भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| ५६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १२ |
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तर्कस्य प्रतिष्ठितत्वमुपलक्ष्यते, तथापि प्रकृते तावद्विषये प्रसज्यत एवाप्रतिष्ठितत्वदो- षादनिर्मोक्षस्तर्कस्य, न हीदमतिगम्भीरं भावयाथात्म्यं मुक्तिनिबन्धनमागममन्तरे- णोत्प्रेक्षितुमपि शक्यम् । रूपाद्यभावाद्धि नायमर्थः प्रत्यक्षगोचरः, लिङ्गाद्यभावाच्च नानुमानादीनामिति चावोचाम । अपि च सम्यग्ज्ञानान्मोक्ष इति सर्वेषां मोक्षवादिना- मभ्युपगमः । तच्च सम्यग्ज्ञानमेकरूपम्, वस्तुतन्त्रत्वात् । एकरूपेण ह्यवस्थितो योऽर्थः स परमार्थः । लोके तद्विषयं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानमित्युच्यते—यथाग्निरुष्ण इति । तत्रैवं सति सम्यग्ज्ञाने पुरुषाणां विप्रतिपत्तिरनुपपन्ना । तर्कज्ञानानां त्वन्योन्यविरोधात्प्र- सिद्धा विप्रतिपत्तिः । यद्धि केनचित्तार्किकेणेदमेव सम्यग्ज्ञानमिति प्रतिपादितं तदपरेण व्युत्थाप्यते, तेनापि प्रतिष्ठापितं ततोऽपरेण व्युत्थाप्यत इति प्रसिद्धं लोके, कथमेक- रूपानवस्थितविषयं तर्कप्रभवं सम्यग्ज्ञानं भवेत् ? न च प्रधानवादी तर्कविदामुत्तम इति सर्वैस्तार्किकैः परिगृहीतो येन तदीयं मतं सम्यग्ज्ञानमिति प्रतिपद्येमहि । न च शक्यन्तेऽतीतानागतवर्तमानास्तार्किका एकस्मिन्देशे काले च समाहर्तुं येन तन्मतिरे- करूपैकार्थविषया सम्यङ्मतिरिरिति स्यात् । वेदस्य तु नित्यत्वे विज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वे च सति व्यवस्थितार्थविषयत्वोपपत्तेः, तज्जनितस्य ज्ञानस्य सम्यक्त्वमतीतानागतवर्त- मानैः सर्वैरपि तार्किकैरपह्नोतुमशक्यम् । अतः सिद्धमस्यैवौपनिषदस्य ज्ञानस्य सम्य- ग्ज्ञानत्वम् । अतोऽन्यत्र सम्यग्ज्ञानत्वानुपपत्तेः संसाराविमोक्ष एव प्रसज्येत । अत आगमवशेनैवागमानुसारितर्कवशेन च चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेति स्थितम् ॥ ११ ॥
( ४ शिष्टापरिग्रहाधिकरणम् । सू० १२ )
एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ १२ ॥
भामती
जगत्कारणसत्त्वे स्वाभाविकप्रतिबन्धध्वंस लिङ्गमस्ति । यत्तु साधर्म्यवैधर्म्यमात्रं, तदप्रतिष्ठादोषान्न मुच्यत
इति कल्पान्तरेणानिर्मोक्षपदार्थमाह ॐ अपि च सम्यग्ज्ञानान्मोक्षः इति ॐ । भूतार्थगोचरस्य हि
सम्यग्ज्ञानस्य व्यवस्थितवस्तुगोचरतया व्यवस्थानं लोके दृष्टं, यथा प्रत्यक्षस्य । वैदिकं चेदं चेतनजगदुपा-
दानविषयं विज्ञानं वेदोत्थतर्केतिकर्तव्यताकं वेदजनितं व्यवस्थितं वेदानपेक्षेण तु तर्केण जगतत्कारणमेवम-
वस्थापयतां तार्किकाणामन्योन्यं विप्रतिपत्तेस्तत्त्वनिर्धारणकारणाभावाच्च न ततस्तत्त्वव्यवस्थेति न ततः
सम्यग्ज्ञानम्, असम्यग्ज्ञानाच्च न संसाराद्विमोक्ष इत्यर्थः ॥ ११ ॥
भामती-व्याख्या
समाधान—कथित शङ्का का परिहार स्वयं सूत्रकार ने किया है—"एवमपि
अविमोक्षप्रसङ्गः।" आशय यह है कि सत्यार्थविषयक सम्यक् ज्ञान व्यवस्थित वस्तु का
प्रतिष्ठापक होने के कारण लोक में प्रतिष्ठित माना जाता है, जैसे—प्रत्यक्ष चेतनगत जगत् की
उपादानता का प्रमापक प्रकृत वैदिक विज्ञान व्यवस्थित है, क्योंकि वेदोत्थित तर्क की
सहायता लेकर वैदिक वाक्यों ने उसको जन्म दिया है किन्तु वेद-निरपेक्ष शुष्क तर्क के द्वारा
तार्किकगण जो परमाणु आदि को जगत् का उपादान कहते हैं, उनकी परस्पर-विप्रतिपत्ति
होने के कारण तत्त्वावधारण सम्भव नहीं, अतः उनका ज्ञान सम्यक् ज्ञान नहीं, असम्यक् ज्ञान
संसार-बन्धन से मोक्ष नहीं दिला सकता ॥ ११ ॥
कणादादितर्कविरोधः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५६३
भामती
न कार्यं कारणादभिन्नमभेदे कारणरूपवत् कार्य्यत्वानुपपत्तेः, करोत्यर्थानुपपत्तेश्च। अभूतप्रादुर्भावनं हि तबर्थः। न चास्य कारणात्मत्वे किञ्चिदभूतमस्ति यदर्थमयं पुरुषो यतेत। अभिव्यक्त्यर्थमिति चेत्, न, तस्या अपि कारणात्मत्वेन सत्त्वात्, असत्त्वे वाऽभिव्यङ्ग्यस्यापि तद्वत् प्रसङ्गेन कारणात्मत्व-व्याघातात्। नहि तदेव तदानीमेवास्ति नास्ति चेति युज्यते। किं चेदं मणिमन्त्रौषधमिन्द्रजालं कार्य्येण शिक्षितं यदियमजातानिरुद्धातिशयमध्यवधानप्रविदूरस्थानं च तस्यैव तदवस्थेन्द्रियस्य पुंसः कदाचित्प्रत्यक्षं परोक्षं च येनास्य कदाचित्प्रत्यक्षमुपलम्भनं कदाचिदनुमानं कदाचिदागमः। कार्य्यान्तरव्यवधिरस्य पारोक्ष्यहेतुरिति चेत्, न, कार्य्यजातस्य सदातनत्वात्। अथापि स्यात्कार्य्यान्तराणि पिण्डकपालशर्कराचूर्णकणप्रभृतीनि कुम्भं व्यवदधते, ततः कुम्भस्य पारोक्ष्यं कदाचिदिति। तन्न, तस्य कार्य्यजातस्य कारणात्मनः सदातनत्वेन सर्वदा व्यवधानेन कुम्भस्यात्यन्तानुपलब्धि-प्रसङ्गात्। कादाचित्कत्वे वा कार्य्यजातस्य न कारणात्मत्वं, नित्यत्वानित्यत्वलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गस्य
भामती-व्याख्या
संशय— कणाद और गौतम के मतवादों के अनुरोध पर जगदुपादानत्व-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय न किया जाय ? अथवा निःसंकोच समन्वय किया जाय ?
पूर्वपक्ष— प्रपञ्चरूप कार्य अपने कारण से सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि अभेद में कार्य-कारणभाव ही उपपन्न नहीं होता एवं विद्यमान या सिद्ध पदार्थ के लिए 'कुरु' या 'करोमि'— इस प्रकार 'डुकृञ्' धातु का प्रयोग ही सम्भव नहीं होता, क्योंकि 'करोति' का अर्थ होता है— 'निष्पादयति' या 'असन्तं सन्तं विधत्ते', किन्तु जो कार्यकारणरूप में पहले से ही विद्यमान है, उसे अभूत या असत् नहीं कहा जा सकता कि जिसे सत् करने के लिए कर्त्ता पुरुष की प्रवृत्ति होती। कार्य की उत्पत्ति के लिए नहीं, अभिव्यक्ति करने के लिए कर्त्ता की प्रवृत्ति होती है— ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अभिव्यक्ति भी कारणरूप में सत् ही मानी जाती है, असत् नहीं। अभिव्यक्ति को यदि कारणरूपेण सत् नहीं माना जाता, तब अभिव्यङ्ग्यरूप कार्य को भी कारणरूपेण सत् मानना व्याहत हो जाता है, क्योंकि वही पदार्थ उसी समय सत् भी और असत् भी— यह युक्ति-संगत नहीं।
सांख्य-सम्मत कार्य पदार्थ ने क्या किसी जादूगर से कोई मणि या औषध प्राप्त कर ली है ? अथवा कोई मन्त्र सीख लिया है ? कि न कभी उत्पन्न होता है और न नष्ट, बराबर बना रहता है, न कभी व्यवहित होता है और न कभी दूर। फिर भी स्वस्थ एवं पटु इन्द्रियवाले उसी सांख्य पुरुष को यह कार्य कभी प्रत्यक्ष होता है और कभी परोक्ष। परोक्षरूप में भी वह (कार्य) कभी अनुमित होता है—
“असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात्।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्।।” (सा. का. ९)
वही कार्य उसी पुरुष को कभी आगम के द्वारा अधिगत होता है— “तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तगमात् सिद्धम्” (सां. का. ६)। 'यद्यपि मृत्तिका में घट, मणिक, मल्लिकादि सभी कार्य हैं, तथापि एक कार्य की उपलब्धि से व्यवहित होने के कारण कार्यान्तर की उपलब्धि नहीं होती'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि समस्त कार्य सदातन माने जाते हैं, अतः घट की उपलब्धि होगी ? अर्थात् घट की आश्रयीभूत मृत्तिका में घट से भिन्न पिण्ड, कपाल, शर्करा (कपालिका), चूर्ण और कणादि कार्य घट के व्यवधायक रहते हैं, अतः घट परोक्ष हो जाता है— ऐसी व्यवस्था जो की जाती है, वह उचित नहीं, क्योंकि समस्त कार्य अपने कारण के रूप में सदैव रहता है, व्यवधायक के सदैव रहने पर घट की कभी भी उपलब्धि नहीं होगी। यदि कार्य की सदैव कारणरूपेण अवस्थिति न मान कर कादाचित्क मानी जाती है, तब कार्य
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भामती
भेदकत्वात्। भेदाभेदयोश्च परस्परविरोधेनैकत्र सहासम्भव इत्युक्तम्। तस्मात् कारणात् कार्यमेकान्तत एव भिन्नम्। न च भेदे गवाश्ववत् कार्यकारणभावानुपपत्तिरिति साम्प्रतम्। अभेदेऽपि कारणरूपवत्तदनुपपत्तेरुक्तत्वात्। अत्यन्तभेदे च कुम्भकुम्भकारयोर्निमित्तनैमित्तिकभावस्य दर्शनात्। तस्मादन्यत्वाविशेषेऽपि समवायभेद एवोपादानोपादेयभावनियमहेतुः। यस्याभूत्वा भवतः समवायस्तदुपादेयं, यत्र च समवायस्तदुपादानम्। उपादानत्वं च कारणस्य कार्यादल्पपरिमाणस्य दृष्टं यथा तन्त्वादीनां पटाद्युपादानानां पटादिभ्यो न्यूनपरिमाणत्वम्। चिदात्मनस्तु परममहत उपादानान्नात्यन्ताल्पपरिमाणमुपादेयं भवितुमर्हति। तस्माद्यत्रेवमल्पतारतम्यं विश्राम्यति यतो न क्षोदीयः सम्भवति तज्जगतो मूलकारणं परमाणुः। क्षोदीयोऽन्तरानन्त्ये तु मेरुसर्षपयोस्तुल्यपरिमाणत्वप्रसङ्गोऽनन्तावयवत्वादुभयोः। तस्मात् परममहतो ब्रह्मण उपादानावभिन्नमुपादेयं जगत्कार्यमभिदधती श्रुतिः प्रतिष्ठितप्रामाण्यतर्कविरोधात् सहस्रसंवत्सरसत्रगतसंवत्सरश्रुतिवत् कथञ्चिज्जघन्यवृत्त्या व्याख्येयेत्यधिकं शङ्कमानं प्रति
