भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ २ पा. १ सू. १४
परिहारोऽभिहितः, नत्वयं विभागः परमार्थतोऽस्ति, यस्मात्तयोः कार्यकारणयोरनन्यत्वमवगम्यते। कार्यमाकाशादिकं बहुप्रपञ्चं जगत्, कारणं परं ब्रह्म, तस्मात्कारणात्परमार्थतोऽनन्यत्वं व्यतिरेकेणाभावः कार्यस्यावगम्यते। कुतः? आरम्भणशब्दादिभ्यः। आरम्भणशब्दस्तावदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय दृष्टान्तापेक्षायामुच्यते—'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (छा० ६।१।१) इति। एतदुक्तं भवति—एकेन मृत्पिण्डेन परमार्थतो मृदात्मना विज्ञानेन सर्वं मृन्मयं घटशरावोदञ्चनादिकं मृदात्मकत्वाविशेषाद्विज्ञातं भवेत्। यतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्—वाचैव केवलमस्तीत्यारभ्यते—विकारो घटः
भामती
स्यादेतत्—यदि कारणात् परमार्थभूतादनन्यत्वमाकाशादेः प्रपञ्चस्य कार्यस्य, कुतस्तर्हि न वैशेषिकाद्युक्तदोषप्रपञ्चावतार इत्यत आह ॐ व्यतिरेकेण।भावः कार्यस्यावगम्यते इति ॐ। न खल्वनन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु भेदं व्यासेधामः, ततश्च नाभेदाश्रयदोषप्रसङ्गः। किन्त्वभेदं व्यासेधद्भिर्वैशेषिकादिभिरस्मासु साहायकमेवाचरितं भवति। भेदनिषेधहेतुं व्याचष्टे ॐ आरम्भणशब्दस्तावद् इति ॐ। एवं हि ब्रह्मविज्ञानेन सर्वं जगत्तत्त्वतो ज्ञायेत, यदि ब्रह्मैव तत्त्वं जगतो भवेत्। यथा रज्ज्वां ज्ञातायां भुजङ्गतत्त्वं ज्ञातं भवति, सा हि तस्य तत्त्वम्। तत्त्वज्ञानं च ज्ञानमतोऽन्यन्मिथ्याज्ञानमज्ञानमेव। अत्रैव वैदिको दृष्टान्तः ॐ यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन इति ॐ। स्यादेतत्—मृदि ज्ञातायां कथं मृन्मयं घटादि ज्ञातं भवति, नहि तन्मृदात्मकमित्युपपादितमधस्तात्। तस्मात्ततो भिन्नं न चान्यस्मिन् विज्ञातेऽन्यद्विज्ञातं भवतीत्यत आह श्रुतिः ॐ वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् ॐ। वाचया केवलमारभ्यते विकारजातं, न तु तत्त्वतोऽस्ति, यतो नामधेयमात्रमेतद्, यथा पुरुषस्य चैतन्यमिति राहोः शिर इति विकल्पमात्रम्। यथा-
भामती-व्याख्या
करण पहले ही किया जा चुका है, तथापि इस अधिकरण की विशेषता यह है—'अभ्युपगम्य चेमं व्यावहारिकं भोक्तृभोग्यलक्षणं विभागं लोकवदिति परिहारोऽभिहितः, न त्वयं विभागः परमार्थतोऽस्ति'। अर्थात् ब्रह्मरूप कारण से आकाशादि कार्य का अनन्यत्व (भेद नहीं) ही है। यदि परमार्थभूत ब्रह्मरूप कारण से आकाशादि प्रपञ्च का अभेद है, तब वैशेषिकादि के द्वारा उद्भावित भोग्य में भोक्तृत्वापत्ति क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—''व्यतिरेकेणाभावः कार्यस्यावगम्यते''। आशय यह है कि हम 'अनन्यत्व' शब्द के द्वारा 'अभेद' का अभिधान नहीं करते किन्तु भेद का प्रतिषेध करते हैं, वैशेषिकोक्त अभेदपक्षीय दोष प्रसक्त नहीं होते, प्रत्युत अभेद का निषेध करके वैशेषिकों ने हमारी सहायता ही की है। भेद-निषेध के हेतु की व्याख्या की जाती है—''आरम्भणशब्दस्तावदेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय''। ब्रह्म के जानलेने मात्र से सभी जगत् तभी जाना जा सकता है, जब कि ब्रह्म ही जगत् का मूल तत्त्व हो। रज्जु के ज्ञान से उसमें आरोपित सर्प का ज्ञान इसी लिए हो जाता है कि रज्जु ही सर्प का मूल तत्त्व (अधिष्ठान) है। तत्त्व-ज्ञान ही प्रमा ज्ञान है, उससे भिन्न सर्पादि का ज्ञान मिथ्या ज्ञान या अज्ञान होता है, इसी भाव का स्पष्टीकरण एक वैदिक दृष्टान्त के द्वारा किया जाता है—''यथा सोम्य ! एकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्''। यहाँ यह शङ्का होती है कि मृत्तिका के ज्ञान से घट, शरावादि का ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि घटादि मृत्तिकात्मक नहीं, क्योंकि यह शिष्टापरिग्रहाधिकरण के पूर्वपक्ष में कहा जा चुका है कारण से कार्य भिन्न होता है। अन्य पदार्थ के ज्ञान से अन्य पदार्थ का ज्ञान क्योंकर होगा? इस शङ्का का निराकरण करने के लिए श्रुति कहती है—''वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्''। आशय यह है कि आकाशादि प्रपञ्च केवल शब्द के द्वारा व्यवहृतमात्र होता है, तत्त्वतः उसकी