भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८९

तथापि तदवगतिः सत्यमेव फलम् , प्रतिबुद्धस्याप्यबाध्यमानत्वात् । नहि स्वप्नादुत्थितः स्वप्नदृष्टं सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यं मिथ्येति मन्यमानस्तदवगतिमपि मिथ्येति मन्यते कश्चित् । एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन देहमात्रात्मवादो दूषितो वेदितव्यः । तथा च श्रुतिः—‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्त-

भामती यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । लौकिको हि सुप्तोत्थितोऽवगम्यं बाधितं मन्यते न तदवगतिं, तेन यद्यपि परीक्षका अनिर्वचनीयरूषितामवगतिमनिर्वचनीयां निश्चिन्वन्ति तथापि लौकिकाभिप्रायेणैतदुक्तम् । अत्रान्तरे लोकायतिकानां मतमपाकरोति ॐ एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन इति ॐ । यदा खल्वयंञ्चैत्रस्तारक्षवीं व्यात्तविकटदंष्ट्राकरालवदनामुत्तब्धवाभ्रमन्नमस्तकावचुम्बितलाङ्गुलामतिरोषारुणव्यस्तविशालवृत्तलोचनां रोमाञ्चसन्नयोत्फुल्लभीषणां स्फटिकाचलभित्तिप्रतिबिम्बितामभ्यमित्रीणां तनुमास्थाय स्वप्ने प्रतिबुद्धो मानुषीमात्मनस्तनुं पश्यति तदोभयदेहानुगतमात्मानं प्रतिसन्दधानो देहातिरिक्कमात्मानं निश्चिनोति, न तु देहमात्रम् ; तन्मात्रत्वे देहवत्प्रतिसन्धानाभावप्रसङ्गात् । कथं चेतदुपपद्येत यदि स्वप्नदृशोऽवगतिरबाधिता स्यात् तद्बाधे तु प्रतिसन्धानाभाव इति । असत्याच्च सत्यप्रतीतिः श्रुतिसिद्धाऽन्वयव्यतिरेकसिद्धा चेत्याह ॐ तथाच श्रुतिः इति ॐ । ॐ तथाकारादि इति ॐ । यद्यपि रेखास्वरूपं सत्यं तथापि

भामती-व्याख्या है—"तत्र ब्रूमः—यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य"। लौकिक पुरुष सो कर जागने पर यद्यपि स्वाप्न ज्ञान के विषयीभूत गज, वाजि आदि पदार्थों को मिथ्या मानता है, तथापि उनके ज्ञान को मिथ्या नहीं, सत्य ही मानता है। ज्ञान को भी केवल अविवेकी पुरुष की दृष्टि से ही सत्य कहा जा सकता है, विवेचक ( परीक्षक ) पुरुष की दृष्टि से नहीं, क्योंकि वह स्वप्न के अनिर्वचनीय गजादि पदार्थों से विशिष्ट ज्ञान को भी अनिर्वचनीय ही मानता है।

देहात्मवादी चार्वाक के मत का प्रसङ्गतः अपाकरण किया जाता है—'एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधेन'। आशय यह है कि स्वप्न-काल में जब चैत्रनामक पुरुष तरक्षु ( व्याघ्र ) का ऐसा शरीर धारण करता है, जिसका मुख पूरा खुला है, बड़ी-बड़ी विकराल दाढ़ें निकल रही हैं, क्रोधावेश में जिसकी लम्बी लांगूल ( पूँछ ) आकाश में ऊपर तन कर व्याघ्र के अपने ही शिर पर धनुषाकार झुकी हुई है, दोनों नेत्रों के विशाल अङ्गारे धधक रहे हैं, रोंगटे खड़े हैं, जो स्फटिकमय पर्वत की चमकीली स्वच्छ भित्ति में प्रतिबिम्बित-सा है, जिसकी मुद्रा शत्रु-संहारोन्मुख है। जब स्वप्न टूटता है और चैत्र जाग जाता है, तब वह अपने को मनुष्य शरीर में बिस्तर पर लेटा हुआ पाता है। चैत्र को यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि स्वप्न में मुझे ही व्याघ्र का भयङ्कर शरीर मिला और छूट गया—इस प्रकार स्वप्नानुभूति का अनुसन्धाता चैत्रात्मा अपने को शरीरादि से भिन्न समझ लेता है, शरीरमात्र मैं हूँ—ऐसा कभी नहीं मानता, क्योंकि आत्मा के शरीर-मात्रस्वरूप होने पर जैसे स्वाप्न शरीर का अभाव हो जाता है, वैसे ही उक्त अनुसन्धान का भी अभाव हो जायगा ।

यह सब कुछ ( देहात्मवाद-निरासादि ) उपपन्न कब होगा ? जब कि स्वप्न-द्रष्टा का ज्ञान अबाधित हो । अन्यथा ( स्वाप्न ज्ञान के बाधित होने पर ) उस ज्ञान को स्वाप्न शरीर का ही धर्म मानना होगा, स्वाप्न शरीर का जाग्रत् अवस्था में बाध हो जाने पर मनुष्य शरीर का उसकी स्मरण नहीं होगा, क्योंकि अन्य व्यक्ति के द्वारा अनुभूत वस्तु का अन्य को स्मरण नहीं होता। अबाधित ज्ञान को बाधित शरीर का धर्म नहीं माना जा सकता, अतः शरीर से अतिरिक्त अबाधित आत्मा मान कर ही अनुभवित्ता और स्मर्ता के एकत्व-प्रत्यभिज्ञान का सामञ्जस्य करना होगा । असत्य पदार्थ से सत्य प्रतीति श्रुति से