्वक खण्डन किया जाता है—"अत्यन्तसारूप्ये च" । अर्थात् प्रकृति-विकारभाव के लिए अत्यन्त सारूप्य अपेक्षित है ? अथवा यत्किञ्चित् ? तन्तुओं का अत्यन्त सारूप्य पट में नहीं, किन्तु तन्तुओं में ही है, वहाँ प्रकृति-विकारभाव नहीं और यत्किञ्चित् सारूप्य तो ब्रह्म और जगत् का भी है, क्योंकि ब्रह्म भी सत् है और जगत् भी सत् । प्रकृति-विकारभाव के दूषक (निषेधक)

५५२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ २ पा. १ सू. ६

ब्रह्मस्वभावस्याननुवर्तनं विलक्षणत्वमभिप्रेयेत ? उत यस्य कस्यचित् ? अथ चैतन्यस्येति वक्तव्यम् । प्रथमे विकल्पे समस्तप्रकृतिविकारोच्छेदप्रसङ्गः । न ह्यसत्यतिशये प्रकृतिविकार इति भवति । द्वितीये चासिद्धत्वम् । दृश्यते हि सत्तालक्षणो ब्रह्मस्वभाव आकाशादिष्वनुवर्तमान इत्युक्तम् । तृतीये तु दृष्टान्ताभावः । किं हि यच्चैतन्येनान्वितं तद्ब्रह्मप्रकृतिकं दृष्टमिति ब्रह्मवादिनं प्रत्युदाह्रियेत ? समस्तस्य वस्तुजातस्य ब्रह्मप्रकृतिकत्वाभ्युपगमात् । आगमविरोधस्तु प्रसिद्ध एव, चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेत्यागमतात्पर्यस्य प्रसाधितत्वात् । यत्तूक्तं - परिनिष्पन्नत्वाद् ब्रह्मणि प्रमाणान्तराणि संभवेयुरिति, तदपि मनोरथमात्रम् । रूपाद्यभावाद्धि नायमर्थः प्रत्यक्षस्य गोचरः, लिङ्गाद्यभावाच्च नानुमानादीनाम् । आगममात्रसमधिगम्य एव त्वयमर्थो


भामती

प्रकृतिविकारभावाविरोधि । तदनुवर्तने तादात्म्येन प्रकृतिविकारभावाभावात् । मध्यमस्त्वसिद्धः । तृतीयस्तु निदर्शनाभावादसाधारण इत्यर्थः । अथ जगद्योनितयाऽऽगमाद् ब्रह्मणोऽवगमादागमबाधितविषयत्वमनुमानस्य कस्मान्नोद्भाव्यत इत्यत आह ॐ आगमविरोधस्तु इति ॐ । न चास्मिन्नागमैकसमधिगमनीये ब्रह्मणि प्रमाणान्तरस्यावकाशोऽस्ति येन तदुपादायागम आक्षिप्येतेत्याशयवानाह ॐ यत्तूक्तं परिनिष्पन्नत्वाद् ब्रह्मणि इति ॐ । यथा हि कार्यत्वविशेषेऽप्यारोग्यकामः पथ्यमश्नीयात् स्वरकामः सिकतां भक्षयेदित्यादीनां मानान्तरापेक्षता, न तु दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यादीनां, तत्कस्य हेतोः ? अस्य कार्यभेदस्य प्रमाणान्तरागोचरत्वात् । एवं भूतत्वविशेषेऽपि पृथिव्यादीनां मानान्तरगोचरत्वं, न तु भूतस्यापि ब्रह्मणः, तस्याम्नैयैकगोचरस्यातिपतितसमस्तमानान्तरसीमतया स्मृत्यागमसिद्धत्वादित्यर्थः । यदि


भामती-व्याख्या

'वैलक्षण्य' हेतु का विकल्पपूर्वक निरास किया जाता है—'विलक्षणत्वेन च कारणेन ब्रह्मप्रकृतिकत्वं जगतो दूषयता' । जगत् में ब्रह्म-वैलक्षण्य क्या (१) ब्रह्म के पूर्ण स्वभाव का अननुवर्तन है ? या (२) यत्किञ्चित् स्वभाव का अभाव ? अथवा (३) चैतन्य की अननुवृत्ति ? इनमें पूर्ण स्वभाव का अननुवर्तन प्रकृति-विकारभाव का विरोधी नहीं, क्योंकि सर्वथा वैलक्षण्य का अभाव या सर्वस्वभाव का अनुवर्तन होने पर प्रकृति-विकारभाव बन ही नहीं सकता । द्वितीय ( मध्यम ) विकल्प असिद्ध है, क्योंकि सत्तारूप ब्रह्म का स्वभाव आकाशादि प्रपञ्च में अनुवर्तमान ही है । तृतीय ( चैतन्यान्नुवर्तन ) विकल्प में कोई दृष्टान्त नहीं, अतः दृष्टान्त-हीन या सपक्षवृत्ति हेतु असाधारण नाम का हेत्वाभास होता है । जगत् ब्रह्मप्रकृतिकत्व का अनुमान ब्रह्मप्रकृतिकत्व-बोधक आगम प्रमाण से बाधित क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—"आगम विरोधस्तु प्रसिद्ध एव" । कथा में प्रसिद्ध दोष का उद्भावन महत्त्व-पूर्ण नहीं समझा जाता । ब्रह्म भी धर्म के समान ही आगमैक-समधिगम्य है, प्रमाणान्तर का विषय ही नहीं कि तर्क या अनुमानादि प्रमाणों के द्वारा इस (ब्रह्म) पर आक्षेप हो सकता—"यत्तूक्तं परिनिष्पन्नत्वाद् ब्रह्मणि प्रमाणान्तराणि सम्भवेयुः" । आशय यह है कि 'सभी कार्य ( साध्य ) पदार्थ आगमेतर प्रमाणगम्य और सभी सिद्धपदार्थ प्रमाणान्तर के विषय होते हैं'—ऐसा कोई नियम नहीं । आरोग्य और यागादि के समानरूप से कार्य होने पर भी आरोग्य के विधायक "आरोग्यकामः पथ्यमश्नीयात्", "स्वरकामः सिकतां भक्षयेत्"—इत्यादि शास्त्रों को प्रमाणान्तर की अपेक्षा होने पर भी याग-विधायक 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि वाक्यों को प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं । इसका क्या कारण ? यागरूप कार्य स्वभावतः वेद से भिन्न प्रमाण का विषय ही नहीं । इसी प्रकार पृथिव्यादि और ब्रह्म समानरूप से सिद्ध पदार्थ हैं, किन्तु पृथिव्यादि ही प्रमाणान्तर के विषय हैं, ब्रह्म नहीं, क्योंकि वह वेदैक-समाधिगम्य,

