भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 582
५६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १२

भामती

भेदकत्वात्। भेदाभेदयोश्च परस्परविरोधेनैकत्र सहासम्भव इत्युक्तम्। तस्मात् कारणात् कार्यमेकान्तत एव भिन्नम्। न च भेदे गवाश्ववत् कार्यकारणभावानुपपत्तिरिति साम्प्रतम्। अभेदेऽपि कारणरूपवत्तदनुपपत्तेरुक्तत्वात्। अत्यन्तभेदे च कुम्भकुम्भकारयोर्निमित्तनैमित्तिकभावस्य दर्शनात्। तस्मादन्यत्वाविशेषेऽपि समवायभेद एवोपादानोपादेयभावनियमहेतुः। यस्याभूत्वा भवतः समवायस्तदुपादेयं, यत्र च समवायस्तदुपादानम्। उपादानत्वं च कारणस्य कार्यादल्पपरिमाणस्य दृष्टं यथा तन्त्वादीनां पटाद्युपादानानां पटादिभ्यो न्यूनपरिमाणत्वम्। चिदात्मनस्तु परममहत उपादानान्नात्यन्ताल्पपरिमाणमुपादेयं भवितुमर्हति। तस्माद्यत्रेवमल्पतारतम्यं विश्राम्यति यतो न क्षोदीयः सम्भवति तज्जगतो मूलकारणं परमाणुः। क्षोदीयोऽन्तरानन्त्ये तु मेरुसर्षपयोस्तुल्यपरिमाणत्वप्रसङ्गोऽनन्तावयवत्वादुभयोः। तस्मात् परममहतो ब्रह्मण उपादानावभिन्नमुपादेयं जगत्कार्यमभिदधती श्रुतिः प्रतिष्ठितप्रामाण्यतर्कविरोधात् सहस्रसंवत्सरसत्रगतसंवत्सरश्रुतिवत् कथञ्चिज्जघन्यवृत्त्या व्याख्येयेत्यधिकं शङ्कमानं प्रति

भामती-व्याख्या

को कारणात्मक नहीं माना जा सकेगा, क्योंकि कारण में नित्यत्व और कार्य में अनित्यत्वादि विरुद्ध धर्म होने से कार्य और कारण का भेद सिद्ध हो जाता है। भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होने के कारण एकत्र रह नहीं सकते—यह कई बार कहा जा चुका है। फलतः कारण से कार्य एकान्ततः भिन्न सिद्ध होता है।

मृत्तिका से घटादि कार्य यदि अत्यन्त भिन्न है, तब वैसे ही उनमें कार्य-कारणभाव न बनेगा, जैसे गौ और अश्व का'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि अत्यन्त अभेद में भी कार्यकारणभाव की अनुपपत्ति दिखाई जा चुकी है, अत्यन्त भेद में तो कुम्भ और कुम्भकार के समान निमित्त-नैमित्तिकभाव ही देखा जाता है। उपादानोपादेयभाव नहीं। यद्यपि गौ से अन्य अश्व गौ का उपादेय नहीं, तथापि मृत्तिका से अन्य घट मृत्तिका का उपादेय माना जाता है, क्योंकि मृत्तिका में घट का समवाय सम्बन्ध है, गौ में अश्व का नहीं। जिस "अभूत्वा भवतः" (असत् कार्यभूत घटादि का) समवाय मृत्तिकादि में होता है, उस घटादि कार्य को उपादेय और वह समवाय जिस मृत्तिकादि पदार्थ में होता है, उसे उपादान कारण कहा जाता है। कार्य की अपेक्षा अल्प परिमाणवाले कारण में उपादानकारणता देखी जाती है. जैसे—तन्त्वादिरूप उपादान कारणों का पटादिरूप कार्य की अपेक्षा अल्पपरिमाण है। चिदात्मा का परम महत् (विभु) परिमाण माना जाता है, घटादि कार्य की अपेक्षा उसका अल्प परिमाण नहीं, अतः स्वल्पपरिमाणता जिस पदार्थ में समाप्त हो जाती है, जिस की अपेक्षा और कोई वस्तु क्षुद्र (स्वल्प) नहीं रहती, ऐसा परमाणु पदार्थ ही जगत् का उपादान कारण होता है। यदि परमाणु में स्वल्प परिमाण की विश्रान्ति न मान कर अनन्त अवयवों तक अल्पता का क्रम माना जाता है, तब मेरु पर्वत और सरसों के एक दाने का समान परिमाण मानना होगा, क्योकि अनन्तावयवरूपता दोनों में समान है। फलतः अपरिच्छिन्न ब्रह्मरूप उपादान से परिच्छिन्न जगद्रूप उपादेय का अभेद बतानेवाली श्रुति प्रतिष्ठितप्रामाण्यक तर्क के द्वारा बाधित होकर वैसे ही गौणार्थकपरक हो जाती है, जैसे—'विश्वसृजामयनं सहस्र संवत्सरम्'—इस श्रुति में 'संवत्सर' शब्द गौणी वृत्ति से 'दिन' का वाचक है ["पञ्चपञ्चाशतस्त्रिवृतः संवत्सराः, पञ्चपञ्चाशतः पञ्चदशाः, पञ्चपञ्चाशतः सप्तदशाः, पञ्चपञ्चाशत एकविंशाः, विश्वसृजामयनं सहस्रसंवत्सरम्" (तै० ब्रा० ३।९।८ ) इस श्रुति ने विश्वसृजनामधारी ऋषियों के लिए सहस्रसंवत्सर-साध्य यज्ञ का जो विधान किया है, वहाँ 'संवत्सर' शब्द पर "सहस्रसंवत्सरं तदायुषामसम्भवान्मनुष्येषु" (जै० सू० ६।७।३१) इत्यादि सूत्रों के द्वारा विचार करते हुए महर्षि ने सात पक्ष प्रस्तुत किए हैं। आठवाँ पक्ष सिद्धान्तरूप में