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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५८२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४

व्यवहारो लौकिको वैदिकश्चेत्यवोचाम । तस्मादन्त्येन प्रमाणेन प्रतिपादित आत्मैकत्वे समस्तस्य प्राचीनस्य भेदव्यवहारस्य बाधितत्वान्नानेकात्मकब्रह्मकल्पनावकाशोऽस्ति । ननु मृदादिदृष्टान्तप्रणयनात्परिणामवद्ब्रह्म शास्त्रस्याभिमतमिति गम्यते । परिणामिनो हि मृदादयोऽर्था लोके समधिगता इति । नेत्युच्यते, ‘स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म’ ( बृ० ४।४।२५ ) ‘स एष नेति नेत्यात्मा’ ( बृ० ३।९।२६ ), ‘अस्थूलमण्व’ ( बृ० ३।८।८ ) इत्याद्याभ्यः सर्वविक्रियाप्रतिषेधश्रुतिभ्यो ब्रह्मणः कूटस्थत्वावगमात् । न ह्येकस्य ब्रह्मणः परिणामधर्मत्वं तद्रहितत्वं च शक्यं प्रतिपत्तुम् । स्थितिगतिवत्स्यादिति चेत्—न, कूटस्थस्येति विशेषणात् । नहि कूटस्थस्य ब्रह्मणः


भामती

सत्यञ्च तदविसंवादादनृतञ्च विचारासहतयाऽनिर्वच्यत्वात् । अन्त्यस्यैकात्म्यज्ञानस्यानपेक्षतया बाधकत्वमनेकत्वज्ञानस्य च प्रतियोगिग्रहापेक्षया दुर्बलत्वेन बाध्यत्वं वदन् प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मादन्त्येन प्रमाणेन इति ॐ । स्यादेतत्—न वयमनेकत्वव्यवहारसिद्ध्यर्थमनेकत्वस्य तात्त्विकत्वं कल्पयामः, किन्तु श्रौतमेवास्य तात्त्विकत्वमिति चोदयति ॐ ननु मृदादि इति ॐ । परिहरति ॐ नेत्युच्यते इति ॐ । मृदादिदृष्टान्तेन हि कथञ्चित्परिणाम उन्नेयः, न च शक्य उन्नेतुमपि, मृत्तिकेत्येव सत्यमिति कारणमात्रसत्यत्वावधारणेन कार्यस्यानृतत्वप्रतिपादनात् साक्षात् कूटस्थनित्यत्वप्रतिपादिकास्तु सन्ति सहस्रशः श्रुतय इति न परिणामधर्मता ब्रह्मणः । अथ कूटस्थस्यापि परिणामः कस्मान्न भवतीत्यत आह ॐ नह्येकस्य इति ॐ । शङ्कते ॐ स्थितिगतिवद् इति ॐ । यथैकवाणाश्रये गतिनिवृत्ती एवमेकस्मिन् ब्रह्मणि परिणा-


भामती-व्याख्या

का निर्वाह हो जाता है, अतः व्यवहार-निर्वाहक ज्ञान के लिए उसके विषयीभूत अनेकत्व को तात्त्विक मानने की आवश्यकता नहीं। अनेकत्व को तात्त्विक या सत्य इसलिए नहीं कह सकते कि उसका विसंवाद होता है, अतः वह अनृत (मिथ्या) है, क्योंकि विचार की कसौटी पर खरा न उतरने के कारण अनिर्वचनीय है। अन्तिम एकात्मतावगति को अन्य ज्ञान की अपेक्षा न होने के कारण प्रमाण या बाधकरूप एवं अनेकत्वावगति को प्रतियोगिज्ञानादि की अपेक्षा होने के कारण बाध्यरूप बताते हुए प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मादन्त्येन प्रमाणेन प्रतिपादिते"।

अनेकत्व-व्यवहार की सिद्धि के लिए अनेकत्व को तात्त्विक नहीं माना जाता अपितु श्रुति के आधार पर आत्मा में अनेकत्व सिद्ध होता है—इस प्रकार की शंका की जाती है—"ननु मृदादिदृष्टान्तप्रणयनात्परिणामवद् ब्रह्म"। जैसे मृत्तिका घट, शराव आदि अनेक रूपों में परिणत होने के कारण अनेकरूप मानी जाती है वैसे ही ब्रह्म आकाश आदि अनेक रूपों में परिणत होने के कारण अनेकरूप क्यों नहीं ? उक्त शङ्का का परिहार किया जाता है—"नेत्युच्यते"। मृदादि दृष्टान्तों के आधार पर परिणामवाद की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि "मृत्तिकेत्येव सत्यम्" इस वाक्य के द्वारा कारणमात्र की सत्यता अवधारित होने के कारण कार्यप्रपञ्च में अनृतत्व सिद्ध किया जाता है एवं ब्रह्म में कूटस्थत्व, नित्यत्व और एकत्व आदि की प्रतिपादिका अनन्त श्रुतियाँ हैं, अतः ब्रह्म को परिणामी कभी भी नहीं कहा जा सकता। कूटस्थ एकतत्त्व को परिणामी क्यों नहीं माना जा सकता—इसका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न ह्येकस्य ब्रह्मणः परिणामधर्मत्वम्"। एक तत्त्व को परिणाम और परिणामाभाव वाला नहीं कहा जा सकता। एक तत्त्व में भी कथित उभयरूपता की शङ्का की जाती है—"स्थितिगतिवत्स्यात्"। अर्थात् जैसे एक ही बाण कभी गति (स्पन्दन) और कभी उसके अभाव (स्थिति) का आश्रय होता है वैसे ही एक ही