सांख्यतर्कविरोधनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५३

धर्मवत् । तथा च श्रुतिः— 'नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ' ( का० १।२।९ ) इति । 'को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्' 'इयं विसृष्टिर्यत आबभूव' ( ऋ० सं० १।३०।६ ) इति चैते ऋचौ सिद्धानामपीश्वराणां दुर्बोधतां जगत्कारणस्य दर्शयतः । स्मृतिरपि भवति — 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' इति । 'अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते, ( गी० २।२५ ) इति च । 'न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः' ( गी० १०।२ ) इति चैवंजातीयका । यदपि श्रवणव्यतिरेकेण मननं विदधच्छब्द एव तर्कमप्यादर्तव्यं दर्शयतीत्युक्तम् । नानेन मिषेण शुष्कतर्कस्यात्रात्मलाभः संभवति । श्रुत्यनुगृहीत एव ह्यत्र तर्कोऽनुभवाङ्गत्वेनाश्रीयते । स्वप्नान्तबुद्धान्तयोरुभयोरितरेतरव्यभिचारादात्मनोऽनन्वागतत्वं, संप्रसादे च प्रपञ्चपरित्यागेन सदात्मना संपत्तेर्निष्प्रपञ्चसदात्मत्वं प्रपञ्चस्य ब्रह्मप्रभवत्वात्कार्यकारणानन्यत्वन्यायेन ब्रह्माव्यतिरेक इत्येवंजातीयकः । 'तर्काप्रतिष्ठानात्' ( ब्र० सू० २।१।११ ) इति च केवलस्य तर्कस्य विप्रलम्भकत्वं दर्शयिष्यति । योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेनैव समस्तस्य जगतश्चेतनतामुत्प्रेक्षेत


भामती

स्मृत्यागमसिद्धं ब्रह्मणस्तर्काविषयत्वं, कथं तर्हि श्रवणातिरिक्तमननविधानमित्यत आह ॐ यदपि श्रवणव्यतिरेकेण इति ॐ । तर्को हि प्रमाणविषयविवेचकतया तदितिकर्त्तव्यताभूतस्तदाश्रयोऽसति प्रमाणेऽनुग्राह्यस्याश्रयाभावात् शुष्कतया नाद्रियते । यस्त्वागमप्रमाणाश्रयस्तद्विषयविवेचकस्तदविरोधी, स मन्तव्य इति विधीयते । ॐ श्रुत्यनुगृहीत इति ॐ । श्रुत्या श्रवणस्य पश्चादितिकर्त्तव्यतात्वेन गृहीतः । ॐ अनुभवाङ्गत्वेन इति ॐ मतो हि भाव्यमानो भावनाया विषयतयाऽनुभूतो भवतीति मननमनुभवाङ्गम् । ॐ आत्मनोऽनन्वागतत्वम् इति ॐ । स्वप्नाद्यवस्थाभिरसंपृक्तत्वमुदासीनत्वमित्यर्थः । अपि च चेतनकारणवादिभिः कारणसालक्षण्येऽपि कार्यस्य कथञ्चिच्चैतन्याविर्भावानाविर्भावाभ्यां विज्ञानं चाविज्ञानं चाभवदिति जगत्कारणे योजयितुं शक्यम् । अचेतनप्रधानकारणवादिनां तु दुर्घटमेतत् । नह्यचेतनस्य जगत्कारणस्य विज्ञानरूपता संभविनी, चेतनस्य जगत्कारणस्य सुषुप्ताद्यवस्थास्विव सतोऽपि चैतन्यस्यानाविर्भावतया शक्यमेव


भामती-व्याख्या

एवं इतर सभी प्रमाणों की सीमा से परे है । 'नैषा तर्केण मतिरापनेया' ( कठो. १।२।९ ) आगमों के द्वारा ब्रह्म में तर्काविषयत्व प्रतिपादित है । यदि ब्रह्म में तर्काविषयत्व आगम-सिद्ध है, तब श्रवण के पश्चात् मननरूप तर्क का विधान क्यों किया गया है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "यदपि श्रवणव्यतिरेकेण इत्यादि" । आशय यह है कि तर्क की जो आदरणीयता सूचित की गई है, वह शुष्क तर्क की नहीं । जैसे कुठार काष्ठ-छेदन का करण और उद्यमन-निपातन कुठार का इतिकर्त्तव्य ( सहायक व्यापार ) मात्र है, वैसे ही प्रमा ज्ञान की उत्पत्ति में प्रमाण करण एवं तर्क इतिकर्त्तव्यमात्र है । अपने जिस उपकरणीय एवं आश्रयीभूत प्रमाण के विषय का विवेचक है, उस प्रमाण के न होने पर असहाय तर्क को शुष्क तर्क कहा जाता है । इसके विपरीत जो तर्क अपने आगमादि प्रमाणों के अश्रित रह कर उनके विषय का विवेचन करता है, अपने मूलभूत प्रमाण का अविरोधी और सच्चा सहायक है, उस तर्क को पूर्ण समादर दिया गया है । उसी का मनन के रूप में विधान किया गया है—"श्रुत्यनुगृहीत एव तर्कोऽनुभवाङ्गत्वेनाश्रीयते" । 'श्रुत्यनुगृहीतः' का अर्थ है—श्रुत्या श्रवणस्य पश्चाद् इतिकर्त्तव्यतात्वेन गृहीतः । मनन को अनुभव का अङ्ग इसी लिए कहा जाता है कि श्रुत और मत ( मनन-युक्त ) विषय निदिध्यासित या भाव्यमान होकर अनुभूत ( प्रत्यक्ष ) हो जाता है । "आत्मनोऽनन्वागतत्वम्" का अर्थ स्वप्नादि अवस्थाओं से असम्पृक्तता या उदासीनत्व है ।

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५५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ७

तस्यापि 'विज्ञानं चाविज्ञानं च' इति चेतनाचेतनविभागश्रवणं विभाचनाविभावनाभ्यां चैतन्यस्य शक्यत एव योजयितुम् । परस्यैव त्विदमपि विभागश्रवणं न युज्यते । कथम् ? परमकारणस्य ह्यत्र समस्तजगदात्मना समवस्थानं श्राव्यते—'विज्ञानं चाविज्ञानं चाभवत्' इति । तत्र यथा चेतनस्याचेतनभावो नोपपद्यते, विलक्षणत्वाद्, एवमचेतनस्यापि चेतनभावो नोपपद्यते । प्रत्युक्तत्वात्तु विलक्षणत्वस्य यथाश्रुत्यैव चेतनं कारणं ग्रहीतव्यं भवति ॥ ६ ॥

असद्विति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ ७ ॥

यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं च ब्रह्म तद्विपरीतस्याचेतनस्याशुद्धस्य शब्दादिमतश्च कार्यस्य कारणमिष्येत, असत्तर्हि कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति प्रसज्येत । अनिष्टं


