भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मैकत्वनानात्वनिरासः ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् ५६९
शराव उदञ्चनं चेति । नतु वस्तुवृत्तेन विकारो नाम कश्चिदस्ति । नामधेयमात्रं ह्येतदनृतं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति । एष ब्रह्मणो दृष्टान्त आम्नातः । तत्र श्रुताद्वाचार- म्भणशब्दाद्दार्ष्टान्तिकेऽपि ब्रह्मव्यतिरेकेण कार्यजातस्याभाव इति गम्यते । पुनश्च तेजोऽबन्नानां ब्रह्मकार्यतामुक्त्वा तेजोऽबन्नकार्याणां तेजोऽबन्नव्यतिरेकेणाभावं ब्रवीति- 'अपागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्' ( छा० ६।४।१ ) इत्यादिना । आरम्भणशब्दादिभ्य इत्यादि शब्दाद् 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि' ( छा० ६।८।७ ), 'इदं सर्वं यदयमात्मा' ( बृ० २।४।६ ), 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' ( मु० २।२।११ ), 'आत्मैवेदं सर्वम्' ( छा० ७।२५।२ ), 'नेह नानास्ति किंचन' (बृ० ४।४।१९ ) इत्येवमाद्यप्यात्मैकत्वप्रतिपादनपरं वचनजातमुदाहर्तव्यम् । न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं संपद्यते । तस्माद्यथा घटकरकाद्याकाशानां महा- काशानन्यत्वं, यथा च मृगतृष्णिकोदकादीनामूषरादिभ्योऽनन्यत्वं, दृष्टनष्टस्वरू-
भामती
तुविकल्पविदः—'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः' इति । तथा चावस्तुतयाऽनृतं विकारजातं मृत्तिकेत्येव सत्यम् । तस्माद् घटशरावोदञ्चनादीनां तत्त्वं मृदेव, तेन मृदि ज्ञातायां तेषां सर्वेषामेव तत्त्वं ज्ञातं भवति । तदिदमुक्तं ॐ न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं सम्पद्यते इति ॐ । निदर्शनान्तरद्वयं दर्शयन्नुपसंहरति ॐ तस्माद्यथा घटकरकाद्याकाशानाम् इति ॐ । ये हि दृष्टनष्टस्वरूपा न ते वस्तुसन्तो यथा मृगतृष्णिकोदकादयः, तथा च सर्वं विकारजातं, तस्मादवस्तुसत् । तथाहि—यदस्ति तद्वस्त्येव, यथा चिदात्मा, नह्यसौ कदाचित् क्वचित् कथञ्चिन्नास्ति, किन्तु सर्वदा सर्वत्र सर्वथास्त्येव, न नास्ति । न चैवं विकारजातं, तस्य कदाचित् कथञ्चित् कुत्रचिदवस्थानात् । तथाहि—सत्स्वभावं
भामती-व्याख्या
कोई पृथक् सत्ता नहीं, क्योंकि वह वैसे ही नामधेयमात्र है, जैसे कि 'पुरुषस्य चैतन्यम्', 'राहोः शिरः' ऐसा विकल्पमात्र । विकल्प की परिभाषा योगसूत्रकार ने की है— 'शब्द- ज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः” ( यो. सू. १।९ ) । जिस पदार्थ की कोई वास्तविक सत्ता नहीं होती, केवल शब्द के द्वारा जो एक मानसिक वृत्तिमात्र हो जाती है, उसको विकल्प- वृत्ति कहते हैं, जैसे कि पुरुष से चैतन्य और राहु से शिर कोई भिन्न पदार्थ नहीं, फिर भी 'पुरुषस्य चैतन्यम्', 'राहोः शिरः'— ऐसा भेद-व्यवहार हो जाता है, वैसे ही घटादि विकार- प्रपञ्च अवस्तु होने के कारण अनृत ( मिथ्या ) है, मृत्तिका ही एक सत्य पदार्थ है । फलतः घट, शराव ( सकोरा ) और उदञ्चन ( मिट्टी का डोल जिसके द्वारा खेत सींचने के लिए कुईं से पानी निकालते हैं ) आदि कार्य-वर्ग का तत्त्व मृत्तिका ही है, अतः मृत्तिका के ज्ञात हो जाने पर सभी विकार-वर्ग का ज्ञात हो जाना स्वाभाविक है । भाष्यकार ने व्यतिरेक- मुखेन यही कहा है—”न चान्यथैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं सम्पद्यते ।” अन्य दो दृष्टान्तों को दिखाते हुए उपसंहार कर रहे हैं—”तस्माद् यथा घटकरकाद्याकाशानां महाकाशानन्य- त्वम्” । अर्थात् जैसे घटाकाश, करकाकाशादि महाकाश से भिन्न नहीं होते अथवा जो पदार्थ दिखते ही नष्ट हो जाएँ—ऐसे मृगतृष्णिका-जलादि वस्तु-सत् नहीं होते, वैसे ही समस्त विकार-समूह वस्तु-सत् नहीं । उसके विपरीत जो स्वयं सत् है और दृष्ट-नष्ट नहीं होता, वह परमार्थ सत् होता है, जैसे— चिदात्मा, क्योंकि यह कभी भी कहीं भी और किसी प्रकार भी असत् नहीं, अपितु सर्वदा सर्वत्र और सर्वथा सत् ही है, असत् नहीं । किन्तु विकार-वर्ग ऐसा नहीं, क्योंकि वह कभी भी कहीं पर भी और किसी प्रकार भी अवस्थित नहीं । यदि विकार-समूह सत्स्वभाववाला है, तब कदाचित् असत् क्यों ? यदि विकार जगत् असत्स्वरूप
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