भामती-व्याख्या
को कारणात्मक नहीं माना जा सकेगा, क्योंकि कारण में नित्यत्व और कार्य में अनित्यत्वादि विरुद्ध धर्म होने से कार्य और कारण का भेद सिद्ध हो जाता है। भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होने के कारण एकत्र रह नहीं सकते—यह कई बार कहा जा चुका है। फलतः कारण से कार्य एकान्ततः भिन्न सिद्ध होता है।
मृत्तिका से घटादि कार्य यदि अत्यन्त भिन्न है, तब वैसे ही उनमें कार्य-कारणभाव न बनेगा, जैसे गौ और अश्व का'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि अत्यन्त अभेद में भी कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति दिखाई जा चुकी है, अत्यन्त भेद में तो कुम्भ और कुम्भकार के समान निमित्त-नैमित्तिकभाव ही देखा जाता है। उपादानोपादेयभाव नहीं। यद्यपि गौ से अन्य अश्व गौ का उपादेय नहीं, तथापि मृत्तिका से अन्य घट मृत्तिका का उपादेय माना जाता है, क्योंकि मृत्तिका में घट का समवाय सम्बन्ध है, गौ में अश्व का नहीं। जिस "अभूत्वा भवतः" (असत् कार्यभूत घटादि का) समवाय मृत्तिकादि में होता है, उस घटादि कार्य को उपादेय और वह समवाय जिस मृत्तिकादि पदार्थ में होता है, उसे उपादान कारण कहा जाता है। कार्य की अपेक्षा अल्प परिमाणवाले कारण में उपादानकारणता देखी जाती है. जैसे—तन्त्वादिरूप उपादान कारणों का पटादिरूप कार्य की अपेक्षा अल्पपरिमाण है। चिदात्मा का परम महत् (विभु) परिमाण माना जाता है, घटादि कार्य की अपेक्षा उसका अल्प परिमाण नहीं, अतः स्वल्पपरिमाणता जिस पदार्थ में समाप्त हो जाती है, जिस की अपेक्षा और कोई वस्तु क्षुद्र (स्वल्प) नहीं रहती, ऐसा परमाणु पदार्थ ही जगत् का उपादान कारण होता है। यदि परमाणु में स्वल्प परिमाण की विश्रान्ति न मान कर अनन्त अवयवों तक अल्पता का क्रम माना जाता है, तब मेरु पर्वत और सरसों के एक दाने का समान परिमाण मानना होगा, क्योकि अनन्तावयवरूपता दोनों में समान है। फलतः अपरिच्छिन्न ब्रह्मरूप उपादान से परिच्छिन्न जगद्रूप उपादेय का अभेद बतानेवाली श्रुति प्रतिष्ठितप्रामाण्यक तर्क के द्वारा बाधित होकर वैसे ही गौणार्थकपरक हो जाती है, जैसे—'विश्वसृजामयनं सहस्र संवत्सरम्'—इस श्रुति में 'संवत्सर' शब्द गौणी वृत्ति से 'दिन' का वाचक है ["पञ्चपञ्चाशतस्त्रिवृतः संवत्सराः, पञ्चपञ्चाशतः पञ्चदशाः, पञ्चपञ्चाशतः सप्तदशाः, पञ्चपञ्चाशत एकविंशाः, विश्वसृजामयनं सहस्रसंवत्सरम्" (तै० ब्रा० ३।९।८ ) इस श्रुति ने विश्वसृजनामधारी ऋषियों के लिए सहस्रसंवत्सर-साध्य यज्ञ का जो विधान किया है, वहाँ 'संवत्सर' शब्द पर "सहस्रसंवत्सरं तदायुषामसम्भवान्मनुष्येषु" (जै० सू० ६।७।३१) इत्यादि सूत्रों के द्वारा विचार करते हुए महर्षि ने सात पक्ष प्रस्तुत किए हैं। आठवाँ पक्ष सिद्धान्तरूप में
कणादादितर्कस्यानादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५६५
वैदिकस्य दर्शनस्य प्रत्यासन्नत्वाद् गुरुतरतर्कबलोपेतत्वाद् वेदानुसारिभिश्च कैश्चि- च्छिष्टैः केनचिदंशेन परिगृहीतत्वात्प्रधानकारणवादं तावद् व्यपाश्रित्य यस्तर्कनिमित्त आक्षेपो वेदान्तवाक्येषूद्भावितः स परिहृतः । इदानीमण्वादिवादव्यपाश्रयेणापि कैश्चिन्मन्दमतिभिर्वेदान्तवाक्येषु पुनस्तर्कनिमित्त आक्षेप आशङ्क्यते इत्यतः प्रधानमल्ल- निबर्हणन्यायेनातिदिशति—एतेनेत्यादि। परिगृह्यन्त इति परिग्रहाः, न परिग्रहा अपरि- ग्रहाः, शिष्टानमपरिग्रहाः शिष्टापरिग्रहाः। एतेन प्रकृतेन प्रधानकारणवादनिरकरण- कारणेन शिष्टैर्मनुव्यासप्रभृतिभिः केनचिदंशेनापरिगृहीता येऽण्वादिकारणवादास्तेऽपि प्रतिषिद्धतया व्याख्याता निराकृता द्रष्टव्याः तुल्यत्वान्निराकरणकारणस्य, नात्र पुनरा- शङ्कितव्यं किंचिदस्ति। तुल्यमत्रापि परमगम्भीरस्य जगत्कारणस्य तर्कानवगाह्यत्वं, तर्कस्याप्रतिष्ठितत्वम्, अन्यथानुमानेऽप्यविमोक्षः, आगमविरोधश्चेत्येवंजातीयकं निराकरणकारणम् ॥ १२ ॥
भामती
सांख्यदूषणमतिदिशति ॐ एतेन इति ॐ सूत्रेण । अस्यार्थः—कारणात् कार्यस्य भेदं तदनन्यत्वमारम्भण- शब्दादिभ्य इत्यत्र निषेत्स्यामः । अविद्यासमारोपेण च कार्यस्य न्यूनाधिकभावमनन्यप्रयोजकत्वादुपेक्षि- ष्यामहे । तेन वैशेषिकाद्यभिमतस्य तर्कस्य शुष्कतयैवावस्थितेः । सूत्रमिदं सांख्यदूषणमतिदिशति । यत्र कथंचिद्वेदानुसारिणो मन्वादिभिः शिष्टैः परिगृहीतस्य सांख्यतर्कस्यैषा गतिस्तत्र परमाण्वादिवादस्यात्य- न्तवेदबाह्यस्य मन्वाद्युपेक्षितस्य च कैव कथेति । ॐ केनचिदंशेन इति ॐ । सृष्ट्यादयो हि व्युत्पाद्यास्ते च किञ्चित्सदसङ्गा पूर्वपक्षन्यायोचितमप्युदाहृत्य व्युत्पाद्यन्त इति केनचिदंशेनेत्युक्तम् । सुगममन्यत् ॥ १२ ॥
भामती-व्याख्या
वर्णित है—"अहानि वाऽभिसंख्यत्वात्" (जै० सू० ६।७।४०) । अर्थात् 'संवत्सर' शब्द गौणी वृत्ति के द्वारा 'दिन' का बोधक है, अतः एक हजार दिनों में सम्पन्न होनेवाले यज्ञ को सहस्र- संवत्सर क्रतु कहा गया है] ।
सिद्धान्त—कथित अत्यधिक शङ्का का निरास करने के लिए सूत्रकार ने सांख्यपक्षीय दूषणों के द्वारा ही वैशेषिक-पक्ष का निरास किया है—"एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः" । इस सूत्र का अर्थ यह है कि कारण से कार्य के भेद का निरास आगे किया जा रहा है—"तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः" (ब्र. सू. २।१।१४) । यह जो कहा था कि कार्य की अपेक्षा कारण का न्यून परिमाण होता है, वह नियम भी कार्य के अविद्यासमारोपितत्व- पक्ष में टूट जाता है, क्योंकि आरम्भवाद में भी अधिकपरिमाणवाली तूल-राशि से स्वल्प- परिमाण का तन्तु उत्पन्न होता देखा जाता है, विशेषतः विवर्तवाद में तो वैसा नियम सुरक्षित हो नहीं रहता, क्योंकि विशाल बिम्ब से क्षुद्र प्रतिबिम्ब और क्षुद्र बिम्ब से विशाल प्रतिबिम्ब अनुभव-सिद्ध है, अतः कार्य का परिमाण उपादान-प्रयुक्त न हो कर उपाधि-प्रयुक्त होता है । फलतः वैशेषिकाभिमत तर्क नितान्त शुष्क होने के कारण सांख्यपक्षोक्त दूषणों के द्वारा ही वैशेषिक पक्ष भी पूर्णतया दूषित हो जाता है । किसी-न-किसी प्रकार वेद का अनुसरण करनेवाले एवं मन्दप्रज्ञ शिष्ट व्यक्तियों के द्वारा गृहीत सांख्यीय तर्कों की जहाँ ऐसी दुर्गति होती है, वहाँ अत्यन्त वेद-बहिष्कृत तथा मन्वादि महर्षियों के द्वारा उपेक्षित वैशेषिक-सम्मत परमाणुवाद की बात ही क्या ? 'केनचिदंशेनापरिगृहीताः"—इस भाष्य के द्वारा यह ध्वनित होता है कि मनु, व्यासादि महर्षियों ने आंशिकरूप में परमाणुवाद का परिग्रह भी किया है, वह अंश कौन है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मन्वादि महर्षियों को सृष्टि-प्रक्रिया का
| ५६६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १३ |
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( ५ भोक्त्रापत्त्यधिकरणम् । सू० १३ )
भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत्स्याल्लोकवत् ॥ १३ ॥
अन्यथा पुनर्ब्रह्मकारणवादस्तर्कबलेनैवाक्षिप्यते । यद्यपि श्रुतिः प्रमाणं स्वविषये भवति, तथापि प्रमाणान्तरेण विषयापहारेऽन्यपरा भवितुमर्हति, यथा मन्त्रार्थवादौ । तर्कोऽपि स्वविषयादन्यत्राप्रतिष्ठितः स्यात् यथा धर्माधर्मयोः । किमतो यद्येवम् ? अत इदमयुक्तं यत्प्रमाणान्तरप्रसिद्धार्थबाधनं श्रुतेः । कथं पुनः प्रमाणान्तरप्रसिद्धोऽर्थः
भामती
स्यादेतत्—अतिगम्भीरजगत्कारणविषयत्वं तर्कस्य नास्ति, केवलमागमगम्यमेतदित्युक्तं, तत् कथं पुनस्तर्कनिमित्त आक्षेप इत्यत आह ॐ यद्यपि श्रुतिः प्रमाणम् इति ॐ । प्रवृत्ता हि श्रुतिरनपेक्षतया स्वतःप्रमाणत्वेन न प्रमाणान्तरमपेक्षते । प्रवर्तमाना पुनः स्फुटतरप्रतिष्ठितप्रामाण्यतर्कविरोधेन मुख्यार्थात् प्रच्याव्य जघन्यवृत्तित्तां नीयते, यथा मन्त्रार्थवादावित्यर्थः । अतिरोहितार्थं भाष्यम् । ॐ यथा त्वद्यत्वे इति ॐ । यद्यतीतानागतयोः सर्गयोरेष विभागो न भवेत् ततस्तदेवाद्यतनस्य विभागस्य बाधकं स्यात्, स्वप्नदर्शनस्येव जाग्रद्दर्शनं, न त्वेतदस्ति । अबाधिताद्यतनदर्शनेन तयोरपि तथात्वानुमानादित्यर्थः । इमां
भामती-व्याख्या
निरूपण करना था, अतः पूर्वपक्ष के रूप में कहीं-कहीं परमाणुवाद की चर्चा कर दी है । पूर्वपक्ष सत्य ही हो ऐसा कोई नियम नहीं, मिथ्या भी हो सकता है । [ किसी-किसी पुस्तक में “केनाप्यंशेनापरिगृहीताः”—ऐसा पाठान्तर उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ विस्पष्ट है ॥ १२ ॥
संशय—'यदि भोग्यादिप्रपञ्चो ब्रह्मणोऽभिन्नः स्यात्, तर्हि भोग्यस्य भोक्तृत्वप्रसङ्गः स्यात्'—इस तर्क के द्वारा अद्वैतवाद बाधित होता है ? अथवा नहीं ?