भामती

कथञ्चिदविज्ञानात्मकत्वं योजयितुमित्याह ॐ योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेन इति ॐ । परस्यैव त्वचेतनप्रधानकारणवादिनः सांख्यस्य न युज्येत ।प्रत्युक्तत्वात्तु वैलक्षण्यस्य इतिवैलक्षण्ये कार्यकारणभावो नास्तीत्यभ्युपेत्येदमुक्तम् । परमार्थतस्तु नास्माभिरेतदभ्युपेयत इत्यर्थः ॥ ६ ॥

न कारणात्कार्यमभिन्नमभेदे कार्यत्वानुपपत्तेः । कारणवत् स्वात्मनि वृत्तिविरोधात् शुद्धयशुद्धयादिविरुद्धधर्मसंसर्गाच्च । अथ चिदात्मनः कारणस्य जगतः कार्याद्भेदः, तथा चेदं जगत्कार्यं सत्त्वेऽपि चिदात्मनः कारणस्य प्रागुत्पत्तेर्नास्ति, नास्ति चेदसदुत्पद्यत इति सत्कार्यवादव्याकोप इत्याह


भामती-व्याख्या

दूसरी बात यह भी है कि जो चेतन तत्त्व को जगत् का कारण कहते हैं, वे लोग कार्य में कारण का साक्ष्य मानकर भी चैतन्य के आविर्भाव और अनाविर्भाव के द्वारा जड़-चेतन-का कथञ्चिद् उपपादन कर सकते हैं, किन्तु प्रधानादि अचेतन तत्त्व को जगत् का कारण माननेवाले वादी उसका उपपादन किसी प्रकार भी नहीं कर सकते, क्योंकि जगत् के कारणीभूत अचेतन में श्रुति-कथित विज्ञानरूपता सम्भव नहीं। चेतन को जगत् का कारण मानने पर जगत् में भी चेतनत्व की सत्ता मानी जा सकती है, किन्तु जैसे सुषुप्ति अवस्था में चेतनत्व की अभिव्यक्ति नहीं होती, वैसे ही जगत् में अनभिव्यक्त चेतनत्व है, अतः श्रुति ने उसे अविज्ञानरूप कह दिया है—"योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेनेत्यादि" । 'परस्यैव त्विदमपि विभागश्रवणं न युज्यते" अर्थात् प्रधानकारणवादी सांख्य के मत में "विज्ञानं चाविज्ञानं च"—इस श्रुति की योजना नहीं हो सकती। "प्रत्युक्तत्वात्तु वैलक्षण्यस्य"—यह जो कहा गया है कि कारण और कार्य के वैरूप्य का वेदान्तियों की ओर से खण्डन कर दिया गया है, वह वस्तु-स्थिति नहीं, अपि तु थोड़ी देर के लिए वैसा मान कर कहा है, परमार्थतः कार्य और कारण का अवैलक्षण्य हमें स्वीकृत नहीं ॥ ६ ॥

ब्रह्मरूप कारण से यह प्रपञ्चरूप कार्य अभिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य ब्रह्म से अभिन्न प्रपञ्च में भी नित्यत्व ही रहेगा, कार्य (जन्यत्व) नहीं रह सकेगा। सत्कार्यवाद के अनुसार कारण में कार्य सदैव रहता है, किन्तु अभिन्न कार्य अपने कारण में वैसे ही न रह सकेगा, जैसे कारण में स्वयं वही कारण नहीं रहता। दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म शुद्ध है और प्रपञ्चरूप कार्य अशुद्ध, एक या अभिन्न वस्तु में शुद्धि और अशुद्धिरूप विरुद्ध धर्मों का का संसर्ग सम्भव नहीं, इस लिए भी कार्य को अपने कारण से अभिन्न नहीं मान सकते। यदि चित्स्वरूप कारण का प्रपञ्च से भेद माना जाता है, तब चित्स्वरूप कारण के रहने पर भी जगत को अपनी उत्पत्ति से पूर्व असत् मानना होगा। असत् कार्य की उत्पत्ति मानने पर सत्कार्यवाद भङ्ग हो जाता है, ऐसी शङ्का की जा रही है—"यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं

सांख्यतर्कविरोधनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५५

चैतत्सत्कार्यवादिनस्तवैति चेत्, नैष दोषः, प्रतिषेधमात्रत्वात्। प्रतिषेधमात्रं हीदं नास्य प्रतिषेधस्य प्रतिषेध्यमस्ति। न ह्ययं प्रतिषेधः प्रागुत्पत्तेः सत्त्वं कार्यस्य प्रतिषेद्धुं शक्नोति। कथम् ? यथैव हीदानीमपीदं कार्यं कारणात्मना सद्, एवं प्रागुत्पत्तेरपीति गम्यते। न हीदानीमपीदं कार्यं कारणात्मानमन्तरेण स्वतन्त्रमेवास्ति, 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' (बृ० २।४।६) इत्यादिश्रवणात्। कारणात्मना तु सत्त्वं कार्यस्य प्रागुत्पत्तेरविशिष्टम्। ननु शब्दादिहीनं ब्रह्म जगतः कारणम्, बाढम्, नतु शब्दादिमत्कार्यं कारणात्मना हीनं प्रागुत्पत्तेरिदानीं वाऽस्ति। तेन न शक्यते वक्तुं प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यमिति। विस्तरेण चैतत्त्कार्यकारणानन्यत्ववादे वक्ष्यामः ॥ ७ ॥

अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ ८ ॥

अत्राह यदि स्थौल्यसावयवत्वाचेतनत्वपरिच्छिन्नत्वाशुद्ध्यादिधर्मकं कार्यं

भामती

☸ यदि चेतनं शुद्धम् इति ☸ । परिहरति ☸ नैष दोषः इति ☸ । कुतः ? ☸ प्रतिषेधमात्रत्वात् ☸ । विभजते ☸ प्रतिषेधमात्रं हीदम् इति ☸ । प्रतिपादयिष्यति हि तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य इत्यत्र । यथा कार्यं स्वरूपेण सदसत्त्वाभ्यां न निर्वचनीयम्, अपि तु कारणरूपेण शक्यं सत्त्वेन निर्वक्तुमिति । एवं च कारणसत्तैव कार्यस्य सत्ता न ततोऽन्येति कथं तदुत्पत्तेः प्राक् सति कारणे भवत्यसत् । स्वरूपेण तूत्पत्तेः प्रागुत्पन्नस्य ध्वस्तस्य वा सदसत्त्वाभ्यामनिर्वच्यस्य न सतोऽसतो वोत्पत्तिरिति निर्विषयः सत्कार्यवादप्रतिषेध इत्यर्थः ॥ ७ ॥

