भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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असत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८१

माणेऽर्थे आकाङ्क्षा स्यात् । न त्वात्मैकत्वव्यतिरेकेणावशिष्यमाणोऽन्योऽर्थोऽस्ति य आकाङ्क्ष्येत । न चेयमवगतिर्नोत्पद्यत इति शक्यं वक्तुम् 'तद्धास्य विजज्ञौ' ( छा० ६।१६।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अवगतिसाधनानां च श्रवणादीनां वेदानुवचनादीनां च विधानात् । न चेयमवगतिरनर्थिका भ्रान्तिर्वेति शक्यं वक्तुम् । अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात्, बाधकज्ञानान्तराभावाच्च । प्राक्चात्मैकत्वावगतेरव्याहतः सर्वः सत्यानृत-

भामती

प्रतिक्षिप्येत, तत्रानुकूलप्रतिकूलनिवारणाज्ञातः परं किञ्चिदाकांक्ष्यमिति । न चेयमवगतिर्दुलिक्षीरप्रायेत्याह ॐ न चेयम् इति ॐ । स्यादेतत् -- अन्त्या चेदियमवगतिर्निष्प्रयोजना तर्हि तथा च न प्रेक्षावद्भिरुपादीयेत, प्रयोजनवत्त्वे वा नान्त्या स्यादित्यत आह ॐ न चेयमवगतिरनर्थिका ॐ । कुतः ? ॐ अविद्यानिवृत्तिफलदर्शनात् ॐ । नहीयमुत्पन्ना सती पश्चादविद्यां निवर्त्तयति येन नान्त्या स्यात्, किन्तुविद्याविरोधिसद्भावतया तन्निवृत्त्यात्मैवोद्यते । अविद्यानिवृत्तिश्च न तत्कार्यतया फलमपि त्विष्टतयेष्टलक्षणत्वात् फलस्येति । प्रतिकूलं पराचीनं निराकर्तुमाह ॐ भ्रान्तिर्वा इति ॐ । कुतः ? ॐ बाधक इति ॐ । स्यादेतत् - मा भूदेकत्वनिबन्धनो व्यवहारोऽनेकत्वनिबन्धनस्त्वस्ति, तदेव हि सकलामुद्वहति लोकयात्राम्, अतस्तत्सिद्ध्यर्थमनेकत्वस्य कल्पनीयं तात्त्विकत्वमित्यत आह ॐ प्राक् च इति ॐ । व्यवहारो हि बुद्धिपूर्वककारिणां बुद्धयोपपद्यते, न त्वस्यास्तात्त्विकत्वेन, भ्रान्त्यापि तदुपपत्तेरित्यावेदितम् ।

भामती-व्याख्या

है। उस (एकत्व-विषयिणी) अवगति के पश्चात् कुछ भी अनुकूल या प्रतिकूल कर्त्तव्य शेष ही नहीं रहता, जिसकी अपेक्षा या उपेक्षा होती। 'यह अवगति डुलि (कछुई) के दूध के समान अत्यन्त अप्रसिद्ध और अलीक है' - ऐसा नहीं कह सकते - "न चेयमवगतिर्नोत्पद्यते"। "तद्धास्य विजज्ञौ" (छा० ६।१६।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मावगति का अपलाप नहीं किया जा सकता। 'उक्त अवगति यदि अन्तिम कार्य है, तब उसका कोई प्रयोजन पश्चात् सिद्ध न होने के कारण वह निष्प्रयोजन क्यों नहीं ? निष्प्रयोजन पदार्थ के सम्पादन में पुरुष-प्रवृत्ति सम्भव नहीं, अतः उस अवगति का कुछ प्रयोजन (लाभ) यदि माना जाता है, तब अन्तिम कैसे ? इस शङ्का का अनुवाद करते हैं - "न चेयमवगतिरनर्थिका", क्योंकि अविद्या की निवृत्ति उसका फल या प्रयोजन माना जाता है। आशय यह है कि उक्त अवगति स्वयं उत्पन्न होकर अविद्या-निवृत्तिरूप फल को उत्पन्न करती, तब अवगति को अन्तिम कार्य नहीं कहा जा सकता था किन्तु अवगति नाम है - ब्रह्म-साक्षात्कार का, ब्रह्म-साक्षात्कार ब्रह्मरूप होने के कारण नित्य-सिद्ध है। अविद्या का विरोधिस্বরূপ है अवगति, अतः अवगति की अभिव्यक्ति होने पर अविद्या-निवृत्ति प्रकट होती है। अविद्या-निवृत्ति भी विद्यात्मक ब्रह्मस्वरूप है, अतः वह जनित नहीं होती, उसमें जन्यता-प्रयुक्त फलरूपता का व्यवहार नहीं होता, अपितु इष्यमाण (पुरुषाभिलषित) होने के कारण अविद्या-निवृत्ति को फल या पुरुषार्थ माना जाता है। उक्त अवगति के पश्चाद्भावी प्रतिकूल पदार्थ का निराकरण किया जाता है - "भ्रान्तिर्वा"। उस अन्तिम अवगति के पश्चात् यदि कोई भ्रान्ति होगी, तब उसका अन्य बाधक कौन होगा ?

यदि एकत्वावगति से व्यवहार का निर्वाह नहीं होता, तब अनेकत्व-निबन्धन व्यवहार तो उपपन्न हो जाता है, अतः अनेकत्व सम्पूर्ण लोक-यात्रा का उद्वाहक होने के कारण तात्त्विक क्यों न मान लिया जाय ? इस शङ्का का निरास करते हैं - "प्राक् चात्मैकत्वावगतेः"। सारांश यह है कि बुद्धिपूर्वककारी पुरुषों का व्यवहार केवल ज्ञान के आधार पर सम्पन्न हो जाता है, ज्ञान प्रमात्मक ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं, भ्रम ज्ञान से भी व्यवहार