पूर्वपक्ष—जगत् की कारणता एक अत्यन्त गम्भीर विषय है, इसमें तर्क की गति नहीं, केवल आगम प्रमाण से अधिगम्य है, अतः तर्क के आधार पर ब्रह्मगत जगत्कारणता पर आक्षेप क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—“यद्यपि श्रुतिः प्रमाणं स्वविषये भवति” । आशय यह है कि यद्यपि अपने विषय में प्रवर्त्तमान श्रुति इतर प्रमाणों से निरपेक्ष होने के कारण स्वतःप्रमाण है, वह अपनी प्रमाणता के लिए प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं करती, तथापि स्फुटतरप्रामाण्यक प्रखर तर्क के द्वारा अपने मुख्य विषय में बाधित होकर श्रुति मुख्यार्थ को छोड़कर गौणार्थपरक वैसे ही हो जाती है, जैसे मन्त्र और अर्थवादादि । [ “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृह० उ० २।४।६), “ब्रह्मैवेदं सर्वम्” (मुं० २।२।११) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मरूप कारण का उसके कार्य प्रपञ्च से अभेद सिद्ध करती हैं, किन्तु ऐसा मानने पर भोक्ता चेतन और भोग्य पदार्थों का लोक-प्रसिद्ध भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि स्वाभिन्नाभिन्नत्व-नियम के अनुसार भोक्ता और भोग्य (शब्दादि प्रपञ्च) ये दोनों ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण परस्पर अभिन्न हो जायँगे । अतः उक्त अभेद-बोधक श्रुतियों का अभेदरूप मुख्यार्थ में तात्पर्य न मानकर ब्रह्मप्राशस्त्यरूप गौणार्थ में पर्यवसान मानना चाहिए ] । भोक्ता और भोग्य के लोक-प्रसिद्ध भेद का अपलाप कभी भी नहीं किया गया । “यथा तु अद्यत्वे भोक्तृ-भोग्ययोर्विभागो दृष्टस्तथातीतानागतयोः”—इस भाष्य का आशय यह है कि यदि अतीत और भावी सृष्टियों में ही भोक्ता और भोग्यादि का विभाग प्रसिद्ध न होता, तब वर्त्तमान विभाग को स्वप्न के समान बाधित और मिथ्या माना जा सकता था, किन्तु वैसा नहीं, अपि तु भोक्ता-भोग्य का भेद सत्य है एवं इसी के आधार पर अतीत और अनागत सर्गों में भेद सत्यत्व का अनुमान किया जा सकता है ।
| कार्यस्यकारणानन्यत्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५६७ |
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श्रुत्या बाध्यत इति ? अत्रोच्यते-- प्रसिद्धो ह्ययं भोक्तृभोग्यविभागो लोके भोक्ता चेतनः शारीरः, भोग्याः शब्दादयो विषया इति । यथा भोक्ता देवदत्तो भोज्य ओदन इति । तस्य च विभागस्याभावः प्रसज्येत, यदि भोक्ता भोग्यभावमापद्येत भोग्यं वा भोक्तृभावमापद्येत । तयोश्चेतरेतरभावापत्तिः परमकारणाद् ब्रह्मणोऽनन्यत्वात्प्रसज्येत । न चास्य प्रसिद्धस्य विभागस्य बाधं युक्तम् । यथा त्वद्यत्वे भोक्तृभोग्ययोर्विभागो दृष्टस्तथातीतानागतयोरपि कल्पयितव्यः । तस्मात्प्रसिद्धस्यास्य भोक्तृभोग्यविभागस्याभावप्रसङ्गादयुक्तमिदं ब्रह्मकारणतावधारणमिति चेत्कश्चिच्चोदयेत्तं प्रति ब्रूयात्—स्याल्लोकवदिति । उपपद्यत एवायमस्मत्पक्षेऽपि विभागः एवं लोके दृष्टत्वात् । तथा हि—समुद्रादुदकात्मनोऽनन्यत्वेऽपि तद्विकाराणां फेनवीचीतरङ्गबुद्बुदादीनामितरेतरविभाग इतरेतरसंश्लेषादिलक्षणश्च व्यवहार उपलभ्यते । नच समुद्रादुदकात्मनोऽनन्यत्वेऽपि तद्विकाराणां फेनतरङ्गादीनामितरेतरभावापत्तिर्भवति । न च तेषामितरेतरभावानापत्तावपि समुद्रात्मनोऽन्यत्वं भवति । एवमिहापि—न च भोक्तृभोग्ययोरितरेतरभावापत्तिः, नच परस्माद् ब्रह्मणोऽन्यत्वं भविष्यति । यद्यपि भोक्ता न ब्रह्मणो विकारः, 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' (तै० २।६) इति स्रष्टुरेवाविकृतस्य कार्यानुप्रवेशेन भोक्तृत्वश्रवणात्, तथापि कार्यमनुप्रविष्टस्यास्त्युपाधिनिमित्तो विभाग आकाशस्येव घटाद्युपाधिनिमित्त इत्यतः परमकारणाद् ब्रह्मणोऽनन्यत्वेऽप्युपपद्यते भोक्तृभोग्यलक्षणो विभागः समुद्रतरङ्गादिन्यायेनेत्युक्तम् । १३ ॥
( ६ आरम्भणाधिकरणम् । सू० १४-२० )
तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ १४ ॥
अभ्युपगम्य चेमं व्यावहारिकं भोक्तृभोग्यलक्षणं विभागं स्याल्लोकवदिति
भामती
शङ्कामापाततोऽविचारितलोकसिद्धदृष्टान्तोपदर्शनमात्रेण निराकरोति सूत्रकारः ॐ स्याल्लोकवत् ॐ ॥१३॥
परिहाररहस्यमाह—तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ।
पूर्वस्मत्वविरोधादस्य विशेषाभिधानोपक्रमस्य विभागमाह ॐ अभ्युपगम्य चेमम् इति ॐ ।
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त— उक्त शङ्का का निराकरण सूत्रकार ने लोक-प्रसिद्ध भेद को आपाततः मानते हुए किया है—"स्याल्लोकवत्" । अर्थात् लोक में फेन और तरङ्गादि का अपने कारणीभूत समुद्र से अभेद रहने पर भी परस्पर अभेद नहीं, भेद ही माना जाता है, वैसे ही भोक्ता और भोग्यादि का अपने कारणीभूत ब्रह्म से अभेद रहने पर भी परस्पर भेद-व्यवहार अक्षुण्ण रहेगा ॥ १३ ॥
संशय— पूर्वाधिकरण में जो ब्रह्म से कार्य प्रपञ्च के भेद और अभेद—दोनों सिद्ध किए गए हैं, दोनों पारमार्थिक हैं ? अथवा व्यावहारिक ?
पूर्वपक्ष— 'कारणात् कार्यस्य भेदाभेदौ पारमार्थिकौ, अबाधितत्वाद्, ब्रह्मवत्' अथवा 'अविरुद्धौ, लोकप्रसिद्धत्वात्, समुद्रात् तरङ्गादिभेदाभेदवत्'—ऐसे अनुमानों के द्वारा उक्त भेद और अभेद पारमार्थिक सिद्ध होते हैं ।
सिद्धान्त— यद्यपि अप्रतिष्ठितत्व दोष के कारण अनुमानादि तर्कों का निरा-
५६८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ २ पा. १ सू. १४
परिहारोऽभिहितः, नत्वयं विभागः परमार्थतोऽस्ति, यस्मात्तयोः कार्यकारणयोरनन्यत्वमवगम्यते। कार्यमाकाशादिकं बहुप्रपञ्चं जगत्, कारणं परं ब्रह्म, तस्मात्कारणात्परमार्थतोऽनन्यत्वं व्यतिरेकेणाभावः कार्यस्यावगम्यते। कुतः? आरम्भणशब्दादिभ्यः। आरम्भणशब्दस्तावदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय दृष्टान्तापेक्षायामुच्यते—'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (छा० ६।१।१) इति। एतदुक्तं भवति—एकेन मृत्पिण्डेन परमार्थतो मृदात्मना विज्ञानेन सर्वं मृन्मयं घटशरावोदञ्चनादिकं मृदात्मकत्वाविशेषाद्विज्ञातं भवेत्। यतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्—वाचैव केवलमस्तीत्यारभ्यते—विकारो घटः
भामती
स्यादेतत्—यदि कारणात् परमार्थभूतादनन्यत्वमाकाशादेः प्रपञ्चस्य कार्यस्य, कुतस्तर्हि न वैशेषिकाद्युक्तदोषप्रपञ्चावतार इत्यत आह ॐ व्यतिरेकेण।भावः कार्यस्यावगम्यते इति ॐ। न खल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु भेदं व्यासेधामः, ततश्च नाभेदाश्रयदोषप्रसङ्गः। किन्त्वभेदं व्यासेधद्भिर्वैशेषिकादिभिरस्मासु साहायकमेवाचरितं भवति। भेदनिषेधहेतुं व्याचष्टे ॐ आरम्भणशब्दस्तावद् इति ॐ। एवं हि ब्रह्मविज्ञानेन सर्वं जगत्तत्त्वतो ज्ञायेत, यदि ब्रह्मैव तत्त्वं जगतो भवेत्। यथा रज्ज्वां ज्ञातायां भुजङ्गतत्त्वं ज्ञातं भवति, सा हि तस्य तत्त्वम्। तत्त्वज्ञानं च ज्ञानमतोऽन्यन्मिथ्याज्ञानमज्ञानमेव। अत्रैव वैदिको दृष्टान्तः ॐ यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन इति ॐ। स्यादेतत्—मृदि ज्ञातायां कथं मृन्मयं घटादि ज्ञातं भवति, नहि तन्मृदात्मकमित्युपपादितमधस्तात्। तस्मात्ततो भिन्नं न चान्यस्मिन् विज्ञातेऽन्यद्विज्ञातं भवतीत्यत आह श्रुतिः ॐ वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् ॐ। वाचया केवलमारभ्यते विकारजातं, न तु तत्त्वतोऽस्ति, यतो नामधेयमात्रमेतद्, यथा पुरुषस्य चैतन्यमिति राहोः शिर इति विकल्पमात्रम्। यथा-
भामती-व्याख्या
करण पहले ही किया जा चुका है, तथापि इस अधिकरण की विशेषता यह है—'अभ्युपगम्य चेमं व्यावहारिकं भोक्तृभोग्यलक्षणं विभागं लोकवदिति परिहारोऽभिहितः, न त्वयं विभागः परमार्थतोऽस्ति'। अर्थात् ब्रह्मरूप कारण से आकाशादि कार्य का अनन्यत्व (भेद नहीं) ही है। यदि परमार्थभूत ब्रह्मरूप कारण से आकाशादि प्रपञ्च का अभेद है, तब वैशेषिकादि के द्वारा उद्भावित भोग्य में भोक्तृत्वापत्ति क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—''व्यतिरेकेणाभावः कार्यस्यावगम्यते''। आशय यह है कि हम 'अनन्यत्व' शब्द के द्वारा 'अभेद' का अभिधान नहीं करते किन्तु भेद का प्रतिषेध करते हैं, वैशेषिकोक्त अभेदपक्षीय दोष प्रसक्त नहीं होते, प्रत्युत अभेद का निषेध करके वैशेषिकों ने हमारी सहायता ही की है। भेद-निषेध के हेतु की व्याख्या की जाती है—''आरम्भणशब्दस्तावदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय''। ब्रह्म के जानलेने मात्र से सभी जगत् तभी जाना जा सकता है, जब कि ब्रह्म ही जगत् का मूल तत्त्व हो। रज्जु के ज्ञान से उसमें आरोपित सर्प का ज्ञान इसी लिए हो जाता है कि रज्जु ही सर्प का मूल तत्त्व (अधिष्ठान) है। तत्त्व-ज्ञान ही प्रमा ज्ञान है, उससे भिन्न सर्पादि का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या अज्ञान होता है, इसी भाव का स्पष्टीकरण एक वैदिक दृष्टान्त के द्वारा किया जाता है—''यथा सोम्य ! एकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्''। यहाँ यह शङ्का होती है कि मृत्तिका के ज्ञान से घट, शरावादि का ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि घटादि मृत्तिकात्मक नहीं, क्योंकि यह शिष्टापरिग्रहाधिकरण के पूर्वपक्ष में कहा जा चुका है कारण से कार्य भिन्न होता है। अन्य पदार्थ के ज्ञान से अन्य पदार्थ का ज्ञान क्योंकर होगा? इस शङ्का का निराकरण करने के लिए श्रुति कहती है—''वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्''। आशय यह है कि आकाशादि प्रपञ्च केवल शब्द के द्वारा व्यवहृतमात्र होता है, तत्त्वतः उसकी
ब्रह्मैकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् ५६९
शराव उदञ्चनं चेति । नतु वस्तुवृत्तेन विकारो नाम कश्चिदस्ति । नामधेयमात्रं ह्येतदनृतं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति । एष ब्रह्मणो दृष्टान्त आम्नातः । तत्र श्रुताद्वाचार- म्भणशब्दाद्दार्ष्टान्तिकेऽपि ब्रह्मव्यतिरेकेण कार्यजातस्याभाव इति गम्यते । पुनश्च तेजोऽबन्नानां ब्रह्मकार्यतामुक्त्वा तेजोऽबन्नकार्याणां तेजोऽबन्नव्यतिरेकेणाभावं ब्रवीति- 'अपागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्' ( छा० ६।४।१ ) इत्यादिना । आरम्भणशब्दादिभ्य इत्यादि शब्दाद् 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि' ( छा० ६।८।७ ), 'इदं सर्वं यदयमात्मा' ( बृ० २।४।६ ), 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' ( मु० २।२।११ ), 'आत्मैवेदं सर्वम्' ( छा० ७।२५।२ ), 'नेह नानास्ति किंचन' (बृ० ४।४।१९ ) इत्येवमाद्यप्यात्मैकत्वप्रतिपादनपरं वचनजातमुदाहर्तव्यम् । न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं संपद्यते । तस्माद्यथा घटकरकाद्याकाशानां महा- काशानन्यत्वं, यथा च मृगतृष्णिकोदकादीनामूषरादिभ्योऽनन्यत्वं, दृष्टनष्टस्वरू-