असामञ्जस्यं विभजते ☸ अत्राह ☸ चोदकः, । ☸ यदि स्थौल्य इति ☸ । यथा हि यूषादिषु हिङ्गुसैन्धवादीनामविभागलक्षणो लयः स्वगतरसाविर्भाव्यैष दूषयत्येवं ब्रह्मणि विशुद्धस्वभावेऽपि जगल्ली-

भामती-व्याख्या

च ब्रह्म” । उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—‘‘नैष दोषः’’, क्योंकि “प्रतिषेध-मात्रत्वात्” । इस सूत्रावयव का आशय स्पष्ट किया जाता है—“प्रतिषेधमात्रं हीदम्, नास्य प्रतिषेधस्य प्रतिषेध्यमस्ति” । असत्त्व सत्त्व का प्रतिषेध है और उस प्रतिषेध का प्रतिषेध्य है—सत्त्व, वेदान्त-सिद्धान्त में जगत् का पृथक् सत्त्व माना ही नहीं जाता । “तदनन्यत्व-मारम्भणशब्दादिभ्यः” ( ब्र. सू. २।१।१४ ) यहाँ पर यह स्पष्ट कर दिया जायगा कि जगद्रूप कार्य का सत् या असत् रूप से निर्वचन नहीं किया जा सकता । कारणरूपेण कार्य को सत् कहा जा सकता है । कारण की सत्ता ही कार्य की सत्ता है, कारण से पृथक् कार्य की सत्ता नहीं, अतः उत्पत्ति के पूर्व कारण के सत् होने पर कार्य असत् क्योंकर होगा ? उत्पत्ति के पश्चात् सिद्धावस्थापन्न या विनष्ट कार्य सत् और असद्रूप से अनिर्वचनीय है, अतः 'सत् या असत् कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती’—इस प्रकार सत्कार्यवाद का प्रतिषेध अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि कार्य की स्वरूपेण सत्ता कभी मानी ही नहीं जाती, तब उस का निषेध अप्रसक्त-प्रतिषेधमात्र है ॥ ७ ॥

शङ्का—शङ्का-सूत्र का शब्दार्थ इतना ही है कि ‘कार्य के अपीत ( प्रलीन ) होने पर उसी के समान उसको भी होना चाहिए—यह असमञ्जस है ।' इस की व्याख्या चार प्रकार से की जाती है—

१—‘‘अत्राह’’ अर्थात् शङ्कावादी ने कहा कि यदि स्थूलत्वाशुद्धत्वादि धर्म से युक्त कार्य प्रपञ्च अपनी विलयावस्था में ब्रह्म से अभिन्न हो जाता है, तब जैसे जूस ( पकी दाल या परवलादि का पानी जो रोगी को पथ्यरूप में दिया जाता है ) में हींग, जीरा और काला

५५६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. ९

ब्रह्मकारणकमभ्युपगम्येत, तदपीतौ प्रलये प्रतिसंसृज्यमानं कार्यं कारणाविभागमापद्यमानं कारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदित्यपीतौ कारणस्यापि ब्रह्मणः कार्यस्येवाशुद्धयादिरूपप्रसङ्गात् सर्वज्ञं ब्रह्म जगत्कारणमित्यसमञ्जसमिदमौपनिषदं दर्शनम् । अपि च समस्तस्य विभागस्याविभागप्राप्तेः पुनरुत्पत्तौ नियमकारणाभावाद्भोक्तृभोग्यादिविभागेनोत्पत्तिर्न प्राप्नोतीत्यसमञ्जसम् । अपि च भोक्तॄणां परेण ब्रह्मणाऽविभागं गतानां कर्मादिनिमित्तप्रलयेऽपि पुनरुत्पत्तावभ्युपगम्यमानायां मुक्तानामपि पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गादसमञ्जसम् । अथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव परेण ब्रह्मणावतिष्ठेत, एवमप्यपीतिश्च न संभवति, कारणाव्यतिरिक्तं च कार्यं न संभवतीत्यसमञ्जसमेवेति ॥ ८ ॥

अत्रोच्यते—न तु दृष्टान्तभावात् ॥ ९ ॥

भामती

यमानमविभागं गच्छद् ब्रह्म स्वधर्मेण दूषयेन्न चान्यथा लयो लोकसिद्ध इति भावः । कल्पान्तरेणासामञ्जस्यमाह ॐ अपि च समस्तस्य इति ॐ । नहि समुद्रस्य फेनोर्मिबुद्बुदादिपरिणामे वा रज्ज्वां सर्पधारादिविभ्रमे वा नियमो दृष्टः । समुद्रो हि कदाचित् फेनोर्मिरूपेण परिणमते कदाचित् बुद्बुदादिना, रज्ज्वां हि कश्चित्सर्पं इति विपर्यस्यति कश्चिद्धारेति । न च कमनियमः । सोऽयमत्र भोग्यादिविभागनियमः क्रमनियमश्चासमञ्जस इति । कल्पान्तरेणासामञ्जस्यमाह ॐ आप च भोक्तॄणाम् इति ॐ । कल्पान्तरं शङ्कापूर्वमाह ॐ अथेदम् इति ॐ ॥ ८ ॥

सिद्धान्तसूत्रम्— ॐ न तु दृष्टान्तभावात् ॐ । नाविभागमात्रं लयोऽपि तु कारणे कार्यस्याविभागस्तत्र

भामती-व्याख्या

नमक मिलकर ( प्रलीन या अविभागापन्न होकर ) जूस को अपने धर्म ( सौरभ और स्वाद ) से युक्त कर देता है, वैसे ही विशुद्धयादि स्वभाववाले ब्रह्म में अशुद्धयादिधर्मक जगत् प्रलीन या अविभागापन्न होकर ब्रह्म को अपने अशुद्धयादि धर्मों से युक्त कर देगा। लोक में यही लय प्रसिद्ध है।

२—दूसरे प्रकार से व्याख्या प्रस्तुत करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"अपि च समस्तस्य विभागस्य"। जब समस्त प्रपञ्च एक बार प्रलीन हो जाता है, तब वैसे ही भोक्तृ-भोग्यादि-विभागवाले प्रपञ्च की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि उसका कोई नियामक नहीं, जैसे समुद्र कभी फेन और तरंगादिरूप में विकृत होता है और कभी बुद्बुदादिरूप में अथवा जैसे रज्जु कभी सर्परूप में, कभी धारा और कभी हारादिरूप में विवर्तित होती है, नियमतः एक ही रूप में नहीं, वैसे ही ब्रह्म सदैव एक ही रूप में क्यों विवर्तित होगा ? किन्तु आप ( वेदान्ती ) जो पहली सृष्टि के समान ही नियमतः दूसरी सृष्टि मानते हैं, उस नियम का सामञ्जस्य कैसे होगा ?

