भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

कणादादितर्कस्यानादरः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५६५

वैदिकस्य दर्शनस्य प्रत्यासन्नत्वाद् गुरुतरतर्कबलोपेतत्वाद् वेदानुसारिभिश्च कैश्चि- च्छिष्टैः केनचिदंशेन परिगृहीतत्वात्प्रधानकारणवादं तावद् व्यपाश्रित्य यस्तर्कनिमित्त आक्षेपो वेदान्तवाक्येषूद्भावितः स परिहृतः । इदानीमण्वादिवादव्यपाश्रयेणापि कैश्चिन्मन्दमतिभिर्वेदान्तवाक्येषु पुनस्तर्कनिमित्त आक्षेप आशङ्क्यते इत्यतः प्रधानमल्ल- निबर्हणन्यायेनातिदिशति—एतेनेत्यादि। परिगृह्यन्त इति परिग्रहाः, न परिग्रहा अपरि- ग्रहाः, शिष्टानमपरिग्रहाः शिष्टापरिग्रहाः। एतेन प्रकृतेन प्रधानकारणवादनिरकरण- कारणेन शिष्टैर्मनुव्यासप्रभृतिभिः केनचिदंशेनापरिगृहीता येऽण्वादिकारणवादास्तेऽपि प्रतिषिद्धतया व्याख्याता निराकृता द्रष्टव्याः तुल्यत्वान्निराकरणकारणस्य, नात्र पुनरा- शङ्कितव्यं किंचिदस्ति। तुल्यमत्रापि परमगम्भीरस्य जगत्कारणस्य तर्कानवगाह्यत्वं, तर्कस्याप्रतिष्ठितत्वम्, अन्यथानुमानेऽप्यविमोक्षः, आगमविरोधश्चेत्येवंजातीयकं निराकरणकारणम् ॥ १२ ॥


भामती

सांख्यदूषणमतिदिशति ॐ एतेन इति ॐ सूत्रेण । अस्यार्थः—कारणात् कार्यस्य भेदं तदनन्यत्वमारम्भण- शब्दादिभ्य इत्यत्र निषेत्स्यामः । अविद्यासमारोपेण च कार्यस्य न्यूनाधिकभावमनन्यप्रयोजकत्वादुपेक्षि- ष्यामहे । तेन वैशेषिकाद्यभिमतस्य तर्कस्य शुष्कतयैवावस्थितेः । सूत्रमिदं सांख्यदूषणमतिदिशति । यत्र कथंचिद्वेदानुसारिणो मन्वादिभिः शिष्टैः परिगृहीतस्य सांख्यतर्कस्यैषा गतिस्तत्र परमाण्वादिवादस्यात्य- न्तवेदबाह्यस्य मन्वाद्युपेक्षितस्य च कैव कथेति । ॐ केनचिदंशेन इति ॐ । सृष्ट्यादयो हि व्युत्पाद्यास्ते च किञ्चित्सदसङ्गा पूर्वपक्षन्यायोचितमप्युदाहृत्य व्युत्पाद्यन्त इति केनचिदंशेनेत्युक्तम् । सुगममन्यत् ॥ १२ ॥


भामती-व्याख्या

वर्णित है—"अहानि वाऽभिसंख्यत्वात्" (जै० सू० ६।७।४०) । अर्थात् 'संवत्सर' शब्द गौणी वृत्ति के द्वारा 'दिन' का बोधक है, अतः एक हजार दिनों में सम्पन्न होनेवाले यज्ञ को सहस्र- संवत्सर क्रतु कहा गया है] ।

सिद्धान्त—कथित अत्यधिक शङ्का का निरास करने के लिए सूत्रकार ने सांख्यपक्षीय दूषणों के द्वारा ही वैशेषिक-पक्ष का निरास किया है—"एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः" । इस सूत्र का अर्थ यह है कि कारण से कार्य के भेद का निरास आगे किया जा रहा है—"तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः" (ब्र. सू. २।१।१४) । यह जो कहा था कि कार्य की अपेक्षा कारण का न्यून परिमाण होता है, वह नियम भी कार्य के अविद्यासमारोपितत्व- पक्ष में टूट जाता है, क्योंकि आरम्भवाद में भी अधिकपरिमाणवाली तूल-राशि से स्वल्प- परिमाण का तन्तु उत्पन्न होता देखा जाता है, विशेषतः विवर्तवाद में तो वैसा नियम सुरक्षित हो नहीं रहता, क्योंकि विशाल बिम्ब से क्षुद्र प्रतिबिम्ब और क्षुद्र बिम्ब से विशाल प्रतिबिम्ब अनुभव-सिद्ध है, अतः कार्य का परिमाण उपादान-प्रयुक्त न हो कर उपाधि-प्रयुक्त होता है । फलतः वैशेषिकाभिमत तर्क नितान्त शुष्क होने के कारण सांख्यपक्षोक्त दूषणों के द्वारा ही वैशेषिक पक्ष भी पूर्णतया दूषित हो जाता है । किसी-न-किसी प्रकार वेद का अनुसरण करनेवाले एवं मन्दप्रज्ञ शिष्ट व्यक्तियों के द्वारा गृहीत सांख्यीय तर्कों की जहाँ ऐसी दुर्गति होती है, वहाँ अत्यन्त वेद-बहिष्कृत तथा मन्वादि महर्षियों के द्वारा उपेक्षित वैशेषिक-सम्मत परमाणुवाद की बात ही क्या ? 'केनचिदंशेनापरिगृहीताः"—इस भाष्य के द्वारा यह ध्वनित होता है कि मनु, व्यासादि महर्षियों ने आंशिकरूप में परमाणुवाद का परिग्रह भी किया है, वह अंश कौन है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मन्वादि महर्षियों को सृष्टि-प्रक्रिया का