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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५९२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १८

उत प्रत्यवयवम् ? यदि तावत्समस्तेषु वर्तेत, ततोऽवयव्यनुपलब्धिः प्रसज्येत, समस्तावयवसन्निकर्षस्याशक्यत्वात् । न हि बहुत्वं समस्तेष्वाश्रयेषु वर्तमानं व्यस्ताश्रयग्रहणेन गृह्यते । अथावयवशः समस्तेषु वर्तेत, तदाप्यारम्भकावयवव्यतिरेकेणावयविनोऽवयवाः कल्येरन्, यैरारम्भकेष्ववयवेष्ववयवशोऽवयवी वर्तेत, कोशावयवव्यतिरिक्कैरंशावयवैरसिः कोशं व्याप्नोति । अनवस्था चैवं प्रसज्येत, तेषु तेष्ववयवेषु वर्तयितुमन्येषामन्येषामवयवानां कल्पनीयत्वात् । अथ प्रत्यवयवं वर्तेत तदैकत्र व्यापारेऽन्यत्राव्यापारः स्यात् । न हि देवदत्तः स्रुघ्ने संनिधीयमानस्तदहरेव पाटलिपुत्रेऽपि संनिधीयते । युगपदनेकत्र वृत्तावनेकत्वप्रसङ्गः स्यात् । देवदत्तयज्ञदत्तयोरिव स्रुघ्नपाटलिपुत्रनिवासिनोः । गोत्वादिवत्प्रत्येकं परिसमाप्तेर्न दोष इति चेत् ,-न, तथा

भामती

इति ॐ । मध्यपरभागयोरर्वाग्भागव्यवहितत्वात् । अथ समस्तावयवव्यासङ्गत्यपि कतिपयावयवस्थानो ग्रहीष्यत इत्यत आह ॐ न हि बहुत्वम् इति ॐ । ॐ अथावयवशः इति ॐ । बहुत्वसंख्या हि स्वरूपेणैव व्यासज्य संख्येयेषु वर्तत इत्येकतमसंख्येयाग्रहणेऽपि न गृह्यते, समस्तब्यासङ्गित्वात्तद्रूपस्य । अवयवी तु न स्वरूपेणावयवान् व्याप्नोति, अपि त्ववयवशः, तेन यथा सूत्रमवयवैः कुसुमानि व्याप्नुवन्न समस्तकुसुमग्रहणमपेक्षते कतिपयकुसुमस्थानस्यापि तस्योपलम्भेः, एवमवयव्यपीति भावः । निराकरोति ॐ तदापि इति ॐ । शङ्कते ॐ गोत्वादिवद् इति ॐ । निराकरोति ॐ न इति ॐ । यद्यपि गोत्वस्य सामान्यस्य

भामती-व्याख्या

अवयवों से व्यवहित होते हैं। 'समस्त अवयवों में रहनेवाले अवयवी का ग्रहण कतिपय अवयवों में ही क्यों न मान लिया जाय ?' इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि बहुत्वम्"। अर्थात् जैसे अनेक आश्रय में रहनेवाले बहुत्व का ग्रहण किसी एक आश्रय के ग्रहण से नहीं होता, वैसे समस्त अवयवों में रहनेवाले अवयवी का ग्रहण कतिपय अवयवों में संभव नहीं।

"अथावयवशः"—इस शङ्का-भाष्य का भाव यह है कि 'बहुत्व' संख्या अखण्ड एक और व्यासज्यवृत्ति (अनेक में रहनेवाली) है, अतः किसी एक आश्रय के ग्रहणमात्र से गृहीत नहीं होती, क्योंकि उसका स्वरूप अनेक आश्रयों में व्यासक्त (व्याप्त) होता है किन्तु अवयवी पदार्थ अखण्ड न होने के कारण स्वरूपतः समस्त अवयवों में पूरा व्याप्त नहीं, अपितु अवयवशः रहता है, अर्थात् पटादि का कुछ भाग सम्मुखीन तन्तुओं में, कुछ भाग मध्यावस्थित तन्तुओं में और कुछ भाग व्यवहित तन्तुओं में रहता है, अतः जैसे फूलों में धागा अवयवशः रहता है, अतः वह समस्त फूलों के ग्रहण की अपेक्षा न करके कतिपय फूलों में अवस्थित गृहीत होता है, उसी प्रकार अवयवी पदार्थ भी समस्त अवयवों के ग्रहण की अपेक्षा न करके कतिपय अवयवों के ग्रहणमात्र से गृहीत क्यों नहीं होगा ?

उक्त शङ्का का निराकरण करते हैं—'तदापि'। अर्थात् पट के जो अवयव भिन्न-भिन्न तन्तुओं में रहते हैं, उन्हें तन्तुरूप आरम्भक अवयवों से भिन्न ही मानना होगा। उन अवयवों की भी अपने अवयवों में अवयवशः वृत्तिता माननी होगी—इस प्रकार अवयव-कल्पना अनवस्था-ग्रस्त हो जाती है।

शंकावादी कहता है—"गोत्वादिवत्"। अर्थात् जैसे गोत्व जाति समस्त गौओं में रहती हुई भी अवयवशः नहीं रहती, अपितु प्रत्येक गौ में पूर्णरूप से रहती है, अतः किसी एक गौ के ग्रहणमात्र से गृहीत हो जाती है। वैसे ही अवयवी पदार्थ की भी प्रत्येक अवयव में पूर्णतया वृत्ति मानने पर कोई दोष प्रसक्त नहीं होता। उक्त शंका का निराकरण करते हैं—"न, तथा प्रतीत्यभावात्"। अर्थात् जैसे गोत्व प्रत्येक गौ में अनुभूत होता है, वैसे प्रत्येक

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