भामती
तुविकल्पविदः—'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः' इति । तथा चावस्तुतयाऽनृतं विकारजातं मृत्तिकेत्येव सत्यम् । तस्माद् घटशरावोदञ्चनादीनां तत्त्वं मृदेव, तेन मृदि ज्ञातायां तेषां सर्वेषामेव तत्त्वं ज्ञातं भवति । तदिदमुक्तं ॐ न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं सम्पद्यते इति ॐ । निदर्शनान्तरद्वयं दर्शयन्नुपसंहरति ॐ तस्माद्यथा घटकरकाद्याकाशानाम् इति ॐ । ये हि दृष्टनष्टस्वरूपा न ते वस्तुसन्तो यथा मृगतृष्णिकोदकादयः, तथा च सर्वं विकारजातं, तस्मादवस्तुसत् । तथाहि—यदस्ति तद्वस्त्येव, यथा चिदात्मा, नह्यसौ कदाचित् क्वचित् कथञ्चिन्नास्ति, किन्तु सर्वदा सर्वत्र सर्वथास्त्येव, न नास्ति । न चैवं विकारजातं, तस्य कदाचित् कथञ्चित् कुत्रचिदवस्थानात् । तथाहि—सत्स्वभावं
भामती-व्याख्या
कोई पृथक् सत्ता नहीं, क्योंकि वह वैसे ही नामधेयमात्र है, जैसे कि 'पुरुषस्य चैतन्यम्', 'राहोः शिरः' ऐसा विकल्पमात्र । विकल्प की परिभाषा योगसूत्रकार ने की है— 'शब्द- ज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः” ( यो. सू. १।९ ) । जिस पदार्थ की कोई वास्तविक सत्ता नहीं होती, केवल शब्द के द्वारा जो एक मानसिक वृत्तिमात्र हो जाती है, उसको विकल्प- वृत्ति कहते हैं, जैसे कि पुरुष से चैतन्य और राहु से शिर कोई भिन्न पदार्थ नहीं, फिर भी 'पुरुषस्य चैतन्यम्', 'राहोः शिरः'— ऐसा भेद-व्यवहार हो जाता है, वैसे ही घटादि विकार- प्रपञ्च अवस्तु होने के कारण अनृत ( मिथ्या ) है, मृत्तिका ही एक सत्य पदार्थ है । फलतः घट, शराव ( सकोरा ) और उदञ्चन ( मिट्टी का डोल जिसके द्वारा खेत सींचने के लिए कुईं से पानी निकालते हैं ) आदि कार्य-वर्ग का तत्त्व मृत्तिका ही है, अतः मृत्तिका के ज्ञात हो जाने पर सभी विकार-वर्ग का ज्ञात हो जाना स्वाभाविक है । भाष्यकार ने व्यतिरेक- मुखेन यही कहा है—”न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं सम्पद्यते ।” अन्य दो दृष्टान्तों को दिखाते हुए उपसंहार कर रहे हैं—”तस्माद् यथा घटकरकाद्याकाशानां महाकाशानन्य- त्वम्” । अर्थात् जैसे घटाकाश, करकाकाशादि महाकाश से भिन्न नहीं होते अथवा जो पदार्थ दिखते ही नष्ट हो जाएँ—ऐसे मृगतृष्णिका-जलादि वस्तु-सत् नहीं होते, वैसे ही समस्त विकार-समूह वस्तु-सत् नहीं । उसके विपरीत जो स्वयं सत् है और दृष्ट-नष्ट नहीं होता, वह परमार्थ सत् होता है, जैसे— चिदात्मा, क्योंकि यह कभी भी कहीं भी और किसी प्रकार भी असत् नहीं, अपितु सर्वदा सर्वत्र और सर्वथा सत् ही है, असत् नहीं । किन्तु विकार-वर्ग ऐसा नहीं, क्योंकि वह कभी भी कहीं पर भी और किसी प्रकार भी अवस्थित नहीं । यदि विकार-समूह सत्स्वभाववाला है, तब कदाचित् असत् क्यों ? यदि विकार जगत् असत्स्वरूप
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| ५७० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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पत्त्वात्स्वरूपेणानूपाख्यत्वात्, एवमस्य भोग्यभोक्त्रादिप्रपञ्चजातस्य ब्रह्मव्य-
भामती
चेद्विकारजातं कथं कदाचिदसत् ? सदसतोरेकत्वविरोधात् । नहि रूपं कदाचित् क्वचित् कथंचिद्वा गन्धो भवति । अथ तस्य सदसत्त्वे धर्मो, ते च स्वकारणाधीनजन्मतया कदाचिदेव भवतः, तत्तर्हि विकारजातं दण्डायमानं सदातनमिति न विकारः कस्यचित् । अथासत्त्वसमये तन्नास्ति, कस्य तर्हि धर्मोऽसत्त्वम् ? नहि धर्मिण्यप्रत्युत्पन्ने तद्धर्मोऽसत्त्वं प्रत्युत्पन्नमुपपद्यते । अथास्य न धर्मः किन्त्वर्थान्तरमसत्त्वं, किमायातं भावस्य ? नहि घटे जाते पटस्य किञ्चिद्भवति । असत्त्वं भावविरोधीति चेद्, न; अकिञ्चित्करस्य तत्त्वानुपपत्तेः । किञ्चित्करत्वे वा तत्राप्यसत्त्वे तदनुयोगसम्भवात् । अथास्यासत्त्वं नाम किञ्चिन्न जायते किन्तु स एव न भवति । यथाहूः—
“न तस्य किञ्चिद्भवति न भवत्येव केवलम् ।” इति ।
अथैष प्रसज्यप्रतिषेधो निरूच्यतां किं तत्स्वभावो भाव उत भावस्वभावः स इति । तत्र पूर्वस्मिन् कल्पे भावानां तत्स्वभावतया तुच्छतया जगच्छून्यं प्रसज्येत । तथा च भावानुभवाभावः । उत्तरस्मिंस्तु सर्वभावनित्यतया नाभावव्यवहारः स्यात् । कल्पनामात्रनिमित्तत्वेऽपि निषेधस्य भावनित्यतापत्तिस्तदवस्थैव । तस्माद्द्भिन्नमस्ति कारणाद्विकारजातं न वस्तुसत् , अतो विकारजातमनिर्वचनीयमनृतम् ।
भामती-व्याख्या
है, तब कदाचित् सत् क्यों ? सत् और असत् की एकरूपता सम्भव नहीं, क्योंकि रूप पदार्थ कभी भी कहीं भी और किसी प्रकार भी गन्ध पदार्थ नहीं होता । विकार-प्रपञ्च के सत्त्व और असत्त्व धर्म हैं और वे अपनी सामग्री के द्वारा कदाचित् उत्पन्न किए जाते हैं, तब विकार-प्रपञ्चरूप धर्मी दण्डायमान सदातन सिद्ध हो जाने के कारण वह किसी का विकार क्यों होगा ? यदि असत्त्वरूप धर्म के समय प्रपञ्च नहीं, तब असत्त्व किस का धर्म होगा ? क्योंकि धर्मी के विद्यमान न होने पर 'असत्त्व' उसका धर्म नहीं हो सकता । यदि असत्त्व प्रपंच का धर्म नहीं, अपितु उससे भिन्न ही है, तब प्रपञ्चरूप धर्मी की भावरूपता पर उसका क्या प्रभाव ? क्योंकि घट की उत्पत्ति का पट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यदि कहा जाय कि प्रपञ्चगत असत्त्व प्रपञ्च के भाव ( सत्त्व ) का विरोधी है, अतः असत्त्व के समय प्रपंच की सत्ता न रहने से उसकी सदातनत्वापत्ति क्यों होगी ? प्रपंचगत असत्त्व भाव का विरोधी क्या बिना किसी विरुद्ध धर्म को जन्म देकर ही है ? अथवा विरुद्ध धर्म ( भावासत्त्व ) का उत्पादन करके ? विरुद्ध धर्मोत्पादन के बिना विरोधी नहीं हो सकता और यदि भावासत्त्वरूप धर्म का उत्पादन करता है, तब उस उत्पद्यमान असत्त्व के विषय में भी ये ही विकल्प किए जा सकते हैं । यदि कहा जाय कि विरोधिरूप असत्त्व से भाव का असत्त्व उत्पन्न नहीं होता अपितु भाव ही नहीं रहता, जैसा कि श्री धर्मकीर्ति ने कहा है— "न तस्य किंचिद् भवति न भवत्येव केवलम्" ( प्र. वा. स्वार्था. २८१ ) । तब 'भावो न भवति'— यहाँ प्रसज्यप्रतिषेध (अभाव) का प्रतिपादक नकार है, जैसा कि श्रीधर्मकीर्ति ने कहा है— "न भवतीति च प्रसज्यप्रतिषेध एव न पर्युदासः" (प्र० वा० स्वो० पृ० ९८) अतः उक्त वाक्य के दो अन्वयबोध हो सकते हैं— (१) 'भावोऽभावः', (२) अभावो भावः' । यदि भावपदार्थों को अभावरूप माना जाता है, तब समस्त आकाशादि जगत् अभावरूप हो जाने से तुच्छ (शून्य) हो जाता है फिर भावपदार्थ का अनुभव ही नहीं होना चाहिए । उत्तर (द्वितीय) कल्प के अनुसार अभाव भी जब भावरूप हो जाता है, तब अभाव-व्यवहार क्योंकर होगा ? 'भावो न'—यहाँ पर यदि भाव का निषेध काल्पनिकमात्र माना जाता है, तब भावपदार्थ में नित्यतापत्ति पूर्ववत् बनी रहती है । फलतः विकार-प्रपंच को ब्रह्मरूप कारण से भिन्न
ब्रह्मकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७१
भामती तदनेन प्रमाणेन सिद्धमनृतत्वं विकारजातस्य कारणस्य निर्वाच्यतया सत्त्वं, मृत्तिकेत्येव सत्यमित्यादिना प्रबन्धेन दृष्टान्ततयाऽनुवदति श्रुतिः । "यत्र लौकिकपरीक्षकाणां बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः" इति चाक्षपाद-सूत्रं प्रमाणसिद्धो दृष्टान्त इत्येतत्परं, न पुनर्लोकसिद्धत्वमत्र विवक्षितम्, अन्यथा तेषां परमाण्वादिनं दृष्टान्तः स्यात् । नहि परमाण्वादिनैसर्गिकवैनयिकबुद्धगतिशयरहितानां लौकिकानां सिद्ध इति । सम्प्र-
भामती-व्याख्या मानना होगा किन्तु वस्तु सत् नहीं । सत् और असत् से भिन्न विकार-प्रपंच को अनिर्वचनीय और अनृत माना जाता है । [ श्री धर्मकीर्ति ने 'वर्णानुपूर्वी वर्णों से भिन्न है ? अथवा अभिन्न' ? इस विषय में जो शैली उद्भावित की है, सम्भवतः वाचस्पति मिश्र ने वही शैली यहाँ अपनाई है । धर्मकीर्ति के श्लोक इस प्रकार हैं—
आनुपूर्व्याश्च वर्णेष्यो भेदः स्फोटेन चिन्तितः ॥ कल्पनारोपिता सा स्यात् कथं वाऽपुरुषाश्रया । सत्तामात्रानुबन्धित्वान्नाशस्यानित्यता ध्वनेः ॥ अग्नेरर्थान्ंतारोत्पत्ती भवेत् काष्ठस्य दर्शनम् । अविनाशात् , स एवास्य विनाश इति चेत् कथम् ॥ अन्योऽन्यस्य विनाशोऽस्तु काष्ठं कस्मान्न दृश्यते । तत्परिग्रहवृत्तश्चेन्न तेनानावरणं यतः ॥ विनाशस्य विनाशित्वं स्यादुत्पत्तैस्ततः पुनः । काष्ठस्य दर्शनं हन्तृघाते चैत्रापुनर्भवः ॥ यथाऽत्राप्येवमिति चेद् हन्तुर्नामरणत्वतः । अनन्यत्वे विनाशस्य स्यान्नाशः काष्ठमेव तु ॥ तस्य सत्त्वादहेतुत्वं नातोऽन्या विद्यते गतिः । अहेतुत्वेऽपि नाशस्य नित्यत्वाद्भावनाशयोः ॥ सहभावप्रसङ्गश्चेदसतो नित्यता कुतः । असत्त्वेऽभावनाशित्वप्रसङ्गोऽपि न युज्यते ॥ यस्माद्भावस्य नाशेन न विनाशनमिष्यते । नश्यन् भावोऽवरापेक्ष इति तज्ज्ञापनाय सा ॥ अवस्थाऽहेतुरुक्तास्या भेदमारोप्य चेतसा । स्वतोऽपि भावेऽभावस्य विकल्पश्चेदयं समः ॥ न तस्य किञ्चिद्भवति न भवत्येव केवलम् । भावे ह्यंष विकल्पः स्याद्विधेर्वस्त्वनुरोधतः ॥ (प्र. वा. स्वो. पृ. ९४) ] ।
कथित प्रमाण के द्वारा विकार-जगत् में जो अनृतत्व और ब्रह्मरूप कारण में निर्वाच्यता-प्रयुक्त सत्त्व सिद्ध होता है, उसी का अनुवाद श्रुति ने "मृत्तिकेत्येव सत्यम्"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा दृष्टान्त के रूप में किया है । यद्यपि "यत्र लौकिकपरीक्षकाणां बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः" (न्या. सू. १।१।२५) इस सूत्र के द्वारा सूत्रकार ने लोक-प्रसिद्ध पदार्थ को ही दृष्टान्त माना है, किन्तु कथित कार्यगत मिथ्यात्व और कारणगत सत्यत्व अनुमान-गम्य हैं, लोक-प्रसिद्ध नहीं । तथापि लोक-प्रसिद्ध का अर्थ है—प्रमाण-सिद्ध । लोक-सिद्ध विवक्षित नहीं, अन्यथा परमाण्वादि अलौकिक पदार्थों को दृष्टान्त नहीं बनाया जा सकेगा, क्योंकि परमाण्वादि बुद्धिगत नैसर्गिक (अविवेचित प्रमाण-सुलभ) और वैनयिक (विवेचित प्रमाण-
५७२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. २ पा १ सू. १४]
तिरेकेणाभाव इति द्रष्टव्यम् । नन्वनेकात्मकं ब्रह्म, यथा वृक्षोऽनेकशाख एवमनेक- शक्तिप्रवृत्तियुक्तं ब्रह्म । अत एकत्वं नानात्वं चोभयमपि सत्यमेव । यथा वृक्ष इत्ये- कत्वं, शाखा इति नानात्वम् । यथा च समुद्रात्मनैकत्वं, फेनतरङ्गाद्यात्मना नानात्वम् । यथा च मृदात्मनैकत्वं, घटशरावाद्यात्मना नानात्वम् । तत्रैकत्वांशेन ज्ञानान्मोक्ष- व्यवहारः सेत्स्यति, नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयौ लौकिकवैदिकव्यवहारौ सेत्स्यत इति । एवं च मृदादिदृष्टान्ता अनुरूपा भविष्यन्तीति । नैवं स्यात्, 'मृत्ति-
