भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसांख्यादितर्कविरोधनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५७
नैवास्मदीये दर्शने किंचिदसामञ्जस्यमस्ति। यत्तावदभिहितं कारणमपिगच्छ-त्कार्यं कारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदिति, तददूषणम्, कस्मात् ? दृष्टान्तभावात्। सन्ति हि दृष्टान्ता यथा कारणमपिगच्छत्कार्यं कारणमात्मीयेन धर्मेण न दूषयति। तद्यथा शरावादयो मृत्प्रकृतिका विकारा विभाग(वस्थायामुच्चावचमध्यमप्रभेदाः सन्तः पुनः प्रकृतिमपिगच्छन्तो न तामात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। रुचकादयश्च सुवर्णविकारा अपीतौ न सुवर्णमात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। पृथिवीविकारश्चतुर्विधो भूतग्रामो न पृथिवीमपीतावात्मीयेन धर्मेण संसृजन्ति। त्वत्पक्षस्य तु न कश्चिद् दृष्टान्तोऽस्त। अपीतिरेव हि न संभवेद्यदि कारणे कार्यं स्वधर्मेणैवावतिष्ठेत। अनन्यत्वेऽपि कार्यकारणयोः कार्यस्य कारणात्मत्वं न तु कारणस्य कार्यात्मत्वं 'आरम्भणशब्दादिभ्यः' (ब्र० सू० २।१।१४) इति वक्ष्यामः। अत्यल्पं चेदमुच्यते कार्यमपीतावात्मीयेन धर्मेण कारणं संसृजेदिति। स्थितावपि समानोऽयं प्रसङ्गः, कार्यकारणयोरनन्य-त्वाभ्युपगमात्। 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २।४।६) 'आत्मैवेदं सर्वम्' (छा० ७।२५।२), 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात्' (मु० २।२।११), 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छा० ३।१४।१) इत्येवमाद्याभिर्हि श्रुतिभिरविशेषेण त्रिष्वपि कालेषु कार्यस्य कारणानन्यत्वं श्राव्यते। तत्र यः परिहारः कार्यस्य तद्धर्माणां चाविद्याध्यारोपितत्वान्नतैः कारणं संसृज्यत इति, अपीतावपि स समानः। अस्ति चायमपरो दृष्टान्तो यथा स्वयं
भामती
च तद्धर्मारूषणे सन्ति सहस्रं दृष्टान्ताः। तत्र तु कारणे कार्यस्य लये कार्यधर्मारूषणे न दृष्टान्तलवोऽप्यस्ती-त्यर्थः। स्यादेतत्--यदि कार्यस्याविभागः कारणे, कथं कार्यधर्मारूषणं कारणस्येत्यत आह ॐ अनन्यत्वेऽपि इति ॐ। यथा रजतस्यारोपितस्य पारमार्थिकं रूपं शुक्तिर्न च शुक्ते रजतमित्यभिप्रे-त्योक्तार्थः। अपि च स्थित्युत्पत्तिप्रलयकालेषु त्रिष्वपि कार्यस्य कारणादभेदमभिदधती श्रुतिरनतिशङ्कनीया, सर्वैरेव वेदवादिभिस्तत्र स्थित्युत्पत्त्योर्यः परिहारः, स प्रलयेऽपि समानः कार्यस्याविद्यासमारोपितत्वं नाम, तस्मान्नापीतिमात्रमनुयोज्यमित्याह ॐ अत्यल्पं चेदमुच्यते इति ॐ। ॐ अस्ति चायमपरो दृष्टान्तः ॐ।
भामती-व्याख्या
को ध्यान में रख कर की गई है—
१-कार्य का अविभागमात्र ही लयपदार्थ नहीं, अपि तु अपने कारण से कार्य का अविभाग लय कहा जाता है। कार्य अपने कारण में लीन होने पर भी अपने कारण को अपने दोषों से दूषित या आक्रान्त नहीं करता—इस तथ्य में हजारो दृष्टान्त हैं, किन्तु कार्य प्रलीन होकर अपने कारण को अपने धर्मों से युक्त कर देता है—इसमें कोई एक भी दृष्टान्त उपलब्ध नहीं होता। कार्य जब पूर्णतया कारण से अभिन्न हो जाता है, तब कारण कार्य-रूपापन्न क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"अनन्यत्वेऽपि कार्यस्य कारणात्मत्वम्, न तु कारणस्य कार्यात्मत्वम्"। जैसे—शुक्ति में आरोपित रजत का पारमार्थिक रूप शुक्ति है, किन्तु शुक्ति का पारमार्थिक रूप रजत नहीं, वैसे ही कार्य कारण का रूप होता है, कारण कार्य का नहीं। दूसरी बात यह भी है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—इन तीनों कालों में कार्य का कारण से अभेद प्रतिपादन करने वाली श्रुति सर्वथा वेदवादियों के द्वारा मान्य एवं अनाशङ्कनीय है। केवल प्रलय में कार्य कारण से अभिन्न होकर अपने दोषों से कारण को दूषित करने की आपत्ति क्यों उठाई गई, उत्पत्ति और स्थिति में क्यों नहीं ? कार्य तीनों कालों में अपने कारण से अभिन्न है। समानसत्ताक पदार्थों के सम्मिश्रण से ही उनके गुण-दोषों का परस्पर विनिमय होता है, विषमसत्ताक पदार्थों के मिश्रण या अभेदापत्ति से मौलिक तत्त्व में कोई अन्तर नहीं