भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५५६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. ९ |
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ब्रह्मकारणकमभ्युपगम्येत, तदपीतौ प्रलये प्रतिसंसृज्यमानं कार्यं कारणाविभागमापद्यमानं कारणमात्मीयेन धर्मेण दूषयेदित्यपीतौ कारणस्यापि ब्रह्मणः कार्यस्येवाशुद्धयादिरूपप्रसङ्गात् सर्वज्ञं ब्रह्म जगत्कारणमित्यसमञ्जसमिदमौपनिषदं दर्शनम् । अपि च समस्तस्य विभागस्याविभागप्राप्तेः पुनरुत्पत्तौ नियमकारणाभावाद्भोक्तृभोग्यादिविभागेनोत्पत्तिर्न प्राप्नोतीत्यसमञ्जसम् । अपि च भोक्तॄणां परेण ब्रह्मणाऽविभागं गतानां कर्मादिनिमित्तप्रलयेऽपि पुनरुत्पत्तावभ्युपगम्यमानायां मुक्तानामपि पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गादसमञ्जसम् । अथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव परेण ब्रह्मणावतिष्ठेत, एवमप्यपीतिश्च न संभवति, कारणाव्यतिरिक्तं च कार्यं न संभवतीत्यसमञ्जसमेवेति ॥ ८ ॥
अत्रोच्यते—न तु दृष्टान्तभावात् ॥ ९ ॥
भामती
यमानमविभागं गच्छद् ब्रह्म स्वधर्मेण दूषयेन्न चान्यथा लयो लोकसिद्ध इति भावः । कल्पान्तरेणासामञ्जस्यमाह ॐ अपि च समस्तस्य इति ॐ । नहि समुद्रस्य फेनोर्मिबुद्बुदादिपरिणामे वा रज्ज्वां सर्पधारादिविभ्रमे वा नियमो दृष्टः । समुद्रो हि कदाचित् फेनोर्मिरूपेण परिणमते कदाचित् बुद्बुदादिना, रज्ज्वां हि कश्चित्सर्पं इति विपर्यस्यति कश्चिद्धारेति । न च कमनियमः । सोऽयमत्र भोग्यादिविभागनियमः क्रमनियमश्चासमञ्जस इति । कल्पान्तरेणासामञ्जस्यमाह ॐ आप च भोक्तॄणाम् इति ॐ । कल्पान्तरं शङ्कापूर्वमाह ॐ अथेदम् इति ॐ ॥ ८ ॥
सिद्धान्तसूत्रम्— ॐ न तु दृष्टान्तभावात् ॐ । नाविभागमात्रं लयोऽपि तु कारणे कार्यस्याविभागस्तत्र
भामती-व्याख्या
नमक मिलकर ( प्रलीन या अविभागापन्न होकर ) जूस को अपने धर्म ( सौरभ और स्वाद ) से युक्त कर देता है, वैसे ही विशुद्धयादि स्वभाववाले ब्रह्म में अशुद्धयादिधर्मक जगत् प्रलीन या अविभागापन्न होकर ब्रह्म को अपने अशुद्धयादि धर्मों से युक्त कर देगा। लोक में यही लय प्रसिद्ध है।
२—दूसरे प्रकार से व्याख्या प्रस्तुत करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"अपि च समस्तस्य विभागस्य"। जब समस्त प्रपञ्च एक बार प्रलीन हो जाता है, तब वैसे ही भोक्तृ-भोग्यादि-विभागवाले प्रपञ्च की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि उसका कोई नियामक नहीं, जैसे समुद्र कभी फेन और तरंगादिरूप में विकृत होता है और कभी बुद्बुदादिरूप में अथवा जैसे रज्जु कभी सर्परूप में, कभी धारा और कभी हारादिरूप में विवर्तित होती है, नियमतः एक ही रूप में नहीं, वैसे ही ब्रह्म सदैव एक ही रूप में क्यों विवर्तित होगा ? किन्तु आप ( वेदान्ती ) जो पहली सृष्टि के समान ही नियमतः दूसरी सृष्टि मानते हैं, उस नियम का सामञ्जस्य कैसे होगा ?
३—प्रकारान्तर से उक्त सूत्र की व्याख्या की जाती है—'अपि च भोक्तॄणां परेण ब्रह्मणाऽविभागं गतानाम्" अर्थात् जीवों का ब्रह्म में विलय हो जाने पर उनके कर्म (धर्माधर्म) भी समाप्त हो जाते हैं, अदृष्टों की सहायता के बिना उनकी उत्पत्ति मानने पर मुक्त पुरुषों की पुनरुत्पत्ति प्रसक्त होती है, जो कि असमञ्जस है।
४—अन्य रीति से व्याख्या करते हुए कहा जाता है—'अथेदं जगदपीतावपि विभक्तमेव"। यदि प्रलयावस्था में भी ब्रह्म में कार्य का विलय नहीं माना जाता, तब वह कार्य पृथक् किसके आश्रित रहेगा ॥ ८ ॥
समाधान—"न तु दृष्टान्तभावात्"। इस सूत्र की व्याख्या भी कथित चारों प्रकारों