भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४ |
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प्रयोजनं क्रियत इति, नैष दोषः; शङ्काविषादिनिमित्तमरणादिकार्योपलब्धेः, स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात् । तत्कार्यमप्यनृतमेवेति चेद् ब्रूयात्, तत्र ब्रूमः - यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यमनृतं,
भामती
धूममहिष्या वह्निज्ञानं सत्यं स्यात् । नहि चक्षुषो रूपज्ञानं सत्यमुपजायत इति रसादिज्ञानेनापि ततः सत्येन भवितव्यम् । यतो नियमो हि स तादृशः सत्यानां यतः कुतश्चित् किञ्चिदेव जायत इत्येवमसत्यानामपि नियमो यतः कुतश्चिदसत्यात्सत्यं कुतश्चिदसत्यं यथा दीर्घत्वादेर्वर्णेषु समारोपितत्वाविशेषेऽप्यजीनमित्यतो ज्यानिविरहमवगच्छन्ति सत्यम्, अजिनमित्यतस्तु समारोपितदीर्घभावाज्ज्यानिविरहमवगच्छन्तो भवन्ति भ्रान्ताः । न चोभयत्र दीर्घसमारोपं प्रति कश्चिदस्ति भेदस्तस्मादुपपन्नमसत्यादपि सत्यस्योदय इति । निदर्शनान्तरमाह ॐ स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । यथा सांसारिको जाग्रद्भुजङ्गं दृष्ट्वा पलायते ततश्च न दंशवेदनामाप्नोति, पिपासुः सलिलमालोक्य पातुं प्रवर्त्तते ततस्तदासाद्य पायम्पायमाप्यायितः सुखमनुभवति, एवं स्वप्नान्तिकेऽपि तदवस्थं सर्वमित्यसत्यात् कार्यसिद्धिः । शङ्कते ॐ तत्कार्यमप्यनृतमेव इति ॐ । एवमपि नासत्यात् सत्यस्य सिद्धिरुक्तैत्यर्थः । परिहरति ॐ तत्र ब्रूमः,
भामती-व्याख्या
सत्य की उत्पत्ति है । हमारा कहना यह नहीं कि सभी असत्य पदार्थों से सत्य की उत्पत्ति होती है । यदि वैसा कहते, तब अवश्य समारोपित धूम की आधारभूत धूम-महिषी (कुहरा) के द्वारा वह्नि की अनुमिति प्रमा होनी चाहिए । यह कोई आवश्यक नहीं कि चक्षु से उत्पन्न रूप-ज्ञान सत्य होता है, तो उससे रसादि का ज्ञान भी सत्य होगा, क्योंकि नियम या स्वभाव ही ऐसा है कि किसी सत्य पदार्थ से उत्पन्न कोई ही ज्ञान सत्य होता है, सभी ज्ञान नहीं । इसी प्रकार असत्य पदार्थों का भी नियम ऐसा ही है कि किसी ही असत्य पदार्थ से कोई ज्ञान सत्य होता है और किसी असत्य पदार्थ से जायमान ज्ञान असत्य होता है । जैसे कि ध्वनि के सभी दीर्घत्वह्रस्वत्वादि धर्म वर्णों में समानरूप से आरोपित हैं, तथापि दीर्घ 'अजीन' [ 'ज्या वयोहानौ' धातु के क्तान्त ] शब्द से ही जीर्णत्वाभाव का सत्य ज्ञान होता है, ह्रस्व 'अजिन' शब्द से नहीं, अतः जो लोग 'अजिन' शब्द को 'अजीन' सुनकर जीर्ण-भावाभाव का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन्हें भ्रान्त ही माना जाता है, सत्यज्ञानवान् नहीं । 'अजीन' और 'अजिन'— इन दोनों शब्दों में दीर्घता का आरोप समान है [ 'ज्या वयोहानौ' से निष्पन्न 'अजीन' शब्द के 'ई' वर्ण में भी दीर्घत्व आरोपित है, क्योंकि वर्ण नित्य और निर्विकार है, उसके व्यञ्जकीभूत नाद में जो दीर्घत्वादि धर्म हैं, उन्हीं की प्रतीति वर्णों में मानी जाती है, जैसा कि "नादवृद्धिपरा" (जै. सू. १।१।१७) इस जैमिनि-सूत्र में स्पष्ट किया गया है। चर्म-वाचक 'अजिन' शब्द में श्रोता को 'अजीन' शब्द का भ्रम हो गया ]। फलतः यह सिद्ध हो गया कि असत्य साधन से भी सत्य कार्य की निष्पत्ति होती है। इसी अर्थ में दूसरा दृष्टान्त प्रदर्शित किया जाता है— "स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात्" । जैसे सांसारिक पुरुष जाग्रत्काल में सर्प को देख कर भाग जाता है, अतः सर्प-दंश-जनित दुःख झेलना नहीं पड़ता और वही पुरुष ग्रीष्म के समय यात्रा-पथ में प्राप्त गंगा का दर्शन करके प्रसन्न हो जाता है, गंगा-जल पी-पी कर तृप्ति सुख का अनुभव करता है। वैसे ही स्वप्न-काल में आरोपित सर्प के दंश से दुःख एवं आरोपित सलिल के पान से सुख का अनुभव करता है। इस प्रकार असत्यपदार्थों से कार्य-सिद्धि देखी जाती है।
शङ्कावादी कहता है कि "तत् कार्यमप्यनृतमेव"। जब कार्य भी असत्य ही है, तब असत्य साधन से सत्य कार्य की सिद्धि नहीं होती। उक्त शङ्का का समाधान किया जाता