भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअसत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८३
स्थितिगतिवदनेकधर्माश्रयत्वं संभवति । कूटस्थं च नित्यं ब्रह्म सर्वविक्रियाप्रतिषेधा-
दित्यवोचाम, न च यथा ब्रह्मण आत्मैकत्वदर्शनं मोक्षसाधनम्, एवं जगदाकारपरि-
णामित्वदर्शनमपि स्वतन्त्रमेव कस्मैचित्फलायाभिप्रेयते, प्रमाणाभावात् । कूटस्थब्रह्मा-
त्मत्वविज्ञानादेव हि फलं दर्शयति शास्त्रम्—‘स एष नेति नेत्यात्मा’ इत्युपक्रम्य
‘अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि’ ( बृ० ४।२।४ ) इत्येवंजातीयकम् । तत्रैतत्सिद्धं
भवति—ब्रह्मप्रकरणे सर्वधर्मविशेषरहितब्रह्मदर्शनादेव फलसिद्धौ सत्यां यत्तत्राफलं
श्रूयते ब्रह्मणो जगदाकारपरिणामित्वादि, तद्ब्रह्मदर्शनोपायत्वेनैव विनियुज्यते,
फलवत्सन्निधावफलं तदङ्गमितिवत्, नतु स्वतन्त्रं फलाय कल्प्यत इति । नहि
परिणामवत्त्वविज्ञानात्परिणामवत्त्वमात्मनः फलं स्यादिति वक्तुं युक्तम् , कूटस्थनित्य-
त्वान्मोक्षस्य । ननु कूटस्थब्रह्मात्मवादिन एकत्वैकान्त्यादीशीत्रीशितव्याभाव ईश्वरका-
भामती
मश्च तदभावश्च कोटस्थं भविष्यत इति । निराकरोति ॐ न, कूटस्थस्येति विशेषणाद् इति ॐ ।
कूटस्थनित्यता हि सदातनी स्वभावावप्रच्युतिः, सा कथं प्रच्युत्या न विरुध्यते ? न च धर्मिणो व्यतिरि-
च्यते धर्मो येन तदुपजनापायाऽपि धर्मो कूटस्थः स्यात् । भेद ऐकान्तिके गवाश्ववद्धर्मधर्मिभावाभावात् ।
बाणादयस्तु परिणामिनः स्थित्या गत्या च परिणमन्त इति । अपि च स्वाध्यायाध्ययनविध्यापादितार्थ-
वत्त्वस्य वेदराशेरेकेनापि वर्णेनानर्थकेन न भवितव्यम्, किं पुनरियता जगतो ब्रह्मयोनित्वप्रतिपादकेन
वाक्यसन्दर्भेण, तत्र फलवद् ब्रह्मदर्शनसमानासनसन्निधावफलं जगद्योनित्वं समाम्नायमानं तदर्थं
सत्तदुपायतयाऽवतिष्ठते नार्थान्तरार्थमित्याह ॐ न च यथा ब्रह्मणः इति ॐ । अतो न परिणामपरत्वमस्ये-
त्यर्थः । तदनन्यत्वमित्यस्य सूत्रस्य प्रतिज्ञाविरोधं श्रुतिविरोधञ्च चोदयति ॐ कूटस्थब्रह्मात्मवादिनः इति ॐ ।
भामती-व्याख्या
ब्रह्म सृष्टि के समय परिणाम और प्रलय के समय परिणामाभाव का आश्रय क्यों नहीं हो सकता ? इस शङ्का का निराकरण किया जाता है—“न, कूटस्थस्येति विशेषणात्” । कूटस्थ-नित्यता नाम है स्वभावाऽप्रच्युति का, वह ब्रह्म में नित्य है। अतः उसकी प्रच्युति कभी नहीं हो सकती । कूटस्थत्वाप्रच्युति के बिना परिणामवाद सम्भव नहीं। धर्मी से धर्मों को अत्यन्त भिन्न नहीं माना जा सकता कि उनकी उत्पत्ति और विनाश की अवस्था में धर्मी कूटस्थ बना रहे। धर्मों को अत्यन्त भिन्न मानने पर गो-अश्व के समान धर्मधर्मिभाव उपपन्न नहीं हो सकता। बाण आदि पदार्थ कूटस्थ न होने के कारण स्थिति और गति के रूप में परिणत हो जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इस विधिवाक्य के द्वारा समस्त वेदराशि में अर्थवत्ता प्रसाधित की गयी है। अतः उसका एक वर्ण भी अनर्थक नहीं हो सकता, फिर भला ब्रह्म की अपरिणामिता के प्रतिपादक अनेक वेदान्तवाक्यों का नैरर्थक्य सम्भव क्योंकर होगा? ब्रह्म के जगदाकारपरिणामित्व का प्रतिपादन करने वाले वेदान्तवाक्यों का स्वतन्त्र कोई फल या प्रयोजन नहीं माना जा सकता क्योंकि ब्रह्मात्मता-दर्शन का फल मोक्ष बताया गया है किन्तु ब्रह्म के प्रपञ्चाकार-परिणामित्व का कोई फल नहीं माना जाता। अतः ‘फलवत्सन्निधौ अफलं तदङ्गं भवति’ इस न्याय के आधार पर सृष्टिप्रक्रिया का प्रतिपादन ब्रह्मावगति का साधनमात्र माना जाता है। भाष्यकार यही कह रहे हैं—‘‘न च यथा ब्रह्मण आत्मैकत्वदर्शनं मोक्षसाधनमेवं जगदाकारपरिणामित्वदर्शनमपि स्वतन्त्रमेव कस्मैचित्फलाय’’। फलतः सृष्टिप्रतिपादक वाक्यों को परिणामपरक नहीं माना जा सकता। ‘‘तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’’—इस सूत्र पर प्रतिज्ञाविरोध और श्रुतिविरोध का आक्षेप किया जाता है—‘‘ननु कूटस्थब्रह्मात्मवादिनः’’। अर्थात् ब्रह्म को नित्यकूटस्थ