भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयोगस्मृतेर्नादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५४३
पन्नायैकदेशत्वादष्टकादिस्मृतिवद्योगस्मृतिरप्यनववदनीया भविष्यतीति-इयमभ्यधिकाशङ्काऽतिदेशेन निवर्त्यते, अर्थैकदेशसंप्रतिपत्तावप्यर्थैकदेशविप्रतिपत्तेः पूर्वोक्ताया
भामती
प्रधानादौ प्रमाणञ्च यमादाविति युक्तम् । तत्राप्रामाण्येऽन्यत्राप्यनाश्वासात् । यथाहुः —
“प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः ।
नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचरे ॥” इति ।
सेयं लब्धप्रसरा प्रधानादौ योगप्रामाणता पिशाची सर्वत्रैव दुर्वारा भवेदित्यस्याः प्रसरं निषेधता प्रधानाद्यभ्युपेयमिति नाशब्दं प्रधानमिति शङ्कार्थः । सा ॐ इयमभ्यधिकाशङ्काऽतिदेशेन निवर्त्यते ॐ । निवृत्तिहेतुमाह ॐ अर्थैकदेशसम्प्रतिपत्तावपि इति ॐ । यदि हि प्रधानादिसत्तापरं योगशास्त्रं भवेत् भवेत् प्रत्यक्षवेदान्तश्रुतिविरोधेनाप्रमाणम् । तथा च तद्विहितेषु यमादिष्वप्यनाश्वासः स्यात् । तस्मान्न प्रधानदिपरं तत् किन्तु तन्निमित्तीकृत्य योगव्युत्पादनपरमित्युक्तम् । न चाविषयेऽप्रामाण्यं विषयेऽपि प्रामाण्यमुपहन्ति । नहि चक्षूरसादावप्रमाणं रूपेऽप्यप्रमाणं भवितुमर्हति । तस्माद्वेदान्तश्रुतिविरोधात् प्रधानादिरस्याविषयो न त्वप्रामाण्यमिति परमार्थः । स्यादेतत् — अध्यात्मविषयाः सन्ति सहस्रं स्मृतयो बौद्धाऽर्हत-
भामती-व्याख्या
मानना चाहिए ] । फलतः योग-शास्त्ररूप प्रमाण के द्वारा प्रमाणित प्रधानादि पदार्थों को अशब्द ( अप्रमाण ) कहना उचित नहीं । 'योग-शास्त्र प्रधानादि अंश में अप्रमाण और यम-नियमादि अंश में प्रमाण है'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि योग-शास्त्र को यदि किसी भी अंश में अप्रमाण माना जाता है, तब पूरे योग-शास्त्र पर से ही विश्वास उठ जायगा, जैसे कि श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—
प्रसरं न लभन्ते हि यावत् क्वचन मर्कटाः ।
नाभिद्रवन्ति ते तावत् पिशाचा वा स्वगोचराः ॥
क्वचिद् दत्तेऽवकाशे हि स्वोत्प्रेक्षालब्धधामभिः ।
जीवितुं लभते कस्तेस्तन्मार्गपतितः स्वयम् ॥” (तं. वा. पृ. १७१)
[ मर्कट ( वानर ) और भूत ( प्रेत ) को जब तक कहीं घुसने का अवसर नहीं मिलता, तभी तक उनके उपद्रव शान्त रहते हैं । जब उनको कहीं पैर रखने का अवसर मिल जाता है, तब पूरा क्षेत्र उनके उपद्रवों से ऐसा आक्रान्त हो जाता है कि उनके मार्ग में आकर कोई व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता । उसी प्रकार ] यदि अप्रमाणता को किसी अंश ( प्रधानादि ) में मान लिया जाता है, तब समग्र अंशी ( योग-शास्त्र ) अप्रमाण हो जाता है, अतः योग-शास्त्र के प्रधानादि अंश में भी अप्रमाणता की गति रोक कर प्रधानादि की वास्तविक सत्ता मान लेनी चाहिए । ऐसा मान लेने पर प्रधानादि में अशाब्दता का आरोप निराधार हो जाता है ।
सिद्धान्त — उक्त अत्यधिक आशङ्का अतिदेश के द्वारा दूर की जाती है, क्योंकि “अर्थैकदेशसंप्रतिपत्तावप्यर्थैकदेशविप्रतिपत्तेः” । यदि योग-शास्त्र का मुख्य तात्पर्य प्रधानादि की सत्ता में होता, तब प्रत्यक्ष वेदान्त श्रुति से बाधित होकर योग-शास्त्र अप्रमाण हो जाता । इतना ही नहीं, उसके द्वारा विहित यम-नियमादि पर भी अविश्वास हो जाता । फलतः योग-शास्त्र को प्रधानादि-परक न मानकर प्रधानादि के निमित्त से यम-नियमादि का प्रतिपादक मानना ही उचित है । योग-शास्त्र प्रधानादि अंश में अप्रमाण होकर यम-नियमादि अंश में भी वैसे ही अप्रमाण नहीं होता, जैसे चक्षु अपने अविषयीभूत रसादि अंश में अप्रमाण होकर रूप में भी अप्रमाण नहीं होता ।