भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअसत्यात्सत्यस्योत्पत्तिः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७७
प्रत्यक्षाभिमतं विज्ञानं भवति प्राक्प्रबोधात्, नच प्रत्यक्षाभासाभिप्रायस्तत्काले भवति, तद्वत् । कथं त्वसत्येन वेदान्तवाक्येन सत्यस्य ब्रह्मात्मत्वस्य प्रतिपत्ति- रुपपद्येत ? नहि रज्जुसर्पेण दष्टो म्रियते । नापि मृगतृष्णिकाम्भसा पानावगाहनादि-
भामती
तदनुभाष्य दूषयति ॐ कथं त्वसत्येन इति ॐ । शक्यमत्र वक्तुं श्रवणाद्युपाय आत्मसाक्षात्कारपर्यन्तो वेदान्तसमुत्थोऽपि ज्ञाननिचयोऽसत्यः, सोऽपि हि वृत्तिरूपः कार्यतया निरोधधर्मा, यस्तु ब्रह्मस्वभावसाक्षा- त्कारोऽसौ न कार्यस्तत्स्वभावत्वात्, तस्मादचोद्यमेतत् ॐ कथमसत्यात्सत्योत्पादः इति ॐ । यत् खलु सत्यं न तदुत्पद्यत इति कुतस्तस्यासत्यादुत्पादो ? यच्चोत्पद्यते तत्सर्वमसत्यमेव । सांव्यवहारिकं तु सत्यत्वं वृत्तिरूपस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्येव श्रवणादीनामप्यभिन्नं, तस्मादभ्युपेत्य वृत्तिस्वरूपस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य परमार्थसत्यतां व्यभिचारोद्भावनमिति मन्तव्यम् । यद्यपि सांव्यवहारिकस्य सत्यादेव भयात्सत्यं मरण- मुत्पद्यते तथापि भयहेतुरहितस्तज्ज्ञानं वाऽसत्यं ततो भयं सत्यं जायत इत्यसत्यात्सत्यस्योत्पत्तिरुक्ता । यद्यपि बाहिज्ञानमपि स्वरूपेण सत्तथापि न तज्ज्ञानत्वेन भयहेतुरपि त्वनिर्वच्याहिरूपितत्वेन । अन्यथा रज्जुज्ञानादपि भयप्रसङ्गाज्ज्ञानत्वेनाविशेषात् । तस्मादनिर्वच्याहिरूपितं ज्ञानमप्यनिर्वच्यमिति सिद्धम- सत्यादपि सत्यस्योपजन इति । न च ब्रूमः सर्वस्मादसत्यात्सत्यस्योपजनो, यतः समारोपितधूमभावाया
भामती-व्याख्या
स्पष्टीकरण किया गया है—"यथा सुप्तस्य प्राकृतस्य जनस्य"। अर्थात् जैसे स्वप्नावस्था में साधारण व्यक्ति जो कुछ भी देखता है, उसको तब तक सत्य और प्रत्यक्ष ही समझता रहता है, जब तक जाग नहीं जाता। वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति वस्तुतः मिथ्या प्रपञ्च को व्यवहार-काल में सत्य ही समझता है।
यह जो शङ्का की गई थी कि "कथं चानृतेन मोक्षशास्त्रेण प्रतिपादितस्य सत्यत्वम् ?" उस शङ्का का अनुवादपूर्वक निरास किया जाता है—"कथं त्वसत्येन सत्यस्य प्रतिपत्तिः ?" यहाँ यह विस्पष्ट कहा जा सकता है कि श्रवणादि साधनों के द्वारा वेदान्त-वाक्य-जनित आत्मसाक्षात्कार-पर्यन्त ज्ञान-परम्परा असत्य है, क्योंकि वह अन्तःकरण की एक वृत्ति है, अन्तःकरण का विकार होने के कारण अन्तःकरण का धर्म है, किन्तु जो ब्रह्मस्वरूप साक्षात्कार है, वह किसी का कार्य (विकार) नहीं, क्योंकि वह ब्रह्मस्वरूप है, अतः यह आक्षेप निराधार है कि असत्य साधन से सत्य का उत्पाद क्योंकर होगा। अर्थात् जो ब्रह्मस्वरूप सत्य साक्षात्कार है, वह उत्पन्न नहीं होता और जो वृत्तिरूप साक्षात्कार उत्पन्न होता है, वह असत्य ही माना जाता है। वृत्तिरूप ब्रह्म-साक्षात्कार में सांव्यवहारिक (व्यवहार-काल में अबाधितत्वरूप) सत्यत्व माना गया है और उसके साधनीभूत श्रवणादि में भी सत्यत्व अभिमत है। फलतः वृत्तिरूप ब्रह्म-साक्षात्कार में परमार्थ-सत्यता समझ कर व्यभिचारोद्भावन किया गया है। यद्यपि व्यावहारिक सर्प के सत्य भय से ही सत्य मरण होता है, आरोपित सर्प से नहीं। तथापि आरोपित सर्प को देख कर जो भय उत्पन्न होता है, वह सत्य ही है, अतः असत्य से सत्य की उत्पत्ति कही गई है। आरोपित सर्प का ज्ञान भी सत्य ही है, अतः उससे भयादि की उत्पत्ति सत्य से ही सत्य की उत्पत्ति है, किन्तु सर्प-ज्ञान जिस रूप से सत्य है, उस रूप से भयादि का हेतु नहीं अर्थात् वह ज्ञानत्वेन सत्य है, ज्ञानत्वेन वह भयादि का जनक नहीं, अपितु अनिर्वचनीय सर्प-विशिष्टत्वेन भयादि का साधक है, अन्यथा [विषय-रहित केवल ज्ञान को भयादि का उत्पादक मानने पर] रज्जु के ज्ञान से भी भयादि की उत्पत्ति प्रसक्त होती है। अनिर्वचनीय विषय से विशिष्ट ज्ञान भी अनिर्वचनीय ही है, सत्य नहीं, फलतः सर्प-ज्ञान से भयादि की उत्पत्ति भी असत्य से ही
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