भामती
स्थ्यनेकान्तवादिनमुत्थापयति ॐ नन्वनेकात्मकम् इति ॐ । अनेकाभिः शक्तिभिर्याः प्रवृत्तयो नाना- कार्यसृष्टयस्तद्युक्तं ब्रह्मैकं नाना चेति । किमतो यद्येवमित्यत आह ॐ तत्रैकत्वांशेन इति ॐ । यदि पुनरेक- त्वमेव वस्तुसद्भूवेत् ततो नानात्वाभावाद्धैदिकः कर्मकाण्डाश्रयो लौकिकश्च व्यवहारः समस्त एवोच्छि- द्येत । ब्रह्मगोचराश्च श्रवणमननादयः सर्वे दत्तजलाञ्जलयः प्रसज्येरन् । एवं चानेकात्मकत्वे ब्रह्मणो मृदादिदृष्टान्ता अनुरूपा भविष्यन्तीति । तमिममनेकान्तवादं दूषयति ॐ नैवं स्याद् इति ॐ । इदं तावदत्र वक्तव्यम्— मृदात्मनैकत्वं घटशरावाद्यात्मना नानात्वमिति वदतः कार्यकारणयोः परस्परं किमभे- दोऽभिमतः, आहो भेदः, उत भेदाभेदाविति । तत्राभेद एकान्तिके मृदात्मनेति च घटशरावाद्यात्मनेति
भामती-व्याख्या
जङ् ) उत्कर्ष से रहित लौकिक व्यक्तियों की दृष्टि में प्रसिद्ध नहीं । [ उक्त सौत्र लक्षण का स्वरूप निखारते हुए वार्तिककार ने कहा है—"बुद्धिसाम्यविषयोऽर्थो दृष्टान्त इति सूत्रार्थः । एवं चाकाशव्यवरोधः । यदि पुनरेवमेवावधार्येत लौकिकानां परीक्षकाणां च यो विषयः, स दृष्टान्त इति अलौकिकार्थो न दृष्टान्तः स्यादाकाशादि" (न्या० वा० पृ० ४१८) । श्री वाच- स्पति मिश्र ने ही इसके अवतरण में कहा है—'अत्र वार्तिककारो लौकिकपरीक्षकस्वरूप- मविवक्षितमिति मन्वान आह—बुद्धिसाम्येति" । इसी सूत्र के भाष्य में भाष्यकार ने 'लौकिक' और 'परीक्षक' शब्दों का अर्थ किया है—"लोकसामान्यमनतीताः लौकिकाः, नैसर्गिकं बुद्धयतिशयम्प्राप्ताः तद्विपरीताः परीक्षकाः—तर्केण प्रमाणैरर्थं परीक्षितुमर्हन्तीति" (न्या० भा० पृ० ४९७) । बुद्धि में दो प्रकार का उत्कर्ष होता है—नैसर्गिक और वैनेयिक । इनकी व्याख्या परिशुद्धिकार ने की है—"क्षीरनीरवद्विवेचितानि सांव्यवहारिकाणि प्रमा- णानि निसर्गः, तद्भवो नैसर्गिकः । खलितैलवत् विवेचितानि दुर्निरूपार्थगोचराणि प्रमाणानि विनयः, स एव वैनेयिकः" (ता० परि० पृ० ४१९) ।]
अनेकान्तवादी (भेदाभेदवादी) की ओर से शङ्का प्रस्तुत की जाती है—"नन्वनेका- त्मकं ब्रह्म" । अनेक शक्तियों के द्वारा जो अनेक कार्य-सर्जनरूप विविध प्रवृत्तियाँ हैं, उनसे युक्त ब्रह्म एक ही है । ऐसा मानने से क्या लाभ ? इस प्रश्न का उत्तर है—"तत्रैकत्वांशेन ज्ञानान्मोक्षव्यवहारः सेत्स्यति नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयः" । यदि ब्रह्म में एकत्व ही वस्तुसत् माना जाता है, तब नानात्व न होने के कारण वैदिक कर्मकाण्ड-प्रतिपादित व्यवहार एवं लौकिक भेद-व्यवहार अत्यन्त उच्छिन्न हो जाता है, ब्रह्मविषयक श्रवण, मननादि साधनों को तिलाञ्जलि देनी होगी । ब्रह्म को अनेकात्मक मानने पर मृदादि दृष्टान्त अनुरूप हो जाते हैं।
उक्त अनेकान्तवाद का निरास करते हैं—"नैवं स्यात्" । जो वादी यह कहता है कि मृदात्मना एकत्व और घटशरावादिरूपेण नानात्व होता है। उस वादी से पूछा जाता है कि कार्य और कारण का क्या (१) अभेद विवक्षित है ? या (२) भेद ? अथवा (३) भेदाभेद ? अत्यन्ताभेद-पक्ष में 'मृदात्मना घटाद्यात्मना'—इस प्रकार का शब्द-विन्यास और व्यवस्था-
ब्रह्मैकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७३
केत्येव सत्यम्' इति प्रकृतिमात्रस्य दृष्टान्ते सत्यत्वावधारणात्, वाचारम्भणशब्देन च विकारजातस्यानृतत्वाभिधानाद्, दार्ष्टान्तिकेऽपि 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यम्' इति च परमकारणस्यैवैकस्य सत्यत्वावधारणात्, 'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' इति च शारीरस्य ब्रह्मभावोपदेशात् । स्वयं प्रसिद्धं ह्येतच्छारीरस्य ब्रह्मात्मत्वमुपदिश्यते, न यत्नान्तरप्रसाध्यम् । अतश्चेदं शास्त्रीयं ब्रह्मात्मत्वमवगम्यमानं स्वाभाविकस्य शारीरात्मत्वस्य बाधकं संपद्यते, रज्ज्वादिबुद्धय इव सर्पादिबुद्धीनाम् । बाधिते च शारीरात्मत्वे तदाश्रयः समस्तः स्वाभाविको व्यवहारो बाधितो भवति, यत्प्रसिद्धये नानात्त्वांशोऽपरो ब्रह्मणः कल्प्येत । दर्शयति च—'यत्र
भामती
चोल्लेखद्वयं नियमश्च नोपपद्यते । भेदे चोल्लेखद्वयनियमावुपपन्नौ, आत्मनेति त्वसमञ्जसम् । नह्यन्यस्यान्य आत्मा भवति । न चानेकान्तवादः । भेदाभेदकल्पे तूल्लेखद्वयं भवेदपि । नियमस्त्वयुक्तो नहि धर्मिणोः कार्यकारणयोः सङ्करे तद्धर्मैकत्वनानात्वे न सङ्कीर्येते इति सम्भवति । ततश्च मृदात्मनेकत्वं यावद्ब्रूवीत तावद् घटशरावाद्यात्मनापि स्यात्, एवं घटशरावाद्यात्मना नानात्वं यावद्ब्रूवीत तावन्मृदात्मना नानात्वं भवेत् । सोऽयं नियमः कार्यकारणयोरेकान्तिकं भेदमपकल्पयति, अनिर्वचनीयतां वा कार्यस्य । पराक्रान्तं चास्माभिः प्रथमाध्याये तदास्तां तावत् । तदेतद्युक्तिनिराकृतमनुवदन्तीं श्रुतिमुदाहरति ॐ मृत्तिकेत्येव सत्यम् इति ॐ । स्यादेतत्—न ब्रह्मणो जीवभावः काल्पनिकः, किन्तु भाविकः, अंशो हि सः, तस्य कर्मसहितेन ज्ञानेन ब्रह्मभाव आधीयत इत्यत आह ॐ स्वयं प्रसिद्धं हि इति ॐ । स्वाभाविकस्यानादेरिति । यदुक्तं नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयो लौकिकश्च व्यवहारः सेत्स्यतीति तत्राह ॐ बाधिते च इति ॐ । यावदबाधं हि सर्वोऽयं व्यवहारः स्वप्नावस्थायामिव तदुपदर्शितपदार्थजातव्यवहारः । स च यथा जाग्रद-
भामती-व्याख्या
नियम—ये दोनों अनुपपन्न हो जाते हैं और 'आत्मनः' ऐसा कहना भी असमञ्जस हो जाता है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्य का आत्मा (स्वरूप) नहीं होता। अनेकान्तवाद (भेदा-भेदवाद) भी संगत नहीं, क्योंकि भेदाभेद-कल्प में उक्त द्विविध शब्द-विन्यास तो बन जाता है किन्तु उक्त कार्यकारणभाव का नियम युक्त नहीं होता, क्योंकि कार्य और कारणरूप धर्मों का सांकर्य सम्भव नहीं। फलतः जब तक मृदात्मना एकत्व रहता है, तब तक घटादि-रूप से भी एकत्व रहेगा। इसी प्रकार जब तक घटादिरूप से नानात्व रहता है, तब तक मृद्रूप से भी नानात्व ही रहेगा। अतः यह कार्य-कारणभाव का नियम या तो कार्य और कारण का ऐकान्तिक भेद सिद्ध करता है अथवा कार्य-वर्ग का अनिर्वचनीयत्व । इस विषय का विशेष विचार प्रथमाध्याय में (विगत पृ० १३० पर) किया जा चुका है, यहाँ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं। युक्ति के द्वारा जो अनेकान्तवाद का निराकरण किया गया, उसके अनुसार कारणमात्र के सत्यत्व का अनुवाद करनेवाली श्रुति का उल्लेख करते हैं—
"मृत्तिकेत्येव सत्यम्"—इति प्रकृतिमात्रस्य दृष्टान्ते सत्यत्वावधारणात्" । शङ्कावादी शङ्का करता है कि ब्रह्म में जीवभाव काल्पनिक नहीं, अपितु वास्तविक है, क्योंकि वह (जीव) ब्रह्म का अंश है, कर्म-समुच्चित ज्ञान के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव आहित होता है। इस शङ्का का समाधान है—"स्वयं प्रसिद्धं हि एतच्छारीरस्य ब्रह्मात्मत्वमुपदिश्यते"। अर्थात् जीव में ब्रह्मरूपता स्वाभाविक अनादि-सिद्ध है, अतः उसकी प्राप्ति के लिए किसी प्रकार के कर्म की आवश्यकता नहीं। जो यह कहा था कि नानात्वांश को लेकर कर्मकाण्ड-प्रतिपादित यज्ञादि एवं लौकिक व्यवहार का निर्वाह हो जाता है, उस पर सिद्धान्ती का कहना है—"बाधिते च शारीरात्मत्वे"। अर्थात् जैसे रज्जु में सर्प-व्यवहार तभी तक होता है, जब तक उसका
| ५७४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' (बृ० ४।५।१५) इत्यादिना ब्रह्मात्मत्वदर्शिनं प्रति समस्तस्य क्रियाकारकफललक्षणस्य व्यवहारस्याभावम् । न चायं व्यवहाराभावोऽवस्थाविशेषनिबद्धोऽभिधीयत इति युक्तं वक्तुम्, 'तत्त्वमसि' इति ब्रह्मात्मभावस्यानवस्थाविशेषनिबन्धनत्वात् । तस्करदृष्टान्तेन चानृताभिसंधस्य बन्धनं सत्याभिसंधस्य च मोक्षं दर्शयन्नेकत्वमेवैकं पारमार्थिकं दर्शयति' (छा० ६।१६) । मिथ्याज्ञानविजृम्भितं च नानात्वम् । उभयसत्यतायां हि कथं व्यवहारगोचरोऽपि जन्तुरनृताभिसंध इत्युच्येत ? 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति' ( बृ० ४।४।१९) इति च भेददृष्टिमपवदन्नेवैतद्दर्शयति । न चास्मिन्दर्शने ज्ञानान्मोक्ष
भामती
वस्थायां बाधकान्निवर्त्तन्ते एवं तत्त्वमस्यादिवाक्यपरिभावनाभ्यासपरिपाकभुवा शारीरस्य ब्रह्मात्मभावसाक्षात्कारेण बाधकेन निवर्त्तन्ते । स्यादेतत् - 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येद्' इत्यादिना मिथ्याज्ञानाधीनो व्यवहारः क्रियाकारकादिलक्षणः सम्यग्ज्ञानेनापनीयत इति न ब्रूते, किन्त्ववस्थाभेदाश्रयो व्यवहारोऽवस्थान्तरप्राप्त्या निवर्त्तते, यथा बालकस्य कामचारवादभक्षतोपनयनप्राप्तौ निवर्त्तन्ते । न च तावतासौ मिथ्याज्ञाननिबन्धनो भवेत्येवमत्रापीत्यत आह ॐ न चायं व्यवहाराभावः इति ॐ । कुतः ? ॐ तत्त्वमसीति ब्रह्मात्मभावस्य इति ॐ । न खल्वेतद्वाक्यमवस्थाविशेषविनियतं ब्रह्मात्मभावमाह जीवस्य, अपि तु न भुजङ्गो रज्जुरियमितिवत् सनातनं तमभिभवति । अपि च सत्यानृताभिधानेनाप्येतदेव युक्तमित्याह ॐ तस्करदृष्टान्तेन च इति ॐ । ॐ न चास्मिन् दर्शने इति ॐ । नहि जातु काष्ठस्य
भामती-व्याख्या
बाध न हो, वैसे ही जीवभाव का जब तक बाध नहीं होता, तब तक स्वाप्न व्यवहार के समान समस्त वैदिक और लौकिक व्यवहार प्रवृत्त हो जाता है। जाग्रद् बाध जैसे स्वप्नावस्था का बाधक और स्वाप्न व्यवहार का निवर्त्तक हो जाता है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—आदि महावाक्यों के श्रवणादिरूप अभ्यास-परम्परा की परिपक्व अवस्था में समुत्पन्न ब्रह्मभावविषयक साक्षात्काररूप बाधक अज्ञान और उसके व्यवहार का निवर्तक हो जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्" (बृह० उ० ४।५।१५) ।
शङ्का—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्"—यह श्रुति यह नहीं कहती है कि 'क्रिया, कारकादि समस्त व्यवहार मिथ्याज्ञान-प्रयुक्त है, सम्यक् ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का बाध हो जाने पर उक्त व्यवहार निवृत्त हो जाता है'। किन्तु उक्त श्रुति यह व्यवस्था देती है कि प्रत्येक अवस्था का व्यवहार भिन्न है, एक अवस्था का व्यवहार दूसरी अवस्था के प्राप्त होने पर निवृत्त हो जाता है, जैसे उपनयन संस्कार से पहले बालक का किसी के घर भी खा-पी लेना आदि ऐच्छिक व्यवहार यज्ञोपवीत हो जाने पर निवृत्त हो जाता है। इतने मात्र से उस ऐच्छिक व्यवहार को भ्रममात्र नहीं माना जा सकता। वैसे ही संसारावस्था में आत्मा का समस्त लौकिक और वैदिक व्यवहार सत्य होने पर भी मोक्षावस्था में निवृत्त हो जाता है, उसे मिथ्याज्ञान-प्रयुक्त मानने की क्या आवश्यकता ?
