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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
५७८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १४

प्रयोजनं क्रियत इति, नैष दोषः; शङ्काविषादिनिमित्तमरणादिकार्योपलब्धेः, स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात् । तत्कार्यमप्यनृतमेवेति चेद् ब्रूयात्, तत्र ब्रूमः - यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यमनृतं,


भामती

धूममहिष्या वह्निज्ञानं सत्यं स्यात् । नहि चक्षुषो रूपज्ञानं सत्यमुपजायत इति रसादिज्ञानेनापि ततः सत्येन भवितव्यम् । यतो नियमो हि स तादृशः सत्यानां यतः कुतश्चित् किञ्चिदेव जायत इत्येवमसत्यानामपि नियमो यतः कुतश्चिदसत्यात्सत्यं कुतश्चिदसत्यं यथा दीर्घत्वादेर्वर्णेषु समारोपितत्वाविशेषेऽप्यजीनमित्यतो ज्यानिविरहमवगच्छन्ति सत्यम्, अजिनमित्यतस्तु समारोपितदीर्घभावाज्ज्यानिविरहमवगच्छन्तो भवन्ति भ्रान्ताः । न चोभयत्र दीर्घसमारोपं प्रति कश्चिदस्ति भेदस्तस्मादुपपन्नमसत्यादपि सत्यस्योदय इति । निदर्शनान्तरमाह ॐ स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । यथा सांसारिको जाग्रद्भुजङ्गं दृष्ट्वा पलायते ततश्च न दंशवेदनामाप्नोति, पिपासुः सलिलमालोक्य पातुं प्रवर्त्तते ततस्तदासाद्य पायम्पायमाप्यायितः सुखमनुभवति, एवं स्वप्नान्तिकेऽपि तदवस्थं सर्वमित्यसत्यात् कार्यसिद्धिः । शङ्कते ॐ तत्कार्यमप्यनृतमेव इति ॐ । एवमपि नासत्यात् सत्यस्य सिद्धिरुक्तैत्यर्थः । परिहरति ॐ तत्र ब्रूमः,

भामती-व्याख्या

सत्य की उत्पत्ति है । हमारा कहना यह नहीं कि सभी असत्य पदार्थों से सत्य की उत्पत्ति होती है । यदि वैसा कहते, तब अवश्य समारोपित धूम की आधारभूत धूम-महिषी (कुहरा) के द्वारा वह्नि की अनुमिति प्रमा होनी चाहिए । यह कोई आवश्यक नहीं कि चक्षु से उत्पन्न रूप-ज्ञान सत्य होता है, तो उससे रसादि का ज्ञान भी सत्य होगा, क्योंकि नियम या स्वभाव ही ऐसा है कि किसी सत्य पदार्थ से उत्पन्न कोई ही ज्ञान सत्य होता है, सभी ज्ञान नहीं । इसी प्रकार असत्य पदार्थों का भी नियम ऐसा ही है कि किसी ही असत्य पदार्थ से कोई ज्ञान सत्य होता है और किसी असत्य पदार्थ से जायमान ज्ञान असत्य होता है । जैसे कि ध्वनि के सभी दीर्घत्वह्रस्वत्वादि धर्म वर्णों में समानरूप से आरोपित हैं, तथापि दीर्घ 'अजीन' [ 'ज्या वयोहानौ' धातु के क्तान्त ] शब्द से ही जीर्णत्वाभाव का सत्य ज्ञान होता है, ह्रस्व 'अजिन' शब्द से नहीं, अतः जो लोग 'अजिन' शब्द को 'अजीन' सुनकर जीर्ण-भावाभाव का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उन्हें भ्रान्त ही माना जाता है, सत्यज्ञानवान् नहीं । 'अजीन' और 'अजिन'— इन दोनों शब्दों में दीर्घता का आरोप समान है [ 'ज्या वयोहानौ' से निष्पन्न 'अजीन' शब्द के 'ई' वर्ण में भी दीर्घत्व आरोपित है, क्योंकि वर्ण नित्य और निर्विकार है, उसके व्यञ्जकीभूत नाद में जो दीर्घत्वादि धर्म हैं, उन्हीं की प्रतीति वर्णों में मानी जाती है, जैसा कि "नादवृद्धिपरा" (जै. सू. १।१।१७) इस जैमिनि-सूत्र में स्पष्ट किया गया है। चर्म-वाचक 'अजिन' शब्द में श्रोता को 'अजीन' शब्द का भ्रम हो गया ]। फलतः यह सिद्ध हो गया कि असत्य साधन से भी सत्य कार्य की निष्पत्ति होती है। इसी अर्थ में दूसरा दृष्टान्त प्रदर्शित किया जाता है— "स्वप्नदर्शनावस्थस्य च सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यदर्शनात्" । जैसे सांसारिक पुरुष जाग्रत्काल में सर्प को देख कर भाग जाता है, अतः सर्प-दंश-जनित दुःख झेलना नहीं पड़ता और वही पुरुष ग्रीष्म के समय यात्रा-पथ में प्राप्त गंगा का दर्शन करके प्रसन्न हो जाता है, गंगा-जल पी-पी कर तृप्ति सुख का अनुभव करता है। वैसे ही स्वप्न-काल में आरोपित सर्प के दंश से दुःख एवं आरोपित सलिल के पान से सुख का अनुभव करता है। इस प्रकार असत्यपदार्थों से कार्य-सिद्धि देखी जाती है।

शङ्कावादी कहता है कि "तत् कार्यमप्यनृतमेव"। जब कार्य भी असत्य ही है, तब असत्य साधन से सत्य कार्य की सिद्धि नहीं होती। उक्त शङ्का का समाधान किया जाता

असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८९

तथापि तदवगतिः सत्यमेव फलम् , प्रतिबुद्धस्याप्यबाध्यमानत्वात् । नहि स्वप्नादुत्थितः स्वप्नदृष्टं सर्पदंशनोदकस्नानादिकार्यं मिथ्येति मन्यमानस्तदवगतिमपि मिथ्येति मन्यते कश्चित् । एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन देहमात्रात्मवादो दूषितो वेदितव्यः । तथा च श्रुतिः—‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात्त-

भामती यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य इति ॐ । लौकिको हि सुप्तोत्थितोऽवगम्यं बाधितं मन्यते न तदवगतिं, तेन यद्यपि परीक्षका अनिर्वचनीयरूषितामवगतिमनिर्वचनीयां निश्चिन्वन्ति तथापि लौकिकाभिप्रायेणैतदुक्तम् । अत्रान्तरे लोकायतिकानां मतमपाकरोति ॐ एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधनेन इति ॐ । यदा खल्वयंञ्चैत्रस्तारक्षवीं व्यात्तविकटदंष्ट्राकरालवदनामुत्तब्धवाभ्रमन्नमस्तकावचुम्बितलाङ्गुलामतिरोषारुणव्यस्तविशालवृत्तलोचनां रोमाञ्चसन्नयोत्फुल्लभीषणां स्फटिकाचलभित्तिप्रतिबिम्बितामभ्यमित्रीणां तनुमास्थाय स्वप्ने प्रतिबुद्धो मानुषीमात्मनस्तनुं पश्यति तदोभयदेहानुगतमात्मानं प्रतिसन्दधानो देहातिरिक्कमात्मानं निश्चिनोति, न तु देहमात्रम् ; तन्मात्रत्वे देहवत्प्रतिसन्धानाभावप्रसङ्गात् । कथं चेतदुपपद्येत यदि स्वप्नदृशोऽवगतिरबाधिता स्यात् तद्बाधे तु प्रतिसन्धानाभाव इति । असत्याच्च सत्यप्रतीतिः श्रुतिसिद्धाऽन्वयव्यतिरेकसिद्धा चेत्याह ॐ तथाच श्रुतिः इति ॐ । ॐ तथाकारादि इति ॐ । यद्यपि रेखास्वरूपं सत्यं तथापि

भामती-व्याख्या है—"तत्र ब्रूमः—यद्यपि स्वप्नदर्शनावस्थस्य"। लौकिक पुरुष सो कर जागने पर यद्यपि स्वाप्न ज्ञान के विषयीभूत गज, वाजि आदि पदार्थों को मिथ्या मानता है, तथापि उनके ज्ञान को मिथ्या नहीं, सत्य ही मानता है। ज्ञान को भी केवल अविवेकी पुरुष की दृष्टि से ही सत्य कहा जा सकता है, विवेचक ( परीक्षक ) पुरुष की दृष्टि से नहीं, क्योंकि वह स्वप्न के अनिर्वचनीय गजादि पदार्थों से विशिष्ट ज्ञान को भी अनिर्वचनीय ही मानता है।

देहात्मवादी चार्वाक के मत का प्रसङ्गतः अपाकरण किया जाता है—'एतेन स्वप्नदृशोऽवगत्यबाधेन'। आशय यह है कि स्वप्न-काल में जब चैत्रनामक पुरुष तरक्षु ( व्याघ्र ) का ऐसा शरीर धारण करता है, जिसका मुख पूरा खुला है, बड़ी-बड़ी विकराल दाढ़ें निकल रही हैं, क्रोधावेश में जिसकी लम्बी लांगूल ( पूँछ ) आकाश में ऊपर तन कर व्याघ्र के अपने ही शिर पर धनुषाकार झुकी हुई है, दोनों नेत्रों के विशाल अङ्गारे धधक रहे हैं, रोंगटे खड़े हैं, जो स्फटिकमय पर्वत की चमकीली स्वच्छ भित्ति में प्रतिबिम्बित-सा है, जिसकी मुद्रा शत्रु-संहारोन्मुख है। जब स्वप्न टूटता है और चैत्र जाग जाता है, तब वह अपने को मनुष्य शरीर में बिस्तर पर लेटा हुआ पाता है। चैत्र को यह प्रत्यभिज्ञा होती है कि स्वप्न में मुझे ही व्याघ्र का भयङ्कर शरीर मिला और छूट गया—इस प्रकार स्वप्नानुभूति का अनुसन्धाता चैत्रात्मा अपने को शरीरादि से भिन्न समझ लेता है, शरीरमात्र मैं हूँ—ऐसा कभी नहीं मानता, क्योंकि आत्मा के शरीर-मात्रस्वरूप होने पर जैसे स्वाप्न शरीर का अभाव हो जाता है, वैसे ही उक्त अनुसन्धान का भी अभाव हो जायगा ।

यह सब कुछ ( देहात्मवाद-निरासादि ) उपपन्न कब होगा ? जब कि स्वप्न-द्रष्टा का ज्ञान अबाधित हो । अन्यथा ( स्वाप्न ज्ञान के बाधित होने पर ) उस ज्ञान को स्वाप्न शरीर का ही धर्म मानना होगा, स्वाप्न शरीर का जाग्रत् अवस्था में बाध हो जाने पर मनुष्य शरीर का उसकी स्मरण नहीं होगा, क्योंकि अन्य व्यक्ति के द्वारा अनुभूत वस्तु का अन्य को स्मरण नहीं होता। अबाधित ज्ञान को बाधित शरीर का धर्म नहीं माना जा सकता, अतः शरीर से अतिरिक्त अबाधित आत्मा मान कर ही अनुभवित्ता और स्मर्ता के एकत्व-प्रत्यभिज्ञान का सामञ्जस्य करना होगा । असत्य पदार्थ से सत्य प्रतीति श्रुति से

५८० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४

स्मिन्त्स्वप्ननिदर्शने' ( छा० ५।२।९ ) इत्यसत्येन स्वप्नदर्शनेन सत्यायाः समृद्धेः प्रतिपत्तिं दर्शयति । तथा प्रत्यक्षदर्शनेषु केषुचिदरिष्टेषु जातेषु 'न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात्' इत्युक्त्वा 'अथ यः स्वप्ने पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति' इत्यादिना तेन तेनासत्येनैव स्वप्नदर्शनेन सत्यं मरणं सूच्यत इति दर्शयति । प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानामीदृशेन स्वप्नदर्शनेन साध्वागमः सूच्यत ईदृशेना- साध्वागम इति । तथाऽकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिर्दृष्टा रेखानृताक्षरप्रतिपत्तेः । अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकं नातः परं किंचिदाकाङ्क्ष्यमस्ति । यथा हि लोके यजेतेत्युक्ते किं केन कथमित्याकाङ्क्ष्यते, नैवं 'तत्त्वमसि' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्ते किंचिदन्यदाकाङ्क्ष्यमस्ति, सर्वात्मकत्वविषयत्वावगतेः । सति ह्यन्यस्मिन्नवशिष्य-

भामती

तद्यथासङ्केतमसत्यं, नहि सङ्केतयितारः सङ्केतयन्तीदृशेन रेखाभेदेनायं वर्णः प्रत्येतव्यः, अपि त्वीदृशो रेखाभेदोऽकार ईदृशश्च ककार इति, तथा चासमीचीनात् सङ्केतात्समीचीनवर्णावगतिरिति सिद्धम् । यच्चोक्तमेकत्वांशेन ज्ञानमोक्षव्यवहारः सेत्स्यति नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयो लौकिकश्च व्यवहारः सेत्स्यतीति तत्राह ॐ अपि चान्त्यमिदं प्रमाणम् इति ॐ । यदि खल्वेकत्वानेकत्वनिबन्धनौ व्यवहारा- वेकस्य पुंसोऽपर्यायेण सम्भवतस्ततस्तदर्थमुभयसद्भावः कल्प्येत, न त्वेतदस्ति, नह्येकत्वावगतिनिबन्धनः कश्चिदस्ति व्यवहारस्तदवगतेः सर्वोत्तरत्वात् । तथाहि तत्त्वमसीत्येकात्म्यावगतिः समस्तप्रमाणतत्फल- तद्व्यवहारानपबाधमानैवोदीयते, नैतस्याः परस्तात् किञ्चिदनुकूलं प्रतिकूलं चास्ति यदपेक्षेत येन चेयं

