भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसत्कार्यवादः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ५९३
प्रतीत्यभावात् । यदि गोत्वादिवत्प्रत्येकं परिसमाप्तोऽवयवी स्यात्, यथा गोत्वं प्रतिव्यक्ति प्रत्यक्षं गृह्यत एवमवयव्यपि प्रत्यवयवं प्रत्यक्षं गृह्येत । नचैवं नियतं गृह्यते । प्रत्येकपरिसमाप्तौ चावयविनः कार्येणाधिकारात्तस्य चैकत्वाच्छृङ्गेणापि स्तनकार्यं कुर्यादुरसा च पृष्ठकार्यम् । न चैवं दृश्यते । प्रागुत्पत्तेश्च कार्यस्यासत्त्व उत्पत्तिरकत्र्तृका निरात्मिका च स्यात् । उत्पत्तिश्च नाम क्रिया, सा सकर्तृकैव भवितुमर्हति, गत्यादिवत् । क्रिया च नाम स्यादकर्तृका चेति विप्रतिषिध्येत । घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमाना
भामती
विशेषा अनिर्वाच्या न परमार्थसन्तस्तथा च क्वास्य प्रत्येकपरिसमाप्तिरिति, तथाप्यभ्युपेत्येदमूदितमिति मन्तव्यम् । अकर्तृका यतोऽतो निरात्मिका स्यात् , कारणाभावे हि कार्यमुत्पन्नं किं नाम भवेत् ? अतो निरात्मकत्वमित्यर्थः । यद्युच्येत घटशब्दस्तदवयवेषु व्यापाराविष्टतया पूर्वापरीभावमापन्नेषु घटोपजनना-भिमुखेषु तादर्थ्यनिमित्तादुपचारात् प्रयुज्यते, तेषाञ्च सिद्धत्वेन कर्तृत्वमस्तीत्युपपद्यते घटो भवतीति प्रयोग इत्यत आह ॐ घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमानः इति ॐ । उत्पादना हि सिद्धानां कपालकुलालादीनां व्यापारो नोत्पत्तिः । न चोत्पादनेवोत्पत्तिः, प्रयोज्यप्रयोजकव्यापारयोर्भेदादभेदे वा घटमुत्पादयतीतिवद्
भामती-व्याख्या
तन्तु में घट उपलब्ध नहीं होता ।
यद्यपि हमारे अद्वैतवेदान्त में एक ही ब्रह्मरूप सत्ता पारमार्थिक तत्त्व है, वही गवादि पिण्डों में अभिव्यक्त होकर गोत्वादि पदों से अभिहित होती है, उससे भिन्न गोत्वादि विशेष जातियां अनिर्वचनीयमात्र हैं, परमार्थतः हैं ही नहीं, फिर वह प्रत्येक व्यक्ति में परिसमाप्त क्योंकर होगी ? तथापि गोत्वादि विशेष जातियों को पृथक् मान करके दोषान्तर का अभिधान किया गया है—"तथा प्रतीत्यभावात्” ।
[पटादि असत् कार्यों की उत्पत्ति मान कर ही समवाय सम्बन्ध का उपपादन किया जाता है किन्तु वह उचित नहीं, क्योंकि यदि अपनी उत्पत्ति से पूर्व पटादि कार्य तन्त्वादि में नहीं रहता, तब 'पटः उत्पद्यते' — इत्यादि प्रयोगों के द्वारा जो उत्पत्ति क्रिया का कर्तृत्व (कर्तृकारकत्व) प्रतीत होता है, वह क्योंकर उपपन्न होगा ? क्योंकि असत् पदार्थ किसी भी क्रिया का कर्त्ता नहीं होता । इतना ही नहीं, अपितु “उत्पत्तिरकत्र्तृका निरात्मिका स्यात्” । अर्थात् ] कोई भी क्रिया कर्त्ता के बिना संपन्न नहीं हो सकती, अतः 'उत्पत्ति' क्रिया अकर्तृका ( अपने कर्ता कारक के बिना ) आत्मलाभ ( स्वरूप-लाभ ) न कर सकेगी, निरात्मिका ( निःस्वरूपा ) हो जायगी, क्योंकि जो किसी कर्त्ता के द्वारा की जाती है, उसे ही क्रिया कहते हैं, कर्त्ता के न होने पर क्रिया कैसे होगी ? यदि कहा जाय कि 'घट उत्पद्यते'—यहाँ 'घट' शब्द का गौण प्रयोग तादर्थ्य निमित्त को लेकर अपने अवयवरूप ( आधारभूत ) कपाल के लिए वैसे ही होता है, जैसे वीरण ( उशीर या खस ) के लिए 'कट' शब्द का प्रयोग, जैसा कि न्याय-भाष्यकार कहते हैं— "तादर्थ्यात् कटार्थेषु वीरणेषु व्यूह्यमानेषु कटं करोतीति भवति” ( न्या. सू. २।२।६१ ) । कपालादि पदार्थ घटोत्पत्ति के समय सत् या विद्यमान ही हैं, अतः उनमें उत्पत्ति क्रिया का कर्तृत्व उपपन्न क्यों न होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है— “घटस्य चोत्पत्तिरुच्यमाना न घटकर्तृका, किं तर्हि ? अन्यकर्तृका”। घट की उत्पत्ति वह व्यापार ( क्रिया ) है, जिसका कर्त्ता ( आश्रय ) घट ही हो सकता है, कपालादि नहीं । कपालादि में उत्पादना ( उत्पत्ति की प्रयोजकता या हेतुता ) रहती है । उत्पादना को ही उत्पत्ति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रयोजक और प्रयोज्य का भेद लोक-प्रसिद्ध है । यदि उत्पादना और उत्पत्ति का अभेद माना जाता है, तब जैसे घट में उत्पादना की कर्मता को
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