भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५६६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १३

( ५ भोक्त्रापत्त्यधिकरणम् । सू० १३ )

भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत्स्याल्लोकवत् ॥ १३ ॥

अन्यथा पुनर्ब्रह्मकारणवादस्तर्कबलेनैवाक्षिप्यते । यद्यपि श्रुतिः प्रमाणं स्वविषये भवति, तथापि प्रमाणान्तरेण विषयापहारेऽन्यपरा भवितुमर्हति, यथा मन्त्रार्थवादौ । तर्कोऽपि स्वविषयादन्यत्राप्रतिष्ठितः स्यात् यथा धर्माधर्मयोः । किमतो यद्येवम् ? अत इदमयुक्तं यत्प्रमाणान्तरप्रसिद्धार्थबाधनं श्रुतेः । कथं पुनः प्रमाणान्तरप्रसिद्धोऽर्थः


भामती

स्यादेतत्—अतिगम्भीरजगत्कारणविषयत्वं तर्कस्य नास्ति, केवलमागमगम्यमेतदित्युक्तं, तत् कथं पुनस्तर्कनिमित्त आक्षेप इत्यत आह ॐ यद्यपि श्रुतिः प्रमाणम् इति ॐ । प्रवृत्ता हि श्रुतिरनपेक्षतया स्वतःप्रमाणत्वेन न प्रमाणान्तरमपेक्षते । प्रवर्तमाना पुनः स्फुटतरप्रतिष्ठितप्रामाण्यतर्कविरोधेन मुख्यार्थात् प्रच्याव्य जघन्यवृत्तित्तां नीयते, यथा मन्त्रार्थवादावित्यर्थः । अतिरोहितार्थं भाष्यम् । ॐ यथा त्वद्यत्वे इति ॐ । यद्यतीतानागतयोः सर्गयोरेष विभागो न भवेत् ततस्तदेवाद्यतनस्य विभागस्य बाधकं स्यात्, स्वप्नदर्शनस्येव जाग्रद्दर्शनं, न त्वेतदस्ति । अबाधिताद्यतनदर्शनेन तयोरपि तथात्वानुमानादित्यर्थः । इमां


भामती-व्याख्या

निरूपण करना था, अतः पूर्वपक्ष के रूप में कहीं-कहीं परमाणुवाद की चर्चा कर दी है । पूर्वपक्ष सत्य ही हो ऐसा कोई नियम नहीं, मिथ्या भी हो सकता है । [ किसी-किसी पुस्तक में “केनाप्यंशेनापरिगृहीताः”—ऐसा पाठान्तर उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ विस्पष्ट है ॥ १२ ॥

संशय—'यदि भोग्यादिप्रपञ्चो ब्रह्मणोऽभिन्नः स्यात्, तर्हि भोग्यस्य भोक्तृत्वप्रसङ्गः स्यात्'—इस तर्क के द्वारा अद्वैतवाद बाधित होता है ? अथवा नहीं ?

पूर्वपक्ष—जगत् की कारणता एक अत्यन्त गम्भीर विषय है, इसमें तर्क की गति नहीं, केवल आगम प्रमाण से अधिगम्य है, अतः तर्क के आधार पर ब्रह्मगत जगत्कारणता पर आक्षेप क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—“यद्यपि श्रुतिः प्रमाणं स्वविषये भवति” । आशय यह है कि यद्यपि अपने विषय में प्रवर्त्तमान श्रुति इतर प्रमाणों से निरपेक्ष होने के कारण स्वतःप्रमाण है, वह अपनी प्रमाणता के लिए प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं करती, तथापि स्फुटतरप्रामाण्यक प्रखर तर्क के द्वारा अपने मुख्य विषय में बाधित होकर श्रुति मुख्यार्थ को छोड़कर गौणार्थपरक वैसे ही हो जाती है, जैसे मन्त्र और अर्थवादादि । [ “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृह० उ० २।४।६), “ब्रह्मैवेदं सर्वम्” (मुं० २।२।११) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मरूप कारण का उसके कार्य प्रपञ्च से अभेद सिद्ध करती हैं, किन्तु ऐसा मानने पर भोक्ता चेतन और भोग्य पदार्थों का लोक-प्रसिद्ध भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि स्वाभिन्नाभिन्नत्व-नियम के अनुसार भोक्ता और भोग्य (शब्दादि प्रपञ्च) ये दोनों ब्रह्म से अभिन्न होने के कारण परस्पर अभिन्न हो जायँगे । अतः उक्त अभेद-बोधक श्रुतियों का अभेदरूप मुख्यार्थ में तात्पर्य न मानकर ब्रह्मप्राशस्त्यरूप गौणार्थ में पर्यवसान मानना चाहिए ] । भोक्ता और भोग्य के लोक-प्रसिद्ध भेद का अपलाप कभी भी नहीं किया गया । “यथा तु अद्यत्वे भोक्तृ-भोग्ययोर्विभागो दृष्टस्तथातीतानागतयोः”—इस भाष्य का आशय यह है कि यदि अतीत और भावी सृष्टियों में ही भोक्ता और भोग्यादि का विभाग प्रसिद्ध न होता, तब वर्त्तमान विभाग को स्वप्न के समान बाधित और मिथ्या माना जा सकता था, किन्तु वैसा नहीं, अपि तु भोक्ता-भोग्य का भेद सत्य है एवं इसी के आधार पर अतीत और अनागत सर्गों में भेद सत्यत्व का अनुमान किया जा सकता है ।