३—प्रकारान्तर से उक्त सूत्र की व्याख्या की जाती है—'अपि च भोक्तॄणां परेण ब्रह्मणाऽविभागं गतानाम्" अर्थात् जीवों का ब्रह्म में विलय हो जाने पर उनके कर्म (धर्माधर्म) भी समाप्त हो जाते हैं, अदृष्टों की सहायता के बिना उनकी उत्पत्ति मानने पर मुक्त पुरुषों की पुनरुत्पत्ति प्रसक्त होती है, जो कि असमञ्जस है।

४—अन्य रीति से व्याख्या करते हुए कहा जाता है—'अथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव"। यदि प्रलयावस्था में भी ब्रह्म में कार्य का विलय नहीं माना जाता, तब वह कार्य पृथक् किसके आश्रित रहेगा ॥ ८ ॥

समाधान—"न तु दृष्टान्तभावात्"। इस सूत्र की व्याख्या भी कथित चारों प्रकारों

सांख्यादितर्कविरोधनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५७

नैवास्मदीये दर्शने किंचिदसामञ्जस्यमस्ति। यत्तावदभिहितं कारणमपिगच्छ-त्कार्यं कारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदिति, तददूषणम्, कस्मात् ? दृष्टान्तभावात्। सन्ति हि दृष्टान्ता यथा कारणमपिगच्छत्कार्यं कारणमात्मीयेन धर्मेण न दूषयति। तद्यथा शरावादयो मृत्प्रकृतिका विकारा विभाग(वस्थायामुच्चावचमध्यमप्रभेदाः सन्तः पुनः प्रकृतिमपिगच्छन्तो न तामात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। रुचकादयश्च सुवर्णविकारा अपीतौ न सुवर्णमात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। पृथिवीविकारश्चतुर्विधो भूतग्रामो न पृथिवीमपीतावात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। त्वत्पक्षस्य तु न कश्चिद् दृष्टान्तोऽस्त। अपीतिरेव हि न संभवेद्यदि कारणे कार्यं स्वधर्मेणैवावतिष्ठेत। अनन्यत्वेऽपि कार्यकारणयोः कार्यस्य कारणात्मत्वं न तु कारणस्य कार्यात्मत्वं 'आरम्भणशब्दादिभ्यः' (ब्र० सू० २।१।१४) इति वक्ष्यामः। अत्यल्पं चेदमुच्यते कार्यमपीतावात्मीयेन धर्मेण कारणं संसृजेदिति। स्थितावपि समानोऽयं प्रसङ्गः, कार्यकारणयोरनन्य-त्वाभ्युपगमात्। 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २।४।६) 'आत्मैवेदं सर्वम्' (छा० ७।२५।२), 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात्' (मु० २।२।११), 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छा० ३।१४।१) इत्येवमाद्याभिर्हि श्रुतिभिरविशेषेण त्रिष्वपि कालेषु कार्यस्य कारणानन्यत्वं श्राव्यते। तत्र यः परिहारः कार्यस्य तद्धर्माणां चाविद्याध्यारोपितत्वान्नतैः कारणं संसृज्यत इति, अपीतावपि स समानः। अस्ति चायमपरो दृष्टान्तो यथा स्वयं


भामती

च तद्धर्मारूषणे सन्ति सहस्रं दृष्टान्ताः। तत्र तु कारणे कार्यस्य लये कार्यधर्मारूषणे न दृष्टान्तलवोऽप्यस्ती-त्यर्थः। स्यादेतत्--यदि कार्यस्याविभागः कारणे, कथं कार्यधर्मारूषणं कारणस्येत्यत आह ॐ अनन्यत्वेऽपि इति ॐ। यथा रजतस्यारोपितस्य पारमार्थिकं रूपं शुक्तिर्न च शुक्ते रजतमित्यभिप्रे-त्योक्तार्थः। अपि च स्थित्युत्पत्तिप्रलयकालेषु त्रिष्वपि कार्यस्य कारणादभेदमभिदधती श्रुतिरनतिशङ्कनीया, सर्वैरेव वेदवादिभिस्तत्र स्थित्युत्पत्त्योर्यः परिहारः, स प्रलयेऽपि समानः कार्यस्याविद्यासमारोपितत्वं नाम, तस्मान्नापीतिमात्रमनुयोज्यमित्याह ॐ अत्यल्पं चेदमुच्यते इति ॐ। ॐ अस्ति चायमपरो दृष्टान्तः ॐ।


भामती-व्याख्या

को ध्यान में रख कर की गई है—

१-कार्य का अविभागमात्र ही लयपदार्थ नहीं, अपि तु अपने कारण से कार्य का अविभाग लय कहा जाता है। कार्य अपने कारण में लीन होने पर भी अपने कारण को अपने दोषों से दूषित या आक्रान्त नहीं करता—इस तथ्य में हजारो दृष्टान्त हैं, किन्तु कार्य प्रलीन होकर अपने कारण को अपने धर्मों से युक्त कर देता है—इसमें कोई एक भी दृष्टान्त उपलब्ध नहीं होता। कार्य जब पूर्णतया कारण से अभिन्न हो जाता है, तब कारण कार्य-रूपापन्न क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"अनन्यत्वेऽपि कार्यस्य कारणात्मत्वम्, न तु कारणस्य कार्यात्मत्वम्"। जैसे—शुक्ति में आरोपित रजत का पारमार्थिक रूप शुक्ति है, किन्तु शुक्ति का पारमार्थिक रूप रजत नहीं, वैसे ही कार्य कारण का रूप होता है, कारण कार्य का नहीं। दूसरी बात यह भी है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—इन तीनों कालों में कार्य का कारण से अभेद प्रतिपादन करने वाली श्रुति सर्वथा वेदवादियों के द्वारा मान्य एवं अनाशङ्कनीय है। केवल प्रलय में कार्य कारण से अभिन्न होकर अपने दोषों से कारण को दूषित करने की आपत्ति क्यों उठाई गई, उत्पत्ति और स्थिति में क्यों नहीं ? कार्य तीनों कालों में अपने कारण से अभिन्न है। समानसत्ताक पदार्थों के सम्मिश्रण से ही उनके गुण-दोषों का परस्पर विनिमय होता है, विषमसत्ताक पदार्थों के मिश्रण या अभेदापत्ति से मौलिक तत्त्व में कोई अन्तर नहीं

