भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार्यकारणयोरनन्यत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८५
परमार्थावस्थायां सर्वव्यवहाराभावं वदन्ति वेदान्ताः सर्वे । तथेश्वरगीतास्वपि – 'न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥' ( गी० ५।१४-१५ ) इति परमार्थावस्थायामीशित्रीशितव्यादिव्यवहाराभावः प्रदर्श्यते । व्यवहारावस्थायां तूक्तः श्रुतावपीश्वरादिव्यवहारः–'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपति- रेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' ( बृ० ४।४।२२ ) इति । तथा चेश्वरगीतास्वपि – 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया' ( गी० १८।६१ ) इति । सूत्रकारोऽपि परमार्थाभिप्रायेण 'तदनन्यत्वम्' इत्याह । व्यवहाराभिप्रायेण तु 'स्याल्लोकवद्' इति महासमुद्रस्थानीयां ब्रह्मणः कथयति । अप्रत्याख्यायैव कार्यप्रपञ्चं परिणामप्रक्रियां चाश्रयति–सगुणे- षूपासनेषूपयोक्ष्यत इति ॥ १४ ॥
भावे चोपलब्धेः ॥ १५ ॥
इतश्च कारणादनन्यत्वं कार्यस्य, यत्कारणं भाव एव कारणस्य कार्यमुपलभ्यते,
भामती
कारणस्य भावः सत्ता चोपलम्भश्च तस्मिन् कार्यस्योपलब्धेर्भावाच्च । एतदुक्तं भवति — विषयपदं विषयविषयिपरं, विषयिपदमपि विषयविषयपरं, तेन कारणोपलम्भभावयोरुपादेयोपलम्भभावादिति सूत्रार्थः सम्पद्यते । तथा च प्रभारूपानुविद्धबुद्धिबोध्येन चाक्षुषेण न व्यभिचारः, नापि वह्निभावाभावा- नुविधायिभावाभावेन धूमभेदेनेति सिद्धं भवति । तत्र यथोक्तहेतोरेकदेशाभिधानेनोपक्रमते भाष्यकारः ❖ इतश्च कारणादनन्यत्वं ❖ भेदाभावः ❖ कार्यस्य, ❖ यत्कारणं ❖ यस्मात् कारणात् । ❖ भाव एव
भामती-व्याख्या
कार्य और कारण के अनन्यत्व ( अभेद ) का साधक यह अन्वय-सूत्र है— "भावे चोपलब्धेः" । [ यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि 'यत् सत्त्वे यत्सत्त्वम्' या 'यदुपलब्धौ यदुप- लब्धिः' इस प्रकार का प्रत्येक अन्वय केवल कार्य-कारणभाव का ही साधक है, कार्य और कारण के अभेद का नहीं । अभेद-सिद्धि के लिए 'सत्त्व' ( भावत्व ) और 'उपलब्धि'— इन दोनों का मिलित अन्वय अपेक्षित है— यद्भावोपलब्ध्योः यद्भावोपलब्धी, तयोरभेदः । इसके अनुरूप सौत्र पदों की योजना की जाती है ] । 'कारणभावे च कार्योपलब्धेः'— इस प्रकार के प्रकरणोपयोगी वाक्य में यद्यपि 'भाव' पद केवल सत्त्वरूप विषय का एवं 'उपलब्धि' पद केवल ज्ञानरूप विषयी का वाचक है, तथापि दोनों पदों से विषय और विषयी—दोनों विवक्षित हैं, क्योंकि उपादान कारण के भाव एवं उपलम्भ पर उपादेय ( कार्य ) का भाव और उपलम्भ निर्भर है, अतः उपादान और उपादेय का अभेद है—ऐसा सूत्र का अर्थ विवक्षित है । यदि 'यदुपलब्धौ यदुपलब्धिः, तयोरभेदः'— इतना ही नियम माना जाता है, तब आलोक और घटादिरूप चाक्षुष विषय में व्यभिचार हो जाता है, क्योंकि आलोक की उपलब्धि होने पर ही घटादि की उपलब्धि होती है, तथापि आलोक और घटादि पदार्थों का अभेद नहीं होता । इसी प्रकार 'यद्भावे यद्भावः, तयोरभेदः'— इतनी ही व्याप्ति मानी जाय, तब अग्नि और धूमादि में व्यभिचार हो जाता है, क्योंकि अग्नि के होने पर धूम होता है, किन्तु वह अग्नि से अभिन्न नहीं होता । [ उभयरूपता की उभयत्र विवक्षा होने पर कहीं भी व्यभिचार नहीं होता, क्योंकि, न तो आलोक के होने पर घटादि का होना अनिवार्य होता है और न अग्नि की उपलब्धि होने पर धूम की उपलब्धि आवश्यक है ] । कथित भाव और उपलब्धि— इन दो हेतुओं में से एक ( भाव ) हेतु का
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