भामती-व्याख्या

सिद्ध है—"तथा च श्रुतिः"। यद्यपि स्वाप्न-दर्शन सत्य है, तथापि स्त्री आदि स्वाप्न विषय असत्य हैं, अतः ऐसे विषय से विशिष्ट ज्ञान को भी असत्य ही माना गया है। सत्य और असत्य का कार्य-कारणभाव केवल श्रुति-सिद्ध ही नहीं, अन्वय-व्यतिरेक से भी सिद्ध है—"प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानाम्"। यहाँ नैयायिकादि-सम्मत कार्य-कारणभाव के नियामक अन्वय और व्यतिरेक का ग्रहण किया गया है, जिसके आधार पर विशेष स्वप्न-दर्शन से विशेष ( समृद्धि या मरणादि ) कार्य की सिद्धि होती है। जाग्रत्कालीन निदर्शन से भी यही सिद्ध होता है—"तथाकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिः"। मुख से बोला जानेवाला अकार वर्ण सत्य और 'अ' रेखा असत्य अकार है, इनका कार्य-कारणभाव लोक-प्रसिद्ध है। यद्यपि रेखा का स्वरूप सत्य है, तथापि उस रेखा से जो संकेत किया जाता है कि यह (रेखा) अवर्ण है, वह असत्य है, क्योंकि संकेतयिता पुरुष ऐसा संकेत नहीं करते कि 'इस रेखा को देखकर अकार या ककार का बोध करना चाहिए', अपितु 'यह रेखा ही अकार है और यह रेखा ककार'—ऐसा संकेत असत्य है। इस प्रकार के असमीचीन ( असत्य ) संकेत से समीचीन वर्णावगति होती है— यह सिद्ध हो जाता है।

यह जो कहा गया था कि 'एकत्वांश के ज्ञान से मोक्ष-व्यवहार और नानात्वांश के ज्ञान से कर्मकाण्ड-सम्बन्धी व्यवहार सिद्ध होगा', उस पर व्यवस्था दी जाती है—"अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकम्"। आशय यह है कि यदि एकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त और अनेकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त दोनों व्यवहार एक ही पुरुष में क्रमशः सम्भव हो जाते, तब अवश्य ही एकत्व और नानात्व—इन दोनों धर्मों की कल्पना कर सकते थे, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि एकत्व की अवगति वह अन्तिम कार्य है, जिसके अनन्तर कोई व्यवहार रहता ही नहीं। "तत्त्वमसि"—इस प्रकार एकात्मत्व की अवगति अपने से पूर्वभावी समस्त (प्रमाण, तज्जन्य अर्थावगति और अर्थविषयक ) व्यवहार का बाध करती हुई ही उदय होती

असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८१

माणेऽर्थे आकाङ्क्षा स्यात् । न त्वात्मैकत्वव्यतिरेकेणावशिष्यमाणोऽन्योऽर्थोऽस्ति य आकाङ्क्ष्येत । न चेयमवगतिर्नोत्पद्यत इति शक्यं वक्तुम् 'तद्धास्य विजज्ञौ' ( छा० ६।१६।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अवगतिसाधनानां च श्रवणादीनां वेदानुवचनादीनां च विधानात् । न चेयमवगतिरनर्थिका भ्रान्तिर्वेति शक्यं वक्तुम् । अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात्, बाधकज्ञानान्तराभावाच्च । प्राक्चात्मैकत्वावगतेरव्याहतः सर्वः सत्यानृत-

भामती

प्रतिक्षिप्येत, तत्रानुकूलप्रतिकूलनिवारणाज्ञातः परं किञ्चिदाकांक्ष्यमिति । न चेयमवगतिर्दुलिक्षीरप्रायेत्याह ॐ न चेयम् इति ॐ । स्यादेतत् -- अन्त्या चेदियमवगतिर्निष्प्रयोजना तर्हि तथा च न प्रेक्षावद्भिरुपादीयेत, प्रयोजनवत्त्वे वा नान्त्या स्यादित्यत आह ॐ न चेयमवगतिरनर्थिका ॐ । कुतः ? ॐ अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात् ॐ । नहीयमुत्पन्ना सती पश्चादविद्यां निवर्त्तयति येन नान्त्या स्यात्, किन्तुविद्याविरोधिसद्भावतया तन्निवृत्त्यात्मैवोद्यते । अविद्यानिवृत्तिश्च न तत्कार्यतया फलमपि त्विष्टतयेष्टलक्षणत्वात् फलस्येति । प्रतिकूलं पराचीनं निराकर्तुमाह ॐ भ्रान्तिर्वा इति ॐ । कुतः ? ॐ बाधक इति ॐ । स्यादेतत् - मा भूदेकत्वनिबन्धनो व्यवहारोऽनेकत्वनिबन्धनस्त्वस्ति, तदेव हि सकलामुद्वहति लोकयात्राम्, अतस्तत्सिद्ध्यर्थमनेकत्वस्य कल्पनीयं तात्त्विकत्वमित्यत आह ॐ प्राक् च इति ॐ । व्यवहारो हि बुद्धिपूर्वककारिणां बुद्धयोपपद्यते, न त्वस्यास्तात्त्विकत्वेन, भ्रान्त्यापि तदुपपत्तेरित्यावेदितम् ।

भामती-व्याख्या

है। उस (एकत्व-विषयिणी) अवगति के पश्चात् कुछ भी अनुकूल या प्रतिकूल कर्त्तव्य शेष ही नहीं रहता, जिसकी अपेक्षा या उपेक्षा होती। 'यह अवगति डुलि (कछुई) के दूध के समान अत्यन्त अप्रसिद्ध और अलीक है' - ऐसा नहीं कह सकते - "न चेयमवगतिर्नोत्पद्यते"। "तद्धास्य विजज्ञौ" (छा० ६।१६।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मावगति का अपलाप नहीं किया जा सकता। 'उक्त अवगति यदि अन्तिम कार्य है, तब उसका कोई प्रयोजन पश्चात् सिद्ध न होने के कारण वह निष्प्रयोजन क्यों नहीं ? निष्प्रयोजन पदार्थ के सम्पादन में पुरुष-प्रवृत्ति सम्भव नहीं, अतः उस अवगति का कुछ प्रयोजन (लाभ) यदि माना जाता है, तब अन्तिम कैसे ? इस शङ्का का अनुवाद करते हैं - "न चेयमवगतिरनर्थिका", क्योंकि अविद्या की निवृत्ति उसका फल या प्रयोजन माना जाता है। आशय यह है कि उक्त अवगति स्वयं उत्पन्न होकर अविद्या-निवृत्तिरूप फल को उत्पन्न करती, तब अवगति को अन्तिम कार्य नहीं कहा जा सकता था किन्तु अवगति नाम है - ब्रह्म-साक्षात्कार का, ब्रह्म-साक्षात्कार ब्रह्मरूप होने के कारण नित्य-सिद्ध है। अविद्या का विरोधिस্বরূপ है अवगति, अतः अवगति की अभिव्यक्ति होने पर अविद्या-निवृत्ति प्रकट होती है। अविद्या-निवृत्ति भी विद्यात्मक ब्रह्मस्वरूप है, अतः वह जनित नहीं होती, उसमें जन्यता-प्रयुक्त फलरूपता का व्यवहार नहीं होता, अपितु इष्यमाण (पुरुषाभिलषित) होने के कारण अविद्या-निवृत्ति को फल या पुरुषार्थ माना जाता है। उक्त अवगति के पश्चाद्भावी प्रतिकूल पदार्थ का निराकरण किया जाता है - "भ्रान्तिर्वा"। उस अन्तिम अवगति के पश्चात् यदि कोई भ्रान्ति होगी, तब उसका अन्य बाधक कौन होगा ?

यदि एकत्वावगति से व्यवहार का निर्वाह नहीं होता, तब अनेकत्व-निबन्धन व्यवहार तो उपपन्न हो जाता है, अतः अनेकत्व सम्पूर्ण लोक-यात्रा का उद्वाहक होने के कारण तात्त्विक क्यों न मान लिया जाय ? इस शङ्का का निरास करते हैं - "प्राक् चात्मैकत्वावगतेः"। सारांश यह है कि बुद्धिपूर्वककारी पुरुषों का व्यवहार केवल ज्ञान के आधार पर सम्पन्न हो जाता है, ज्ञान प्रमात्मक ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं, भ्रम ज्ञान से भी व्यवहार

५८२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४

व्यवहारो लौकिको वैदिकश्चेत्यवोचाम । तस्मादन्त्येन प्रमाणेन प्रतिपादित आत्मैकत्वे समस्तस्य प्राचीनस्य भेदव्यवहारस्य बाधितत्वान्नानेकात्मकब्रह्मकल्पनावकाशोऽस्ति । ननु मृदादिदृष्टान्तप्रणयनात्परिणामवद्ब्रह्म शास्त्रस्याभिमतमिति गम्यते । परिणामिनो हि मृदादयोऽर्था लोके समधिगता इति । नेत्युच्यते, ‘स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म’ ( बृ० ४।४।२५ ) ‘स एष नेति नेत्यात्मा’ ( बृ० ३।९।२६ ), ‘अस्थूलमण्व’ ( बृ० ३।८।८ ) इत्याद्याभ्यः सर्वविक्रियाप्रतिषेधश्रुतिभ्यो ब्रह्मणः कूटस्थत्वावगमात् । न ह्येकस्य ब्रह्मणः परिणामधर्मत्वं तद्रहितत्वं च शक्यं प्रतिपत्तुम् । स्थितिगतिवत्स्यादिति चेत्—न, कूटस्थस्येति विशेषणात् । नहि कूटस्थस्य ब्रह्मणः


भामती

सत्यञ्च तदविसंवादादनृतञ्च विचारासहतयाऽनिर्वच्यत्वात् । अन्त्यस्यैकात्म्यज्ञानस्यानपेक्षतया बाधकत्वमनेकत्वज्ञानस्य च प्रतियोगिग्रहापेक्षया दुर्बलत्वेन बाध्यत्वं वदन् प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मादन्त्येन प्रमाणेन इति ॐ । स्यादेतत्—न वयमनेकत्वव्यवहारसिद्ध्यर्थमनेकत्वस्य तात्त्विकत्वं कल्पयामः, किन्तु श्रौतमेवास्य तात्त्विकत्वमिति चोदयति ॐ ननु मृदादि इति ॐ । परिहरति ॐ नेत्युच्यते इति ॐ । मृदादिदृष्टान्तेन हि कथञ्चित्परिणाम उन्नेयः, न च शक्य उन्नेतुमपि, मृत्तिकेत्येव सत्यमिति कारणमात्रसत्यत्वावधारणेन कार्यस्यानृतत्वप्रतिपादनात् साक्षात् कूटस्थनित्यत्वप्रतिपादिकास्तु सन्ति सहस्रशः श्रुतय इति न परिणामधर्मता ब्रह्मणः । अथ कूटस्थस्यापि परिणामः कस्मान्न भवतीत्यत आह ॐ नह्येकस्य इति ॐ । शङ्कते ॐ स्थितिगतिवद् इति ॐ । यथैकवाणाश्रये गतिनिवृत्ती एवमेकस्मिन् ब्रह्मणि परिणा-


भामती-व्याख्या

का निर्वाह हो जाता है, अतः व्यवहार-निर्वाहक ज्ञान के लिए उसके विषयीभूत अनेकत्व को तात्त्विक मानने की आवश्यकता नहीं। अनेकत्व को तात्त्विक या सत्य इसलिए नहीं कह सकते कि उसका विसंवाद होता है, अतः वह अनृत (मिथ्या) है, क्योंकि विचार की कसौटी पर खरा न उतरने के कारण अनिर्वचनीय है। अन्तिम एकात्मतावगति को अन्य ज्ञान की अपेक्षा न होने के कारण प्रमाण या बाधकरूप एवं अनेकत्वावगति को प्रतियोगिज्ञानादि की अपेक्षा होने के कारण बाध्यरूप बताते हुए प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मादन्त्येन प्रमाणेन प्रतिपादिते"।

अनेकत्व-व्यवहार की सिद्धि के लिए अनेकत्व को तात्त्विक नहीं माना जाता अपितु श्रुति के आधार पर आत्मा में अनेकत्व सिद्ध होता है—इस प्रकार की शंका की जाती है—"ननु मृदादिदृष्टान्तप्रणयनात्परिणामवद् ब्रह्म"। जैसे मृत्तिका घट, शराव आदि अनेक रूपों में परिणत होने के कारण अनेकरूप मानी जाती है वैसे ही ब्रह्म आकाश आदि अनेक रूपों में परिणत होने के कारण अनेकरूप क्यों नहीं ? उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"नेत्युच्यते"। मृदादि दृष्टान्तों के आधार पर परिणामवाद की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि "मृत्तिकेत्येव सत्यम्" इस वाक्य के द्वारा कारणमात्र की सत्यता अवधारित होने के कारण कार्यप्रपञ्च में अनृतत्व सिद्ध किया जाता है एवं ब्रह्म में कूटस्थत्व, नित्यत्व और एकत्व आदि की प्रतिपादिका अनन्त श्रुतियाँ हैं, अतः ब्रह्म को परिणामी कभी भी नहीं कहा जा सकता। कूटस्थ एकतत्त्व को परिणामी क्यों नहीं माना जा सकता—इसका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न ह्येकस्य ब्रह्मणः परिणामधर्मत्वम्"। एक तत्त्व को परिणाम और परिणामाभाव वाला नहीं कहा जा सकता। एक तत्त्व में भी कथित उभयरूपता की शङ्का की जाती है—"स्थितिगतिवत्स्यात्"। अर्थात् जैसे एक ही बाण कभी गति (स्पन्दन) और कभी उसके अभाव (स्थिति) का आश्रय होता है वैसे ही एक ही

असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८३

स्थितिगतिवदनेकधर्माश्रयत्वं संभवति । कूटस्थं च नित्यं ब्रह्म सर्वविक्रियाप्रतिषेधा-
दित्यवोचाम, न च यथा ब्रह्मण आत्मैकत्वदर्शनं मोक्षसाधनम्, एवं जगदाकारपरि-
णामित्वदर्शनमपि स्वतन्त्रमेव कस्मैचित्फलायाभिप्रेयते, प्रमाणाभावात् । कूटस्थब्रह्मा-
त्मत्वविज्ञानादेव हि फलं दर्शयति शास्त्रम्—‘स एष नेति नेत्यात्मा’ इत्युपक्रम्य
‘अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि’ ( बृ० ४।२।४ ) इत्येवंजातीयकम् । तत्रैतत्सिद्धं
भवति—ब्रह्मप्रकरणे सर्वधर्मविशेषरहितब्रह्मदर्शनादेव फलसिद्धौ सत्यां यत्तत्राफलं
श्रूयते ब्रह्मणो जगदाकारपरिणामित्वादि, तद्ब्रह्मदर्शनोपायत्वेनैव विनियुज्यते,
फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गमितिवत्, नतु स्वतन्त्रं फलाय कल्प्यत इति । नहि
परिणामवत्त्वविज्ञानात्परिणामवत्त्वमात्मनः फलं स्यादिति वक्तुं युक्तम् , कूटस्थनित्य-
त्वान्मोक्षस्य । ननु कूटस्थब्रह्मात्मवादिन एकत्वैकान्त्यादीशीत्रीशितव्याभाव ईश्वरका-

भामती

मश्च तदभावश्च कोटस्थं भविष्यत इति । निराकरोति ॐ न, कूटस्थस्येति विशेषणाद् इति ॐ ।
कूटस्थनित्यता हि सदातनी स्वभावावप्रच्युतिः, सा कथं प्रच्युत्या न विरुध्यते ? न च धर्मिणो व्यतिरि-
च्यते धर्मो येन तदुपजनापायाऽपि धर्मो कूटस्थः स्यात् । भेद ऐकान्तिके गवाश्ववद्धर्मधर्मिभावाभावात् ।
बाणादयस्तु परिणामिनः स्थित्या गत्या च परिणमन्त इति । अपि च स्वाध्यायाध्ययनविध्यापादितार्थ-
वत्त्वस्य वेदराशेरेकेनापि वर्णेनानर्थकेन न भवितव्यम्, किं पुनरियता जगतो ब्रह्मयोनित्वप्रतिपादकेन
वाक्यसन्दर्भेण, तत्र फलवद् ब्रह्मदर्शनसमानासनसन्निधावफलं जगद्योनित्वं समाम्नायमानं तदर्थं
सत्तदुपायतयाऽवतिष्ठते नार्थान्तरार्थमित्याह ॐ न च यथा ब्रह्मणः इति ॐ । अतो न परिणामपरत्वमस्ये-
त्यर्थः । तदनन्यत्वमित्यस्य सूत्रस्य प्रतिज्ञाविरोधं श्रुतिविरोधञ्च चोदयति ॐ कूटस्थब्रह्मात्मवादिनः इति ॐ ।

भामती-व्याख्या

ब्रह्म सृष्टि के समय परिणाम और प्रलय के समय परिणामाभाव का आश्रय क्यों नहीं हो सकता ? इस शङ्का का निराकरण किया जाता है—“न, कूटस्थस्येति विशेषणात्” । कूटस्थ-नित्यता नाम है स्वभावाऽप्रच्युति का, वह ब्रह्म में नित्य है। अतः उसकी प्रच्युति कभी नहीं हो सकती । कूटस्थत्वाप्रच्युति के बिना परिणामवाद सम्भव नहीं। धर्मी से धर्मों को अत्यन्त भिन्न नहीं माना जा सकता कि उनकी उत्पत्ति और विनाश की अवस्था में धर्मी कूटस्थ बना रहे। धर्मों को अत्यन्त भिन्न मानने पर गो-अश्व के समान धर्मधर्मिभाव उपपन्न नहीं हो सकता। बाण आदि पदार्थ कूटस्थ न होने के कारण स्थिति और गति के रूप में परिणत हो जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इस विधिवाक्य के द्वारा समस्त वेदराशि में अर्थवत्ता प्रसाधित की गयी है। अतः उसका एक वर्ण भी अनर्थक नहीं हो सकता, फिर भला ब्रह्म की अपरिणामिता के प्रतिपादक अनेक वेदान्तवाक्यों का नैरर्थक्य सम्भव क्योंकर होगा? ब्रह्म के जगदाकारपरिणामित्व का प्रतिपादन करने वाले वेदान्तवाक्यों का स्वतन्त्र कोई फल या प्रयोजन नहीं माना जा सकता क्योंकि ब्रह्मात्मता-दर्शन का फल मोक्ष बताया गया है किन्तु ब्रह्म के प्रपञ्चाकार-परिणामित्व का कोई फल नहीं माना जाता। अतः ‘फलवत्सन्निधौ अफलं तदङ्गं भवति’ इस न्याय के आधार पर सृष्टिप्रक्रिया का प्रतिपादन ब्रह्मावगति का साधनमात्र माना जाता है। भाष्यकार यही कह रहे हैं—‘‘न च यथा ब्रह्मण आत्मैकत्वदर्शनं मोक्षसाधनमेवं जगदाकारपरिणामित्वदर्शनमपि स्वतन्त्रमेव कस्मैचित्फलाय’’। फलतः सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों को परिणामपरक नहीं माना जा सकता। ‘‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’’—इस सूत्र पर प्रतिज्ञाविरोध और श्रुतिविरोध का आक्षेप किया जाता है—‘‘ननु कूटस्थब्रह्मात्मवादिनः’’। अर्थात् ब्रह्म को नित्यकूटस्थ

५८४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १४

रणप्रतिज्ञाविरोध इति चेत्, न; अविद्यात्मकनामरूपबीजव्याकरणापेक्षत्वात् सर्वज्ञत्वस्य। 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः' (तै० २।१) इत्यादिवाक्येभ्यो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वरूपात्सर्वज्ञात्सर्वशक्तेरीश्वराज्जगज्जनिस्थितिमलया नाचेतनात्प्रधानादन्यस्माच्चेत्येषोऽर्थः प्रतिज्ञातः- 'जन्माद्यस्य यतः' (ब्र० सू० १।१।२) इति। सा प्रतिज्ञा तदवस्थैव न तद्विरुद्धोऽर्थः पुनरिहोच्यते। कथं नोच्यतेऽत्यन्तमात्मन एकत्वमद्वितीयत्वं च ब्रुवता? शृणु यथा नोच्यते- सर्वज्ञस्येश्वरस्यात्मभूत इवाविद्याकल्पिते नामरूपे तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये संसारप्रपञ्चबीजभूते सर्वज्ञस्येश्वरस्य मायाशक्तिः प्रकृतिरिति च श्रुतिस्मृत्योरभिलप्येते। ताभ्यामन्यः सर्वज्ञ ईश्वरः, 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म' (छा० ८।१४।१) इति श्रुतेः, 'नामरूपे व्याकरवाणि' (छा० ६।३।२), 'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् यदास्ते' (तै० आ० ३।१२।७), 'एकं बीजं बहुधा यः करोति' (श्वे० ६।१२) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च। एवमविद्याकृतनामरूपोपाध्यनुरोधीश्वरो भवति, व्योमेव घटकरकाद्युपाध्यनुरोधि। स च स्वात्मभूतानेव घटाकाशस्थानीयानविद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपकृतकार्यकरणसंघातानुरोधिनो जीवाख्यान्विज्ञानात्मनः प्रतीष्टे व्यवहारविषये। तदेवमविद्यात्मकोपाधिपरिच्छेदापेक्षमेवेश्वरस्येश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं च, न परमार्थतो विद्यायापास्तसर्वोपाधिस्वरूप आत्मनीशित्रीशितव्यसर्वज्ञत्वादिव्यवहार उपपद्यते। तथा चोक्तम्- 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा' (छा० ७।२४।१) इति। 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' (बृ० ४।५।१५) इत्यादिना च, एवं

भामती

परिहरति ॐ न, अविद्यात्मक इति ॐ। नाम च रूपञ्च ते एव बीजं तस्य व्याकरणं कार्यप्रपञ्चस्तदपेक्षत्वात्तैश्वर्यस्य। एतदुक्तं भवति— न तात्त्विकमैश्वर्यं सर्वज्ञत्वञ्च ब्रह्मणः किन्त्वविद्योपाधिकमिति तदाश्रयं प्रतिज्ञासूत्रं, तत्त्वाश्रयन्तु तदनन्यत्वसूत्रं, तेनाविरोधः। सुगममन्यत् ॥ १४ ॥

भामती-व्याख्या

मानने पर ईश्वर में जगतकारणता-प्रतिपादन की प्रतिज्ञा एवं तत्प्रतिपादक श्रुतिवाक्यों का विरोध क्यों नहीं उपस्थित होता? उसका परिहार किया जाता है—“न, अविद्यात्मकनामरूपबीजव्याकरणापेक्षत्वात्सर्वज्ञत्वस्य”। [आशय यह है कि शङ्कावादी का कहना था कि सूत्रकार ने अपने द्वितीय (“जन्माद्यस्य यतः”—इस) सूत्र में जो प्रतिज्ञा की थी ‘ईश्वरो जगतः कारणम्’। उस प्रतिज्ञा में अब (तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ इस सूत्र में) जो ‘तदनन्यत्व’ हेतु का उपन्यास किया जाता है—‘ईश्वरो जगतः कारणम्, जगदनन्यत्वात्’। यहाँ प्रयुक्त हेतु में ‘प्रतिज्ञा-विरोध’ नाम का निग्रहस्थान है, जैसा कि न्यायसूत्रकार ने कहा है—“प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः” (न्या० सू० ५।२।४)। जगतकारणत्व और ‘जगदभिन्नत्व’—ये दोनों धर्म अत्यन्त विरुद्ध हैं, क्योंकि घट कभी अपना कारण नहीं हो सकता]। इस शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने जो कहा है—“न अविद्यात्मकनामरूपबीजव्याकरणापेक्षत्वात्”, उसका आशय यह है कि ईश्वर में जो जगतकर्तृत्वप्रयुक्त सर्वज्ञत्व माना जाता है, वह तात्त्विक नहीं, अपितु अविद्यारूप उपाधि के द्वारा कल्पित होता है, प्रतिज्ञा-सूत्र में कल्पित सर्वज्ञत्व ही अपेक्षित होता है और अपेक्षित ऐश्वर्य भी नामरूपात्मक बीजशक्ति का व्याकरण (प्रकटन) ही है, जिसे ईश्वर में मान लेने पर किसी प्रकार का विरोध उपस्थित नहीं होता ॥ १४ ॥

कार्यकारणयोरनन्यत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८५

परमार्थावस्थायां सर्वव्यवहाराभावं वदन्ति वेदान्ताः सर्वे । तथेश्वरगीतास्वपि – 'न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥' ( गी० ५।१४-१५ ) इति परमार्थावस्थायामीशित्रीशितव्यादिव्यवहाराभावः प्रदर्श्यते । व्यवहारावस्थायां तूक्तः श्रुतावपीश्वरादिव्यवहारः–'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपति- रेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' ( बृ० ४।४।२२ ) इति । तथा चेश्वरगीतास्वपि – 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया' ( गी० १८।६१ ) इति । सूत्रकारोऽपि परमार्थाभिप्रायेण 'तदनन्यत्वम्' इत्याह । व्यवहाराभिप्रायेण तु 'स्याल्लोकवद्' इति महासमुद्रस्थानीयां ब्रह्मणः कथयति । अप्रत्याख्यायैव कार्यप्रपञ्चं परिणामप्रक्रियां चाश्रयति–सगुणे- षूपासनेषूपयोक्ष्यत इति ॥ १४ ॥

भावे चोपलब्धेः ॥ १५ ॥

इतश्च कारणादनन्यत्वं कार्यस्य, यत्कारणं भाव एव कारणस्य कार्यमुपलभ्यते,

भामती

कारणस्य भावः सत्ता चोपलम्भश्च तस्मिन् कार्यस्योपलब्धेर्भावाच्च । एतदुक्तं भवति — विषयपदं विषयविषयिपरं, विषयिपदमपि विषयविषयपरं, तेन कारणोपलम्भभावयोरुपादेयोपलम्भभावादिति सूत्रार्थः सम्पद्यते । तथा च प्रभारूपानुविद्धबुद्धिबोध्येन चाक्षुषेण न व्यभिचारः, नापि वह्निभावाभावा- नुविधायिभावाभावेन धूमभेदेनेति सिद्धं भवति । तत्र यथोक्तहेतोरेकदेशाभिधानेनोपक्रमते भाष्यकारःइतश्च कारणादनन्यत्वंभेदाभावःकार्यस्य,यत्कारणंयस्मात् कारणात् ।भाव एव