५५८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[अ. २ पा. १ सू. ९

प्रसारितया मायया मायावी त्रिष्वपि कालेषु न संस्पृश्यते, अवस्तुत्वात्, एवं परमात्मापि संसारमायया न संस्पृश्यत इति । यथा च स्वप्नदृगेकः स्वप्नदर्शनमायया न संस्पृश्यत इति, प्रबोधसंप्रसादयोरनन्वागतत्वात् । एवमवस्थात्रयसाक्ष्येकोऽव्यभिचार्यवस्थात्रयेण व्यभिचारिणा न संस्पृश्यते । मायामात्रं ह्येतद्यत्परमात्मनोऽवस्थात्रयात्मनावभासनं रज्ज्वा इव सर्पादिभावेनेति । अत्रोक्तं वेदान्तार्थसंप्रदायविद्भिराचार्यैः—'अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते । अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा' (गौड० कारि० १।१६) इति । तत्र यदुक्तमपीतौ कारणस्यापि कार्यस्येव स्थौल्यादिदोषप्रसङ्ग इत्येतदयुक्तम् । यत्पुनरेतदुक्तं समस्तस्य विभागस्याविभागप्राप्तेः पुनर्विभागेनोत्पत्तौ नियमकारणं नोपपद्यत इति, अयमप्यदोषः दृष्टान्तभावादेव । यथा हि सुषुप्तिसमाध्यादावपि सत्यां स्वाभाविक्यामविभागप्राप्तौ मिथ्याज्ञानस्यानपोदितत्वात्पूर्ववत्पुनः प्रबोधे विभागो भवति, एवमिहापि भविष्यति । श्रुतिश्चात्र भवति—'इमाः सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामह इति, त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदा भवन्ति' (छा० ६।९।२, ३) इति । यथा ह्यविभागेऽपि परमात्मनि मिथ्याज्ञानप्रतिबद्धो विभागव्यवहारः स्वप्नवदव्याहतः स्थितो दृश्यते, एवमपीतावपि मिथ्याज्ञानप्रतिबद्धैव विभागशक्तिरनुमास्यते । एतेन मुक्तानां पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः प्रत्युक्तः, सम्यग्ज्ञानेन मिथ्याज्ञानस्यापोदितत्वात् । यः पुनरयमन्तेऽपरो विकल्प उत्प्रेक्षितोऽथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव परेण ब्रह्मणावतिष्ठेतेति, सोऽप्यनभ्युपगमादेव

भामती

ॐ यथा स्वप्नदृगेकः इति ॐ । लौकिकः पुरुषः । ॐ एवमवस्थात्रयसाक्ष्ये‌कः इति ॐ । अवस्थात्रयमुत्पत्ति-स्थितिप्रलयाः । कल्पान्तरेणासामञ्जस्ये कल्पान्तरेण दृष्टान्तभावं परिहारमाह ॐ यत् पुनरेतदुक्तम् इति ॐ । अविद्याशक्तेर्नियतत्वादुत्पत्तिनियम इत्यर्थः । ॐएतेन इति ॐ। मिथ्याज्ञानविभागशक्तिप्रतिनियमेन मुक्तानां पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः प्रत्युक्तः, कारणाभावे कार्याभावस्य प्रतिनियमात्, तत्त्वज्ञानेन च स्वशक्तितो

भामती-व्याख्या

आता। जैसे अविद्यारोपित सर्प अपनी उत्पत्ति, स्थिति या लय की अवस्था में रज्जू को कभी विषाक्त नहीं बना सकता, वैसे यह समस्त प्रपञ्च अपने कारण को दूषित नहीं कर सकता—"एवमवस्थात्रयसाक्ष्येकोऽव्यभिचारी"। 'अवस्थात्रय' शब्द से उत्पत्ति, स्थिति और लय का ग्रहण किया गया है।

२—द्वितीय कल्प के अनुसार उद्भावित असामञ्जस्य का समाधान किया जा रहा है—"यत्पुनरुक्तं समस्तस्य"। अर्थात् यह जो कहा था कि प्रपंच के अपने कारण में प्रलीन हो जाने पर वैसे ही प्रपंच की उत्पत्ति में न तो कोई नियामक है और न दृष्टान्त। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि पूर्ण सृष्टि के संस्कारों से युक्त अज्ञानरूप बीज ही वैसी ही सृष्टि की उत्पत्ति का नियामक है, जैसा कि सुषुप्ति और समाधि के अनन्तर देखा जाता है।

३—मुक्त पुरुषों की पुनत्पत्ति की आपत्ति भी इस लिए नहीं होती कि जो मिथ्या ज्ञान उत्पत्ति का नियामक होता है, वह मुक्त पुरुषों का नष्ट हो चुका होता है, अतः कारण का अभाव होने पर नियमतः कार्य का अभाव होता है। तत्त्वज्ञान के द्वारा मिथ्या ज्ञान का समूल विनाश हो जाता है।

४—यह चतुर्थ विकल्प उठाया गया था कि प्रलयावस्था में जगत् यदि ब्रह्म से भिन्न रहता है तो किसके आश्रित रहेगा? वह वैसा वेदान्त-सिद्धान्त में माना ही नहीं जाता।

सांख्यादितर्कनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५९

प्रतिषिद्धः । तस्मात्समञ्जसमिदमौपनिषदं दर्शनम् ॥ ९ ॥

स्वपक्षदोषाच्च ॥ १० ॥

स्वपक्षे चैते प्रतिवादिनः साधारणा दोषाः प्रादुःष्युः । कथमिति ? उच्यते— यत्तावदभिहितं-विलक्षणत्वाच्चेदं जगद् ब्रह्मप्रकृतिकमिति, प्रधानप्रकृतिकतायामपि समानमेतत्, शब्दादिहीनात्प्रधानाच्छब्दादिमतो जगत उत्पत्त्युपगमात् । अत एव च विलक्षणकार्योत्पत्त्युपगमात्समानः प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यवादप्रसङ्गः। तथाऽपीतौ कार्यस्य कारणाविभागाभ्युपगमात्तद्वत्प्रसङ्गोऽपि समानः । तथा मृदितसर्वविशेषेषु विकारेष्वपीतावभागात्मतां गतेष्विदमस्य पुरुषस्योपादानमिदमस्येति प्राक्प्रलयात्प्रतिपुरुषं ये नियता भेदाः, न ते तथैव पुनरुत्पत्तौ नियन्तुं शक्यन्ते, कारणाभावात् । विनैव कारणेन नियमेऽभ्युपगम्यमाने कारणाभावसाम्यान्मुक्तानामपि पुनर्बन्धप्रसङ्गः । अथ केचिद्भेदा अपीतावविभागमापद्यन्ते केचिन्नोति चेत्—ये नापद्यन्ते तेषां प्रधानकार्यत्वं न प्राप्नोतीत्येवमेते दोषाः साधारणत्वान्नान्यतरस्मिन् पक्षे चोदयितव्या भवन्तीत्यदोषतामेवैषां द्रढयति, अवश्य्याश्रयितव्यत्वात् १०॥

भामती

मिथ्याज्ञानस्य समूलघातं निहतत्वादिति ॥ ९ ॥

कार्यकारणयोर्वैलक्षण्यं तावत्समानमेवोभयोः पक्षयोः, प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यवादप्रसङ्गोऽपीतो तद्वत्प्रसङ्गश्च प्रधानोपादानपक्ष एव नास्मत्पक्ष इति यद्यप्युपरिष्टात्प्रतिपादयिष्यामस्तथापि गुडजिह्विकया समानत्वापादनमिदानीमिति मन्तव्यमिदमस्य पुरुषस्य सुखदुःखोपादानं क्लेशकर्माशयादीदमस्येति । सुगममन्यत् ॥ १० ॥


