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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ २ पा. १ सू. १८

न घटकर्तृका, किं तर्हि ? अन्यकर्तृकेति कल्प्या स्यात् । तथा कपालादीनामप्युत्पत्ति- रुच्यमानाऽन्यकर्तृकैव कल्प्येत । तथा च सति घट उत्पद्यत इत्युक्ते कुलालादीनि कारणान्युत्पद्यन्त इत्युक्तं स्यात् । न च लोके घटोत्पत्तिरित्युकते कुलालादीनामप्युत्प- द्यमानता प्रतीयते, उत्पन्नताप्रतीतेश्च । अथ स्वकारणसत्तासंबन्ध एवोत्पत्तिरात्मला- भश्च कार्यस्येति चेत्, कथमलब्धात्मकं संबध्येतेति वक्तव्यम् ? सतोर्हि द्वयोः संबन्धः संभवति, न सदसतो रसतोर्वा, अभावस्य च निरुपाख्यत्वात्प्रागुत्पत्तेरिति

भामती

घटमुत्पद्यत इत्यपि प्रसङ्गात् । तस्मात् करोतिकारयत्योरिव घटगोचरयोर्भृत्यस्वामिसमवेतयोरुत्पत्त्युत्पा- दनयोरधिष्ठानभेदोऽभ्युपेत्यः, तत्र कपालकुलालादीनां सिद्धानामुत्पादनाधिष्ठानानां नोत्पत्त्यधिष्ठानत्व- मस्तीति परिशेष्याद् घट एव साध्य उत्पत्तेरधिष्ठानमेषितव्यः । न चासावसन्नधिष्ठानं भवितुमर्हतीति सत्त्वमस्याभ्युपेयम् । एवञ्च घटो भवतीति घटव्यापारस्य धातुपात्तत्वात् तत्रास्य कर्तृत्वमुपपद्यते तण्डु- लानामिव सतां विक्कित्तौ विक्किद्यन्ति तण्डुला इति । शङ्कते ॐ अथ स्वकारणसत्तासम्बन्ध एवोत्पत्तिः इति ॐ । एतदुक्तं भवति — नोत्पत्तिर्नाम कश्चिद् व्यापारो येनासिद्धस्य कथमत्र कर्तृत्वमित्यनुयुज्येत, किन्तु स्वकारणसमवायः स्वसत्तासमवायो वा, न चासतोऽप्यविरुद्ध इति । सोऽप्यसतोऽनुपपन्न इत्याह ॐ कथमलब्धात्मकम् इति ॐ । अपि च प्रागुत्पत्तेरसत्त्वं कार्यस्येति कार्याभावस्य भावेन मर्यादाकरण- मनुपपन्नमित्याह ॐ अभावस्य च इति ॐ । स्यादेतत् — अत्यन्ताभावस्य वन्ध्यासुतस्य मा भून्मर्यादा

भामती-व्याख्या

लेकर कुलालो घटमुत्पादयति'—ऐसा प्रयोग होता है, वैसे ही उत्पादना से अभिन्न उत्पत्ति की भी कर्मता घट में मान कर 'घटमुत्पद्यते'—ऐसा प्रयोग होना चाहिए, घट उत्पद्यते— ऐसा नहीं। फलतः यह मानना होगा कि 'करोति' और 'कारयति'--इन दोनों क्रियाओं के आश्रय भिन्न होते हैं, जैसे कि 'स्वामी घटं कारयति' और 'भृत्यो घटं करोति'—यहाँ घटविषयक (घटकर्मक) स्वामी (प्रयोजक) की कारयितृता और भृत्य की कर्तृता भिन्न- भिन्न आश्रय में रहनेवाले धर्म हैं, वैसे ही उत्पादना और उत्पत्ति—इन क्रियाओं के भी आश्रय भिन्न हैं। इस प्रकार उत्पादना क्रिया के अधिष्ठानभूत कपाल-कुलालादि सिद्ध पदार्थ उत्पत्ति क्रिया के आश्रय नहीं हो सकते। परिशेषतः घटरूप साध्य पदार्थ को ही उत्पत्ति क्रिया का आश्रय मानना चाहिए। घट असत् होकर उत्पत्ति क्रिया का आधार कभी नहीं हो सकता, अतः घट का सत्त्व भी पहले मानना होगा। सत्त्व मान लेने पर 'घटो भवति'— यहाँ घट का जो भवन (उत्पत्ति) 'भू' धातु से प्रतिपादित है, उसका कर्तृत्व घट में उपपन्न है।

शङ्का की जाती है—"अथ स्वकारणसत्तासम्बन्ध एवोत्पत्तिः।" आशय यह है कि उत्पत्ति कोई व्यापार या क्रिया नहीं, जिसकी आश्रयता असत् पदार्थों में अनुपपन्न होती। स्व-कारण-समवाय अथवा स्व-सत्ता-समवाय का नाम उत्पत्ति है। घट का स्वकीय कारणीभूत कपालों में जो स्व-समवाय अथवा स्व में जो सत्ता जाति का समवाय सम्बन्ध है, वह ऐसा उत्पत्ति पदार्थ है, जो असत् घट में भी रह सकता है, उसके लिए घट का सत्त्व पहले से मानने की आवश्यकता क्या ?

उक्त शङ्का का निरास किया जाता है—"कथमलब्धात्मकं सम्बन्ध्येत ?" सारांश यह है कि स्वकीय कारण में कार्य का सम्बन्ध हो, चाहे स्व में सत्ता का सम्बन्ध हो। असद्भूत कार्य का स्वप्रतियोगिक या स्वानुयोगिक कोई भी सम्बन्ध सम्भव नहीं, क्योंकि दो सत् पदार्थों का ही परस्पर सम्बन्ध होता है। दूसरी बात यह है कि 'घट का असत्त्व घट की उत्पत्ति से पूर्व'—इस प्रकार का मर्यादा-करण (सीमाङ्कन) असत्त्व के लिए संगत नहीं,