भामती-व्याख्या

कार्य और कारण के अनन्यत्व ( अभेद ) का साधक यह अन्वय-सूत्र है— "भावे चोपलब्धेः" । [ यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि 'यत् सत्त्वे यत्सत्त्वम्' या 'यदुपलब्धौ यदुप- लब्धिः' इस प्रकार का प्रत्येक अन्वय केवल कार्य-कारणभाव का ही साधक है, कार्य और कारण के अभेद का नहीं । अभेद-सिद्धि के लिए 'सत्त्व' ( भावत्व ) और 'उपलब्धि'— इन दोनों का मिलित अन्वय अपेक्षित है— यद्भावोपलब्ध्योः यद्भावोपलब्धी, तयोरभेदः । इसके अनुरूप सौत्र पदों की योजना की जाती है ] । 'कारणभावे च कार्योपलब्धेः'— इस प्रकार के प्रकरणोपयोगी वाक्य में यद्यपि 'भाव' पद केवल सत्त्वरूप विषय का एवं 'उपलब्धि' पद केवल ज्ञानरूप विषयी का वाचक है, तथापि दोनों पदों से विषय और विषयी—दोनों विवक्षित हैं, क्योंकि उपादान कारण के भाव एवं उपलम्भ पर उपादेय ( कार्य ) का भाव और उपलम्भ निर्भर है, अतः उपादान और उपादेय का अभेद है—ऐसा सूत्र का अर्थ विवक्षित है । यदि 'यदुपलब्धौ यदुपलब्धिः, तयोरभेदः'— इतना ही नियम माना जाता है, तब आलोक और घटादिरूप चाक्षुष विषय में व्यभिचार हो जाता है, क्योंकि आलोक की उपलब्धि होने पर ही घटादि की उपलब्धि होती है, तथापि आलोक और घटादि पदार्थों का अभेद नहीं होता । इसी प्रकार 'यद्भावे यद्भावः, तयोरभेदः'— इतनी ही व्याप्ति मानी जाय, तब अग्नि और धूमादि में व्यभिचार हो जाता है, क्योंकि अग्नि के होने पर धूम होता है, किन्तु वह अग्नि से अभिन्न नहीं होता । [ उभयरूपता की उभयत्र विवक्षा होने पर कहीं भी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि, न तो आलोक के होने पर घटादि का होना अनिवार्य होता है और न अग्नि की उपलब्धि होने पर धूम की उपलब्धि आवश्यक है ] । कथित भाव और उपलब्धि— इन दो हेतुओं में से एक ( भाव ) हेतु का

७४

५८६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. १५

नाभावे । तद्यथा सत्यां मृदि घट उपलभ्यते, सत्सु च तन्तुषु पटः । न च नियमेनान्य- भावेऽन्यस्योपलब्धिर्दृष्टा । न ह्यश्वो गोरन्यः सन् गोर्भाव एवोपलभ्यते । न च कुलाल- भाव एव घट उपलभ्यते, सत्यपि निमित्तनैमित्तिकभावेऽन्यत्वात् । नन्वन्यस्य भावेऽ- प्यन्यस्योपलब्धिर्नियता दृश्यते—यथाग्निभावे धूमस्येति । नेत्युच्यते, उद्वापितेऽप्यग्नौ गोपालघुटिकादिधारितस्य धूमस्य दृश्यमानत्वात् । अथ धूमं कयाचिदवस्थया विशिंष्यादीदृशो धूमो नासत्याग्नौ भवतीति । नैवमपि कश्चिद्दोषः, तद्भावानुरक्तां हि बुद्धिं कार्यकारणयोरनन्यत्वे हेतुं वयं वदामः । न चासावग्निधूमयोर्विद्यते । 'भावाच्चो- पलब्धेः' इति वा सूत्रम् । न केवलं शब्दादेव कार्यकारणयोरनन्यत्वं, प्रत्यक्षोपलब्धि- भावाच्च तयोरनन्यत्वमित्यर्थः । भवति हि प्रत्यक्षोपलब्धिः कार्यकारणयोरनन्यत्वे । तद्यथा—तन्तुसंस्थाने पटे तन्तुव्यतिरेकेण पटो नाम कार्यं नैवोपलभ्यते, केवलास्तु तन्तव आतानवितानवन्तः प्रत्यक्षमुपलभ्यन्ते, तथा तन्तुष्वंशवोऽशूषु तदवयवाः । अनया प्रत्यक्षोपलब्ध्या लोहितशुक्लकृष्णानि त्रीणि रूपाणि, ततो वायुमात्रमाकाश-


भामती

कारणस्य इति ॐ । अस्य व्यतिरेकमुखेन गमकत्वमाह ॐ न च नियमेन इति ॐ । काकतालीयन्यायेना- न्यभावेऽन्यस्योपलभ्यते, न तु नियमेनेत्यर्थः । हेतुविशेषणाय व्यभिचारं चोदयति ॐ नन्वन्यस्य भावेऽपि इति ॐ । एकदेशिमतेन परिहरति ॐनेत्युच्यते इति ॐ । शङ्क्यैकदेशिपरिहारं दूषयित्वा परमार्थपरिहारमाह ॐ अथ इति ॐ । तदनेन हेतुविशेषणमुक्तम् । पाठान्तरेणेदमेव सूत्रं व्याचष्टे ॐ न केवलं शब्दादेव इति ॐ । पट इति हि प्रत्यक्षबुद्ध्या तन्तव एवातानवितावस्था आलम्ब्यन्ते, न तु तदतिरिक्तः पटः प्रत्यक्षमुपलभ्यते । एकत्वं तु तन्तूनामेकप्रावरणलक्षणार्थक्रियावच्छेदाद्बहूनामपि । यथैकदेशकालावच्छिन्ना


भामती-व्याख्या

अभिधान भाष्यकार करते हैं—"इतश्च कारणादनन्यत्वं कार्यस्य" । 'अनन्यत्व' शब्द का अर्थ अभेद है। भाष्यस्थ 'यत्कारणम्' शब्द का भाव यह है कि कार्य और कारण का अनन्यत्व जिस कारण (हेतु) से सिद्ध होता है, वह कारण है—'भावे एव कारणस्य कार्योपलब्धेः' । इसी नियम में व्यतिरेकमुखेन अभेद-साधकत्व कहा जा रहा है—'न च नियमेनान्यभावेऽन्य- स्योपलब्धिर्दृष्टा' । अर्थात् काकतालीय न्याय से (अकस्मात्) भिन्न पदार्थ के होने पर भिन्न पदार्थ की उपलब्धि कभी हो जाती है किन्तु नियमतः नहीं। अभेद-साधक हेतुओं में उभयरूपता विशेषण की आवश्यकता दिखाने के लिए केवल हेतु के व्यभिचार की शङ्का उठाते हैं—"नन्वन्यस्य भावेऽपि" । उस शङ्का का परिहार एकदेशी के मत से करते हैं— "नेत्युच्यते" । दूध पकाने की भट्ठिकादि में अग्नि के बुझ जाने पर भी धूम देखा जाता है, अतः अग्नि के बिना भी धूम रहता है। एकदेशी-मत को दूषित करके वास्तविक परिहार किया जाता है—"अथ धूमं कयाचिदवस्थया विशिंष्यात्" । "तद्भावानुरक्तां हि बुद्धिं कार्य- कारणयोरनन्यत्वे हेतुं वयं वदामः"—इस भाष्य के द्वारा विवक्षित हेतु-विशेषण स्फुट किया गया है।

पाठान्तर-निर्देशपूर्वक इसी सूत्र की व्याख्या की जा रही है—"न केवलं शब्दादेव" । आशय यह है कि "अयं पटः"—इस प्रकार की प्रत्यक्षात्मक बुद्धि के द्वारा विशेष ताना-बाना वाले तन्तु ही गृहीत होते हैं, उनसे अतिरिक्त पट नाम की कोई वस्तु प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होती। यदि तन्तुरूप ही पट है, तब तन्तुओं में बहुत्व होने के कारण पट में 'अयमेकः'—इस प्रकार एकत्व-व्यवहार क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अनेक तन्तुओं में भी एकत्व- व्यवहार तब होता है, जब कि वे मिलकर प्रावरण (शरीराच्छादनरूप) एक अर्थक्रिया

कार्यकारणयोरभेदः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८७

मात्रं चेत्यनुमेयम् ( छा० ४।६।४ ) । ततः परं ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं, तत्र सर्वप्रमाणानां निष्ठामवोचाम ॥ १५ ॥

सत्त्वाच्चावरस्य ॥ १६ ॥

इतश्च कारणात्कार्यस्यानन्यत्वं, यत्कारणं प्रागुत्पत्तेः कारणात्मनैव कारणे सत्त्वमवरकालीनस्य कार्यस्य श्रूयते— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' ( छा० ६।२।१ ), 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' ( ऐ० आ० २।४।१।१ ) इत्यादाविदंशब्दगृहीतस्य कार्यस्य कारणेन सामानाधिकरण्यात् । यच्च यदात्मना यन्न वर्तते न तत्तत उत्पद्यते,

भामती

धवखदिरपलाशादयो बहवोऽपि वनमिति । अर्थक्रियायाञ्च प्रत्येकमसमर्था अप्यनारभ्यैवार्थान्तरं किञ्चि-न्मिलिताः कुर्वन्तो दृश्यन्ते, यथा ग्रावाण उखाधारणमेकम्, एवमनारभ्यैवार्थान्तरं तन्तवो मिलिताः प्रावरणमेकं करिष्यन्ति । न च समवायाद्द्वयोरपि भेदानवसायः इति साम्प्रतम्, अन्यो-न्याश्रयत्वात् — भेदे हि सिद्धे समवायः समवायाच्च भेदः । न च भेदे साधनान्तरमस्ति, अर्थक्रियाव्यप-देशभेदयोरभेदेऽप्युपपत्तेरित्यपपादितम् । तस्माद्यत्किञ्चिदेतत् । अनया च विशा मूलकारणं ब्रह्मैव परमा-र्थसद्ववान्तरकारणानि च तन्त्वादयः सर्वेऽनिर्वच्या एवेत्याह ॐ तथा तन्तुषु इति ॐ ॥ १५ ॥

विभजते ॐ इतश्च इति ॐ । न केवलं श्रुतिः, उपपत्तिश्चात्र भवति ॐ यच्च यदात्मना इति ॐ । नहि तैलं सिकतात्मना सिकतायामस्ति, यथा घटोऽस्ति मृदि मृदात्मना । प्रत्युत्पन्नो हि घटो मृदात्मनो-

भामती-व्याख्या

( प्रयोजन ) का निष्पादन करते हैं, जैसे कि धव, खदिर और पलाशादि अनेक वृक्षों में ही 'वनम्'—इस प्रकार एकत्व-व्यवहार उनकी अवच्छेदकीभूत एक देश-कालरूप उपाधि को लेकर हो जाता है, वैसे ही अनेक तन्तुओं में प्रावरणरूप एक अर्थक्रिया की अपेक्षा 'अयमेकः पटः'—ऐसा व्यवहार माना जाता है। यद्यपि प्रत्येक तन्तु प्रावरणरूप प्रयोजन की सिद्धि में सक्षम नहीं होता, तथापि अनेक मिले हुए तन्तु पटादिरूप कार्यान्तर को उत्पन्न किए बिना ही प्रावरणरूप कार्य का सम्पादन वैसे ही कर लेंगे, जैसे कि अनेक पत्थर मिलकर ( चूल्हे का रूप धारण कर ) उखा ( हाँडी या बटलोई ) को धारण करते हैं। 'यद्यपि तन्तुओं से पट भिन्न है, तथापि दोनों के मध्य में समवाय होने के कारण भेद का भान नहीं हो पाता'—ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है, क्योंकि कार्य और कारण में भेद सिद्ध होने पर समवाय सम्बन्ध सिद्ध होगा और समवाय सिद्ध होने पर भेद। कार्य और कारण के भेद-साधन में अन्य कोई हेतु सम्भव नहीं। 'तन्तु को कोई सुई में डाल कर सिलाई के काम में लाते हैं, पट को नहीं और पट ओढ़ने-बिछाने के काम आता है, तन्तु नहीं'—इस प्रकार का अर्थक्रिया-भेद एवं 'इमे तन्तवः', 'अयं पटः' —इस प्रकार का व्यपदेश-भेद ( विशेष शब्दों का प्रयोग ) भी तन्तु और पट का भेद सिद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि एक ही वस्तु उपाधि-विशेष से उपहित होकर भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करती है—यह कहा जा चुका है। [ सांख्यतत्त्वकौमुदी में भी कहा है—"स्वात्मनि क्रियानिरोधबुद्धिव्यपदेशार्थक्रियाभेदाश्च नैकान्तिकं भेदं साधयितुमर्हन्ति, एकस्मिन्नपि तत्तद्विशेषाविर्भावतिरोभावाभ्यामेतेषाम-विरोधात्" ( सां. त. कौ. का. ९ ) ]। इस विचार के द्वारा यह सिद्ध होता है कि मूल कारण एक ब्रह्म वस्तुसत् है, तन्त्वादिरूप सभी अवान्तर कारण अनिर्वचनीय हैं—"तथा तन्तुषु अंशवोंऽशुषु तदवयवाः" ॥ १५ ॥

"सत्त्वाच्चावरस्य"—इस सूत्र की व्याख्या की जाती है—"इतश्च कारणात् कार्यस्यान-न्यत्वम्" । केवल श्रुति अनन्यत्व की साधिका नहीं, अपितु युक्ति भी है—"यच्च यदात्मना यत्र

५८८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १६

यथा सिकताभ्यस्तैलम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेरनन्यत्वादुत्पन्नमप्यनन्यदेव कारणात्कार्यमित्यवगम्यते । यथा च कारणं ब्रह्म त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति, एवं कार्यमपि जगत्त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति । एकं च पुनः सत्त्वमतोऽप्यनन्यत्वं कारणात्कार्यस्य ॥ १६ ॥

