भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. २ पा. १ सू. १४
स्मिन्त्स्वप्ननिदर्शने' ( छा० ५।२।९ ) इत्यसत्येन स्वप्नदर्शनेन सत्यायाः समृद्धेः प्रतिपत्तिं दर्शयति । तथा प्रत्यक्षदर्शनेषु केषुचिदरिष्टेषु जातेषु 'न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात्' इत्युक्त्वा 'अथ यः स्वप्ने पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति' इत्यादिना तेन तेनासत्येनैव स्वप्नदर्शनेन सत्यं मरणं सूच्यत इति दर्शयति । प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानामीदृशेन स्वप्नदर्शनेन साध्वागमः सूच्यत ईदृशेना- साध्वागम इति । तथाऽकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिर्दृष्टा रेखानृताक्षरप्रतिपत्तेः । अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकं नातः परं किंचिदाकाङ्क्ष्यमस्ति । यथा हि लोके यजेतेत्युक्ते किं केन कथमित्याकाङ्क्ष्यते, नैवं 'तत्त्वमसि' 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्युक्ते किंचिदन्यदाकाङ्क्ष्यमस्ति, सर्वात्मकत्वविषयत्वावगतेः । सति ह्यन्यस्मिन्नवशिष्य-
भामती
तद्यथासङ्केतमसत्यं, नहि सङ्केतयितारः सङ्केतयन्तीदृशेन रेखाभेदेनायं वर्णः प्रत्येतव्यः, अपि त्वीदृशो रेखाभेदोऽकार ईदृशश्च ककार इति, तथा चासमीचीनात् सङ्केतात्समीचीनवर्णावगतिरिति सिद्धम् । यच्चोक्तमेकत्वांशेन ज्ञानमोक्षव्यवहारः सेत्स्यति नानात्वांशेन तु कर्मकाण्डाश्रयो लौकिकश्च व्यवहारः सेत्स्यतीति तत्राह ॐ अपि चान्त्यमिदं प्रमाणम् इति ॐ । यदि खल्वेकत्वानेकत्वनिबन्धनौ व्यवहारा- वेकस्य पुंसोऽपर्यायेण सम्भवतस्ततस्तदर्थमुभयसद्भावः कल्प्येत, न त्वेतदस्ति, नह्येकत्वावगतिनिबन्धनः कश्चिदस्ति व्यवहारस्तदवगतेः सर्वोत्तरत्वात् । तथाहि तत्त्वमसीत्येकात्म्यावगतिः समस्तप्रमाणतत्फल- तद्व्यवहारानपबाधमानैवोदीयते, नैतस्याः परस्तात् किञ्चिदनुकूलं प्रतिकूलं चास्ति यदपेक्षेत येन चेयं
भामती-व्याख्या
सिद्ध है—"तथा च श्रुतिः"। यद्यपि स्वाप्न-दर्शन सत्य है, तथापि स्त्री आदि स्वाप्न विषय असत्य हैं, अतः ऐसे विषय से विशिष्ट ज्ञान को भी असत्य ही माना गया है। सत्य और असत्य का कार्य-कारणभाव केवल श्रुति-सिद्ध ही नहीं, अन्वय-व्यतिरेक से भी सिद्ध है—"प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वयव्यतिरेककुशलानाम्"। यहाँ नैयायिकादि-सम्मत कार्य-कारणभाव के नियामक अन्वय और व्यतिरेक का ग्रहण किया गया है, जिसके आधार पर विशेष स्वप्न-दर्शन से विशेष ( समृद्धि या मरणादि ) कार्य की सिद्धि होती है। जाग्रत्कालीन निदर्शन से भी यही सिद्ध होता है—"तथाकारादिसत्याक्षरप्रतिपत्तिः"। मुख से बोला जानेवाला अकार वर्ण सत्य और 'अ' रेखा असत्य अकार है, इनका कार्य-कारणभाव लोक-प्रसिद्ध है। यद्यपि रेखा का स्वरूप सत्य है, तथापि उस रेखा से जो संकेत किया जाता है कि यह (रेखा) अवर्ण है, वह असत्य है, क्योंकि संकेतयिता पुरुष ऐसा संकेत नहीं करते कि 'इस रेखा को देखकर अकार या ककार का बोध करना चाहिए', अपितु 'यह रेखा ही अकार है और यह रेखा ककार'—ऐसा संकेत असत्य है। इस प्रकार के असमीचीन ( असत्य ) संकेत से समीचीन वर्णावगति होती है— यह सिद्ध हो जाता है।
यह जो कहा गया था कि 'एकत्वांश के ज्ञान से मोक्ष-व्यवहार और नानात्वांश के ज्ञान से कर्मकाण्ड-सम्बन्धी व्यवहार सिद्ध होगा', उस पर व्यवस्था दी जाती है—"अपि चान्त्यमिदं प्रमाणमात्मैकत्वस्य प्रतिपादकम्"। आशय यह है कि यदि एकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त और अनेकत्व-ज्ञान-प्रयुक्त दोनों व्यवहार एक ही पुरुष में क्रमशः सम्भव हो जाते, तब अवश्य ही एकत्व और नानात्व—इन दोनों धर्मों की कल्पना कर सकते थे, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि एकत्व की अवगति वह अन्तिम कार्य है, जिसके अनन्तर कोई व्यवहार रहता ही नहीं। "तत्त्वमसि"—इस प्रकार एकात्मत्व की अवगति अपने से पूर्वभावी समस्त (प्रमाण, तज्जन्य अर्थावगति और अर्थविषयक ) व्यवहार का बाध करती हुई ही उदय होती