भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ७
तस्यापि 'विज्ञानं चाविज्ञानं च' इति चेतनाचेतनविभागश्रवणं विभाचनाविभावनाभ्यां चैतन्यस्य शक्यत एव योजयितुम् । परस्यैव त्विदमपि विभागश्रवणं न युज्यते । कथम् ? परमकारणस्य ह्यत्र समस्तजगदात्मना समवस्थानं श्राव्यते—'विज्ञानं चाविज्ञानं चाभवत्' इति । तत्र यथा चेतनस्याचेतनभावो नोपपद्यते, विलक्षणत्वाद्, एवमचेतनस्यापि चेतनभावो नोपपद्यते । प्रत्युक्तत्वात्तु विलक्षणत्वस्य यथाश्रुत्यैव चेतनं कारणं ग्रहीतव्यं भवति ॥ ६ ॥
असद्विति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ ७ ॥
यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं च ब्रह्म तद्विपरीतस्याचेतनस्याशुद्धस्य शब्दादिमतश्च कार्यस्य कारणमिष्येत, असत्तर्हि कार्यं प्रागुत्पत्तेरिति प्रसज्येत । अनिष्टं
भामती
कथञ्चिदविज्ञानात्मकत्वं योजयितुमित्याह ॐ योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेन इति ॐ । परस्यैव त्वचेतनप्रधानकारणवादिनः सांख्यस्य न युज्येत । ॐ प्रत्युक्तत्वात्तु वैलक्षण्यस्य इति ॐ वैलक्षण्ये कार्यकारणभावो नास्तीत्यभ्युपेत्येदमुक्तम् । परमार्थतस्तु नास्माभिरेतदभ्युपेयत इत्यर्थः ॥ ६ ॥
न कारणात्कार्यमभिन्नमभेदे कार्यत्वानुपपत्तेः । कारणवत् स्वात्मनि वृत्तिविरोधात् शुद्धयशुद्धयादिविरुद्धधर्मसंसर्गाच्च । अथ चिदात्मनः कारणस्य जगतः कार्याद्भेदः, तथा चेदं जगत्कार्यं सत्त्वेऽपि चिदात्मनः कारणस्य प्रागुत्पत्तेर्नास्ति, नास्ति चेदसदुत्पद्यत इति सत्कार्यवादव्याकोप इत्याह
भामती-व्याख्या
दूसरी बात यह भी है कि जो चेतन तत्त्व को जगत् का कारण कहते हैं, वे लोग कार्य में कारण का साक्ष्य मानकर भी चैतन्य के आविर्भाव और अनाविर्भाव के द्वारा जड़-चेतन-का कथञ्चिद् उपपादन कर सकते हैं, किन्तु प्रधानादि अचेतन तत्त्व को जगत् का कारण माननेवाले वादी उसका उपपादन किसी प्रकार भी नहीं कर सकते, क्योंकि जगत् के कारणीभूत अचेतन में श्रुति-कथित विज्ञानरूपता सम्भव नहीं। चेतन को जगत् का कारण मानने पर जगत् में भी चेतनत्व की सत्ता मानी जा सकती है, किन्तु जैसे सुषुप्ति अवस्था में चेतनत्व की अभिव्यक्ति नहीं होती, वैसे ही जगत् में अनभिव्यक्त चेतनत्व है, अतः श्रुति ने उसे अविज्ञानरूप कह दिया है—"योऽपि चेतनकारणश्रवणबलेनेत्यादि" । 'परस्यैव त्विदमपि विभागश्रवणं न युज्यते" अर्थात् प्रधानकारणवादी सांख्य के मत में "विज्ञानं चाविज्ञानं च"—इस श्रुति की योजना नहीं हो सकती। "प्रत्युक्तत्वात्तु वैलक्षण्यस्य"—यह जो कहा गया है कि कारण और कार्य के वैरूप्य का वेदान्तियों की ओर से खण्डन कर दिया गया है, वह वस्तु-स्थिति नहीं, अपि तु थोड़ी देर के लिए वैसा मान कर कहा है, परमार्थतः कार्य और कारण का अवैलक्षण्य हमें स्वीकृत नहीं ॥ ६ ॥
ब्रह्मरूप कारण से यह प्रपञ्चरूप कार्य अभिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य ब्रह्म से अभिन्न प्रपञ्च में भी नित्यत्व ही रहेगा, कार्य (जन्यत्व) नहीं रह सकेगा। सत्कार्यवाद के अनुसार कारण में कार्य सदैव रहता है, किन्तु अभिन्न कार्य अपने कारण में वैसे ही न रह सकेगा, जैसे कारण में स्वयं वही कारण नहीं रहता। दूसरी बात यह भी है कि ब्रह्म शुद्ध है और प्रपञ्चरूप कार्य अशुद्ध, एक या अभिन्न वस्तु में शुद्धि और अशुद्धिरूप विरुद्ध धर्मों का का संसर्ग सम्भव नहीं, इस लिए भी कार्य को अपने कारण से अभिन्न नहीं मान सकते। यदि चित्स्वरूप कारण का प्रपञ्च से भेद माना जाता है, तब चित्स्वरूप कारण के रहने पर भी जगत को अपनी उत्पत्ति से पूर्व असत् मानना होगा। असत् कार्य की उत्पत्ति मानने पर सत्कार्यवाद भङ्ग हो जाता है, ऐसी शङ्का की जा रही है—"यदि चेतनं शुद्धं शब्दादिहीनं