भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसत्कार्यवादः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५९५
मर्यादाकरणमनुपपन्नम् । सतां हि लोके क्षेत्रगृहादीनां मर्यादा दृष्टा, नाभावस्य । न हि वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव प्राक्पूर्णवर्मणोऽभिषेकादित्येवंजातीयकेन मर्यादाकरणेन, निरुपाख्यो वन्ध्यापुत्रो राजा बभूव भवति भविष्यतीति वा विशेष्यते । यदि च वन्ध्यापुत्रोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वमभविष्यत्तत इदमप्युपापत्स्यत—कार्याभावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं भविष्यतीति । वयं तु पश्यामो वन्ध्यापुत्रस्य कार्याभावस्य चाभावत्वाविशेषाद्यथा वन्ध्यापुत्रः कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यत्येवं कार्याभावोऽपि कारकव्यापारादूर्ध्वं न भविष्यतीति । नन्वेवं सति कारकव्यापारोऽनर्थकः प्रसज्येत । यथैव हि प्राक्सिद्धत्वात्कारणस्वरूपसिद्धये न कश्चिद् व्याप्रियते, एवं प्राक्सिद्धत्वात्तदनन्यत्वाच्च कार्यस्य स्वरूपसिद्धयेऽपि न कश्चिद्व्याप्रियेत, व्याप्रियते च । अतः कारकव्यापारार्थवत्त्वाय मन्यामहे प्रागुत्पत्तेरभावः कार्यस्येति । नैष दोषः, यतः कार्याकारेण कारणं व्यवस्थापयतः कारकव्यापारस्यार्थवत्त्वमुपपद्यते, कार्याकारोऽपि
भामती
अनुपाख्येयो हि सः, घटप्रागभावस्य तु भविष्यता घटेनोपाख्येयस्यास्ति मर्यादेत्यत आह ॐ यदि बन्ध्यापुत्रः कारकव्यापाराद् इति ॐ । उक्तमेतदधस्ताद्यथा न जातु घटः पटो भवेत्येवमसदपि सन्न भवतीति । तस्मान्मृत्पिण्डे घटस्यासत्त्वेऽत्यन्तासत्त्वमेवेति । अत्रासत्कार्यवादो चोदयति ॐ नन्वेवं सति इति ॐ । प्राक् प्रसिद्धमपि कार्यं कदाचित् कारणेन योजयितुं व्यापारोऽर्थवान् भवेदित्यत आह ॐ तदनन्यत्वाच्च इति ॐ । परिहरति ॐ नैष दोषः इति ॐ । उक्तमेतद्यथा भुजङ्गतत्त्वं न रज्जोर्भिद्यते, रज्जुरेव हि
भामती-व्याख्या
क्योंकि असत्त्व अभाव पदार्थ है, अभाव निरुपाख्य माना जाता है, अतः 'अभाव पदार्थ इन दैशिक और कालिक सीमाओं के बीच में रहता है'—ऐसी उपाख्या सम्भव नहीं। खेत और घर आदि भाव पदार्थों का ही सीमाङ्कन हो सकता है, अभाव का नहीं—"अभावस्य च निरुपाख्यत्वात् 'प्रागुत्पत्तेः'—इति मर्यादाकरणमनुपपन्नम्"। यदि कहा जाय कि अभावों में अत्यन्ताभाव और वन्ध्या-सुतादि अलीक पदार्थों का मर्यादा-करण अवश्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अनुपाख्य हैं किन्तु प्रागभाव घटादि के द्वारा उपाख्येय (निरूपणीय) होता है, अतः उसकी मर्यादा घटकी उत्पत्ति क्यों न हो सकेगी ? इस शङ्का का उत्तर है—"यदि च वन्ध्यापुत्रः कारकव्यापारादूर्ध्वमभविष्यत्"। इस तथ्य का स्पष्टीकरण पहले ही किया जा चुका है कि जैसे घट कभी पट नहीं हो सकता, वैसे ही असत् पदार्थ कभी सत् नहीं हो सकता, प्रागभाव भी असत् और अनुपाख्य है, अतः उसका भी मर्यादा-करण सम्भव नहीं। फलतः मृत्पिण्ड में घट का असत्ता मानने पर घट का अत्यन्त असत् ही मानना होगा।
शङ्का—"नन्वेवं सति" इत्यादि भाष्य में असत्कार्यवादी की ओर से यह शङ्का प्रस्तुत की गई है कि यदि घटादि कार्य को पहले से ही सत् (सिद्ध) माना जाता है, तब उसकी उत्पत्ति के लिए कुलालादि कारक-चक्र का व्यापार निरर्थक हो जाता है, क्योंकि उस समय जैसे सिद्ध तन्तुरूप कारण का स्वरूप-लाभ करने के लिए कोई व्यापार नहीं किया जाता, वैसे ही सिद्ध घटादि की सिद्धि के लिए कोई व्यापार क्यों किया जायगा ? जैसे दो सिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध स्थापित करने के लिए व्यापार किया जाता है, वैसे भी प्रकृत में कोई व्यापार अपेक्षित नहीं, क्योंकि "तदनन्यत्वात्"। सत्कार्यवाद में कार्य और कारण का अत्यन्त अभेद माना जाता है, जब कि सम्बन्ध को भेद की अपेक्षा होती है।
**समाधान—**उक्त शङ्का का भाष्यकार परिहार करते हैं—"नैष दोषः"। यह कहा जा चुका है कि जैसे आरोपित सर्प अपने आधारभूत रज्जु से भिन्न नहीं, रज्जु ही सर्प है,