समाधान—भाष्यकार उस शङ्का का निरास करते हुए कहते हैं कि "व्यवहाराभावोऽवस्थाविशेषनिबद्धः", क्योंकि "तत्त्वमसीति ब्रह्मात्मभावस्यानवस्थाविशेषनिबद्धः"। अर्थात् "तत्त्वमसि"—यह वाक्य किसी अवस्था-विशेष के लिए ही जीव में ब्रह्मरूपता का बोधक नहीं, अपितु 'न भुजङ्गः, रज्जुरियम्'—यह वाक्य जैसे सनातन रज्जुरूपता का बोधक है, वैसे ही सार्वदिक ब्रह्मरूपता का अभिधान करता है। जैसे काष्ठरूप कारण में दण्ड,
ब्रह्मैकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७५
इत्युपपद्यते, सम्यग्ज्ञानापनोद्यस्य कस्यचिन्मिथ्याज्ञानस्य संसारकारणत्वेनानभ्यु- पगमात् । उभयसत्यतायां हि कथमेकत्वज्ञानेन नानात्वज्ञानमपनुद्यत इत्युच्यते ? नन्वेकत्वैकान्ताभ्युपगमे नानात्वाभावात्प्रत्यक्षादीनि लौकिकानि प्रमाणानि व्याहन्येरन्निर्विषयत्वात्, स्थाण्वादिष्विव पुरुषादिज्ञानानि । तथा विधिप्रतिषेधशास्त्र- मपि भेदापेक्षत्वात्तदभावे व्याहन्येत मोक्षशास्त्रस्यापि शिष्यशास्त्रादिभेदापेक्षत्वात्त- दभावे व्याघातः स्यात् । कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्यात्मैकत्वस्य
भामती
दण्डकमण्डलु कुण्डलशालिनः कुण्डलित्वज्ञानं दण्डवत्तां कमण्डलुमत्तां वा बाधते । तत् कस्य हेतोः ? तेषां कुण्डलादीनां तस्मिन् भाविकत्वात्, तद्विहापि भाविकगोचरेणैकाम्यज्ञानेन न नानात्वं भाविकमपवद- नीयम् । नहि ज्ञानेन वस्त्वपनीयते, अपि तु मिथ्याज्ञानेनारोपितमित्यर्थः । चोदयति ॐ नन्वेकत्वैकान्ताभ्युपगमः इति ॐ । अबाधितानधिगतासन्दिग्धविज्ञानसाधनं प्रमाण- मिति प्रमाणसामान्यलक्षणोपपत्त्या प्रत्यक्षादीनि प्रमाणतामनुभवते । एकत्वैकान्ताभ्युपगमे तु तेषां सर्वेषां भेदविषयाणां बाधितत्वादप्रामाण्यं प्रसज्येत । तथा विधिप्रतिषेधशास्त्रमपि भावनाभाव्यभावककरणेति- कर्तव्यताभेदापेक्षत्वाद् व्याहन्येत । तथा च नास्तिक्यमेकदेशाक्षेपेण च सर्ववेदाक्षेपाद्वेदान्तानामप्यप्रामाण्य- मित्यभेदैकान्ताभ्युपगमहानिः । न केवलं विधिनिषेधाक्षेपेणास्य मोक्षशास्त्रस्याक्षेपः स्वरूपेणास्यापि भेदापे- क्षत्वादित्याह ॐ मोक्षशास्त्रस्यापि इति ॐ । अपि चास्मिन् दर्शने वर्णपदवाक्यप्रकरणादीनामलीकत्वात्तत्प्र- भवमद्वैतज्ञानमसभीचीनं भवेत् , न खल्वलीकाद् धूमाद् धूमकेतनज्ञानं समीचीनमित्याह ॐ कथं चानृतेन
भामती-व्याख्या
कमण्डलु और कुण्डलादि सभी कार्य वस्तुतः उत्पन्न होते हैं, अतः 'कुण्डलवदिदं काष्ठम्'— यह ज्ञान काष्ठगत कुण्डलित्व या दण्डवत्ता का बाधक नहीं। वैसे ही जीव और ब्रह्म का नानात्व (भेद) यदि वास्तविक होता, तब एकत्व-ज्ञान से उसका बाध नहीं होता, क्योंकि ज्ञान के द्वारा किसी वस्तु का अपनयन नहीं होता, अपितु मिथ्या ज्ञान के द्वारा आरोपित पदार्थों का ही बाध होता है।
शङ्का—भाष्यकार ने शङ्का उठाई है कि यदि एकान्तिक एकत्व ( अभेद ) माना जाता है, तब (१) लौकिक प्रत्यक्षादि प्रमाण, (२) विधि-निषेधात्मक शास्त्र एवं (३) मोक्षा- गम—ये सभी व्याहत ( बाधितविषयक ) हो जाते हैं, क्योंकि (१) जिस ज्ञान का विषय अबाधित, अनधिगत और असन्दिग्ध हो, उस ज्ञान को प्रमा और उसके साधन पदार्थ को प्रमाण कहा जाता है। इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण से युक्त होकर ही प्रत्यक्षादि प्रमाणता की पदवी प्राप्त करते हैं किन्तु एकान्तिक एकत्व ( अभेद ) मान लेने पर उक्त प्रमाणता सुरक्षित नहीं रहती, क्योंकि वे सभी प्रमाण भेदविषयक हैं, अभेद के द्वारा भेद का बाध हो जाने से उनमें अप्रामाण्य प्रसक्त होता है। (२) विधि-निषेधात्मक शास्त्र भी भावना ( शाब्दी और आर्थी द्विविध कृति ), भाव्य ( कार्य ), भावक ( शब्दादि ), करण ( यागादि ) तथा इतिकर्त्तव्य ( करण के सहायक व्यापार ) के भेद की अपेक्षा करने के कारण भेदाभ्यु- पगम से व्याहत हो जाता है। विधि-निषेधात्मक शास्त्रों के व्याहत हो जाने से परलोकादि का अभाव एवं नास्तिक्य प्राप्त होता है। (३) वेद के विधि-निषेधात्मक एक भाग पर आक्षेप होने के कारण वेदान्तरूप मोक्षगम का भी अप्रामाण्य एवं एकान्तिक एकत्वाभ्युपगम की हानि प्रसक्त होती है। केवल विधि-निषेधात्मक भाग के आक्षेप से ही यह वेदान्तरूप मोक्ष-शास्त्र व्याहत नहीं होता, अपितु भेद-सापेक्ष होने के कारण स्वरूपतः ( साक्षात् ) बाधित होता है—"मोक्षशास्त्रस्यापि शिष्यशास्त्रादिभेदापेक्षत्वात् तदभावे व्याघातः स्यात्" । दूसरी
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सत्यत्वमुपपद्येतेति ? अत्रोच्यते - नैष दोषः, सर्वव्यवहाराणामेव प्राग्ब्रह्मात्मताविज्ञानात्सत्यत्वो- पपत्तेः, स्वप्नव्यवहारस्येव प्राक्प्रबोधात् । यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिस्तावत् प्रमाणप्रमेयफललक्षणेषु विकारेष्वनृतत्वबुद्धिर्न कस्यचिदुत्पद्यते । विकारानैव त्वहं ममेत्यविद्ययाऽऽत्मात्मीयेन भावेन सर्वो जन्तुः प्रतिपद्यते स्वाभाविकीं ब्रह्मात्मतां हित्वा । तस्मात्प्राग्ब्रह्मात्मताप्रतिबोधादुपपन्नः सर्वो लौकिको वैदिकश्च व्यवहारः। यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य जनस्य स्वप्ने उच्चावचान्भावान्पश्यतो निश्चितमेव
भामती
मोक्षशास्त्रेण इति ॐ । परिहरति ॐ अत्रोच्यते इति ॐ । यद्यपि प्रत्यक्षादीनां तात्त्विकमबाधितत्वं नास्ति, युक्त्यागमाभ्यां बाधनात्, तथापि व्यवहारे बाधनाभावात्सांव्यवहारिकमबाधनम् । नहि प्रत्यक्षादिभिरर्थं परिच्छिद्य प्रवर्त्तमानो व्यवहारे विसंवाद्यते सांसारिकः कश्चित् । तस्मादबाधनान्न प्रमाणलक्षणमतिपतन्ति प्रत्यक्षादय इति । ॐ सत्यत्वोपपत्तेः इति ॐ । सत्यत्वाभिमानोपपत्तेरिति । ग्रहणकवाक्यमेतद् , विभजते ॐ यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिः इति ॐ । विकारानैव तु शरीरादीनहमित्यात्मभावेन पुत्रपश्वादीन् ममेत्यात्मीयभावेनेति योजना । ॐ वैदिकश्च इति ॐ । कर्मकाण्डमोक्षशास्त्रव्यवहारसमर्थना । ॐ स्वप्न- व्यवहारस्येव इति विभजते ॐ यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य इति ॐ । कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेणेति यदुक्तं
भामती-व्याख्या
बात यह भी है कि इस दर्शन (वेदान्त-शास्त्र) में वर्ण (अकारादि), पद, वाक्य और प्रकरणादि की अपेक्षा है [जैसा कि न्यायवार्तिककार शास्त्र का स्वरूप बताते हुए कहते हैं—"शास्त्रं पुनः प्रमाणादिवाचकपदसमूहः, पदं पुनः वर्णसमूहः, पदसमूहः सूत्रम्, सूत्रसमूहः प्रकरणम्, प्रकरणसमूह आह्निकम्, आह्निकसमूहोऽध्यायः" (न्या० वा० १।१।१)] । अभेदवाद में तो कथित वर्ण, पदादि का भेद मिथ्या या अलीक है, अतः ऐसे शास्त्र के द्वारा उत्पादित अद्वैत-ज्ञान भी असमीचीन (अप्रमा) ही होगा, क्योंकि अलीक धूम के द्वारा उत्पादित वह्निविषयक ज्ञान समीचीन नहीं होता, भाष्यकार ने यही कहा है— "कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्यात्मैकत्वस्य सत्यत्वमुपपद्येत" ।
समाधान - उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"नैष दोषः"। यद्यपि प्रत्यक्षादि को तात्त्विक प्रमाण (अबाधितविषयक) नहीं माना जाता, क्योंकि युक्ति और आगम के द्वारा प्रत्यक्षादि का विषय बाधित हो जाता है। तथापि सांव्यावहारिक प्रामाण्य प्रत्यक्षादि का माना जाता है, क्योंकि व्यवहार-काल में उनका विषय अबाधित होता है, अन्यथा सांसारिक पुरुष की प्रत्यक्षादि के विषय में प्रवृत्ति सफल न होती, किन्तु सफल होती है। फलतः व्यवहार-काल में अबाधित अनधिगत और असन्दिग्ध विषय को अपनाने के कारण प्रत्यक्षादि प्रमाण अपने सामान्य लक्षण से विभूषित हो जाते हैं; "सत्यत्वोपपत्तेः"— इस भाष्य का अर्थ है—'सत्यत्वाभिमानोपपत्तेः' । "सर्वव्यवहाराणां प्राग् ब्रह्मात्मताविज्ञानात् सत्यत्वोपपत्तेः"—यह भाष्य ग्रहणक वाक्य (व्याख्येय भाष्य) है, उसकी व्याख्या स्वयं भाष्यकार करता है—"यावद्धि न सत्यात्मैकत्वप्रतिपत्तिः"। यहाँ 'आत्मात्मीयेन भावेन' का इस प्रकार विश्लिष्ट अन्वय कर लेना चाहिए—"शरीरादिविकारान् अहमिति आत्मभावेन, पुत्रपश्वादीन् ममेति आत्मीयभावेन" । शरीरेन्द्रियादि में अहं और पुत्रपश्वादि में ममभाव का अध्यास स्पष्ट करते हुए भाष्यकार ने ग्रन्थ के आरम्भ में ही कहा है—"अहंममेति लौकिको व्यवहारः" । "वैदिकश्च व्यवहारः"—इस वाक्य के द्वारा भाष्यकार ने कर्मकाण्ड तथा मोक्ष-शास्त्र का समर्थन किया है—"स्वप्नव्यवहारस्येव"—इस दृष्टान्त की
असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७७
प्रत्यक्षाभिमतं विज्ञानं भवति प्राक्प्रबोधात्, नच प्रत्यक्षाभासाभिप्रायस्तत्काले भवति, तद्वत् । कथं त्वसत्येन वेदान्तवाक्येन सत्यस्य ब्रह्मात्मत्वस्य प्रतिपत्ति- रुपपद्येत ? नहि रज्जुसर्पेण दष्टो म्रियते । नापि मृगतृष्णिकाम्भसा पानावगाहनादि-
भामती
तदनुभाष्य दूषयति ॐ कथं त्वसत्येन इति ॐ । शक्यमत्र वक्तुं श्रवणाद्युपाय आत्मसाक्षात्कारपर्यन्तो वेदान्तसमुत्थोऽपि ज्ञाननिचयोऽसत्यः, सोऽपि हि वृत्तिरूपः कार्यतया निरोधधर्मा, यस्तु ब्रह्मस्वभावसाक्षा- त्कारोऽसौ न कार्यस्तत्स्वभावत्वात्, तस्मादचोद्यमेतत् ॐ कथमसत्यात्सत्योत्पादः इति ॐ । यत् खलु सत्यं न तदुत्पद्यत इति कुतस्तस्यासत्यादुत्पादो ? यच्चोत्पद्यते तत्सर्वमसत्यमेव । सांव्यवहारिकं तु सत्यत्वं वृत्तिरूपस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्येव श्रवणादीनामप्यभिन्नं, तस्मादभ्युपेत्य वृत्तिस्वरूपस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य परमार्थसत्यतां व्यभिचारोद्भावनमिति मन्तव्यम् । यद्यपि सांव्यवहारिकस्य सत्यादेव भयात्सत्यं मरण- मुत्पद्यते तथापि भयहेतुरहितस्तज्ज्ञानं वाऽसत्यं ततो भयं सत्यं जायत इत्यसत्यात्सत्यस्योत्पत्तिरुक्ता । यद्यपि बाहिज्ञानमपि स्वरूपेण सत्तथापि न तज्ज्ञानत्वेन भयहेतुरपि त्वनिर्वच्याहिरूपितत्वेन । अन्यथा रज्जुज्ञानादपि भयप्रसङ्गाज्ज्ञानत्वेनाविशेषात् । तस्मादनिर्वच्याहिरूपितं ज्ञानमप्यनिर्वच्यमिति सिद्धम- सत्यादपि सत्यस्योपजन इति । न च ब्रूमः सर्वस्मादसत्यात्सत्यस्योपजनो, यतः समारोपितधूमभावाया
