भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 588, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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पत्त्वात्स्वरूपेणानूपाख्यत्वात्, एवमस्य भोग्यभोक्त्रादिप्रपञ्चजातस्य ब्रह्मव्य-
भामती
चेद्विकारजातं कथं कदाचिदसत् ? सदसतोरेकत्वविरोधात् । नहि रूपं कदाचित् क्वचित् कथंचिद्वा गन्धो भवति । अथ तस्य सदसत्त्वे धर्मो, ते च स्वकारणाधीनजन्मतया कदाचिदेव भवतः, तत्तर्हि विकारजातं दण्डायमानं सदातनमिति न विकारः कस्यचित् । अथासत्त्वसमये तन्नास्ति, कस्य तर्हि धर्मोऽसत्त्वम् ? नहि धर्मिण्यप्रत्युत्पन्ने तद्धर्मोऽसत्त्वं प्रत्युत्पन्नमुपपद्यते । अथास्य न धर्मः किन्त्वर्थान्तरमसत्त्वं, किमायातं भावस्य ? नहि घटे जाते पटस्य किञ्चिद्भवति । असत्त्वं भावविरोधीति चेद्, न; अकिञ्चित्करस्य तत्त्वानुपपत्तेः । किञ्चित्करत्वे वा तत्राप्यसत्त्वे तदनुयोगसम्भवात् । अथास्यासत्त्वं नाम किञ्चिन्न जायते किन्तु स एव न भवति । यथाहूः—
“न तस्य किञ्चिद्भवति न भवत्येव केवलम् ।” इति ।
अथैष प्रसज्यप्रतिषेधो निरूच्यतां किं तत्स्वभावो भाव उत भावस्वभावः स इति । तत्र पूर्वस्मिन् कल्पे भावानां तत्स्वभावतया तुच्छतया जगच्छून्यं प्रसज्येत । तथा च भावानुभवाभावः । उत्तरस्मिंस्तु सर्वभावनित्यतया नाभावव्यवहारः स्यात् । कल्पनामात्रनिमित्तत्वेऽपि निषेधस्य भावनित्यतापत्तिस्तदवस्थैव । तस्माद्द्भिन्नमस्ति कारणाद्विकारजातं न वस्तुसत् , अतो विकारजातमनिर्वचनीयमनृतम् ।
भामती-व्याख्या
है, तब कदाचित् सत् क्यों ? सत् और असत् की एकरूपता सम्भव नहीं, क्योंकि रूप पदार्थ कभी भी कहीं भी और किसी प्रकार भी गन्ध पदार्थ नहीं होता । विकार-प्रपञ्च के सत्त्व और असत्त्व धर्म हैं और वे अपनी सामग्री के द्वारा कदाचित् उत्पन्न किए जाते हैं, तब विकार-प्रपञ्चरूप धर्मी दण्डायमान सदातन सिद्ध हो जाने के कारण वह किसी का विकार क्यों होगा ? यदि असत्त्वरूप धर्म के समय प्रपञ्च नहीं, तब असत्त्व किस का धर्म होगा ? क्योंकि धर्मी के विद्यमान न होने पर 'असत्त्व' उसका धर्म नहीं हो सकता । यदि असत्त्व प्रपंच का धर्म नहीं, अपितु उससे भिन्न ही है, तब प्रपञ्चरूप धर्मी की भावरूपता पर उसका क्या प्रभाव ? क्योंकि घट की उत्पत्ति का पट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । यदि कहा जाय कि प्रपञ्चगत असत्त्व प्रपञ्च के भाव ( सत्त्व ) का विरोधी है, अतः असत्त्व के समय प्रपंच की सत्ता न रहने से उसकी सदातनत्वापत्ति क्यों होगी ? प्रपंचगत असत्त्व भाव का विरोधी क्या बिना किसी विरुद्ध धर्म को जन्म देकर ही है ? अथवा विरुद्ध धर्म ( भावासत्त्व ) का उत्पादन करके ? विरुद्ध धर्मोत्पादन के बिना विरोधी नहीं हो सकता और यदि भावासत्त्वरूप धर्म का उत्पादन करता है, तब उस उत्पद्यमान असत्त्व के विषय में भी ये ही विकल्प किए जा सकते हैं । यदि कहा जाय कि विरोधिरूप असत्त्व से भाव का असत्त्व उत्पन्न नहीं होता अपितु भाव ही नहीं रहता, जैसा कि श्री धर्मकीर्ति ने कहा है— "न तस्य किंचिद् भवति न भवत्येव केवलम्" ( प्र. वा. स्वार्था. २८१ ) । तब 'भावो न भवति'— यहाँ प्रसज्यप्रतिषेध (अभाव) का प्रतिपादक नकार है, जैसा कि श्रीधर्मकीर्ति ने कहा है— "न भवतीति च प्रसज्यप्रतिषेध एव न पर्युदासः" (प्र० वा० स्वो० पृ० ९८) अतः उक्त वाक्य के दो अन्वयबोध हो सकते हैं— (१) 'भावोऽभावः', (२) अभावो भावः' । यदि भावपदार्थों को अभावरूप माना जाता है, तब समस्त आकाशादि जगत् अभावरूप हो जाने से तुच्छ (शून्य) हो जाता है फिर भावपदार्थ का अनुभव ही नहीं होना चाहिए । उत्तर (द्वितीय) कल्प के अनुसार अभाव भी जब भावरूप हो जाता है, तब अभाव-व्यवहार क्योंकर होगा ? 'भावो न'—यहाँ पर यदि भाव का निषेध काल्पनिकमात्र माना जाता है, तब भावपदार्थ में नित्यतापत्ति पूर्ववत् बनी रहती है । फलतः विकार-प्रपंच को ब्रह्मरूप कारण से भिन्न