भामती

पलभ्यते, नैवं प्रत्युत्पन्नं तैलं सिकतात्मना । तेन यथा सिकतायाः तैलं न जायत एवमात्मनोऽपि जगन्न जायेत, जायते च, तस्मादात्मात्मनाऽऽसीदिति गम्यते । उपपद्यन्तरमाह ॐ यथा च कारणं ब्रह्म इति ॐ । यथा हि घटः सर्वदा सर्वत्र घट एव न जात्वसौ क्वचित् पटो भवत्येवं सदपि सर्वत्र सर्वदा सदेव न तु क्वचित् कदाचिदसद्भवितुमर्हतीत्युपपादितमधस्तात् । तस्मात् कार्यं त्रिष्वपि कालेषु सदेव । सत्त्वं चेत् किमतस्तयोरेवमित्यत आह ॐ एकञ्च पुनः इति ॐ । सत्त्वं चैकं कार्यकारणयोः, नहि प्रतिव्यक्ति सत्त्वं भिद्यते, ततश्चाभिन्नसत्तान्वयवादेते अपि मिथो न भिद्येते इति । न च ताभ्यामनन्यत्वात् सत्त्वस्यैव भेद इति युक्तम् । तथा सति हि सत्त्वस्य समारोपितत्वप्रसङ्गः । तत्र भेदाभेदयोरन्यतरसमारोपकल्पनायां किं तात्त्विकाभेदोपादाना भेदकल्पनास्त्वाहो तात्त्विकभेदोपादानाभेदकल्पनेति । वयं तु पश्यामो भेदग्रहस्य प्रतियोगिग्रहापेक्षत्वाद्द्वेदग्रहमन्तरेण च प्रतियोगिग्रहासम्भवादन्धोऽन्याश्रयापत्तेः, अभेदग्रहस्य च निरपेक्षतया तदनुपपत्तेः, एकैकाश्रयत्वाच्च भेदस्यैकाभावे तदनुपपत्तेः, अभेदग्रहोपादानैव भेदकल्पनेति सर्वमवदातम् ॥ १६ ॥

भामती-व्याख्या

न वर्तते, न तत् तत उत्पद्यते”। तेल बालू में तादात्म्येन नहीं रहता, अतः बालू से तेल उत्पन्न नहीं होता । घट मृत्तिका में मृत्तिकात्वेन रहता है, अतः वह मृत्तिका से उत्पन्न होता देखा जाता है । यही कारण है कि वर्तमान घट मृत्तिकात्वेन उपलब्ध होता है, किन्तु वर्तमान तेल सिकतात्वेन उपलब्ध नहीं होता । फलतः जैसे सिकता (बालू) से तैल उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही आत्मा से भी आकाशादि प्रपञ्च उत्पन्न नहीं हो सकता था, किन्तु उत्पन्न होता है, अतः प्रपञ्च आत्मरूपेण आत्मा में अवस्थित था—ऐसी अवगति (अनुमिति) होती है । इसी अर्थ की पुष्टि के लिए अन्य युक्ति दिखाते हैं—“यथा च कारणं ब्रह्म त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति एवं कार्यमपि”। जैसे कि घट सर्वदा सर्वत्र घट ही है, वह कभी पट नहीं होता, वैसे ही सत् पदार्थ सदैव सत् ही रहेगा, कभी असत् नहीं हो सकता—ऐसा पहले कहा जा चुका है । इससे यह सिद्ध हो गया कि कार्य प्रपञ्च तीनों कालों में सत् ही है । कार्य का सत्त्व मान लेने से क्या लाभ ? इस प्रश्न का उत्तर है—“एकं च पुनः सत्त्वमतोऽप्यनन्यत्वं कारणात्कार्यस्य”। कार्य और कारण में सत्त्व एक ही है, प्रत्येक व्यक्ति में सत्त्व भिन्न-भिन्न नहीं रहता, इस लिए अभिन्न (एक) सत्ता से अभिन्न होने के कारण कार्य और कारण परस्पर भिन्न नहीं हो सकते । ‘कार्य और कारण भिन्न हैं, अतः भिन्न पदार्थों से अभिन्न होने के कारण सत्त्व का ही भेद क्यों न मान लिया जाय ?’ इस शङ्का का समाधान यह है कि वैसा मानने पर सत्त्व में समारोपितत्व प्रसक्त होगा, क्योंकि तब यह विकल्प उठ खड़ा होता है कि भेद और अभेद—इन दोनों में से एक के समारोप की कल्पना में क्या तात्त्विक अभेद में भेद की कल्पना (आरोप) की जाय ? अथवा तात्त्विक भेद में अभेद की कल्पना की जाय ? हम अद्वैतवेदान्तियों का दृष्टिकोण यह है कि भेद-ज्ञान अपने प्रतियोगियों के ज्ञान पर निर्भर है, क्योंकि प्रतियोगियों के ज्ञान के बिना भेद-ज्ञान सम्भव नहीं, इस प्रकार अन्योऽन्याश्रय दोष हो जाता है, अतः अभेद में ही भेद की कल्पना माननी उचित है। अभेद-ज्ञान निरपेक्ष है, अतः अन्योन्याश्रयता नहीं । एक-एक व्यक्ति के आश्रित भेद रहता है, अतः भेद को एकत्व या अभेद की नियमतः अपेक्षा है, अतः अभेद-ग्रह में ही भेद की कल्पना न्याय-

सत्कार्यवादः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५८९

असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥ १७ ॥

ननु क्वचिदसत्त्वमपि प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य व्यपदिशति श्रुतिः—‘असदेवेदमग्र आसीत्’ (छा० ३।१९।१) इति, ‘असद्वा इदमग्र आसीत्’ (तै० २।७।१) इति च । तस्मादसद्व्यपदेशान्न प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य सत्त्वमिति चेत्, नेति ब्रूमः,—न ह्ययमत्यन्तासत्त्वाभिप्रायेण प्रागुत्पत्तेः कार्यस्यासद्व्यपदेशः, किं तर्हि ? व्याकृतनामरूपत्वाद्धर्मादव्याकृतनामरूपत्वं धर्मान्तरं तेन धर्मान्तरेणायमसद्व्यपदेशः प्रागुत्पत्तेः सत एव कार्यस्य कारणरूपेणानन्यस्य । कथमेतदवगम्यते ? वाक्यशेषात् । यदुपक्रमे संदिग्धार्थं वाक्यं तच्छेषात्निश्चीयते । इह च तावत् ‘असदेवेदमग्र आसीद्’ इत्यसच्छब्देनोपक्रमे निर्दिष्टं यत्तदेव पुनस्तच्छब्देन परामृश्य सदिति विशिनष्टि ‘तत्सदासीत्’ इति । असतश्च पूर्वापरकालासंबंधादासीच्छब्दानुपपत्तेश्च । ‘असद्वा इदमग्र आसीद्’ इत्यत्रापि ‘तदात्मानं स्वयमकुरुत’ इति वाक्यशेषे विशेषणान्नात्यन्तासत्त्वम् । तस्माद्धर्मान्तरेणैवायमसद्व्यपदेशः प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य । नामरूपव्याकृतं हि वस्तु सच्छब्दार्हं लोके प्रसिद्धम् । अतः प्राङ्नामरूपव्याकरणादसदिवासीदित्युपचर्यते ॥ १७ ॥

युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ १८ ॥

युक्तेश्च प्रागुत्पत्तेः कार्यस्य सत्त्वमनन्यत्वं च कारणादवगम्यते, शब्दान्तराच्च । युक्तिस्तावद्वर्ण्यते—दधिघटरुचकाद्यर्थिभिः प्रतिनियतानि कारणानि क्षीरमृत्तिकासुवर्णादीन्युपादीयमानानि लोके दृश्यन्ते । न हि दध्यर्थिभिर्मृत्तिकोपादीयते, न घटार्थिभिः क्षीरं, तदसत्कार्यवादे नोपपद्येत । अविशिष्टे हि प्रागुत्पत्तेः सर्वस्य सर्वत्रासत्त्वे कस्मात्क्षीरादेव दध्युत्पद्यते ? न मृत्तिकायाः ? मृत्तिकाया एव च घट उत्पद्यते, न क्षीरात् । अथाविशिष्टेऽपि प्रागसत्त्वे क्षीर एव दध्नः कश्चिदतिशयो न मृत्तिकायां, मृत्तिकायामेव च घटस्य कश्चिदतिशयो न क्षीर इत्युच्येत, तर्ह्यतिशयवत्त्वात्प्रागवस्थाया असत्कार्यवादहानिः सत्कार्यवादसिद्धिश्च । शक्तिश्च कारणस्य कार्यनियमार्था


भामती

व्याकृतत्वाव्याकृतत्वे च धर्मावनिर्वचनीयौ । सूत्रमेतन्निगदव्याख्यातेन भाष्येण व्याख्यातम् ॥ १७ ॥

ॐ अतिशयवत्त्वात्प्रागवस्थायाः इति ॐ । अतिशयो हि धर्मो नासत्यतिशयवति कार्ये भवितुमर्हतीति । ननु न कार्यस्यातिशयो नियमहेतुरपि तु कारणस्य शक्तिभेदः, स चासत्यपि कार्ये कारणस्य


भामती-व्याख्या

संगत है । मण्डनमिश्र भी कहते हैं— “अभेदोपादानो भेदः” (ब्र० सि० पृ० ७०) ॥ १६ ॥

श्रुतियों में जो कार्य प्रपञ्च को कभी असत् कहा गया है—"असद्वा इदमग्र आसीत्”, (तै. उ. २।७।१) । वहाँ असत्त्वका अर्थ अव्याकृतत्व (अनभिव्यक्तत्व) है । जगत् अव्याकृत से व्याकृत होता है । व्याकृतत्व और अव्याकृतत्व—दोनों धर्म अनिर्वचनीय माने जाते हैं । शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है ॥ १७ ॥

[ सांख्याचार्यों ने जिन असदकरण, उपादान-ग्रहण, सर्वसम्भवाभाव, शक्ताच्छक्योत्पत्ति, कारणात्मत्वादि युक्तियों के द्वारा सत्कार्यवाद की सिद्धि की है । सम्भवतः सूत्रकार ने उन्हीं युक्तियों का स्मरण यहाँ किया है—"युक्तेः" ] । दूध से दधि बनता है, मृत्तिका से नहीं, अतः दधि की पूर्वावस्था दूध में सत् मानी जाती है, फलतः असत्कार्यवाद की हानि और सत्कार्यवाद की सिद्धि होती है, क्योंकि मृत्तिका से दूध में जो विशेषता या अतिशय है, वह एक ऐसा धर्म है, जो कि दधि की पूर्वावस्था में ही रहेगा । 'यदि कहा जाय कि कार्य की पूर्वावस्था दूध से ही दधि होने का नियामक नहीं, अपितु कारण की शक्ति नियामक है,

५९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. १८

कल्प्यमाना नान्याऽसती वा कार्यं नियच्छेत् , असत्त्वाविशेषादन्यत्वाविशेषाच्च । तस्मा- त्कारणस्यात्मभूता शक्तिः शक्तेश्चात्मभूतं कार्यम् । अपि च कार्यकारणयोर्द्रव्यगुणादीनां चाश्वमहिषवद्भेदबुद्ध्यभावात्तादात्म्यमभ्युपगन्तव्यम् । समवायकल्पनायामपि, समवा- यस्य समवायिभिः संबन्धेऽभ्युपगम्यमाने, तस्य तस्यान्योऽन्यः संबन्धः कल्पयितव्य इत्यनवस्थाप्रसङ्गः । अनभ्युपगम्यमाने च विच्छेदप्रसङ्गः । अथ समवायः स्वयं संबन्ध- रूपत्वादनपेक्ष्यैवापरं संबन्धं संबध्येत, संयोगोऽपि तर्हि स्वयं संबन्धरूपत्वादनपेक्ष्यैव

भामती

सत्त्वासन्नेवेष्यत आह ॐ शक्तिश्च इति ॐ । नान्या कार्यकारणाभ्यां, नाप्यसती कार्यान्मनेति योजना । ॐ अपि च कार्यकारणयोः इति ॐ । यद्यपि भावाच्चोपलब्धेरित्यत्रायमर्थं उक्तस्तथापि समवायदूषणाय पुनरवतारितः । अनभ्युपगम्यमाने च समवायस्य समवायिभ्यां सम्बन्धे विच्छेदप्रसङ्गोऽवयवावयविद्रव्य- गुणादीनां मिथः । नह्यसम्बद्धः समवायिभ्यां समवायः समवायिनौ सम्बन्धयेदिति । शङ्कते ॐ अथ समवायः स्वयम् इति ॐ । यथा हि सत्त्वयोगाद् द्रव्यगुणकर्माणि सन्ति, सत्त्वं तु स्वभावत एव सदिति न सत्त्वान्तरयोगमपेक्षते, तथा समवायः समवायिभ्यां सम्बद्धं न सम्बन्धान्तरयोगमपेक्षते, स्वयं सम्बन्धरूप- त्वादिति, तदेतत्सिद्धान्तान्तरविरोधापादनेन निराकरोति ॐ संयोगोऽपि तर्हि इति ॐ । न च संयोगस्य