भामती-व्याख्या
स्पष्टीकरण किया गया है—"यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य जनस्य"। अर्थात् जैसे स्वप्नावस्था में साधारण व्यक्ति जो कुछ भी देखता है, उसको तब तक सत्य और प्रत्यक्ष ही समझता रहता है, जब तक जाग नहीं जाता। वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति वस्तुतः मिथ्या प्रपञ्च को व्यवहार-काल में सत्य ही समझता है।
यह जो शङ्का की गई थी कि "कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्य सत्यत्वम् ?" उस शङ्का का अनुवादपूर्वक निरास किया जाता है—"कथं त्वसत्येन सत्यस्य प्रतिपत्तिः ?" यहाँ यह विस्पष्ट कहा जा सकता है कि श्रवणादि साधनों के द्वारा वेदान्त-वाक्य-जनित आत्मसाक्षात्कार-पर्यन्त ज्ञान-परम्परा असत्य है, क्योंकि वह अन्तःकरण की एक वृत्ति है, अन्तःकरण का विकार होने के कारण अन्तःकरण का धर्म है, किन्तु जो ब्रह्मस्वरूप साक्षात्कार है, वह किसी का कार्य (विकार) नहीं, क्योंकि वह ब्रह्मस्वरूप है, अतः यह आक्षेप निराधार है कि असत्य साधन से सत्य का उत्पाद क्योंकर होगा। अर्थात् जो ब्रह्मस्वरूप सत्य साक्षात्कार है, वह उत्पन्न नहीं होता और जो वृत्तिरूप साक्षात्कार उत्पन्न होता है, वह असत्य ही माना जाता है। वृत्तिरूप ब्रह्म-साक्षात्कार में सांव्यवहारिक (व्यवहार-काल में अबाधितत्वरूप) सत्यत्व माना गया है और उसके साधनीभूत श्रवणादि में भी सत्यत्व अभिमत है। फलतः वृत्तिरूप ब्रह्म-साक्षात्कार में परमार्थ-सत्यता समझ कर व्यभिचारोद्भावन किया गया है। यद्यपि व्यावहारिक सर्प के सत्य भय से ही सत्य मरण होता है, आरोपित सर्प से नहीं। तथापि आरोपित सर्प को देख कर जो भय उत्पन्न होता है, वह सत्य ही है, अतः असत्य से सत्य की उत्पत्ति कही गई है। आरोपित सर्प का ज्ञान भी सत्य ही है, अतः उससे भयादि की उत्पत्ति सत्य से ही सत्य की उत्पत्ति है, किन्तु सर्प-ज्ञान जिस रूप से सत्य है, उस रूप से भयादि का हेतु नहीं अर्थात् वह ज्ञानत्वेन सत्य है, ज्ञानत्वेन वह भयादि का जनक नहीं, अपितु अनिर्वचनीय सर्प-विशिष्टत्वेन भयादि का साधक है, अन्यथा [विषय-रहित केवल ज्ञान को भयादि का उत्पादक मानने पर] रज्जु के ज्ञान से भी भयादि की उत्पत्ति प्रसक्त होती है। अनिर्वचनीय विषय से विशिष्ट ज्ञान भी अनिर्वचनीय ही है, सत्य नहीं, फलतः सर्प-ज्ञान से भयादि की उत्पत्ति भी असत्य से ही
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| ५७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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प्रयोजनं क्रियत इति, नैष दोषः; शङ्काविषादिनिमित्तमरणादिकार्योपलब्धेः, स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात् । तत्कार्यमप्यनृतमेवेति चेद् ब्रूयात्, तत्र ब्रूमः - यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यमनृतं,
भामती
धूममहिष्या वह्निज्ञानं सत्यं स्यात् । नहि चक्षुषो रूपज्ञानं सत्यमुपजायत इति रसादिज्ञानेनापि ततः सत्येन भवितव्यम् । यतो नियमो हि स तादृशः सत्यानां यतः कुतश्चित् किञ्चिदेव जायत इत्येवमसत्यानामपि नियमो यतः कुतश्चिदसत्यात्सत्यं कुतश्चिदसत्यं यथा दीर्घत्वादेर्वर्णेषु समारोपितत्वाविशेषेऽप्यजीनमित्यतो ज्यानिविरहमवगच्छन्ति सत्यम्, अजिनमित्यतस्तु समारोपितदीर्घभावाज्ज्यानिविरहमवगच्छन्तो भवन्ति भ्रान्ताः । न चोभयत्र दीर्घसमारोपं प्रति कश्चिदस्ति भेदस्तस्मादुपपन्नमसत्यादपि सत्यस्योदय इति । निदर्शनान्तरमाह ॐ स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । यथा सांसारिको जाग्रद्भुजङ्गं दृष्ट्वा पलायते ततश्च न दंशवेदनामाप्नोति, पिपासुः सलिलमालोक्य पातुं प्रवर्त्तते ततस्तदासाद्य पायम्पायमाप्यायितः सुखमनुभवति, एवं स्वप्नान्तिकेऽपि तदवस्थं सर्वमित्यसत्यात् कार्यसिद्धिः । शङ्कते ॐ तत्कार्यमप्यनृतमेव इति ॐ । एवमपि नासत्यात् सत्यस्य सिद्धिरुक्तैत्यर्थः । परिहरति ॐ तत्र ब्रूमः,
भामती-व्याख्या
सत्य की उत्पत्ति है । हमारा कहना यह नहीं कि सभी असत्य पदार्थों से सत्य की उत्पत्ति होती है । यदि वैसा कहते, तब अवश्य समारोपित धूम की आधारभूत धूम-महिषी (कुहरा) के द्वारा वह्नि की अनुमिति प्रमा होनी चाहिए । यह कोई आवश्यक नहीं कि चक्षु से उत्पन्न रूप-ज्ञान सत्य होता है, तो उससे रसादि का ज्ञान भी सत्य होगा, क्योंकि नियम या स्वभाव ही ऐसा है कि किसी सत्य पदार्थ से उत्पन्न कोई ही ज्ञान सत्य होता है, सभी ज्ञान नहीं । इसी प्रकार असत्य पदार्थों का भी नियम ऐसा ही है कि किसी ही असत्य पदार्थ से कोई ज्ञान सत्य होता है और किसी असत्य पदार्थ से जायमान ज्ञान असत्य होता है । जैसे कि ध्वनि के सभी दीर्घत्वह्रस्वत्वादि धर्म वर्णों में समानरूप से आरोपित हैं, तथापि दीर्घ 'अजीन' [ 'ज्या वयोहानौ' धातु के क्तान्त ] शब्द से ही जीर्णत्वाभाव का सत्य ज्ञान होता है, ह्रस्व 'अजिन' शब्द से नहीं, अतः जो लोग 'अजिन' शब्द को 'अजीन' सुनकर जीर्ण-भावाभाव का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन्हें भ्रान्त ही माना जाता है, सत्यज्ञानवान् नहीं । 'अजीन' और 'अजिन'— इन दोनों शब्दों में दीर्घता का आरोप समान है [ 'ज्या वयोहानौ' से निष्पन्न 'अजीन' शब्द के 'ई' वर्ण में भी दीर्घत्व आरोपित है, क्योंकि वर्ण नित्य और निर्विकार है, उसके व्यञ्जकीभूत नाद में जो दीर्घत्वादि धर्म हैं, उन्हीं की प्रतीति वर्णों में मानी जाती है, जैसा कि "नादवृद्धिपरा" (जै. सू. १।१।१७) इस जैमिनि-सूत्र में स्पष्ट किया गया है। चर्म-वाचक 'अजिन' शब्द में श्रोता को 'अजीन' शब्द का भ्रम हो गया ]। फलतः यह सिद्ध हो गया कि असत्य साधन से भी सत्य कार्य की निष्पत्ति होती है। इसी अर्थ में दूसरा दृष्टान्त प्रदर्शित किया जाता है— "स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात्" । जैसे सांसारिक पुरुष जाग्रत्काल में सर्प को देख कर भाग जाता है, अतः सर्प-दंश-जनित दुःख झेलना नहीं पड़ता और वही पुरुष ग्रीष्म के समय यात्रा-पथ में प्राप्त गंगा का दर्शन करके प्रसन्न हो जाता है, गंगा-जल पी-पी कर तृप्ति सुख का अनुभव करता है। वैसे ही स्वप्न-काल में आरोपित सर्प के दंश से दुःख एवं आरोपित सलिल के पान से सुख का अनुभव करता है। इस प्रकार असत्यपदार्थों से कार्य-सिद्धि देखी जाती है।
शङ्कावादी कहता है कि "तत् कार्यमप्यनृतमेव"। जब कार्य भी असत्य ही है, तब असत्य साधन से सत्य कार्य की सिद्धि नहीं होती। उक्त शङ्का का समाधान किया जाता
असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८९
तथापि तदवगतिः सत्यमेव फलम् , प्रतिबुद्धस्याप्यबाध्यमानत्वात् । नहि स्वप्नादुत्थितः स्वप्नदृष्टं सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यं मिथ्येति मन्यमानस्तदवगतिमपि मिथ्येति मन्यते कश्चित् । एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन देहमात्रात्मवादो दूषितो वेदितव्यः । तथा च श्रुतिः—‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्त-
भामती यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । लौकिको हि सुप्तोत्थितोऽवगम्यं बाधितं मन्यते न तदवगतिं, तेन यद्यपि परीक्षका अनिर्वचनीयरूषितामवगतिमनिर्वचनीयां निश्चिन्वन्ति तथापि लौकिकाभिप्रायेणैतदुक्तम् । अत्रान्तरे लोकायतिकानां मतमपाकरोति ॐ एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन इति ॐ । यदा खल्वयंञ्चैत्रस्तारक्षवीं व्यात्तविकटदंष्ट्राकरालवदनामुत्तब्धवाभ्रमन्नमस्तकावचुम्बितलाङ्गुलामतिरोषारुणव्यस्तविशालवृत्तलोचनां रोमाञ्चसन्नयोत्फुल्लभीषणां स्फटिकाचलभित्तिप्रतिबिम्बितामभ्यमित्रीणां तनुमास्थाय स्वप्ने प्रतिबुद्धो मानुषीमात्मनस्तनुं पश्यति तदोभयदेहानुगतमात्मानं प्रतिसन्दधानो देहातिरिक्कमात्मानं निश्चिनोति, न तु देहमात्रम् ; तन्मात्रत्वे देहवत्प्रतिसन्धानाभावप्रसङ्गात् । कथं चेतदुपपद्येत यदि स्वप्नदृशोऽवगतिरबाधिता स्यात् तद्बाधे तु प्रतिसन्धानाभाव इति । असत्याच्च सत्यप्रतीतिः श्रुतिसिद्धाऽन्वयव्यतिरेकसिद्धा चेत्याह ॐ तथाच श्रुतिः इति ॐ । ॐ तथाकारादि इति ॐ । यद्यपि रेखास्वरूपं सत्यं तथापि
भामती-व्याख्या है—"तत्र ब्रूमः—यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य"। लौकिक पुरुष सो कर जागने पर यद्यपि स्वाप्न ज्ञान के विषयीभूत गज, वाजि आदि पदार्थों को मिथ्या मानता है, तथापि उनके ज्ञान को मिथ्या नहीं, सत्य ही मानता है। ज्ञान को भी केवल अविवेकी पुरुष की दृष्टि से ही सत्य कहा जा सकता है, विवेचक ( परीक्षक ) पुरुष की दृष्टि से नहीं, क्योंकि वह स्वप्न के अनिर्वचनीय गजादि पदार्थों से विशिष्ट ज्ञान को भी अनिर्वचनीय ही मानता है।
