सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 609

समवायनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंबलितम् ५९१

समवायं संबध्नीयेत । तादात्म्यप्रतीतेश्च द्रव्यगुणादीनां समवायकल्पनाऽनर्थक्यम् । कथं च कार्यमवयविद्रव्यं कारणेष्ववयवद्रव्येषु वर्तमानं वर्तते ? किं समस्तेष्ववयवेषु वर्तेत,

भामती

कार्यत्वात् कार्यस्य च समवायिकारणाधीनजन्मकत्वात् असमवाये च तदनुपपत्तेः समवायकल्पना संयोग इति वाच्यम् । अजसंयोगे तदभावप्रसङ्गात् । अपि च सम्बन्ध्यधीननिरूपणः समवायो यथा सम्बन्धिद्वयभेदे न भिद्यते तन्नाशे च न नश्यत्यपि तु नित्य एक एव, एवं यदि संयोगोऽपि भवेत् ततः को दोषः ? अथैतत्प्रसङ्गभिया संयोगवत्समवायोऽपि प्रतिसम्बन्धिमिथुनं भिद्यते चानित्यश्चेत्यभ्युपेयते, तथा सति यथैकस्मान्निमित्तकारणादेव जायत एवं संयोगोऽपि निमित्तकारणादेव जनिष्यत इति समानम् । ॐ तादात्म्यप्रतीतेश्च इति ॐ । सम्बन्धावगमो हि सम्बन्धकल्पनाबीजं न तादात्म्यावगमस्तस्य नानात्वैकाश्रयसम्बन्धविरोधादिति । वृत्तिविकल्पेनावयवातिरिक्तमवयविनं दूषयति ॐ कथञ्च कार्यम् इति ॐ । ॐ समस्त

भामती-व्याख्या

विना ही अपने सम्बन्धियों को परस्पर सम्बन्धित कर सकता, फलतः समवाय की सिद्धि ही न हो सकेगी ] । यदि नैयायिक यह कहता है कि संयोग एक जन्य पदार्थ है, जन्य पदार्थ सदैव अपने समवायिकारण के अधीन होता है, उसका समवाय सम्बन्ध न मानने पर समवायिकारण के विना संयोग की उपपत्ति क्योंकर होगी ? इस शङ्का का निरास करता हुआ सिद्धान्ती कहता है कि दो विभु पदार्थों का संयोग नित्य माना जाता है, जन्य नहीं, वह संयोग जैसे समवायिकरण के विना उपपन्न हो जाता है, वैसे ही सामान्य संयोग भी उपपन्न हो जायगा, समवाय मानने की आवश्यकता क्या ?

दूसरी बात यह भी है कि “द्विष्ठसम्बन्धसंवित्तिर्नैकरूपप्रवेदनात्” (प्रज्ञाकरभा. पृ. ४) इस न्याय के आधार पर समवाय सम्बन्ध भी अपने दोनों सम्बन्धियों के स्वभाव पर निर्भर है। दोनों सम्बन्धियों में परस्पर भेद है, किन्तु समवाय एक है, वह भिन्न नहीं होता। सम्बन्धियों के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, क्योंकि नित्य माना जाता है। इसी प्रकार यदि संयोग संबन्ध को मान लिया जाता है, तब क्या दोष ? यदि इस समान प्रसङ्ग ( प्रतिबन्दी ) के भय से संयोग के ही समान समवाय को भी सम्बन्धी के भेद से भिन्न और अनित्य मान लिया जाता है, तब अनवस्था-प्रसङ्ग से बचने के लिए समवाय को समवायिकारण के अधीन न मान कर केवल निमित्तकारण से ही उत्पन्न माना जा सकता है और उसी प्रकार संयोग भी केवल निमित्तकारण से उत्पन्न हो जायगा—इस प्रकार समान-प्रसङ्ग का घेराव बना ही रहता है।

“तादात्म्यप्रतीतेश्च द्रव्यगुणादीनाम्”- इस भाष्य का आशय यह है कि दो पदार्थों में जब 'सम्बद्धौ' इस प्रकार संबन्ध की प्रतीति होती है, तब उस प्रतीति के आधार पर संबन्ध की कल्पना की जाती है, किन्तु तादात्म्य की प्रतीति संबन्ध की साधिका नहीं, प्रत्युत पदार्थों में नानात्व और संबन्ध की विरोधिनी है, क्योंकि तादात्म्यापन्न पदार्थ नाना नहीं, एक होता है और एक पदार्थ में संबन्ध होता नहीं, संबन्ध सदैव अनेक पदार्थों का ही होता है, फलतः तादात्म्य नानात्वसमानाधिकरणभूत संबन्ध का विरोधी है।

जिस अवयवी पदार्थ का अवयवों में समवाय माना जाता है, वह अवयवी प्रत्येक अवयव में रहता है ? अथवा अनेक अवयवों में ? इस प्रकार उसकी वृत्तित्ता का विकल्प उठा कर अवयवी का निरास किया जाता है-“कथं च कार्यमवयविद्रव्यम्”। समस्त अवयवों में रहनेवाले वृक्षादि अवयवी की उपलब्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वृक्षादि के मध्य और पिछले भाग के अवयवों का द्रष्टा के इन्द्रिय से सम्बन्ध नहीं होता, क्योंकि वे अवयव साम्मुखीन

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 609, कुल 639 में से · BharatKosha