भामती-व्याख्या

वह शक्ति कार्य के असत् होने पर भी कारण में रहती है' तब के लिए कहा गया है— शक्तिश्च कारणस्य" । अर्थात् वह शक्ति न तो कार्य और कारण से भिन्न हो सकती है और न कार्य के असत् होने पर उपपन्न हो सकती है। “अपि च कार्यकारणयोः” । यद्यपि कार्य और कारण का तादात्म्य "भावाच्चोपलब्धेः” –इस पन्द्रहवें सूत्र में कहा जा चुका है, तथापि समवाय सम्बन्ध का निरास करने के लिए तादात्म्य का पुनः पुष्टीकरण कर दिया गया है। "अनभ्युपगम्यमाने च विच्छेदप्रसङ्गः" –इस भाष्य का आशय यह है कि समवाय सम्बन्ध का अपने सम्बन्धियों के साथ सम्बन्धान्तर मानने पर अनवस्था और सम्बन्धान्तर न मानने पर समवाय के अवयव-अवयवी और गुण-द्रव्यादि संबंधियों का परस्पर विच्छेद प्रसक्त होता है। [पट और तन्तु --इन दोनों के साथ एक समवाय का सम्बन्ध माना जाता है, तब समवाय के द्वारा सम्बन्धित पट और तन्तुओं में 'पटवन्तः तन्तवः' या 'पटविशिष्टाः तन्तवः' --इस प्रकार विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न हो जाता है किन्तु समवाय का पटादि कार्य और तन्तुवादि कारण से सम्बन्ध न मानने पर कार्य और कारण में विशिष्ट बुद्धि नहीं होगी, क्योंकि ] समवाय सम्बन्ध अपने कार्य और कारणादिरूप सम्बन्धियों से असम्बद्ध होकर उनको परस्पर सम्बन्धित नहीं कर सकता।

शङ्का –समवाय स्वयं सम्बन्धरूप होने के कारण सम्बन्धान्तर की अपेक्षा के विना वैसे ही अपने सम्बन्धियों में विशिष्टता-ज्ञान का जनक हो जाता है, जैसे द्रव्य, गुण और कर्म में सत्ता जाति के सम्बन्ध से सत्त्व-बुद्धि होती है, किन्तु सत्ता में सत्तान्तर-सम्बन्ध के विना ही 'सत्' बुद्धि हो जाती है।

समाधान –उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार ने सिद्धान्तान्तर-विरोध की शैली पर किया है-“संयोगोऽपि तर्हि” [अर्थात् नैयायिकों का यह भी कहना है कि संयोग सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों में समवाय सम्बन्ध से रह कर अपने सम्बन्धियों को परस्पर सम्बन्धित करता है। यहाँ सिद्धान्ती का कहना यह है कि यदि समवाय सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ सम्बन्धान्तर की अपेक्षा के विना ही अपने सम्बन्धियों में परस्पर वैशिष्ट्य-ज्ञान का जनक हो जाता है, तब संयोग सम्बन्ध भी अपने सम्बन्धियों के साथ समवाय सम्बन्ध के

समवायनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंबलितम् ५९१

समवायं संबध्नीयेत । तादात्म्यप्रतीतेश्च द्रव्यगुणादीनां समवायकल्पनाऽनर्थक्यम् । कथं च कार्यमवयविद्रव्यं कारणेष्ववयवद्रव्येषु वर्तमानं वर्तते ? किं समस्तेष्ववयवेषु वर्तेत,

भामती

कार्यत्वात् कार्यस्य च समवायिकारणाधीनजन्मकत्वात् असमवाये च तदनुपपत्तेः समवायकल्पना संयोग इति वाच्यम् । अजसंयोगे तदभावप्रसङ्गात् । अपि च सम्बन्ध्यधीननिरूपणः समवायो यथा सम्बन्धिद्वयभेदे न भिद्यते तन्नाशे च न नश्यत्यपि तु नित्य एक एव, एवं यदि संयोगोऽपि भवेत् ततः को दोषः ? अथैतत्प्रसङ्गभिया संयोगवत्समवायोऽपि प्रतिसम्बन्धिमिथुनं भिद्यते चानित्यश्चेत्यभ्युपेयते, तथा सति यथैकस्मान्निमित्तकारणादेव जायत एवं संयोगोऽपि निमित्तकारणादेव जनिष्यत इति समानम् । ॐ तादात्म्यप्रतीतेश्च इति ॐ । सम्बन्धावगमो हि सम्बन्धकल्पनाबीजं न तादात्म्यावगमस्तस्य नानात्वैकाश्रयसम्बन्धविरोधादिति । वृत्तिविकल्पेनावयवातिरिक्तमवयविनं दूषयति ॐ कथञ्च कार्यम् इति ॐ । ॐ समस्त

भामती-व्याख्या

विना ही अपने सम्बन्धियों को परस्पर सम्बन्धित कर सकता, फलतः समवाय की सिद्धि ही न हो सकेगी ] । यदि नैयायिक यह कहता है कि संयोग एक जन्य पदार्थ है, जन्य पदार्थ सदैव अपने समवायिकारण के अधीन होता है, उसका समवाय सम्बन्ध न मानने पर समवायिकारण के विना संयोग की उपपत्ति क्योंकर होगी ? इस शङ्का का निरास करता हुआ सिद्धान्ती कहता है कि दो विभु पदार्थों का संयोग नित्य माना जाता है, जन्य नहीं, वह संयोग जैसे समवायिकरण के विना उपपन्न हो जाता है, वैसे ही सामान्य संयोग भी उपपन्न हो जायगा, समवाय मानने की आवश्यकता क्या ?

दूसरी बात यह भी है कि “द्विष्ठसम्बन्धसंवित्तिर्नैकरूपप्रवेदनात्” (प्रज्ञाकरभा. पृ. ४) इस न्याय के आधार पर समवाय सम्बन्ध भी अपने दोनों सम्बन्धियों के स्वभाव पर निर्भर है। दोनों सम्बन्धियों में परस्पर भेद है, किन्तु समवाय एक है, वह भिन्न नहीं होता। सम्बन्धियों के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, क्योंकि नित्य माना जाता है। इसी प्रकार यदि संयोग संबन्ध को मान लिया जाता है, तब क्या दोष ? यदि इस समान प्रसङ्ग ( प्रतिबन्दी ) के भय से संयोग के ही समान समवाय को भी सम्बन्धी के भेद से भिन्न और अनित्य मान लिया जाता है, तब अनवस्था-प्रसङ्ग से बचने के लिए समवाय को समवायिकारण के अधीन न मान कर केवल निमित्तकारण से ही उत्पन्न माना जा सकता है और उसी प्रकार संयोग भी केवल निमित्तकारण से उत्पन्न हो जायगा—इस प्रकार समान-प्रसङ्ग का घेराव बना ही रहता है।

“तादात्म्यप्रतीतेश्च द्रव्यगुणादीनाम्”- इस भाष्य का आशय यह है कि दो पदार्थों में जब 'सम्बद्धौ' इस प्रकार संबन्ध की प्रतीति होती है, तब उस प्रतीति के आधार पर संबन्ध की कल्पना की जाती है, किन्तु तादात्म्य की प्रतीति संबन्ध की साधिका नहीं, प्रत्युत पदार्थों में नानात्व और संबन्ध की विरोधिनी है, क्योंकि तादात्म्यापन्न पदार्थ नाना नहीं, एक होता है और एक पदार्थ में संबन्ध होता नहीं, संबन्ध सदैव अनेक पदार्थों का ही होता है, फलतः तादात्म्य नानात्वसमानाधिकरणभूत संबन्ध का विरोधी है।

जिस अवयवी पदार्थ का अवयवों में समवाय माना जाता है, वह अवयवी प्रत्येक अवयव में रहता है ? अथवा अनेक अवयवों में ? इस प्रकार उसकी वृत्तित्ता का विकल्प उठा कर अवयवी का निरास किया जाता है-“कथं च कार्यमवयविद्रव्यम्”। समस्त अवयवों में रहनेवाले वृक्षादि अवयवी की उपलब्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वृक्षादि के मध्य और पिछले भाग के अवयवों का द्रष्टा के इन्द्रिय से सम्बन्ध नहीं होता, क्योंकि वे अवयव साम्मुखीन

५९२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १८

उत प्रत्यवयवम् ? यदि तावत्समस्तेषु वर्तेत, ततोऽवयव्यनुपलब्धिः प्रसज्येत, समस्तावयवसन्निकर्षस्याशक्यत्वात् । न हि बहुत्वं समस्तेष्वाश्रयेषु वर्तमानं व्यस्ताश्रयग्रहणेन गृह्यते । अथावयवशः समस्तेषु वर्तेत, तदाप्यारम्भकावयवव्यतिरेकेणावयविनोऽवयवाः कल्येरन्, यैरारम्भकेष्ववयवेष्ववयवशोऽवयवी वर्तेत, कोशावयवव्यतिरिक्कैरंशावयवैरसिः कोशं व्याप्नोति । अनवस्था चैवं प्रसज्येत, तेषु तेष्ववयवेषु वर्तयितुमन्येषामन्येषामवयवानां कल्पनीयत्वात् । अथ प्रत्यवयवं वर्तेत तदैकत्र व्यापारेऽन्यत्राव्यापारः स्यात् । न हि देवदत्तः स्रुघ्ने संनिधीयमानस्तदहरेव पाटलिपुत्रेऽपि संनिधीयते । युगपदनेकत्र वृत्तावनेकत्वप्रसङ्गः स्यात् । देवदत्तयज्ञदत्तयोरिव स्रुघ्नपाटलिपुत्रनिवासिनोः । गोत्वादिवत्प्रत्येकं परिसमाप्तेर्न दोष इति चेत् ,-न, तथा

भामती

इति ॐ । मध्यपरभागयोरर्वाग्भागव्यवहितत्वात् । अथ समस्तावयवव्यासङ्गत्यपि कतिपयावयवस्थानो ग्रहीष्यत इत्यत आह ॐ न हि बहुत्वम् इति ॐ । ॐ अथावयवशः इति ॐ । बहुत्वसंख्या हि स्वरूपेणैव व्यासज्य संख्येयेषु वर्तत इत्येकतमसंख्येयाग्रहणेऽपि न गृह्यते, समस्तब्यासङ्गित्वात्तद्रूपस्य । अवयवी तु न स्वरूपेणावयवान् व्याप्नोति, अपि त्ववयवशः, तेन यथा सूत्रमवयवैः कुसुमानि व्याप्नुवन्न समस्तकुसुमग्रहणमपेक्षते कतिपयकुसुमस्थानस्यापि तस्योपलम्भेः, एवमवयव्यपीति भावः । निराकरोति ॐ तदापि इति ॐ । शङ्कते ॐ गोत्वादिवद् इति ॐ । निराकरोति ॐ न इति ॐ । यद्यपि गोत्वस्य सामान्यस्य

भामती-व्याख्या

अवयवों से व्यवहित होते हैं। 'समस्त अवयवों में रहनेवाले अवयवी का ग्रहण कतिपय अवयवों में ही क्यों न मान लिया जाय ?' इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि बहुत्वम्"। अर्थात् जैसे अनेक आश्रय में रहनेवाले बहुत्व का ग्रहण किसी एक आश्रय के ग्रहण से नहीं होता, वैसे समस्त अवयवों में रहनेवाले अवयवी का ग्रहण कतिपय अवयवों में संभव नहीं।

"अथावयवशः"—इस शङ्का-भाष्य का भाव यह है कि 'बहुत्व' संख्या अखण्ड एक और व्यासज्यवृत्ति (अनेक में रहनेवाली) है, अतः किसी एक आश्रय के ग्रहणमात्र से गृहीत नहीं होती, क्योंकि उसका स्वरूप अनेक आश्रयों में व्यासक्त (व्याप्त) होता है किन्तु अवयवी पदार्थ अखण्ड न होने के कारण स्वरूपतः समस्त अवयवों में पूरा व्याप्त नहीं, अपितु अवयवशः रहता है, अर्थात् पटादि का कुछ भाग सम्मुखीन तन्तुओं में, कुछ भाग मध्यावस्थित तन्तुओं में और कुछ भाग व्यवहित तन्तुओं में रहता है, अतः जैसे फूलों में धागा अवयवशः रहता है, अतः वह समस्त फूलों के ग्रहण की अपेक्षा न करके कतिपय फूलों में अवस्थित गृहीत होता है, उसी प्रकार अवयवी पदार्थ भी समस्त अवयवों के ग्रहण की अपेक्षा न करके कतिपय अवयवों के ग्रहणमात्र से गृहीत क्यों नहीं होगा ?

