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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 639 में से

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पृष्ठ 608

५९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. १८

कल्प्यमाना नान्याऽसती वा कार्यं नियच्छेत् , असत्त्वाविशेषादन्यत्वाविशेषाच्च । तस्मा- त्कारणस्यात्मभूता शक्तिः शक्तेश्चात्मभूतं कार्यम् । अपि च कार्यकारणयोर्द्रव्यगुणादीनां चाश्वमहिषवद्भेदबुद्ध्यभावात्तादात्म्यमभ्युपगन्तव्यम् । समवायकल्पनायामपि, समवा- यस्य समवायिभिः संबन्धेऽभ्युपगम्यमाने, तस्य तस्यान्योऽन्यः संबन्धः कल्पयितव्य इत्यनवस्थाप्रसङ्गः । अनभ्युपगम्यमाने च विच्छेदप्रसङ्गः । अथ समवायः स्वयं संबन्ध- रूपत्वादनपेक्ष्यैवापरं संबन्धं संबध्येत, संयोगोऽपि तर्हि स्वयं संबन्धरूपत्वादनपेक्ष्यैव

भामती

सत्त्वासन्नेवेष्यत आह ॐ शक्तिश्च इति ॐ । नान्या कार्यकारणाभ्यां, नाप्यसती कार्यान्मनेति योजना । ॐ अपि च कार्यकारणयोः इति ॐ । यद्यपि भावाच्चोपलब्धेरित्यत्रायमर्थं उक्तस्तथापि समवायदूषणाय पुनरवतारितः । अनभ्युपगम्यमाने च समवायस्य समवायिभ्यां सम्बन्धे विच्छेदप्रसङ्गोऽवयवावयविद्रव्य- गुणादीनां मिथः । नह्यसम्बद्धः समवायिभ्यां समवायः समवायिनौ सम्बन्धयेदिति । शङ्कते ॐ अथ समवायः स्वयम् इति ॐ । यथा हि सत्त्वयोगाद् द्रव्यगुणकर्माणि सन्ति, सत्त्वं तु स्वभावत एव सदिति न सत्त्वान्तरयोगमपेक्षते, तथा समवायः समवायिभ्यां सम्बद्धं न सम्बन्धान्तरयोगमपेक्षते, स्वयं सम्बन्धरूप- त्वादिति, तदेतत्सिद्धान्तान्तरविरोधापादनेन निराकरोति ॐ संयोगोऽपि तर्हि इति ॐ । न च संयोगस्य

भामती-व्याख्या

वह शक्ति कार्य के असत् होने पर भी कारण में रहती है' तब के लिए कहा गया है— शक्तिश्च कारणस्य" । अर्थात् वह शक्ति न तो कार्य और कारण से भिन्न हो सकती है और न कार्य के असत् होने पर उपपन्न हो सकती है। “अपि च कार्यकारणयोः” । यद्यपि कार्य और कारण का तादात्म्य "भावाच्चोपलब्धेः” –इस पन्द्रहवें सूत्र में कहा जा चुका है, तथापि समवाय सम्बन्ध का निरास करने के लिए तादात्म्य का पुनः पुष्टीकरण कर दिया गया है। "अनभ्युपगम्यमाने च विच्छेदप्रसङ्गः" –इस भाष्य का आशय यह है कि समवाय सम्बन्ध का अपने सम्बन्धियों के साथ सम्बन्धान्तर मानने पर अनवस्था और सम्बन्धान्तर न मानने पर समवाय के अवयव-अवयवी और गुण-द्रव्यादि संबंधियों का परस्पर विच्छेद प्रसक्त होता है। [पट और तन्तु --इन दोनों के साथ एक समवाय का सम्बन्ध माना जाता है, तब समवाय के द्वारा सम्बन्धित पट और तन्तुओं में 'पटवन्तः तन्तवः' या 'पटविशिष्टाः तन्तवः' --इस प्रकार विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न हो जाता है किन्तु समवाय का पटादि कार्य और तन्तुवादि कारण से सम्बन्ध न मानने पर कार्य और कारण में विशिष्ट बुद्धि नहीं होगी, क्योंकि ] समवाय सम्बन्ध अपने कार्य और कारणादिरूप सम्बन्धियों से असम्बद्ध होकर उनको परस्पर सम्बन्धित नहीं कर सकता।

शङ्का –समवाय स्वयं सम्बन्धरूप होने के कारण सम्बन्धान्तर की अपेक्षा के विना वैसे ही अपने सम्बन्धियों में विशिष्टता-ज्ञान का जनक हो जाता है, जैसे द्रव्य, गुण और कर्म में सत्ता जाति के सम्बन्ध से सत्त्व-बुद्धि होती है, किन्तु सत्ता में सत्तान्तर-सम्बन्ध के विना ही 'सत्' बुद्धि हो जाती है।

समाधान –उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार ने सिद्धान्तान्तर-विरोध की शैली पर किया है-“संयोगोऽपि तर्हि” [अर्थात् नैयायिकों का यह भी कहना है कि संयोग सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों में समवाय सम्बन्ध से रह कर अपने सम्बन्धियों को परस्पर सम्बन्धित करता है। यहाँ सिद्धान्ती का कहना यह है कि यदि समवाय सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ सम्बन्धान्तर की अपेक्षा के विना ही अपने सम्बन्धियों में परस्पर वैशिष्ट्य-ज्ञान का जनक हो जाता है, तब संयोग सम्बन्ध भी अपने सम्बन्धियों के साथ समवाय सम्बन्ध के