भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३
दर्शनात् । सतीष्वप्यध्यात्मविषयासु बह्वीषु स्मृतिषु सांख्ययोगस्मृत्योरेव निराकरणे यत्नः कृतः । सांख्ययोगौ हि परमपुरुषार्थसाधनत्वेन लोके प्रख्यातौ, शिष्टैश्च परिगृहीतौ, लिङ्गेन च श्रौतेनोपबृंहितौ । 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः' (श्वे० ६।१३) इति । निराकरणं तु-न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःश्रेयसमधिगम्यत इति । श्रुतिर्हि वैदिकादात्मैकत्वविज्ञानादन्यन्निःश्रेयससाधनं वारयति - 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' (श्वे० ३।८) इति । द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च नात्मैकत्वदर्शिनः । यत्तु दर्शनमुक्तं 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम्' इति, वैदिकमेव तत्र ज्ञानं ध्यानं च सांख्ययोगशब्दाभ्यामभिलप्यते प्रत्यासत्तेरित्यवगन्तव्यम् । येन त्वंशेन न विरुध्येते तेनेष्टमेव सांख्ययोगस्मृत्योः सावकाशत्वम् । तद्यथा - 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' (बृ. ४।३।१६) इत्येवमादिश्रुतिप्रसिद्धमेव पुरुषस्य विशुद्धत्वं निर्गुणपुरुषनिरूपणेन सांख्यैरभ्युपगम्यते । तथा च योगैरपि 'अथ परिव्राड्विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः' (जावा० ५)
भामती
कापालिकादीनां, ता अपि कस्मान्न निराक्रियन्त इत्यत आह ॐ सतीष्वपि इति ॐ । तासु खलु बहुलं वेदार्थविसंवादिनीषु शिष्टानादृतासु कैश्चिदेव तु पुरुषापसदैः पशुप्राथैर्म्लेच्छादिभिः परिगृहीतासु वेदमूलत्वाशङ्कव नास्तीति न निराकृताः, तद्विपरीतास्तु सांख्ययोगस्मृतय इति ताः प्रधानादिपरतया व्युदस्यन्त इत्यर्थः । ॐ न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण इति ॐ । प्रधानादिविषयेणेत्यर्थः । ॐ द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च ॐ ये प्रधानादिपरतया तच्छास्त्रं व्याचक्षत इत्यर्थः । संख्या सम्यग्बुद्धिर्वैदिकी तया वर्तन्त इति सांख्याः । एवं योगो ध्यानम् , उपायोपेययोरभेदविवक्षया, चित्तवृत्तिनिरोधो हि योगः, तस्योपायो
भामती-व्याख्या
अध्यात्मविषयक हजारों अन्य दर्शन हैं, जैसे-बौद्ध, आर्हत (जैन) और कापालिकादि। उनका भी यहाँ निराकरण क्यों नहीं किया जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सतीष्वपि अध्यात्मविषयासु बह्वीषु स्मृतिषु" । अर्थात् बौद्धादि दर्शन वेदार्थ के विसंवादी (विपरीत) होने के कारण शिष्ट पुरुषों के द्वारा ही अनादृत एवं समाज के गिरे हुए म्लेच्छप्राय पशु-स्तर के असभ्य पुरुषों के ही श्रद्धा-भाजन हैं। उनमें वेदमूलकत्व की आशङ्का ही नहीं हो सकती, अतः उनके निराकरण की कोई आवश्यकता ही नहीं किन्तु सांख्य-योग ठीक उनके विपरीत वेदमूलक और शिष्ट-समाज में समादृत और प्रचलित हैं, अतः प्रधानादि-प्रतिपादन अंश में उनका निरास किया जाता है। "न सांख्यज्ञानेन वेदनिरपेक्षेण योगमार्गेण वा निःश्रेयसमधिगम्यते"—इस भाष्य का आशय यह है कि सांख्य-योग का निराकरण इसी लिए किया जाता है कि उनका जो कहना है कि 'वेद-निरपेक्ष केवल प्रधानादिविषयक सांख्य-ज्ञान अथवा योग-मार्ग से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है' उनका वह कहना अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि श्रुति ने यह नियम घोषित कर रखा है कि केवल वैदिक आत्मैकत्व-ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है किन्तु 'द्वैतिनो हि ते सांख्या योगाश्च'। सांख्य-दर्शन और योग-दर्शन का सिद्धान्त आत्मैकत्ववाद का विरोधी द्वैतवाद एवं प्रधानादिपरक है। श्रुतियों में जो "सांख्ययोगाभिपन्नम्" (श्वेता. ६।१३) इस प्रकार 'सांख्य' और 'योग' शब्द आए हैं, वहाँ 'सांख्य' शब्द वैदिक सम्यक् आत्मैकत्वज्ञान और 'योग' शब्द ध्यान को कहता है। 'योग' शब्द से जो "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (यो. सू. १।२) इस प्रकार चित्त-वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है, वह प्रत्ययैकतानतारूप ध्यान का उपाय है, उपाय और उपेय की अभेद-विवक्षा में वैसा कह दिया गया है। केवल चित्त-वृत्ति-निरोध ही ध्यान