उक्त शङ्का का निराकरण करते हैं—'तदापि'। अर्थात् पट के जो अवयव भिन्न-भिन्न तन्तुओं में रहते हैं, उन्हें तन्तुरूप आरम्भक अवयवों से भिन्न ही मानना होगा। उन अवयवों की भी अपने अवयवों में अवयवशः वृत्तिता माननी होगी—इस प्रकार अवयव-कल्पना अनवस्था-ग्रस्त हो जाती है।

शंकावादी कहता है—"गोत्वादिवत्"। अर्थात् जैसे गोत्व जाति समस्त गौओं में रहती हुई भी अवयवशः नहीं रहती, अपितु प्रत्येक गौ में पूर्णरूप से रहती है, अतः किसी एक गौ के ग्रहणमात्र से गृहीत हो जाती है। वैसे ही अवयवी पदार्थ की भी प्रत्येक अवयव में पूर्णतया वृत्ति मानने पर कोई दोष प्रसक्त नहीं होता। उक्त शंका का निराकरण करते हैं—"न, तथा प्रतीत्यभावात्"। अर्थात् जैसे गोत्व प्रत्येक गौ में अनुभूत होता है, वैसे प्रत्येक

सत्कार्यवादः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५९३

प्रतीत्यभावात् । यदि गोत्वादिवत्प्रत्येकं परिसमाप्तोऽवयवी स्यात्, यथा गोत्वं प्रतिव्यक्ति प्रत्यक्षं गृह्यत एवमवयव्यपि प्रत्यवयवं प्रत्यक्षं गृह्येत । नचैवं नियतं गृह्यते । प्रत्येकपरिसमाप्तौ चावयविनः कार्येणाधिकारात्तस्य चैकत्वाच्छृङ्गेणापि स्तनकार्यं कुर्यादुरसा च पृष्ठकार्यम् । न चैवं दृश्यते । प्रागुत्पत्तेश्च कार्यस्यासत्त्व उत्पत्तिरकत्र्तृका निरात्मिका च स्यात् । उत्पत्तिश्च नाम क्रिया, सा सकर्तृकैव भवितुमर्हति, गत्यादिवत् । क्रिया च नाम स्यादकर्तृका चेति विप्रतिषिध्येत । घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमाना

भामती

विशेषा अनिर्वाच्या न परमार्थसन्तस्तथा च क्वास्य प्रत्येकपरिसमाप्तिरिति, तथाप्यभ्युपेत्येदमूदितमिति मन्तव्यम् । अकर्तृका यतोऽतो निरात्मिका स्यात् , कारणाभावे हि कार्यमुत्पन्नं किं नाम भवेत् ? अतो निरात्मकत्वमित्यर्थः । यद्युच्येत घटशब्दस्तदवयवेषु व्यापाराविष्टतया पूर्वापरीभावमापन्नेषु घटोपजनना-भिमुखेषु तादर्थ्यनिमित्तादुपचारात् प्रयुज्यते, तेषाञ्च सिद्धत्वेन कर्तृत्वमस्तीत्युपपद्यते घटो भवतीति प्रयोग इत्यत आह ॐ घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमानः इति ॐ । उत्पादना हि सिद्धानां कपालकुलालादीनां व्यापारो नोत्पत्तिः । न चोत्पादनेवोत्पत्तिः, प्रयोज्यप्रयोजकव्यापारयोर्भेदादभेदे वा घटमुत्पादयतीतिवद्

भामती-व्याख्या

तन्तु में घट उपलब्ध नहीं होता ।

यद्यपि हमारे अद्वैतवेदान्त में एक ही ब्रह्मरूप सत्ता पारमार्थिक तत्त्व है, वही गवादि पिण्डों में अभिव्यक्त होकर गोत्वादि पदों से अभिहित होती है, उससे भिन्न गोत्वादि विशेष जातियां अनिर्वचनीयमात्र हैं, परमार्थतः हैं ही नहीं, फिर वह प्रत्येक व्यक्ति में परिसमाप्त क्योंकर होगी ? तथापि गोत्वादि विशेष जातियों को पृथक् मान करके दोषान्तर का अभिधान किया गया है—"तथा प्रतीत्यभावात्” ।

[पटादि असत् कार्यों की उत्पत्ति मान कर ही समवाय सम्बन्ध का उपपादन किया जाता है किन्तु वह उचित नहीं, क्योंकि यदि अपनी उत्पत्ति से पूर्व पटादि कार्य तन्त्वादि में नहीं रहता, तब 'पटः उत्पद्यते' — इत्यादि प्रयोगों के द्वारा जो उत्पत्ति क्रिया का कर्तृत्व (कर्तृकारकत्व) प्रतीत होता है, वह क्योंकर उपपन्न होगा ? क्योंकि असत् पदार्थ किसी भी क्रिया का कर्त्ता नहीं होता । इतना ही नहीं, अपितु “उत्पत्तिरकत्र्तृका निरात्मिका स्यात्” । अर्थात् ] कोई भी क्रिया कर्त्ता के बिना संपन्न नहीं हो सकती, अतः 'उत्पत्ति' क्रिया अकर्तृका ( अपने कर्ता कारक के बिना ) आत्मलाभ ( स्वरूप-लाभ ) न कर सकेगी, निरात्मिका ( निःस्वरूपा ) हो जायगी, क्योंकि जो किसी कर्त्ता के द्वारा की जाती है, उसे ही क्रिया कहते हैं, कर्त्ता के न होने पर क्रिया कैसे होगी ? यदि कहा जाय कि 'घट उत्पद्यते'—यहाँ 'घट' शब्द का गौण प्रयोग तादर्थ्य निमित्त को लेकर अपने अवयवरूप ( आधारभूत ) कपाल के लिए वैसे ही होता है, जैसे वीरण ( उशीर या खस ) के लिए 'कट' शब्द का प्रयोग, जैसा कि न्याय-भाष्यकार कहते हैं— "तादर्थ्यात् कटार्थेषु वीरणेषु व्यूह्यमानेषु कटं करोतीति भवति” ( न्या. सू. २।२।६१ ) । कपालादि पदार्थ घटोत्पत्ति के समय सत् या विद्यमान ही हैं, अतः उनमें उत्पत्ति क्रिया का कर्तृत्व उपपन्न क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है— “घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमाना न घटकर्तृका, किं तर्हि ? अन्यकर्तृका”। घट की उत्पत्ति वह व्यापार ( क्रिया ) है, जिसका कर्त्ता ( आश्रय ) घट ही हो सकता है, कपालादि नहीं । कपालादि में उत्पादना ( उत्पत्ति की प्रयोजकता या हेतुता ) रहती है । उत्पादना को ही उत्पत्ति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रयोजक और प्रयोज्य का भेद लोक-प्रसिद्ध है । यदि उत्पादना और उत्पत्ति का अभेद माना जाता है, तब जैसे घट में उत्पादना की कर्मता को

७५

५९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ २ पा. १ सू. १८

न घटकर्तृका, किं तर्हि ? अन्यकर्तृकेति कल्प्या स्यात् । तथा कपालादीनामप्युत्पत्ति- रुच्यमानाऽन्यकर्तृकैव कल्प्येत । तथा च सति घट उत्पद्यत इत्युक्ते कुलालादीनि कारणान्युत्पद्यन्त इत्युक्तं स्यात् । न च लोके घटोत्पत्तिरित्युकते कुलालादीनामप्युत्प- द्यमानता प्रतीयते, उत्पन्नताप्रतीतेश्च । अथ स्वकारणसत्तासंबन्ध एवोत्पत्तिरात्मला- भश्च कार्यस्येति चेत्, कथमलब्धात्मकं संबध्येतेति वक्तव्यम् ? सतोर्हि द्वयोः संबन्धः संभवति, न सदसतो रसतोर्वा, अभावस्य च निरुपाख्यत्वात्प्रागुत्पत्तेरिति

भामती

घटमुत्पद्यत इत्यपि प्रसङ्गात् । तस्मात् करोतिकारयत्योरिव घटगोचरयोर्भृत्यस्वामिसमवेतयोरुत्पत्त्युत्पा- दनयोरधिष्ठानभेदोऽभ्युपेत्यः, तत्र कपालकुलालादीनां सिद्धानामुत्पादनाधिष्ठानानां नोत्पत्त्यधिष्ठानत्व- मस्तीति परिशेष्याद् घट एव साध्य उत्पत्तेरधिष्ठानमेषितव्यः । न चासावसन्नधिष्ठानं भवितुमर्हतीति सत्त्वमस्याभ्युपेयम् । एवञ्च घटो भवतीति घटव्यापारस्य धातुपात्तत्वात् तत्रास्य कर्तृत्वमुपपद्यते तण्डु- लानामिव सतां विक्कित्तौ विक्किद्यन्ति तण्डुला इति । शङ्कते ॐ अथ स्वकारणसत्तासम्बन्ध एवोत्पत्तिः इति ॐ । एतदुक्तं भवति — नोत्पत्तिर्नाम कश्चिद् व्यापारो येनासिद्धस्य कथमत्र कर्तृत्वमित्यनुयुज्येत, किन्तु स्वकारणसमवायः स्वसत्तासमवायो वा, न चासतोऽप्यविरुद्ध इति । सोऽप्यसतोऽनुपपन्न इत्याह ॐ कथमलब्धात्मकम् इति ॐ । अपि च प्रागुत्पत्तेरसत्त्वं कार्यस्येति कार्याभावस्य भावेन मर्यादाकरण- मनुपपन्नमित्याह ॐ अभावस्य च इति ॐ । स्यादेतत् — अत्यन्ताभावस्य वन्ध्यासुतस्य मा भून्मर्यादा

भामती-व्याख्या

लेकर कुलालो घटमुत्पादयति'—ऐसा प्रयोग होता है, वैसे ही उत्पादना से अभिन्न उत्पत्ति की भी कर्मता घट में मान कर 'घटमुत्पद्यते'—ऐसा प्रयोग होना चाहिए, घट उत्पद्यते— ऐसा नहीं। फलतः यह मानना होगा कि 'करोति' और 'कारयति'--इन दोनों क्रियाओं के आश्रय भिन्न होते हैं, जैसे कि 'स्वामी घटं कारयति' और 'भृत्यो घटं करोति'—यहाँ घटविषयक (घटकर्मक) स्वामी (प्रयोजक) की कारयितृता और भृत्य की कर्तृता भिन्न- भिन्न आश्रय में रहनेवाले धर्म हैं, वैसे ही उत्पादना और उत्पत्ति—इन क्रियाओं के भी आश्रय भिन्न हैं। इस प्रकार उत्पादना क्रिया के अधिष्ठानभूत कपाल-कुलालादि सिद्ध पदार्थ उत्पत्ति क्रिया के आश्रय नहीं हो सकते। परिशेषतः घटरूप साध्य पदार्थ को ही उत्पत्ति क्रिया का आश्रय मानना चाहिए। घट असत् होकर उत्पत्ति क्रिया का आधार कभी नहीं हो सकता, अतः घट का सत्त्व भी पहले मानना होगा। सत्त्व मान लेने पर 'घटो भवति'— यहाँ घट का जो भवन (उत्पत्ति) 'भू' धातु से प्रतिपादित है, उसका कर्तृत्व घट में उपपन्न है।

शङ्का की जाती है—"अथ स्वकारणसत्तासम्बन्ध एवोत्पत्तिः।" आशय यह है कि उत्पत्ति कोई व्यापार या क्रिया नहीं, जिसकी आश्रयता असत् पदार्थों में अनुपपन्न होती। स्व-कारण-समवाय अथवा स्व-सत्ता-समवाय का नाम उत्पत्ति है। घट का स्वकीय कारणीभूत कपालों में जो स्व-समवाय अथवा स्व में जो सत्ता जाति का समवाय सम्बन्ध है, वह ऐसा उत्पत्ति पदार्थ है, जो असत् घट में भी रह सकता है, उसके लिए घट का सत्त्व पहले से मानने की आवश्यकता क्या ?

उक्त शङ्का का निरास किया जाता है—"कथमलब्धात्मकं सम्बन्ध्येत ?" सारांश यह है कि स्वकीय कारण में कार्य का सम्बन्ध हो, चाहे स्व में सत्ता का सम्बन्ध हो। असद्भूत कार्य का स्वप्रतियोगिक या स्वानुयोगिक कोई भी सम्बन्ध सम्भव नहीं, क्योंकि दो सत् पदार्थों का ही परस्पर सम्बन्ध होता है। दूसरी बात यह है कि 'घट का असत्त्व घट की उत्पत्ति से पूर्व'—इस प्रकार का मर्यादा-करण (सीमाङ्कन) असत्त्व के लिए संगत नहीं,

सत्कार्यवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५९५

मर्यादाकरणमनुपपन्नम् । सतां हि लोके क्षेत्रगृहादीनां मर्यादा दृष्टा, नाभावस्य । न हि वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव प्राक्पूर्णवर्मणोऽभिषेकादित्येवंजातीयकेन मर्यादाकरणेन, निरुपाख्यो वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव भवति भविष्यतीति वा विशेष्यते । यदि च वन्ध्यापुत्रोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वमभविष्यत्तत इदमप्युपापत्स्यत—कार्याभावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं भविष्यतीति । वयं तु पश्यामो वन्ध्यापुत्रस्य कार्याभावस्य चाभावत्वाविशेषाद्यथा वन्ध्यापुत्रः कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यत्येवं कार्याभावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यतीति । नन्वेवं सति कारकव्यापारोऽनर्थकः प्रसज्येत । यथैव हि प्राक्सिद्धत्वात्कारणस्वरूपसिद्धये न कश्चिद् व्याप्रियते, एवं प्राक्सिद्धत्वात्तदनन्यत्वाच्च कार्यस्य स्वरूपसिद्धयेऽपि न कश्चिद्व्याप्रियेत, व्याप्रियते च । अतः कारकव्यापारार्थवत्त्वाय मन्यामहे प्रागुत्पत्तेरभावः कार्यस्येति । नैष दोषः, यतः कार्याकारेण कारणं व्यवस्थापयतः कारकव्यापारस्यार्थवत्त्वमुपपद्यते, कार्याकारोऽपि

भामती

अनुपाख्येयो हि सः, घटप्रागभावस्य तु भविष्यता घटेनोपाख्येयस्यास्ति मर्यादेत्यत आह ॐ यदि बन्ध्यापुत्रः कारकव्यापाराद् इति ॐ । उक्तमेतदधस्ताद्यथा न जातु घटः पटो भवेत्येवमसदपि सन्न भवतीति । तस्मान्मृत्पिण्डे घटस्यासत्त्वेऽत्यन्तासत्त्वमेवेति । अत्रासत्कार्यवादो चोदयति ॐ नन्वेवं सति इति ॐ । प्राक् प्रसिद्धमपि कार्यं कदाचित् कारणेन योजयितुं व्यापारोऽर्थवान् भवेदित्यत आह ॐ तदनन्यत्वाच्च इति ॐ । परिहरति ॐ नैष दोषः इति ॐ । उक्तमेतद्यथा भुजङ्गतत्त्वं न रज्जोर्भिद्यते, रज्जुरेव हि