भामती-व्याख्या

ब्रह्म से पृथक् जगत् की कभी भी स्वतन्त्र सत्ता मानी ही नहीं जाती ॥ ९ ॥

कार्य और कारण के सारूप्य का न होना—यह दोष तो ब्रह्मवाद और सांख्य-सम्मत प्रकृतिवाद—इन दोनों मतों में समान है। किन्तु उत्पत्ति के पूर्व असत्कार्यवाद का प्रसङ्ग और विलय हो जाने के पश्चात् पूर्ववत् कार्य की अनुत्पत्ति—ये दोनों दोष केवल प्रकृतिवाद में ही हैं, हमारे ब्रह्मवाद में नहीं। यद्यपि यह सब कुछ आगे चल कर कहा जायगा, तथापि यहाँ जो भाष्यकार ने सभी दोषों का प्रसङ्ग दोनों पक्षों में समानरूप से कहा है, वह 'गुड़जिह्विका' न्याय को लेकर कहा है [ बच्चे को कटु औषध पिलाने के लिए पहले उसकी जिह्वा पर गुड़ लगा दिया जाता है, उसके पश्चात् चिरायता, नीम या करेले का रस पिला दिया जाता है—इसी का नाम गुड़जिह्विका है। कटूक्ति से पहले मधुरोक्ति का प्रयोग सूत्रकारादि भी किया करते थे, जैसे पूर्वपक्ष का खण्डन करने के लिए सीधे 'न' या 'तुच्छम्' न कह कर 'अपिवा' या केवल 'वा' का मधुर प्रयोग करते थे, अत एव कल्पतरुकार ने आगे (ब्र. सू. ३।१।८ में) चलकर कहा है—"गुडजिह्विका मधुरोक्तिः, नैव युक्तमित्युक्ते नैष्ठुर्यं स्यादिति"। फलतः वेदान्ती के "तव पक्षे एवेमे दोषाः, नास्माकम्"—ऐसा कह देने पर लोग तालियाँ पीट देते और सांख्याचार्य का मर्मस्थल आहत हो जाता, अतः भाष्यकार ने कह दिया—"समानमेतत्"। समान दोषोद्भावन जय-पराजय का स्थान नहीं होता, जैसा कि कुमारिल भट्ट निर्णय देते हैं—

तस्माद् ययोः समो दोषः परिहारोऽपि वा समः ।
नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ॥ (श्लो. वा. पृ. ३४१) ] ।

भाष्यकार ने जो कहा है—"इदमस्य पुरुषस्योपादानम्, इदमस्य"। उसका अर्थ है—'इदं

५६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. ११

तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यविमोक्षप्रसङ्गः ॥ ११ ॥

इतश्च नागमगम्येऽर्थे केवलेन तर्केण प्रत्यवस्थातव्यम् । यस्मान्निरागमाः पुरुषोत्प्रेक्षामात्रनिबन्धनास्तर्का अप्रतिष्ठिता भवन्ति, उत्प्रेक्षाया निरङ्कुशत्वात् । तथा हि कैश्चिदभियुक्तैर्यत्नेनोत्प्रेक्षितास्तर्का अभियुक्ततरैरन्यैराभास्यमाना दृश्यन्ते । तैरप्युत्प्रेक्षिताः सन्तस्ततोऽन्यैराभास्यन्त इति न प्रतिष्ठितत्वं तर्काणां शक्यमाश्रयितुम्, पुरुषमतिवैरूप्यात् । अथ कस्यचित्प्रसिद्धमाहात्म्यस्य कपिलस्य चान्यस्य वा संमतस्तर्कः प्रतिष्ठित इत्याश्रीयत, एवमप्यप्रतिष्ठितत्वमेव, प्रसिद्धमाहात्म्यानुमतानामपि तीर्थकराणां कपिलकणभुकप्रभृतीनां परस्परविप्रतिपत्तिदर्शनात् । अथोच्येतान्यथा वयमनुमास्यामहे यथा नाप्रतिष्ठादोषो भविष्यति । नहिप्रतिष्ठितस्तर्क एव नास्तीति


भामती

केवलागमगम्येऽर्थे स्वतन्त्रतर्काविषये । न सांख्यादिवत् साधर्म्यवैधर्म्यमात्रेण तर्कः प्रवर्तनीयो येन प्रधानादिसिद्धिर्भवेत् । शुष्कतर्को हि स भवत्यप्रतिष्ठानात् । तदुक्तम्—
यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः ।
अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ इति ।
न च महापुरुषपरिगृहीतत्वेन कस्यचित्तर्कस्य प्रतिष्ठा, महापुरुषाणामेव तार्किकाणां मिथो विप्रतिपत्तेरिति । सूत्रे शङ्कते ॐअन्यथानुमेयमिति चेत्ॐ । तद्विभजते ॐअन्यथा वयमनुमास्यामहे इति ॐ । नानुमानाभासव्यभिचारिणानुमानव्यभिचारः शङ्कनीयः, प्रत्यक्षादिष्वपि तदाभासव्यभिचारेण तत्प्रसङ्गात् ।


भामती-व्याख्या

क्लेशकर्मादि अस्य पुरुषस्य सुखदुःखयोः उपादानम् (कारणम्), इदमस्य'—इस प्रकार का नियत भेद प्रलय के पश्चात् नहीं रहता, अतः मुक्त पुरुषों की पुनरुत्पत्ति प्रसक्त नहीं होती है ॥१०॥

जगत् का उपादानकारण कौन है ? इस प्रश्न का ठीक उत्तर केवल वेदों में है, स्वतन्त्र तर्क का विषय नहीं, अतः जैसे सांख्याचार्य जो स्वतन्त्र तर्क के आधार पर जगत् के के त्रिगुणत्वादि साधर्म्य और चेतनत्वादि वैधर्म्य का अवलम्बन कर प्रधान तत्त्व की तर्कना किया करते हैं, वह सर्वथा अनुचित है। आगम-निरपेक्ष या शुष्क तर्क कभी किसी एक तत्त्व पर प्रतिष्ठित (स्थिर) नहीं रह सकता, जैसा कि वाक्यपदीयकार कहते हैं—
यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः ।
अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (वा. प. १।३४)
[अर्थात् किसी एक तार्किक के द्वारा यत्नपूर्वक अनुमान से जो पदार्थ जैसा अनुमित (तर्कित) होता है, बड़ा तार्किक आकर अपनी ऊहापोह के द्वारा वह पदार्थ अन्यथा (विपरीत) सिद्ध कर दिया करता है, जैसी कि तार्किक-चक्र-चूडामणि श्री रघुनाथ शिरोमणि की गर्वोक्ति है—
विदुषां निवहेरिरहैककथ्याद् यददुष्टं निरटङ्कि यच्च दुष्टम् ।
मयि जल्पति कल्पनाधिनाथे रघुनाथे मनुनां तदन्यथैव ॥ (बाध प्र.)
अत एव महर्षि व्यास ने ही यह सत्परामर्श दिया है—"अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केषु योजयेत्' (भारत. भीष्म ५।१२) ]। कोई तर्क किसी एक महापुरुष के द्वारा परिगृहीत है—एतावता उसकी प्रतिष्ठा नहीं हो सकती, क्योंकि दूसरे महापुरुषों को उसमें विप्रतिपत्ति है ।

