भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकणादादितर्कविरोधः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५६३
भामती
न कार्यं कारणादभिन्नमभेदे कारणरूपवत् कार्य्यत्वानुपपत्तेः, करोत्यर्थानुपपत्तेश्च। अभूतप्रादुर्भावनं हि तबर्थः। न चास्य कारणात्मत्वे किञ्चिदभूतमस्ति यदर्थमयं पुरुषो यतेत। अभिव्यक्त्यर्थमिति चेत्, न, तस्या अपि कारणात्मत्वेन सत्त्वात्, असत्त्वे वाऽभिव्यङ्ग्यस्यापि तद्वत् प्रसङ्गेन कारणात्मत्व-व्याघातात्। नहि तदेव तदानीमेवास्ति नास्ति चेति युज्यते। किं चेदं मणिमन्त्रौषधमिन्द्रजालं कार्य्येण शिक्षितं यदियमजातानिरुद्धातिशयमध्यवधानप्रविदूरस्थानं च तस्यैव तदवस्थेन्द्रियस्य पुंसः कदाचित्प्रत्यक्षं परोक्षं च येनास्य कदाचित्प्रत्यक्षमुपलम्भनं कदाचिदनुमानं कदाचिदागमः। कार्य्यान्तरव्यवधिरस्य पारोक्ष्यहेतुरिति चेत्, न, कार्य्यजातस्य सदातनत्वात्। अथापि स्यात्कार्य्यान्तराणि पिण्डकपालशर्कराचूर्णकणप्रभृतीनि कुम्भं व्यवदधते, ततः कुम्भस्य पारोक्ष्यं कदाचिदिति। तन्न, तस्य कार्य्यजातस्य कारणात्मनः सदातनत्वेन सर्वदा व्यवधानेन कुम्भस्यात्यन्तानुपलब्धि-प्रसङ्गात्। कादाचित्कत्वे वा कार्य्यजातस्य न कारणात्मत्वं, नित्यत्वानित्यत्वलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गस्य
भामती-व्याख्या
संशय— कणाद और गौतम के मतवादों के अनुरोध पर जगदुपादानत्व-प्रतिपादक वेदान्त-वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय न किया जाय ? अथवा निःसंकोच समन्वय किया जाय ?
पूर्वपक्ष— प्रपञ्चरूप कार्य अपने कारण से सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि अभेद में कार्य-कारणभाव ही उपपन्न नहीं होता एवं विद्यमान या सिद्ध पदार्थ के लिए 'कुरु' या 'करोमि'— इस प्रकार 'डुकृञ्' धातु का प्रयोग ही सम्भव नहीं होता, क्योंकि 'करोति' का अर्थ होता है— 'निष्पादयति' या 'असन्तं सन्तं विधत्ते', किन्तु जो कार्यकारणरूप में पहले से ही विद्यमान है, उसे अभूत या असत् नहीं कहा जा सकता कि जिसे सत् करने के लिए कर्त्ता पुरुष की प्रवृत्ति होती। कार्य की उत्पत्ति के लिए नहीं, अभिव्यक्ति करने के लिए कर्त्ता की प्रवृत्ति होती है— ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि अभिव्यक्ति भी कारणरूप में सत् ही मानी जाती है, असत् नहीं। अभिव्यक्ति को यदि कारणरूपेण सत् नहीं माना जाता, तब अभिव्यङ्ग्यरूप कार्य को भी कारणरूपेण सत् मानना व्याहत हो जाता है, क्योंकि वही पदार्थ उसी समय सत् भी और असत् भी— यह युक्ति-संगत नहीं।
सांख्य-सम्मत कार्य पदार्थ ने क्या किसी जादूगर से कोई मणि या औषध प्राप्त कर ली है ? अथवा कोई मन्त्र सीख लिया है ? कि न कभी उत्पन्न होता है और न नष्ट, बराबर बना रहता है, न कभी व्यवहित होता है और न कभी दूर। फिर भी स्वस्थ एवं पटु इन्द्रियवाले उसी सांख्य पुरुष को यह कार्य कभी प्रत्यक्ष होता है और कभी परोक्ष। परोक्षरूप में भी वह (कार्य) कभी अनुमित होता है—
“असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात्।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम्।।” (सा. का. ९)
वही कार्य उसी पुरुष को कभी आगम के द्वारा अधिगत होता है— “तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तगमात् सिद्धम्” (सां. का. ६)। 'यद्यपि मृत्तिका में घट, मणिक, मल्लिकादि सभी कार्य हैं, तथापि एक कार्य की उपलब्धि से व्यवहित होने के कारण कार्यान्तर की उपलब्धि नहीं होती'— ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि समस्त कार्य सदातन माने जाते हैं, अतः घट की उपलब्धि होगी ? अर्थात् घट की आश्रयीभूत मृत्तिका में घट से भिन्न पिण्ड, कपाल, शर्करा (कपालिका), चूर्ण और कणादि कार्य घट के व्यवधायक रहते हैं, अतः घट परोक्ष हो जाता है— ऐसी व्यवस्था जो की जाती है, वह उचित नहीं, क्योंकि समस्त कार्य अपने कारण के रूप में सदैव रहता है, व्यवधायक के सदैव रहने पर घट की कभी भी उपलब्धि नहीं होगी। यदि कार्य की सदैव कारणरूपेण अवस्थिति न मान कर कादाचित्क मानी जाती है, तब कार्य