भामती-व्याख्या

क्योंकि असत्त्व अभाव पदार्थ है, अभाव निरुपाख्य माना जाता है, अतः 'अभाव पदार्थ इन दैशिक और कालिक सीमाओं के बीच में रहता है'—ऐसी उपाख्या सम्भव नहीं। खेत और घर आदि भाव पदार्थों का ही सीमाङ्कन हो सकता है, अभाव का नहीं—"अभावस्य च निरुपाख्यत्वात् 'प्रागुत्पत्तेः'—इति मर्यादाकरणमनुपपन्नम्"। यदि कहा जाय कि अभावों में अत्यन्ताभाव और वन्ध्या-सुतादि अलीक पदार्थों का मर्यादा-करण अवश्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अनुपाख्य हैं किन्तु प्रागभाव घटादि के द्वारा उपाख्येय (निरूपणीय) होता है, अतः उसकी मर्यादा घटकी उत्पत्ति क्यों न हो सकेगी ? इस शङ्का का उत्तर है—"यदि च वन्ध्यापुत्रः कारकव्यापारादूर्ध्वमभविष्यत्"। इस तथ्य का स्पष्टीकरण पहले ही किया जा चुका है कि जैसे घट कभी पट नहीं हो सकता, वैसे ही असत् पदार्थ कभी सत् नहीं हो सकता, प्रागभाव भी असत् और अनुपाख्य है, अतः उसका भी मर्यादा-करण सम्भव नहीं। फलतः मृत्पिण्ड में घट का असत्ता मानने पर घट का अत्यन्त असत् ही मानना होगा।

शङ्का—"नन्वेवं सति" इत्यादि भाष्य में असत्कार्यवादी की ओर से यह शङ्का प्रस्तुत की गई है कि यदि घटादि कार्य को पहले से ही सत् (सिद्ध) माना जाता है, तब उसकी उत्पत्ति के लिए कुलालादि कारक-चक्र का व्यापार निरर्थक हो जाता है, क्योंकि उस समय जैसे सिद्ध तन्तुरूप कारण का स्वरूप-लाभ करने के लिए कोई व्यापार नहीं किया जाता, वैसे ही सिद्ध घटादि की सिद्धि के लिए कोई व्यापार क्यों किया जायगा ? जैसे दो सिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए व्यापार किया जाता है, वैसे भी प्रकृत में कोई व्यापार अपेक्षित नहीं, क्योंकि "तदनन्यत्वात्"। सत्कार्यवाद में कार्य और कारण का अत्यन्त अभेद माना जाता है, जब कि सम्बन्ध को भेद की अपेक्षा होती है।

**समाधान—**उक्त शङ्का का भाष्यकार परिहार करते हैं—"नैष दोषः"। यह कहा जा चुका है कि जैसे आरोपित सर्प अपने आधारभूत रज्जु से भिन्न नहीं, रज्जु ही सर्प है,

५९६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १८

कारणस्यात्मभूत एवान्यात्मभूतस्यानारभ्यत्वादित्यभाणि । न च विशेषदर्शनमात्रेण वस्त्वन्यत्वं भवति । नहि देवदत्तः संकोचितहस्तपादः प्रसारितहस्तपादश्च विशेषेण दृश्यमानोऽपि वस्त्वन्यत्वं गच्छति, स एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । तथा प्रतिदिनमनेकसंस्थानानामपि पित्रादीनां न वस्त्वन्यत्वं भवति, मम पिता मम भ्राता मम पुत्र इति प्रत्यभिज्ञानात् । जन्मोच्छेदान्तरितत्वात्तन्न युक्तं नान्यत्रेति चेत्, न; क्षीरादीनामपि दध्याद्याकारसंस्थानस्य प्रत्यक्षत्वात् । अदृश्यमानानामपि वटधानादीनां समानजातीयावयवान्तरोपचितानामङ्कुरादिभावेन दर्शनगोचरतापत्तौ जन्मसंज्ञा । तेषामेवावयवानामपचयवशाददर्शनापत्तावुच्छेदसंज्ञा । तत्रेहग्जन्मोच्छेदान्तरितत्वाच्छेदसतः सत्त्वापत्तिः, सतश्चासत्त्वापत्तिः, तथा सति गर्भवासिन उत्तानशायिनश्च भेदप्रसङ्गः । तथा च बाल्ययौवनस्थाविरेष्वपि भेदप्रसङ्गः, पित्रादिव्यवहारलोपप्रसङ्गश्च । एतेन क्षणभङ्गवादः प्रतिवदितव्यः । यस्य पुनः प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यं तस्य निर्विषयः कारकव्यापारः स्यात् । अभावस्य विषयत्वानुपपत्तेराकाशहननप्रयोजनखड्गाद्यनेकायुधप्रयुक्तिकवत् । समवायिकारणविषयः कारकव्यापारः स्यादिति चेत्, न; अन्यविषयेण कारकव्यापारेणान्यनिष्पत्तेरतिप्रसङ्गात् । समवायिकारणस्यैवात्मातिशयः कार्यमिति चेत्, न; सत्कार्यतापत्तेः । तस्मात्क्षीरादीन्येव द्रव्याणि दध्यादिभावेनावतिष्ठमानानि कार्याख्यां लभन्त इति न कारणादन्यत्कार्यं वर्षशतेनापि शक्यं निश्चेतुम् । तथा मूलकारणमेवान्त्यात्कार्यात्तेन तेन कार्याकारेण नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते । एवं युक्तेः कार्यस्य

भामती

तत्, काल्पनिकस्तु भेदः, एवं वस्तुतः कार्यतत्त्वं न कारणाद्भिद्यते, कारणस्वरूपमेव हि तत्, अनिर्वाच्यं तु कार्यरूपं भिन्नमिवाभिन्नमिव चावभासत इति । तदिदमुक्तं ॐ वस्त्वन्यत्वम् इति ॐ । वस्तुतः परमार्थतोऽन्यत्वं न विशेषदर्शनमात्राद्भवति, सांव्यवहारिके तु कथञ्चित्तत्वान्यत्वे भवत एवेत्यर्थः । अनयैव हि विशेष संदर्भों योज्यः । असत्कार्यवादिनं प्रति दूषणान्तरमाह ॐ यस्य पुनः इति ॐ । कार्यस्य कारणादभेदे सविषयत्वं कारकव्यापारस्य स्यान्नान्यथेत्यर्थः । ॐ मूलकारणं ॐ ब्रह्म । शब्दान्तराच्चेति । सूत्रावयवमवतार्य व्याचष्टे ॐएवं युक्तेः कार्यस्य ॐ इति । अतिरोहितार्थम् ॥ १८ ॥

भामती-व्याख्या

उनका भेद काल्पनिकमात्र है। वैसे ही कार्यतत्त्व अपने कारणतत्त्व से परमार्थतः भिन्न नहीं होता, वह कारण-स्वरूप ही होता है किन्तु 'अनिर्वाचनीय कार्य अपने कारण से भिन्न एवं अभिन्न जैसा प्रतीत होता है। यत्किञ्चित् विशेषता (भेद) देख लेनेमात्र से वस्तु अन्य नहीं हो जाती—'न च विशेषेण दृश्यमानोऽपि वस्त्वन्यत्वं भवति'। यहाँ 'वस्तुतः' का अर्थ परमार्थतः है । थोड़ा-सा अन्तर दिख जाने मात्र से यदि वस्तु-भेद हो, तब एक देवदत्त अपने हाथ को संकुचित या विस्तारित कर लेनेमात्र से भिन्न हो जायगा और 'सोऽयं देवदत्तः'-इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा निराधार हो जायगी । 'ये तन्तु हैं, पट नहीं'-इत्यादि व्यवहार तो कथंचित् हो जाता है और पटाकारेण तन्तुओं को व्यवस्थित करने के लिए कारक-चक्र का व्यापार भी सार्थक है । इसी प्रकार भाष्य के शेष सन्दर्भ की व्याख्या कर लेनी चाहिए।

असत्कार्यवाद में दूषणान्तर का उद्भावन किया जाता है—"यस्य पुनः"। पटादि कार्यों का तन्त्वादि कारणों से अभेद मानने पर तन्तुओं के आश्रित कारक-व्यापार उपपन्न हो जाता है, किन्तु कार्य को तन्तुओं से अन्य एवं असत् मानने पर वह क्रिया किस द्रव्य पर होगी ? भाष्यकार ने जो कहा है—"मूलकारणमेवान्त्यात् कार्यात्"। यहाँ 'मूलकारण' पद से 'ब्रह्म' का ग्रहण किया गया है। इस अट्ठारहवें सूत्र के "शब्दान्तराच्च"—इस भाग का

सत्कार्यवादः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५९७

प्रागुत्पत्तेः सत्त्वमनन्यत्वं च कारणादवगम्यते शब्दान्तराच्चैतदवगम्यते । पूर्वसूत्रेऽसद्द्व्यपदेशिनः शब्दस्योदाहृतत्वात्ततोऽन्यः सद्द्व्यपदेशी शब्दः शब्दान्तरम्—'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि । 'तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीद्' इति चासत्पक्षमुपक्षिप्य 'कथमसतः सज्जायेत' इत्याक्षिप्य 'सदेव सोम्येदमग्र आसीद्' (छा० ६।२।१) इत्यवधारयति । तत्रेदंशब्दवाच्यस्य कार्यस्य प्रागुत्पत्तेः सच्छब्दवाच्येन कारणेन सामानाधिकरण्यस्य श्रूयमाणत्वात्सत्त्वानन्यत्वे प्रसिद्ध्यतः । यदि तु प्रागुत्पत्तेरसत्कार्यं स्यात्पश्चाच्चोत्पद्यमानं कारणे समवेयात्तदाऽन्यत्कारणात्स्यात् , तत्र 'येनाश्रुतं श्रुतं भवति' (छा० ६।१।३) इतीयं प्रतिज्ञा पीड्येत । सत्त्वानन्यत्वावगतेस्त्वियं प्रतिज्ञा समर्थ्यते ॥ १८ ॥

पटवच्च ॥ १९ ॥

यथा च संवेष्टितः पटो न व्यक्तं गृह्यते—किमयं पटः ? किं वाऽन्यद् द्रव्यमिति । स एव प्रसारितो यत्संवेष्टितं द्रव्यं तत्पट एवेति प्रसारणेनाभिव्यक्तो गृह्यते । यथा च संवेष्टनसमये पट इति गृह्यमाणोऽपि न विशिष्टायामविस्तारो गृह्यते, स एव प्रसारणसमये विशिष्टायामविस्तारो गृह्यते–न संवेष्टितरूपादन्योऽयं भिन्नः पट इति । एवं तन्त्वादिकारणावस्थं पटादिकार्यमस्पष्टं सत् तुरीवेमकुविन्दादिकारकव्यापारादिभिर्व्यक्तं स्पष्टं गृह्यते । अतः संवेष्टितप्रसारितपटन्यायेनैवानन्यत्कारणात्कार्यमित्यर्थः॥१९॥

यथा च प्राणादि ॥ २० ॥

यथा च लोके प्राणापानादिषु प्राणभेदेषु प्राणायामेन निरुद्धेषु कारणमात्रेण रूपेण वर्तमानेषु जीवनमात्रं कार्यं निर्वर्त्यते, नाकुञ्चनप्रसारणादिकं कार्यान्तरम् । तेष्वेव प्राणभेदेषु पुनः प्रवृत्तेषु जीवनादधिकमाकुञ्चनप्रसारणादिकमपि कार्यान्तरं


भामती

"पटवच्च", "यथा च प्राणादि" इति च सूत्रे निगदव्याख्यातेन भाष्येण व्याख्याते ॥ १९-२० ॥


भामती-व्याख्या

अवतरणपूर्वक व्याख्यान किया जाता है—"एवं युक्तेः कार्यस्य प्रागुत्पत्तेः सत्त्वमनन्यत्वं कारणादवगम्यते शब्दान्तराच्चैतदवगम्यते"। पूर्वसूत्र में जो "धर्मान्तरेण"—ऐसा कह कर 'अव्याकृतत्व' धर्म के द्वारा असत्त्व का उपपादन कर कार्य-सत्त्व की स्थापना की गई है, वहाँ 'शब्दान्तर' को अभ्युच्चय के रूप में प्रस्तुत किया गया है । 'शब्दान्तर' का अर्थ है—पूर्वसूत्र में उदाहृत 'असत्' शब्द से भिन्न 'सत्' शब्द के द्वारा भी सत्कार्यवाद की सिद्धि होती है—"सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" (छां० ६।२।१) । १८ ॥

"पटवच्च"—इस सूत्र के द्वारा यह कहा गया है कि जैसे वेष्टित (लिपटे हुए) वस्त्र का लम्बा-चौड़ा आकार दिखाई नहीं देता और प्रसारित (फैलाए हुए) वस्त्र का आकार प्रकट हो जाता है। वैसे ही कारणावस्था में कार्य सत् होने पर भी अव्यक्त और बुने जाने पर सुव्यक्त हो जाता है ॥ १९ ॥

"यथा च प्राणादि"—यह सूत्र अर्थक्रिया-भेद में असत्कार्य की साधकता को पङ्गु कर देता है। जैसे निरुद्ध (समाधिस्थ) प्राण अपने शरीर में आकुञ्चन-प्रसारणादि क्रियाएँ नहीं कर सकता, वैसे ही कारणावस्था में पटादि कार्य भी प्रावरणादि कार्य नहीं करता—एतावता असत् नहीं हो सकता ॥ २० ॥