शङ्का—सूत्रकार ने शङ्का प्रस्तुत की है—"अन्यथानुमेयम्", उसकी व्याख्या की जाती है—"अन्यथा वयमनुमास्यामहे" । शङ्कावादी का आशय यह है कि किसी अनुमानाभास

सांख्यादितर्कनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ५६१

वक्तुम्। एतदपि हि तर्काणामप्रतिष्ठितत्वं तर्केणैव प्रतिष्ठाप्यते, केषांचित्तर्काणामप्रतिष्ठितत्वदर्शनेनान्येषामपि तज्जातीयानां तर्काणामप्रतिष्ठितत्वकल्पनात्। सर्वतर्काप्रतिष्ठायां च लोकव्यवहारोच्छेदप्रसङ्गः। अतीतवर्तमानाध्वसाम्येन ह्यनागतेऽप्यध्वनि सुखदुःखप्राप्तिपरिहाराय प्रवर्तमानो लोको दृश्यते। श्रुत्यर्थविप्रतिपत्तौ चार्थाभासनिराकरणेन सम्यगर्थनिर्धारणं तर्केणैव वाक्यवृत्तिनिरूपणरूपेण क्रियते। मनुरपि चैवं मन्यते 'प्रत्यक्षमनुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्। त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता॥' इति। 'आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना। यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥' (१२।१०५,१०६) इति च ब्रुवन्। अयमेव तर्कस्यालंकारो यदप्रतिष्ठितत्वं नाम। एवं हि सावद्यतर्कपरित्यागेन निरवद्यस्तर्कः प्रतिपत्तव्यो भवति। नहि पूर्वजो मूढ आसीदित्यात्मनापि मूढेन भवितव्यमिति किंचिदस्ति प्रमाणम्। तस्मान्न तर्काप्रतिष्ठानं दोष इति चेत्—एवमप्यविमोक्षप्रसङ्गः। यद्यपि कंचिद्विषये

भामती

तस्मात् स्वाभाविकप्रतिबन्धवल्लिङ्गानुसरणे निपुणेनानुमात्रा भवितव्यं, ततश्चाप्रत्यूहं प्रधानं सेत्स्यतीति भावः। अपि च येन तर्केण तर्काणामप्रतिष्ठामाह स एव तर्कः प्रतिष्ठितोऽभ्युपेयस्तदप्रतिष्ठायामितराप्रतिष्ठानाभावादित्याह ॐ नहि प्रतिष्ठितस्तर्क एव इति ॐ। अपि च तर्काप्रतिष्ठायां सकललोकयात्रोच्छेदप्रसङ्गः। न च श्रुत्यर्थाभासनिराकरणेन तदर्थतत्त्वविनिश्चय इत्याह ॐ सर्वतर्काप्रतिष्ठायां च इति ॐ। अपि च विचारात्मकस्तर्कस्तर्कितपूर्वपक्षपरित्यागेन तर्कितं राद्धान्तमनुजानाति। सति चैष पूर्वपक्षविषये तर्के प्रतिष्ठारहिते प्रवर्तते, तदभावे विचाराप्रवृत्तेः। तदिदमाह ॐ अयमेव च तर्कस्यालङ्कारः इति ॐ। तामिमामाशङ्कां सूत्रेण परिहरति ॐ एवमप्यविमोक्षप्रसङ्गः ॐ। न वयमन्यत्र तर्कमप्रमाणयामः, किन्तु

भामती-व्याख्या

(तर्काभास) के अप्रतिष्ठित (अर्थ-व्यभिचारी) हो जाने मात्र से सद्नुमान (सत्तर्क) व्यभिचरित नहीं होता, अन्यथा किसी प्रत्यक्षाभास के अपने विषय से व्यभिचरित हो जाने पर प्रमाणभूत प्रत्यक्ष को भी व्यभिचारी मानना होगा। अतः अनुमान (तर्क) में अपेक्षित स्वाभाविकसम्बन्धरूप व्याप्ति जिस हेतु में विद्यमान है, ऐसे सद्धेतु के प्रयोग में अनुमाता व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए। उस सद्धेतु के द्वारा प्रधान तत्त्व की निराबाध सिद्धि हो जायेगी। दूसरी बात यह भी है कि जिस तर्क के द्वारा अन्य तर्कों की अप्रतिष्ठता सिद्ध की जा रही है, उस तर्क को तो प्रतिष्ठित मानना होगा, क्योंकि उसके प्रतिष्ठित न होने पर अन्य तर्क अप्रतिष्ठित किसके आधार पर होंगे? यह कहा जा रहा है—“न हि प्रतिष्ठितस्तर्क एव नास्ति”। किसी भी तर्क के प्रतिष्ठित न होने पर समस्त लोक-व्यवहार उच्छिन्न हो जायगा—“सर्वतर्काप्रतिष्ठायां च लोकव्यवहारोच्छेदः”। किसी श्रुति का अर्थ यह है? अथवा यह? ऐसा वैमत्य (संशय) उपस्थित होने पर वाक्य-तात्पर्य-निर्णायक तर्क के द्वारा ही अर्थाभास का निरास एवं सदर्थ का निश्चय किया जाता है—“श्रुत्यर्थविप्रतिपत्तौ चार्थाभासनिराकरणेन”। विचारात्मक तर्क के आधार पर ही वितर्कित पूर्वपक्ष का प्रतिक्षेप एवं सुतर्कित सिद्धान्त का अनुसन्धान किया जाता है, इसीलिए भगवान् मनु ने कहा है—

‘आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राविरोधिना।
यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्मं वेद नेतरः॥’ (मनु० १२।१०६)

अत एव प्रतिष्ठा-रहित तर्क (तर्काभास) की भी सत्ता माननी पड़ती है, क्योंकि उसके न रहने पर विचार में कथक-सम्प्रदाय की प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती। अतः तर्क का अप्रतिष्ठित होना एक अलङ्कार है—“अयमेव हि तर्कस्यालङ्कारो यदप्रतिष्ठितत्वम्”।

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