देहात्मवादी चार्वाक के मत का प्रसङ्गतः अपाकरण किया जाता है—'एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधेन'। आशय यह है कि स्वप्न-काल में जब चैत्रनामक पुरुष तरक्षु ( व्याघ्र ) का ऐसा शरीर धारण करता है, जिसका मुख पूरा खुला है, बड़ी-बड़ी विकराल दाढ़ें निकल रही हैं, क्रोधावेश में जिसकी लम्बी लांगूल ( पूँछ ) आकाश में ऊपर तन कर व्याघ्र के अपने ही शिर पर धनुषाकार झुकी हुई है, दोनों नेत्रों के विशाल अङ्गारे धधक रहे हैं, रोंगटे खड़े हैं, जो स्फटिकमय पर्वत की चमकीली स्वच्छ भित्ति में प्रतिबिम्बित-सा है, जिसकी मुद्रा शत्रु-संहारोन्मुख है। जब स्वप्न टूटता है और चैत्र जाग जाता है, तब वह अपने को मनुष्य शरीर में बिस्तर पर लेटा हुआ पाता है। चैत्र को यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि स्वप्न में मुझे ही व्याघ्र का भयङ्कर शरीर मिला और छूट गया—इस प्रकार स्वप्नानुभूति का अनुसन्धाता चैत्रात्मा अपने को शरीरादि से भिन्न समझ लेता है, शरीरमात्र मैं हूँ—ऐसा कभी नहीं मानता, क्योंकि आत्मा के शरीर-मात्रस्वरूप होने पर जैसे स्वाप्न शरीर का अभाव हो जाता है, वैसे ही उक्त अनुसन्धान का भी अभाव हो जायगा ।
यह सब कुछ ( देहात्मवाद-निरासादि ) उपपन्न कब होगा ? जब कि स्वप्न-द्रष्टा का ज्ञान अबाधित हो । अन्यथा ( स्वाप्न ज्ञान के बाधित होने पर ) उस ज्ञान को स्वाप्न शरीर का ही धर्म मानना होगा, स्वाप्न शरीर का जाग्रत् अवस्था में बाध हो जाने पर मनुष्य शरीर का उसकी स्मरण नहीं होगा, क्योंकि अन्य व्यक्ति के द्वारा अनुभूत वस्तु का अन्य को स्मरण नहीं होता। अबाधित ज्ञान को बाधित शरीर का धर्म नहीं माना जा सकता, अतः शरीर से अतिरिक्त अबाधित आत्मा मान कर ही अनुभवित्ता और स्मर्ता के एकत्व-प्रत्यभिज्ञान का सामञ्जस्य करना होगा । असत्य पदार्थ से सत्य प्रतीति श्रुति से
५८० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४
स्मिन्त्स्वप्ननिदर्शने' ( छा० ५।२।९ ) इत्यसत्येन स्वप्नदर्शनेन सत्यायाः समृद्धेः प्रतिपत्तिं दर्शयति । तथा प्रत्यक्षदर्शनेषु केषुचिदरिष्टेषु जातेषु 'न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात्' इत्युक्त्वा 'अथ यः स्वप्ने पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति' इत्यादिना तेन तेनासत्येनैव स्वप्नदर्शनेन सत्यं मरणं सूच्यत इति दर्शयति । प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानामीदृशेन स्वप्नदर्शनेन साध्वागमः सूच्यत ईदृशेना- साध्वागम इति । तथाऽकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिर्दृष्टा रेखानृताक्षरप्रतिपत्तेः । अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकं नातः परं किंचिदाकाङ्क्ष्यमस्ति । यथा हि लोके यजेतेत्युक्ते किं केन कथमित्याकाङ्क्ष्यते, नैवं 'तत्त्वमसि' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्ते किंचिदन्यदाकाङ्क्ष्यमस्ति, सर्वात्मकत्वविषयत्वावगतेः । सति ह्यन्यस्मिन्नवशिष्य-
भामती
तद्यथासङ्केतमसत्यं, नहि सङ्केतयितारः सङ्केतयन्तीदृशेन रेखाभेदेनायं वर्णः प्रत्येतव्यः, अपि त्वीदृशो रेखाभेदोऽकार ईदृशश्च ककार इति, तथा चासमीचीनात् सङ्केतात्समीचीनवर्णावगतिरिति सिद्धम् । यच्चोक्तमेकत्वांशेन ज्ञानमोक्षव्यवहारः सेत्स्यति नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयो लौकिकश्च व्यवहारः सेत्स्यतीति तत्राह ॐ अपि चान्त्यमिदं प्रमाणम् इति ॐ । यदि खल्वेकत्वानेकत्वनिबन्धनौ व्यवहारा- वेकस्य पुंसोऽपर्यायेण सम्भवतस्ततस्तदर्थमुभयसद्भावः कल्प्येत, न त्वेतदस्ति, नह्येकत्वावगतिनिबन्धनः कश्चिदस्ति व्यवहारस्तदवगतेः सर्वोत्तरत्वात् । तथाहि तत्त्वमसीत्येकात्म्यावगतिः समस्तप्रमाणतत्फल- तद्व्यवहारानपबाधमानैवोदीयते, नैतस्याः परस्तात् किञ्चिदनुकूलं प्रतिकूलं चास्ति यदपेक्षेत येन चेयं
भामती-व्याख्या
सिद्ध है—"तथा च श्रुतिः"। यद्यपि स्वाप्न-दर्शन सत्य है, तथापि स्त्री आदि स्वाप्न विषय असत्य हैं, अतः ऐसे विषय से विशिष्ट ज्ञान को भी असत्य ही माना गया है। सत्य और असत्य का कार्य-कारणभाव केवल श्रुति-सिद्ध ही नहीं, अन्वय-व्यतिरेक से भी सिद्ध है—"प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानाम्"। यहाँ नैयायिकादि-सम्मत कार्य-कारणभाव के नियामक अन्वय और व्यतिरेक का ग्रहण किया गया है, जिसके आधार पर विशेष स्वप्न-दर्शन से विशेष ( समृद्धि या मरणादि ) कार्य की सिद्धि होती है। जाग्रत्कालीन निदर्शन से भी यही सिद्ध होता है—"तथाकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिः"। मुख से बोला जानेवाला अकार वर्ण सत्य और 'अ' रेखा असत्य अकार है, इनका कार्य-कारणभाव लोक-प्रसिद्ध है। यद्यपि रेखा का स्वरूप सत्य है, तथापि उस रेखा से जो संकेत किया जाता है कि यह (रेखा) अवर्ण है, वह असत्य है, क्योंकि संकेतयिता पुरुष ऐसा संकेत नहीं करते कि 'इस रेखा को देखकर अकार या ककार का बोध करना चाहिए', अपितु 'यह रेखा ही अकार है और यह रेखा ककार'—ऐसा संकेत असत्य है। इस प्रकार के असमीचीन ( असत्य ) संकेत से समीचीन वर्णावगति होती है— यह सिद्ध हो जाता है।
यह जो कहा गया था कि 'एकत्वांश के ज्ञान से मोक्ष-व्यवहार और नानात्वांश के ज्ञान से कर्मकाण्ड-सम्बन्धी व्यवहार सिद्ध होगा', उस पर व्यवस्था दी जाती है—"अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकम्"। आशय यह है कि यदि एकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त और अनेकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त दोनों व्यवहार एक ही पुरुष में क्रमशः सम्भव हो जाते, तब अवश्य ही एकत्व और नानात्व—इन दोनों धर्मों की कल्पना कर सकते थे, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि एकत्व की अवगति वह अन्तिम कार्य है, जिसके अनन्तर कोई व्यवहार रहता ही नहीं। "तत्त्वमसि"—इस प्रकार एकात्मत्व की अवगति अपने से पूर्वभावी समस्त (प्रमाण, तज्जन्य अर्थावगति और अर्थविषयक ) व्यवहार का बाध करती हुई ही उदय होती
असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८१
माणेऽर्थे आकाङ्क्षा स्यात् । न त्वात्मैकत्वव्यतिरेकेणावशिष्यमाणोऽन्योऽर्थोऽस्ति य आकाङ्क्ष्येत । न चेयमवगतिर्नोत्पद्यत इति शक्यं वक्तुम् 'तद्धास्य विजज्ञौ' ( छा० ६।१६।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अवगतिसाधनानां च श्रवणादीनां वेदानुवचनादीनां च विधानात् । न चेयमवगतिरनर्थिका भ्रान्तिर्वेति शक्यं वक्तुम् । अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात्, बाधकज्ञानान्तराभावाच्च । प्राक्चात्मैकत्वावगतेरव्याहतः सर्वः सत्यानृत-
भामती
प्रतिक्षिप्येत, तत्रानुकूलप्रतिकूलनिवारणाज्ञातः परं किञ्चिदाकांक्ष्यमिति । न चेयमवगतिर्दुलिक्षीरप्रायेत्याह ॐ न चेयम् इति ॐ । स्यादेतत् -- अन्त्या चेदियमवगतिर्निष्प्रयोजना तर्हि तथा च न प्रेक्षावद्भिरुपादीयेत, प्रयोजनवत्त्वे वा नान्त्या स्यादित्यत आह ॐ न चेयमवगतिरनर्थिका ॐ । कुतः ? ॐ अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात् ॐ । नहीयमुत्पन्ना सती पश्चादविद्यां निवर्त्तयति येन नान्त्या स्यात्, किन्तुविद्याविरोधिसद्भावतया तन्निवृत्त्यात्मैवोद्यते । अविद्यानिवृत्तिश्च न तत्कार्यतया फलमपि त्विष्टतयेष्टलक्षणत्वात् फलस्येति । प्रतिकूलं पराचीनं निराकर्तुमाह ॐ भ्रान्तिर्वा इति ॐ । कुतः ? ॐ बाधक इति ॐ । स्यादेतत् - मा भूदेकत्वनिबन्धनो व्यवहारोऽनेकत्वनिबन्धनस्त्वस्ति, तदेव हि सकलामुद्वहति लोकयात्राम्, अतस्तत्सिद्ध्यर्थमनेकत्वस्य कल्पनीयं तात्त्विकत्वमित्यत आह ॐ प्राक् च इति ॐ । व्यवहारो हि बुद्धिपूर्वककारिणां बुद्धयोपपद्यते, न त्वस्यास्तात्त्विकत्वेन, भ्रान्त्यापि तदुपपत्तेरित्यावेदितम् ।
भामती-व्याख्या
है। उस (एकत्व-विषयिणी) अवगति के पश्चात् कुछ भी अनुकूल या प्रतिकूल कर्त्तव्य शेष ही नहीं रहता, जिसकी अपेक्षा या उपेक्षा होती। 'यह अवगति डुलि (कछुई) के दूध के समान अत्यन्त अप्रसिद्ध और अलीक है' - ऐसा नहीं कह सकते - "न चेयमवगतिर्नोत्पद्यते"। "तद्धास्य विजज्ञौ" (छा० ६।१६।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मावगति का अपलाप नहीं किया जा सकता। 'उक्त अवगति यदि अन्तिम कार्य है, तब उसका कोई प्रयोजन पश्चात् सिद्ध न होने के कारण वह निष्प्रयोजन क्यों नहीं ? निष्प्रयोजन पदार्थ के सम्पादन में पुरुष-प्रवृत्ति सम्भव नहीं, अतः उस अवगति का कुछ प्रयोजन (लाभ) यदि माना जाता है, तब अन्तिम कैसे ? इस शङ्का का अनुवाद करते हैं - "न चेयमवगतिरनर्थिका", क्योंकि अविद्या की निवृत्ति उसका फल या प्रयोजन माना जाता है। आशय यह है कि उक्त अवगति स्वयं उत्पन्न होकर अविद्या-निवृत्तिरूप फल को उत्पन्न करती, तब अवगति को अन्तिम कार्य नहीं कहा जा सकता था किन्तु अवगति नाम है - ब्रह्म-साक्षात्कार का, ब्रह्म-साक्षात्कार ब्रह्मरूप होने के कारण नित्य-सिद्ध है। अविद्या का विरोधिस্বরূপ है अवगति, अतः अवगति की अभिव्यक्ति होने पर अविद्या-निवृत्ति प्रकट होती है। अविद्या-निवृत्ति भी विद्यात्मक ब्रह्मस्वरूप है, अतः वह जनित नहीं होती, उसमें जन्यता-प्रयुक्त फलरूपता का व्यवहार नहीं होता, अपितु इष्यमाण (पुरुषाभिलषित) होने के कारण अविद्या-निवृत्ति को फल या पुरुषार्थ माना जाता है। उक्त अवगति के पश्चाद्भावी प्रतिकूल पदार्थ का निराकरण किया जाता है - "भ्रान्तिर्वा"। उस अन्तिम अवगति के पश्चात् यदि कोई भ्रान्ति होगी, तब उसका अन्य बाधक कौन होगा ?
यदि एकत्वावगति से व्यवहार का निर्वाह नहीं होता, तब अनेकत्व-निबन्धन व्यवहार तो उपपन्न हो जाता है, अतः अनेकत्व सम्पूर्ण लोक-यात्रा का उद्वाहक होने के कारण तात्त्विक क्यों न मान लिया जाय ? इस शङ्का का निरास करते हैं - "प्राक् चात्मैकत्वावगतेः"। सारांश यह है कि बुद्धिपूर्वककारी पुरुषों का व्यवहार केवल ज्ञान के आधार पर सम्पन्न हो जाता है, ज्ञान प्रमात्मक ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं, भ्रम ज्ञान से भी व्यवहार